Monday, 14 April 2025

Article : काम करो तो भीम जैसा

आज Dr. भीमराव अम्बेडकर की जयंती है, जिसके उपलक्ष्य पर school, college, सरकारी कार्यालयों में अवकाश है।

पर भीमराव अम्बेडकर थे कौन? और ऐसा भी उन्होंने क्या विशेष किया था कि उनके जन्मदिन पर अवकाश घोषित किया जाता है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर,  निम्न माहर जाति के गरीब परिवार के बेटे थे। 

यह बात आजादी से पहले की है। उस समय बहुत अधिक छुआछूत का बोलबाला था, अतः निम्न जाति के लोगों को बहुत से कष्ट झेलने पड़ते थे।

कुशाग्र बुद्धि के भीमराव ने देखा कि आजादी के मतवाले, अपनी जान कुर्बान करने को तैयार थे, देश को आजाद कराने के लिए।

उस समय क्रान्ति की लहर अपने चरम पर थी, जिसे देखकर, सभी को प्रतीत हो रहा था कि अब देश जल्द ही आजाद हो जाएगा। 

भीमराव ने सोचा कि, अब जब देश आजाद हो ही जाएगा, तो अगर निम्न जाति के उत्थान के लिए भी प्रयास किया जाए, तो देश की आजादी के साथ-साथ निम्न जाति का भी उद्धार हो जाएगा।

काम करो तो भीम जैसा


दुनिया-भर के देशभक्त देश की आजादी के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे, वहीं भीमराव अपनी उच्च शिक्षा के अध्ययन में लग गए।

वो अच्छी तरह से जानते थे कि केवल जूलुस निकालने और नारेबाजी से system को नहीं बदला जा सकता है, अगर system को बदलना है, तो पहले खुद की स्थिति मजबूत होनी चाहिए। 

और यदि आप धनाढ्य परिवार से जुड़े हुए नहीं हैं तो अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उच्च शिक्षित होना, उच्च पद पर आसीन होना ही दूसरा विकल्प है।

धनाढ्य परिवार से थे नहीं और उन्हें सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण निम्न जाति की स्थिति को मजबूत करना था।

अतः वे जी-जान से उच्च शिक्षा प्राप्त करने में जुट गए, जिसके चलते उन्होंने Alfinston School से पढ़ाई की थी। उन्होंने Bombay विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र व राजनीतिज्ञ विज्ञान में degree प्राप्त की। डॉ. अम्बेडकर ने कुल 32 शैक्षणिक degrees हासिल कीं जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

Graz IN में कानून की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने London School of Economics (LSE) में उच्च अर्थशास्त्र की degree भी हासिल की। 1923 में London School of Economics ने उनकी thesis को मान्यता दी और उन्हें doctor of science की उपाधि से सम्मानित किया। एक ही वर्ष में वे doctor और barrister दोनों बन गए।

अगर यह समझना है कि वो अपने लक्ष्य के प्रति कितने प्रतिबद्ध थे, तो वो भी देख लेते हैं।

क़िफायत से रहने के लिए लंदन में वे हमेशा पैदल चलते थे। खाने पर पैसे ख़र्च ना हों, ये सोच कर वे कई बार भूखे रह जाते थे। लेकिन पढ़ाई पर उनका पूरा ध्यान लगा रहता।

लंदन में बाबा साहेब आंबेडकर के roommate होते थे असनाडेकर। वे अम्बेडकर से कहते, ''अरे अम्बेडकर, रात बहुत हो गई है। कितनी देर तक पढ़ते रहोगे, कब तक जगे रहोगे? अब आराम करो, सो जाओ।"

Lieutenant धनंजय कीर की लिखी डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर की जीवनी में इसका ज़िक्र मिलता है। अंबेडकर अपने roommate को जवाब देते, ''अरे, मेरे पास खाने के लिए पैसे और सोने के लिए समय नहीं है। मुझे अपना कोर्स जल्द से जल्द पूरा करना है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है।''

इससे यह पता चलता है कि डॉ. अंबेडकर अपने लक्ष्य के प्रति कितने प्रतिबद्ध थे। 

वो समय आ चुका था, जिसका भीमराव को बड़ी शिद्दत से इंतजार था, देश आजाद हो चुका था और उनकी शिक्षा भी पूर्ण हो चुकी थी...

भीमराव के जुनून ने उन्हें वो पद दिला दिया, जिसकी उन्हें आकांक्षा थी। देश के संविधान निमार्ण कार्य की नींव रखी जा रही थी।

जिसके अन्य निर्माताओं के साथ उनका भी नाम था। बल्कि अत्यधिक शिक्षित और काबिल वही थे तो नाम मुख्य निर्माता में शामिल था।

बस फिर क्या था, बहुत से नियम-कानून के साथ-साथ उन्होंने निम्न जाति के उत्थान के लिए कई कानून बना दिए, जिसमें आरक्षण देने का प्रावधान, मील का पत्थर साबित हुआ।

हालांकि उन्होंने आरक्षण का प्रावधान केवल दस साल के लिए बनाया था, क्योंकि किसी का भी उत्थान करना हो, तो उसके लिए 10 साल की लंबी अवधि more than enough है। 

उनका आरक्षण देने का मुख्य उद्देश्य, निम्न जाति के लोगों को समान अवसर प्रदान कराना था,  जिससे योग्य व्यक्ति का विकास हो सके। 

इतने सालों के आरक्षण से समान अधिकार दिलाने का कार्य पूर्ण हो चुका है।

पर राजनीतिक ध्रुवीकरण के लाभ को बरकरार रखने के कारण आज भी जातिगत आरक्षण यथावत वैसे ही चल रहा है। 

अपनी जाति, अपने समाज को सर्वप्रथम रखना और उसका उत्थान करना, यही वजह है कि भीमराव अंबेडकर को आज भी लोग जानते हैं, पूजते हैं। जगह-जगह उनकी मूर्ति लगी है, उनके नाम से शहर हैं, universities हैं और उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में अवकाश भी घोषित किया गया है।

इसलिए कहा जाता है कि काम करो तो भीमराव जैसा, अर्थात सिर्फ अपने विकास के लिए न सोचें, बल्कि उत्थान अपनी, सम्पूर्ण जाति, समाज और देश का करने का सोचें...

पर जब हम बाबा भीमराव अम्बेडकर को इतना सम्मान देते हैं तो वही मान हमें उनकी दूरदर्शिता और सोच को भी देना चाहिए। 

उनकी सोच थी कि योग्य व्यक्ति को अवसर मिलने चाहिए, चाहे उसके पास साधन हो या न हो, या वो किसी भी जाति धर्म हो। 

क्योंकि योग्यता ही देश को सफल बनाने के लिए आवश्यक है। 

अतः अब आरक्षण केवल साधन विहीन योग्य व्यक्ति को ही मिलना  चाहिये। 

जिससे देश का सर्वांगीण विकास हो और देश सही मायने में आजादी के मतवालों और बाबा भीमराव अंबेडकर के सपनों का भारत बने...

जय हिन्द, जय भारत 🇮🇳 

Saturday, 12 April 2025

India's Heritage : एक रामायण हनुमान जी की

आज हनुमान जन्मोत्सव है, इस उपलक्ष्य में India's Heritage segment में भक्त शिरोमणि, प्रभु श्री राम जी के अनन्य भक्त हनुमान जी के विषय में ऐसी कथा का वर्णन करने जा रहे हैं, जिससे न जाने कितने लोग अनभिज्ञ होंगे।

और इस कथा को जानने के बाद, हर व्यक्ति के मन में हनुमानजी के प्रति और अधिक प्रेम, श्रद्धा और भक्ति उमड़ पड़ेगी।

चलिए उस कथा को आरम्भ करने से पहले जोर से हनुमान जी का जय घोष लगाते हैं। 

बजरंग बली की जय, जय हो हनुमान की जय...

सनातन काल से हिन्दू धर्म में हनुमानजी का विशेष स्थान है। हनुमान जी, भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार थे।

स्वयं ईश्वरीय रूप होने के बाद भी उन्होंने अपना जीवन प्रभु श्री राम जी की भक्ति में लीन कर दिया।

इतनी अधिक सरलता, सौम्यता और समर्पण का भाव, कि उसकी कभी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। आज की कथा, उसी भाव को प्रदर्शित करती है। 

एक रामायण हनुमान जी की


त्रेतायुग को साक्ष्य रूप में प्रस्तुत करने का माध्यम है, वाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण... 

रामायण में लिखा एक-एक‌ श्लोक, एक एक पल एक एक क्षण को जीवंत करता है। इसे 24000 श्लोक में लिखा गया है।

उस समय संस्कृत मुख्य रूप से लिखित लीपि थी, अतः वाल्मीकि जी द्वारा रामायण भी संस्कृत में ही लिखी हुई है।

पर उसके बहुत वर्षों के पश्चात् गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में रामचरित मानस व हनुमान चालीसा की रचना की...

पर आपके मन में सवाल यह नहीं उठते हैं कि... 

क्या वाल्मीकि रामायण ही पहली रामायण थी?

जब रामायण लिखी जा चुकी थी, तो रामचरित मानस क्यों?

हनुमान चालीसा की रचना इतने युग बाद क्यों?

या हनुमान चालीसा, तुलसीदास जी ने क्यों लिखी?... 

तो चलिए इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर जानते, भारत की धरोहर से...

हम सभी यही जानते हैं कि पहली रामायण वाल्मीकि जी ने लिखी थी, लेकिन शास्त्रों के अनुसार सबसे पहली राम कथा, अनंतभक्त हनुमानजी ने लिखी थी और वो भी अपने नाखूनों से एक चट्टान पर, जिसे हनुमद रामायण कहा गया।

बात उस समय की है, जब लंका विजय के बाद प्रभु श्रीराम अयोध्या में लौटकर राजपाट संभालने लगे थे। कुछ दिन अयोध्या में रहकर श्रीराम की सेवा के बाद हनुमानजी हिमालय जाकर वहां शिव तपस्या में लीन हो गए। 

इस दौरान वे रोजाना अपने पास मौजूद, एक शिला पर नाखून से राम कथा लिखते रहे। कई वर्षों के बाद तपस्या और राम कथा दोनों पूरी हो गई, जो कालांतर में हनुमद रामायण कही गई।

इसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने वाल्मीकि रामायण लिखी और अतिउत्साह के साथ, उसे मन में लेकर भगवान शिव को समर्पित करने के लिए कैलाश धाम पहुंच गए। वहां हनुमानजी पहले से मौजूद थे। 

कैलाशधाम पहुंच कर, वाल्मीकि जी ने, शिला पर नाखूनों से उकेरी हनुमद रामायण देखी, जिसे देखकर वे निराश हो गए।

वाल्मीकि जी को उदास देखकर, बजरंगबली ने उनसे मायूसी की वजह पूछी, तो महर्षि ने कहा, कि मैंने कठिन परिश्रम से रामायण लिखी, लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी लिखी रामायण को महत्व नहीं मिलेगा।

आपने वह सब कुछ लिख दिया है, जिसके आगे मेरी रामायण कहीं नहीं टिक पाएगी।

यह सुनकर हनुमानजी मुस्कुरा दिए, उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा, बस इतनी सी व्यथा? 

महर्षि वाल्मीकि आप चिंता ना करें, इतना कहकर बजरंगबली ने हनुमद रामायण लिखी शिला एक कंधे पर तो दूसरे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठा लिया। 

फिर हजारों मील दूर ले जाकर उन्होंने समुद्र में अपनी लिखी हनुमद रामायण राम को समर्पित करते हुए जल निमग्न कर दिया।

यह देखकर वाल्मीकि भाव-विह्वल हो उठे, इतनी सरलता इतनी सौम्यता, माना कि मैंने अति परिश्रम करके रामायण लिखी थी, पर हनुमानजी ने भी तो अत्यंत समर्पित होकर कठिन परिश्रम के साथ ही हनुमद रामायण लिखी थी।

मुझे यश‌ दिलाने के लिए उन्होंने कितनी सहजता से यह कठिन कार्य, "अपनी कृति को जल निमग्न कर दिया"...

वे बरबस ही बोल उठे, हे रामभक्त आप धन्य हैं...आपकी महिमा के गुणगान के लिए मुझे एक और जन्म लेना होगा।

मैं वचन देता हूं कि कलियुग में मैं एक और रामायण लिखने के लिए जन्म लूंगा, वह रामायण आम लोगों की भाषा में होगी। 

माना जाता है कि कलयुग में 16वीं शताब्दी में रामचरितमानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदासजी, महर्षि वाल्मीकि का ही दूसरा जन्म थे।

और उन्होंने रामचरितमानस लिखने से पहले  हनुमान चालीसा लिखी, फिर हनुमानजी का गुणगान करते हुए उनकी प्रेरणा से अपनी रामचरितमानस पूरी की..

तो यह है वो कथा, जो बताती है कि पहली रामायण हनुमद रामायण है, जिसे स्वयं हनुमान जी ने अपने नाखूनों से शिला पर उकेरी थी, जिसे बाद में, बहुत ही सहजता और सरलता से समुद्र में जल निमग्न कर दी थी, जिससे हर ओर वाल्मीकि रामायण को यश और कीर्ति मिले। और बाद में हनुमानजी के द्वारा दिए गए अविश्वस्नीय बलिदान को कोटि-कोटि धन्यवाद देने हेतु वाल्मीकि जी ने पुनः जन्म लिया और पहले हनुमान जी की प्रशंसा और स्तुति करते हुए हनुमान चालीसा लिखी, उसके उपरांत अवधी भाषा में रामचरित मानस लिखी। 

हनुमद रामायण लिखी गई थी, इसकी पुष्टि एक घटना के द्वारा सिद्ध होती है।

बात चौथी, पांचवीं शताब्दी की है, वह समय संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान कालीदास जी का समय था 

उस काल में एक पट्टलिका समुंदर किनारे मिली तो उसे सार्वजनिक जगह रख दिया गया, जहां विद्यार्थी उस पर लिखी लिपि समझ और पढ़ सकें। 

समझा जाता है कि कालीदास ने उसे समझ लिया था, वह जान गए थे कि यह पट्टालिका, हनुमान जी की लिखी हनुमद रामायण का ही अंश है, जो समुद्र के पानी के साथ बहते हुए उन तक पहुंच गई थी।

हनुमानजी को यूं ही भक्तशिरोमणि नहीं कहा गया है, अति सिद्ध, अति सामर्थ्यवान, भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार होने के बाद भी इतने सरल, सौम्य, सहज और समर्पित अन्यत्र कहीं कोई और नहीं...

बोलो बजरंगबली की जय, हनुमान की जय...

दुनिया चले न श्री राम के बिना, राम जी चले न हनुमान के बिना...

आपके श्रीचरणों में भक्ति के पुष्प अर्पित करते हुए बस एक ही कामना है 🙏🏻🙏🏻

हे प्रभु, हम सब पर अपनी विशेष कृपा बनाए, सभी जगह सुख और समृद्धि बनी रहे 🙏🏻

Note : जानकारी विश्वस्त सूत्रों द्वारा एकत्रित की गई है ....

Friday, 11 April 2025

Story of Life: वो भयानक रात (भाग‌-5)

वो भयानक रात (भाग -1) ,

वो भयानक रात (भाग -2) , 

वो भयानक रात (भाग -3) 

वो भयानक रात (भाग - 4) के आगे....

वो भयानक रात (भाग -5) 




दरअसल, राकेश जी अपने कड़क स्वभाव के लिए पुलिस चौकी में प्रसिद्ध थे। 

अभी सब शांत पड़ना शुरू हुआ ही था कि पुलिस वाले कुछ और लोग भी आ गए। क्योंकि नीचे आते-आते राकेश जी फोन करते हुए आए थे।

पुलिस वाले तुरंत संजीव और दोनों गुंडों को अपने साथ ले गए, साथ ही आशा को अस्पताल चलने को कहने लगे।

पर आशा ने कहा कि उसको इतने घावों की आदत है, वो बस जल्द से जल्द अपने बच्चों को सुरक्षित करना चाहती है, अतः उसे गांव भेजने की व्यवस्था कर दी जाए।

राकेश जी ने order दिया कि इसके घावों की मरहम पट्टी करा के इसे गांव छोड़ आया जाए।

आशा ने सुनीता, सुरेश जी, बच्चों, पड़ोसी और विशेष रूप से राकेश जी का बारम्बार धन्यवाद दिया और गांव के लिए जाने लगी।

आशा के जाने के पहले, सुनीता ने उसे उस महीने की तनख्वाह के साथ 5 हजार ऊपर दे दिए।

आशा ने तनख्वाह के अलावा, बाकी रुपए लेने को मना किये, वो बोली दीदी, अब न जाने कब मिलना हो, शायद रुपए चुका भी न पाऊं...

सुनीता ने कहा कि, तुम्हें अभी रुपयों की बहुत आवश्यकता है, इन्हें रख लो...

अगर तुम लौट कर आ पाओगी, तो मुझे अच्छा लगेगा, पर तुम्हारी और बच्चों की सुरक्षा पहले है, तो अगर तुम न आ पाओ, तब इन्हें हमारे रिश्ते के अच्छे समय की सौगात समझ कर रख लेना। 

दीदी, मैं जरूर आऊंगी, इन्हें लौटाने, पर कब वो नहीं पता। एक बार सारी व्यवस्था हो जाए बस... तुम्हारे उपकार को मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगी... आशा की आंखें आंसुओं से भरी हुई थी और आवाज कंपकंपा रही थी... बेहद मार्मिक दृश्य बन गया था...

अपना सबका ध्यान रखना दीदी, मैं जरूर आऊंगी... यह कहते हुए वो घर से निकल गई...

थोड़ी देर में सब चले गए। 

आशा के आने से जो टूट-फूट हुई थी, उसे ठीक करने में सुरेश जी के हजारों रुपए ठुक गये।

आज इस बात को बहुत साल गुजर गए थे, पर सुनीता को आज भी वो भयानक रात सिहरन दे जाती थी।

उसे आज भी इंतजार था, आशा के लौटने का... रुपए वापस पाने की आस में नहीं, बल्कि इस बात को जानने की लालसा में कि, आशा और उसके बच्चे कैसे हैं?...

जबकि, सुरेश जी और बच्चे नहीं चाहते थे कि आशा, कभी भी लौट कर आए, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर आशा, वापस लौटी, तो उसके पीछे संजीव भी आ सकता है...

और वो भयानक रात, उन्हें फिर से अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं चाहिए थी।

Thursday, 10 April 2025

Story of Life: वो भयानक रात (भाग -4)

 वो भयानक रात (भाग -1) ,

वो भयानक रात (भाग -2)  व

वो भयानक रात (भाग -3) के आगे...

वो भयानक रात (भाग -4) 




सुरेश जी भी तंग आकर सोच रहे थे कि क्या करें? एक तरफ हद का मचता हुआ शोर, दूसरी ओर आशा का गिड़गिड़ाना...

इससे पहले कि वो निर्णय लेते, बहुत तेज़ भढाम से आवाज़ हुई...

क्योंकि घर का दरवाजा गिर गया था और उसके साथ ही संजीव, और दो मुस्टंडे से दिखने वाले लोग भी घर के भीतर थे।

फिर वही हुआ, जिसका आशा को डर था, संजीव लगा ताबड़तोड़ आशा को मारने...

सुरेश जी और सन्नी ने रोकने की कोशिश की, तो उन मुस्टंडों ने सुरेश और सन्नी को कसकर पकड़ लिया।

श्यामा तो घबरा कर रोने लगी, उसने आज तक ऐसा भयानक दृश्य नहीं देखा था, साथ ही वो अपने पापा और भैया के लिए भी डर रही थी।

थोड़ी ही देर में आशा के खून निकलना शुरू हो गया। उसके बच्चे भी बुरी तरह से रो रहे थे।

अजीब भयानक दृश्य बन गया था, जिसकी कल्पना, सुनीता, सुरेश और बच्चों ने कभी सपने में भी नहीं की थी। 

इतनी ज्यादा चिल्ल-पों की आवाजें सुनकर apartment से बहुत लोग भी अंदर आ गये। 

जिसमें सब-इंस्पेक्टर राकेश जी भी शामिल थे, जो अभी महीना भर पहले ही रहने आए थे।

उन्होंने एक भारी सी आवाज़ में कहा, ओय क्या गुंडागर्दी है? क्यों मार रहा है औरत को?...

उनकी आवाज सुनते ही संजीव के मुंह से निकल गया, अरे ये कहां से आ गये? इसके साथ ही उसके हाथ वहीं रुक गये। मुसटंडो ने सुरेश जी और सन्नी को भी छोड़ दिया।

दरअसल, राकेश जी अपने कड़क स्वभाव के लिए पुलिस चौकी में प्रसिद्ध थे। 

अभी...

Wednesday, 9 April 2025

Story of Life: वो भयानक रात (भाग -3)

व भयानक रात (भाग -1) व

वो भयानक रात (भाग -2) के आगे...

वो भयानक रात (भाग -3) 


सन्नी आगे दरवाजे की ओर बढ़ा, तभी आशा ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया... अरे क्या कर रहे हो सन्नी बाबा? 

पीछे हट जाओ, दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है, मेरा मरद होगा.. पक्का मुझे लेने आया होगा... 

आपके पति आंटी? वो क्यों आएंगे इतनी रात में??? 

अरे मैं जानती हूं, अपने मरद को, वो ही होगा..

आशा का कहना सही था, वो आशा का पति संजीव ही था। 

वो ज़ोर ज़ोर से आशा का नाम लेकर बाहर बुला रहा था, शायद उसने बहुत अधिक शराब भी पी रखी थी... क्योंकि उसकी आवाज़ में लडखडाहट साफ सुनाई दे रहा था।

सुनकर सुरेश जी बोले, जब संजीव तुम्हें लेने आया है, तो दरवाजा भी खोलना चाहिए और तुम्हें उसके साथ जाना भी चाहिए।

आशा, सुनीता के पैरों से लिपट गई, दीदी, भैया को मना करो, वरना संजीव मुझे पीट-पीटकर अधमरा कर देगा। 

बस रात भर की बात है, सुबह होते ही मैं गांव चली जाऊंगी... तुम्हारे घर इतने दिन काम किया है, तुमने मेरा हमेशा साथ दिया है, एक आखिर बार और दे दो।

एक बार बच्चों को अपनी मां के पास गांव छोड़ आऊं, फिर ठीक से निपटूंगी संजीव से...

मुझे अपनी चिंता नहीं है, एक बार बच्चों की चिंता से मुक्त हो जाऊं, वरना यह नकारा इंसान शराब के लिए मेरे बच्चों को बेच देगा।

आशा, बिना सांस लिए बस बोले जा रही है, साथ ही वो बहुत बुरी तरह से कांप भी रही थी, न जाने डर से या क्रोध से...

उधर संजीव भी दरवाजा पीटे जा रहा था, साथ ही गाली-गलौज भी कर रहा था।

कुछ देर में उसने आशा के साथ-साथ सुनीता के घर के सब लोगों को भी गाली देना शुरू कर दिया और वो भी बहुत तेज़ स्वर में...

अब तो शोर शराबे से पूरे apartment के लोग जाग गये, कुछ के तो फोन भी आने लगे कि वो लोग आधी रात को क्या तमाशा करवा रहे हैं? दरवाजा खोलकर maid को भेज क्यों नहीं देते हैं?  

सुरेश जी भी तंग आकर सोच रहे थे कि क्या करें? एक तरफ हद का मचता हुआ शोर, दूसरी ओर आशा का गिड़गिड़ाना...

इससे पहले कि वो निर्णय लेते, बहुत तेज़ भढाम से आवाज़ हुई...

आगे पढ़े वो भयानक रात (भाग -4) में ...

Tuesday, 8 April 2025

Story of Life: वो भयानक रात (भाग -2)

वो भयानक रात (भाग -1) के आगे...

वो भयानक रात (भाग -2)




यह कहते हुए सुनीता, उस बच्चे की ओर बढ़ी, जो गिर गया था, पर उसका पैर बड़ी तेज़ी से फिसला गया... 

वो तो सन्नी ने संभाल लिया, वरना आशा के बच्चे के चक्कर में सुनिता की हड्डी ज़रूर टूट जाती...

सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वो अचानक से फिसलने कैसे लगी थी?

तभी उसने ध्यान दिया कि आशा की 1 साल की बच्ची ने शूशू कर दिया था। 

सुनीता को गिरता देख, आशा बोलने लगी, दीदी अपना ध्यान रखो, इन बस्ती के बच्चों की तो आदत है, गिरते-पड़ते, मारते-पीटते रहने की... 

हम इतनी लोलो-पोच नहीं करते, तुम बड़े लोगों जैसे, वरना तो पाल लिए बच्चे... 

तुम्हारा क्या है, दो बच्चे और office का काम, बस.... 

हमारे जैसे तुम लोग नहीं कर सकते, 10-10 बच्चे और दिनभर मैडमों के नखरे... 

दुनिया भर का शोर और आशा की फालतू की बातें, सुन-सुनकर, सुरेश जी का सिर चकराने लगा, वो अंदर जाने को मुड़े ही थे कि फिर जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी...

आह! अब कौन?...

आगे पढ़े, वो भयानक रात (भाग -3) में...

Monday, 7 April 2025

Story of Life : वो भयानक रात


वो भयानक रात (भाग -1)



रात गहरा चुकी थी, सब सो चुके थे। हर ओर सन्नाटा पसरा हुआ था।

तभी बहुत तेज दरवाजा पीटने की, साथ ही bell पर bell बजाने की आवाज आने लगी।

सुनीता, सुरेश, श्यामा और सन्नी सब जाग गये।

दरवाजा खोला, तो सामने आशा, अपने बच्चों के‌ साथ खड़ी थी।

थोड़ी ही देर में हुड़दंग और बच्चों के शोरगुल से घर की शांति भंग हो चुकी थी।

श्यामा और सन्नी, सुनीता की ओर प्रश्न सूचक नजरों से देख रहे थे, जैसे पूछ रहे हों, यह सब क्या है माँ?

शांत स्वभाव के सुरेश जी भी, इतनी रात को मंच रही चिल्ल-पों से irritate होने लगे।

सुनीता को भी आशा का इतनी रात को बच्चों के‌ साथ आ जाना, कुछ समझ नहीं आ रहा था।

बहुत संकोच के बाद उसने आखिरकार, आशा से इतना ही पूछा, क्या आशा इतनी देर में बच्चों के साथ क्यों?

पर आशा से ज्यादा बोलना भी कहां होता था, ज़रा कुछ बोलो और उसका tape recorder शुरू हो जाता था, तो बस सुनीता के इतना पूछने भर से वो लगी दहाड़े मार-मारकर रोने...

क्या रात दीदी... मेरे पर परेशानी आएगी, तो और मैं कहां जाती? तुम्हारा ही तो सहारा है... 

वरना बच्चों के साथ हमें इतनी रात को कौन अपने घर आने देगा? तुम भी ना, कुछ समझती ही नहीं हो... 

अभी आशा अपना दुखड़ा सुना ही रही थी कि उसके दो बच्चे सोफे पर ज़ोर-ज़ोर से कूदने लगे और उनके कूदने से सोफे की seat फट गई... 

Seat फटने से एक बच्चा disbalance होकर गिर गया और जोर-जोर से रोने लगा।

अब सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि लाखों रुपए के महंगे सोफे को देखकर दुखी हो या बच्चे को लगी चोट को देखे...

वो अभी ऊहापोह में ही थी कि ज़ोर-ज़ोर से चटाक-चटाक की आवाजें आई, आशा ने दोनों बच्चों को चाटें रसीद दिए थे। 

यह देख, बरबस सुनिता के मुंह से निकल गया, अरे क्या कर रही है? बच्चे को देख उसे चोट तो नहीं लगी है।

यह कहते हुए सुनीता, उस बच्चे की ओर बढ़ी, जो गिर गया था, पर उसका पैर बड़ी तेज़ी से फिसला गया... 

वो तो सन्नी ने संभाल लिया, वरना आशा के बच्चे के चक्कर में सुनिता की हड्डी ज़रूर टूट जाती...

सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वो अचानक से फिसलने कैसे लगी थी?

आगे पढें वो भयानक रात (भाग - 2) में 


Sunday, 6 April 2025

Bhajan (Devotional Song) : लेगा राम का जो नाम

आज चैत्र नवरात्रि की नवमी है, और आज ही के दिन प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। इसीलिए, इस दिवस को राम नवमी के नाम से भी जाना जाता है।

तो चलिए, प्रभु श्री राम के इस भजन का आनंद लेते हैं और उनकी भक्ति में लीन हो जाते हैं।

लेगा राम का जो नाम


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम 


नाम लिया जो दशरथ ने 

तो पुत्र रूप में पाया 

वात्सल्यता से परिपूर्ण हो 

मोक्ष उन्होंने पाया 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम 


लिया नाम जो मारुति ने 

भक्त शिरोमणि कहलाए

उनसे प्रसन्न हुए प्रभु ऐसे

उनके हृदय में गये समाए 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम

 

लिया नाम जो वाल्मीकि ने 

डाकू से ऋषि कहलाए 

रामायण को लिखकर वो

सम्पूर्ण जगत में छाए 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम 


लिया नाम जो अहिल्या ने 

पत्थर से नारी बन पायी 

पति के शाप से मुक्त हो 

बैकुंठ में गयी समाई 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम  


लिया नाम जो शबरी ने 

भक्ति का रस था पाया 

झूठे बेर खिलाकर भी 

था पुण्य अपार कमाया 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम  


लिया नाम जो सुग्रीव ने

तो मैत्री का सुख पाया 

भटक रहा था वन में जो 

उसने राज्य पूरा पाया 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम 


सुनो राम नाम की महिमा 

होती है कितनी अपार 

पत्थर पर जो लिखा नाम तो 

समुद्र हो गया पार 


लेगा राम का जो नाम 

होंगे उसके पूरण काम 


आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। प्रभु श्री राम की कृपा हम सभी पर इसी तरह बनी रहे 🙏🏻 




आज का यह भजन, अद्वय ने प्रस्तुत किया है। भजन, पसंद आने पर कृपया उसको comment box पर उसे प्रेरित अवश्य करें 🙏🏻

पूरे भजन का musical video YouTube में uploaded है। उस का आनंद लेने के लिए, दिए गए link पर click करें :

Saturday, 5 April 2025

Recipe : साबूदाना खीर

आज चैत्र नवरात्रि की अष्टमी है। माँ दुर्गा का दिन, माँ जगदंबा की सम्पूर्णता का दिन, उनकी सम्पूर्ण शक्ति और सिद्धी का दिन, देवी मांँ की आराधना का दिन...

तो चलिए आज माँ को महाभोग में साबूदाने की खीर चढ़ाएं...

साबूदाने की खीर बनना आसान नहीं होता है, वो चिपचिपी बनती है, और जल्दी ही जल भी जाती है, इसलिए लोगों द्वारा उसे बनाना पसंद नहीं होता है। 

पर आप जब Shades of Life से जुड़े हैं तो आप की बनाई साबूदाना खीर world best बनेगी। 

Sabudana Kheer




A) Ingredients :

  • Full cream milk - 500 ml.
  • Sugar - 200 gm. or as per taste 
  • Sabudana (sago) - 50 gm. 
  • Dry fruits - 50 gm. (cashews, almonds, pistachios)
  • Foxnut (makhana) - 20 gm.
  • Saffron - 5 to 10 threads
  • Milk powder - 100 gm.
  • Basil seeds - 5 gm. (optional)
  • Green cardamom powder - 1tsp


B) Method :

  1. साबूदाना में पानी डालकर 2 to 2½ hours के लिए रख दें।
  2. Pan में पानी boil होने के लिए रख दीजिए।
  3. जब पानी उबल जाए तो उसमें भीगे साबूदाना को डाल दीजिए, ढक्कन से ढक कर 25-30 minutes तक or transparent होने तक, बीच-बीच में चलाते हुए boil करें।
  4. साबूदाना उबल जाने पर छान लें।
  5. फिर उसे बर्फ से भरे ठंडे पानी में डाल दीजिए। 
  6. Milk powder में थोड़ा सा दूध डालकर paste बना लीजिए।
  7. केसर के धागे थोड़े से दूध में डालकर घोल लें।
  8. Dry fruits (काजू, बादाम और पिस्ते) को finely chop कर लीजिए और मखाने को mixer grinder jar में डालकर coarsely grind कर लें।
  9. दूसरे pan में, दूध और चीनी डालकर गाढ़ा होने रख दें।
  10. बीच-बीच में चलाते रहें।
  11. जब दूध थोड़ा गाढ़ा हो जाए, तो उसमें मखाना-मेवा डाल दीजिए। 
  12. अब इसमें milk powder का paste डालकर थोड़ा और चला लें।
  13. अब इसमें boiled साबूदाना डालकर proper consistency आने तक चलाते हुए पकाएं। 
  14. अब इसमें केसर दूध और छोटी इलायची पाउडर मिलाकर अच्छे से चला लें।
  15. अब इसे refrigerator में रखकर ठंडा कर लें। 
  16. सब्जा बीज (तुलसी के बीज) को पानी में 2 hours के लिए soak करने के लिए रख दीजिए।
  17. 2 hours बाद छानकर उसे fridge में रख दीजिए।
  18. Serving के समय, कांच के glass में खीर pour कर दीजिए, ऊपर से भीगे हुए सब्जा बीज से garnish करें।

Your tasty, healthy and vrat-friendly Sabudana Kheer is ready to serve.


C) Tips and Tricks :

  • साबूदाने को तीन से चार बार अच्छे से धो लें। इससे साबूदाने का extra starch निकल जाता है। जिससे उसके चिपचिपे होने की tendency कम हो जाती है।
  • गर्म पानी में डालने से साबूदाना चिपचिपा नहीं होता है। 
  • पूरा boil हो जाने के बाद ठंडे पानी में डालने से एक-एक साबूदाना अलग-अलग हो जाता है। इस तरह से पके साबूदाने को दूध में डालने से न तो वो आपस में चिपकते हैं, न‌ तली में लगकर जलते हैं। 
  • खीर चिपचिपी न बनकर खिली-खिली बनती है।
  • सब्जा बीज बहुत healthy option है और खीर में डालने से taste next level पर पहुंच जाता है। साथ ही बहुत healthy option बनाता है। पर यह पूरी तरह से optional है। आप इसे अपने taste के according डाल सकते हैं।


Benefits of basil seeds : Digestion में सुधार, weight घटाने में मदद, blood sugar को नियंत्रित करना, और immunity अच्छी करना।

In short, साबूदाना खाने से indigestion, weight gain, blood sugar level high होने की संभावना रहती है, तो अगर आप तुलसी बीज(सब्जा) डाल देंगे तो आपकी dish balance हो जाएगी और वो भी taste को और enhance करके, but choice is yours...

आज ही माता रानी के महाभोग में साबूदाने की खीर बनाएं और उनकी ढेरों कृपा का लाभ उठाएं।

जय माता दी 🚩 

Friday, 4 April 2025

Article : Legendry Manoj Kumar

कहा जाता है, साहित्य और फिल्में समाज का दर्पण होती है। कुछ हद तक सही भी है। 

या यह भी कहा जा सकता है साहित्य और फिल्में, समाज की गुरु भी होती हैं। क्योंकि समाज का प्रतिनिधित्व करती फिल्में बहुत कुछ सिखा भी जाती हैं।

पर्दे पर नजर आने वाले अधिकांश हीरो और हीरोइन अपने निजी जीवन और नाम के लिए ही फिल्मों में काम करते हैं। पर उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने समय के superhit hero तो थे ही पर उन्होंने फिल्म में काम करते हुए भी देशप्रेम का परिचय दिया है। 

और ऐसे ही एक हीरो और निर्देशक हैं, मनोज कुमार जी.... 

उनकी देशभक्ति की भावना ने, स्वतः ही कलम को लिखने की प्रेरणा दी है। उनकी देशभक्ति को प्रणाम करते हुए आज का यह लेख आधारित है।

Legendary Manoj Kumar



इनकी superhit films मे बहुत सी देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत फिल्में भी थीं। और यह इस बात से और भी सिद्ध होती है कि मनोज कुमार जी को भारत कुमार के नाम से भी पुकारा जाता था। 

दूसरे शब्दों में कहें तो, अपने देश भारत से,  प्रेम करना और उस पर गर्व करना सिखाया था, मनोज कुमार जी ने...

उनकी देशभक्ति पर आधारित सुप्रसिद्ध फिल्में हैं, उपकार, रोटी कपड़ा और मकान, शहीद, पूरब और पश्चिम और क्रांति...

जितनी यह फिल्म, superhit थी, उतने ही उसके गाने, 

मेरे देश की धरती... 

ओ मेरा रंग दे बसंती चोला...

भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं...

अबके बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे...

दुल्हन चली, ओ पहन चली...

इन फिल्मों और गानो में देशभक्ति की भावना इस तरह से घुली मिली है कि इनके बिना वो माहौल, वो जोश और उत्साह सोच पाना बेमानी लगता है। 

मनोज कुमार जी को बहुत awards मिले हैं।

1973 में Film fare award

Dadasaheb Phalke award 2016

Film fare lifetime achievement award 1999

Film fare awards for direction, in रोटी कपड़ा और मकान व‌ उपकार के लिए...1968, 1975 

Padma Shri award 1992 

Film fare awards for story and dialogues 1968 ( upkar)

Film fare awards for Best editing 1973 (shor)

Screen life time achievement award 2008

Guild award for life time achievement  2012

ऐसे ही बहुत सारे awards मिले हैं।

अगर as a hero मनोज कुमार‌ जी को, आजकल के बच्चों की नज़र से देखेंगे तो, वो कहेंगे कि वो तो हमारी नानी, दादी के समय के हीरो थे, पर अगर देशभक्ति के गीतों की बात करेंगे तो वो उसमें आज भी गुनगुनाते और थिरकते नजर आएंगे। 

आज भी school and college के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर मनोज कुमार जी की फिल्मों के गीत गाए जाते हैं और उन पर नृत्य किया जाता है।

आज 87 साल की अच्छी और लंबी जिन्दगी को जीते हुए, उन्होंने अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया है। 

यूं तो जन्म और मृत्यु, जीवन के अटल सत्य हैं, फिर भी जब कोई legendary personality, इस दुनिया से अलविदा लेती है तो सबकी आंखें नम हो ही जाती हैं। 

उनकी फिल्म शोर का यह अमर गीत, जिसने चंद पंक्तियों में जीवन सार समझा दिया, हमेशा ही उनकी याद दिलाता रहेगा...

एक प्यार का नग़मा है

मौजों की रवानी है

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं

तेरी मेरी कहानी है

कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है

जीवन का मतलब तो, आना और जाना है

दो पल के जीवन से, इक उम्र चुरानी है

ज़िन्दगी और…


मनोज कुमार जी, आपके देश के प्रति अपार प्रेम को शत-शत नमन 🙏🏻 

आपकी पुण्य आत्मा ईश्वर में लीन होकर शान्ति को प्राप्त करें।

Wednesday, 2 April 2025

Short Story : पुराने खिलौने

पुराने खिलौने 


किरण‌ के बच्चे बड़े हो गए थे और अपनी-अपनी नौकरी के लिए दूसरे शहर भी चले गए थे।

जिन बच्चों के शोरगुल से घर में रौनक थी, वो अब शांत और सुनसान हो चला था।

एक दिन घर के काम निपटा कर किरण बच्चों के कमरे में कुछ ढूंढने के लिए गयी, पर वो सामान कहीं नहीं मिल रहा था।

आखिरकार उसने बच्चों के खिलौने की अलमारी खोली तो धड़धड़ा कर बहुत से खिलौने नीचे गिर गये।

सभी पुराने हो चुके थे, कुछ बहुत पुराने भी...

पर उनके गिरते ही, किरण के मन में उनसे जुड़ी यादें नई हो चली थी...

कितना दीवाने थे बच्चे उन खिलौनों के लिए...  कि बंदऔर उसने कितने जतन से जोड़े थे, अलमारी भर कर खिलौने...

पर आज सब बच्चों के बिना, बेकार से प्रतीत हो रहे थे। 

वो यादों में खोई थी कि घंटी बजी, प्रेस के कपड़े लिए प्रेमा अपनी बेटी मोहिनी के साथ खड़ी थी। 

मोहिनी, अपने नाम सी ही सबको बड़ी जल्दी अपनी ओर मोह लेती थी।

किरण भी, जब वो आती थी, उसको कुछ न कुछ अवश्य देती थी।

किरण ने देखा, मोहिनी एकटक उसके हाथ की तरफ देखे जा रही थी। 

दरअसल किरण, दरवाजा खोलने आई थी तो एक छोटा सा खरगोश लिए ही चली आई थी और बच्चे तो खिलौनों के दीवाने होते ही हैं...

मोहिनी की चमकती आंखों को देख कर किरण का मन पसीज गया और उसने अपने बेटे के favourite खरगोश को मोहिनी को दे दिया।

मोहिनी खरगोश पाकर खुशी से नाचने लगी और किरण से प्यार से चिपक गई। मोहिनी के प्यार को पाकर किरण भी अभिभूत हो गई।

प्रेमा बोली, दीदी आप मोहिनी को इतना कुछ देती हैं कि आपके घर कपड़े देने आती हूं तो यह भी पीछे पीछे चली ही आती है। यह कहते हुए प्रेमा भी खुश नज़र आ रही थी। 

प्रेमा के जाने के बाद, किरण ने बारी-बारी से दोनों बच्चों को फोन किया, और बताया कि खरगोश दे दिया और बाकी भी खिलौने दें, मोहिनी को?

बेटी ने अपने कुछ favourite खिलौने छोड़ कर बाकी सभी खिलौने दें देने को बोल दिया। बेटा खरगोश देने के कारण थोड़ा नाराज़ हुआ, पर बाद में उसने भी कुछ खिलौने देने को बोल दिया।

अगले दिन किरण, एक बड़े से bag में बहुत सारे खिलौने भरकर, मोहिनी को देने ले गई।

वहां पहुंच कर उसने वो सारे खिलौने बाहर निकाल दिए...

खिलौनों को देखकर, मोहिनी कुछ बोलती, उससे पहले ही जगदीश बोल उठा, क्या मैडम, इतने‌ सारे पुराने खिलौने क्यों लेकर आ‌ई हो मेरी बेटी के लिए?

यह मोहिनी भी न, जाने क्या कह आती है सबको कि लोग अपने घर का कूड़ा हमारे घर खाली करने आ जाते हैं। और हम रद्दी वाले को रद्दी बेच बेचकर परेशान हो जाते हैं।

सुनकर किरण को बहुत बुरा लगा, वो सारे खिलौने उठाने लगी, तभी एक रद्दी वाला आया।

जगदीश ने उसको बेचने के लिए, बहुत सारे पुराने खिलौने और सामान निकाले। उनमें, किरण का दिया हुआ खरगोश भी शामिल था। 

किरण ने देखा कि सामान पुराने अवश्य थे, लेकिन सभी ठीक अवस्था में थे।

उसने तुरंत वो खरगोश उठा लिया और जगदीश को बोला, यह पुराने खिलौने, मेरे बच्चों की खुशी और मीठी यादें थी, और यह सभी एकदम ठीक हैं, कोई कूड़ा नहीं हैं। इन्हें मैं मोहिनी को इसलिए देने आई थी, क्योंकि खिलौने देखकर उसकी आंखें खुशी से चमकने लगती हैं, जो उसके सुखद बचपन को दर्शाती है।

पर जब तुम्हें कद्र नहीं है, अपनी बेटी की आंखों की चमक की, तो मैं क्यों अपने बच्चों की मीठी यादों को तुम जैसे हृदयहीन इंसान को दूं।

यह कह कर वो अपने सारे  खिलौनों को अपने साथ लौटा लाई, कभी न देने के लिए, क्योंकि यादों का बहुमूल्य होना, सिर्फ वो ही समझता है, जिसकी वो हो, बाकी के लिए वो पुराना होता है।

Tuesday, 1 April 2025

Poem : बना दिया April Fool

बना दिया April Fool



माता रानी का आगमन,

मौसम भी अनुकूल।

हर दिल से मिटाने को

भारत की संस्कृति, 

बना दिया अप्रैल फूल।


कहीं अंग्रेजों के जाने से, 

भारत को आजाद बनाने से।

उनका अस्तित्व न हो धूल,

इसी डर से उन्होंने

बना दिया अप्रैल फूल। 


पर हम कब तक छलेंगे,

उनके बनाए रिवाजों।

पर यूं ही चलेंगे,

तोड़ेंगे अब वो दस्तूर, 

नहीं बनाएंगे अप्रैल फूल।