Friday, 1 May 2026

India's Heritage : Buddha Purnima

(I) अवतरण दिवस :

आज बुद्ध पूर्णिमा है, भगवान बुद्ध का अवतरण दिवस। आज के India's Heritage segment में भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक घटना का वर्णन कर रहे हैं। भगवान बुद्ध भगवान श्रीहरि के नवें अवतार हैं।


(II) श्रीहरि के अवतार :

  • मत्स्य (मछली)
  • कूर्म (कछुआ)
  • वराह (सूअर)

यहाँ तक विष्णु जी ने पशु रूप में अवतार लेकर सृष्टि की रक्षा की।

तत्पश्चात अपने परमभक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु व हिरण्यकश्यपु के दर्प को चूर करने के लिए नरसिंह (नर-सिंह) भगवान का अवतरण लिया, जिस रूप में वो वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए आधे पशु व आधे मनुष्य रूप में (आधे नर व‌ आधे सिंह) अवतरित हुए। 

वमन (बौना ब्राह्मण) के अवतार के साथ ही विष्णु जी ने मनुष्य रूप धारण किया और उसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण और फिर बुद्ध के रूप में अवतार लिया। दशावतार में कल्कि के रूप में भी भगवान श्री हरि अवतार लेंगे।

भगवान विष्णु जी का हर स्वरूप न केवल देखने में, अपितु भगवान विष्णु जी के हर अवतार की शिक्षाएं, संस्कार, नीति भिन्न-भिन्न रही हैं।

भगवान बुद्ध भी सबसे भिन्न थे, उसी का उल्लेख है उनसे जुड़ी हुई इस कथा में...

Buddha Purnima


(III) युवराज सिद्धार्थ :

भगवान गौतम बुद्ध जन्म से इश्वाकू वंश के शाक्य कुल के युवराज सिद्धार्थ थे, पर उन्होंने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण से इतर, परिवार से ज्यादा कर्मों को प्रधानता दी।

अपने राज्य पाठ, सुख-ऐश्वर्य, यहां तक की परिवार को त्याग कर कठिन तप के द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया और राजकुमार सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बन गए।

संसार का ज्ञान प्राप्त करने से पहले राजपुत्र सिद्धार्थ लगभग छह साल तक उस समय के योग, समाधि में लीन कहे जानेवाले अनेक ऋषि, साधु, योगी, ज्ञानीब तथा महानुभवियों के शरण में गए थे।

गौतम बुद्ध संसार का ज्ञान प्राप्त करने हेतु छह साल तक दरदर भटकते रहे। उनके आखिरी गुरु ने उनसे कहा था कि आहार-चावल के दाने कम करते जाओ, जब एक दाने पर आओगे तब तुम्हें ज्ञान की प्राप्ति होगी।

ज्ञान पाने की लालसा में बुद्ध ने वैसा ही किया। वे शारिरिक रूप से बहुत ज़्यादा कमजोर हो गए। उनका पूरा शरीर बस एक हड्डियों का पिंजर बन कर रह गया था।

एक दिन वे बहते हुए पानी से दूसरी छोर जा रहे थे। जैसे ही वे बहते पानी के मुख्य धारा में आए, कमजोरी के कारण वे बहने लगे। बड़ी प्रयास से एक पत्थर को पकड़कर उन्होंने अपनी जान बचाई, और वे थके-हारे आज के बिहार राज्य में स्थित बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे जा बैठे।

बैसाखी पूर्णिमा की बात है, इस नगर की सुजाता नाम की वधु को बड़ी मनौती के पश्चात पुत्र प्राप्ति हुई थी। पुत्र प्राप्ति के ख़ुशी में सुजाता ग्राम के सभी देवी-देवताओं को दूध-चावल की बनी खीर का भोग चढ़ाने आई। 

सिद्धार्थ का अस्थि-पिंजर शरीर देखकर उसे बड़ी करुणा आई, खीर का पात्र सिद्धार्थ के सामने रखते हुए अनायास उसके मुख से शुभकामना निकल पड़ी, “जैसे मेरी कामना पूरी हुई है, वैसे ही तुम्हारी भी हो।”

खीर का सेवन करने के बाद सिद्धार्थ के तन-मन में तृप्ति का आभास हुआ। कमजोर शरीर को ऊर्जा प्राप्त हुई, तब उन्होंने संकल्प किया- “अब जीऊँ या मरूँ, जब तक ज्ञान कि प्राप्ति न होगी इस जगह से उठूंगा नही।” और निग्रह के साथ समाधि लगाई।

सिद्धार्थ इस अवस्था मे छह-दिन छह-रात रहे। छठवें दिन  एक निमिष (पलक झपकने में जितना समय लगता है) से भी कम समय में सिद्धार्थ को ज्ञान कि प्राप्ति हुई, और वे बुद्ध बन गए।

मगर जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई तब उनकी भगवान की अवधारणा तटस्थ थी, उन्होंने कभी ज्यादा भगवान के अस्तित्व के बारे में खुल कर बात नहीं की।

उनका ज्ञान था “जीवन में दुःख है। उस दुःख का कारण है औऱ उसका उपाय है कर्म और योग-साधना।”