उम्मीद
हर रोज़ उम्मीदों को,
जुड़ते टूटते देखा है।
हम जो थे अब तक
आशाओं से भरे हुए,
उन आशाओं को
क्षण-क्षण
बिखरते देखा है।
जीने की जो इच्छा है,
उसको तिल-तिल
छूटते देखा है।
हमने बहुत पास से
खुद को बदलते देखा है।
ज़िंदगी गुजार दी
जिन रिश्तों को संवारने में,
उन्हीं रिश्तों को हर पल
बदलते हुए देखा है।।
