Friday, 4 April 2025

Article : Legendry Manoj Kumar

कहा जाता है, साहित्य और फिल्में समाज का दर्पण होती है। कुछ हद तक सही भी है। 

या यह भी कहा जा सकता है साहित्य और फिल्में, समाज की गुरु भी होती हैं। क्योंकि समाज का प्रतिनिधित्व करती फिल्में बहुत कुछ सिखा भी जाती हैं।

पर्दे पर नजर आने वाले अधिकांश हीरो और हीरोइन अपने निजी जीवन और नाम के लिए ही फिल्मों में काम करते हैं। पर उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने समय के superhit hero तो थे ही पर उन्होंने फिल्म में काम करते हुए भी देशप्रेम का परिचय दिया है। 

और ऐसे ही एक हीरो और निर्देशक हैं, मनोज कुमार जी.... 

उनकी देशभक्ति की भावना ने, स्वतः ही कलम को लिखने की प्रेरणा दी है। उनकी देशभक्ति को प्रणाम करते हुए आज का यह लेख आधारित है।

Legendary Manoj Kumar



इनकी superhit films मे बहुत सी देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत फिल्में भी थीं। और यह इस बात से और भी सिद्ध होती है कि मनोज कुमार जी को भारत कुमार के नाम से भी पुकारा जाता था। 

दूसरे शब्दों में कहें तो, अपने देश भारत से,  प्रेम करना और उस पर गर्व करना सिखाया था, मनोज कुमार जी ने...

उनकी देशभक्ति पर आधारित सुप्रसिद्ध फिल्में हैं, उपकार, रोटी कपड़ा और मकान, शहीद, पूरब और पश्चिम और क्रांति...

जितनी यह फिल्म, superhit थी, उतने ही उसके गाने, 

मेरे देश की धरती... 

ओ मेरा रंग दे बसंती चोला...

भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं...

अबके बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे...

दुल्हन चली, ओ पहन चली...

इन फिल्मों और गानो में देशभक्ति की भावना इस तरह से घुली मिली है कि इनके बिना वो माहौल, वो जोश और उत्साह सोच पाना बेमानी लगता है। 

मनोज कुमार जी को बहुत awards मिले हैं।

1973 में Film fare award

Dadasaheb Phalke award 2016

Film fare lifetime achievement award 1999

Film fare awards for direction, in रोटी कपड़ा और मकान व‌ उपकार के लिए...1968, 1975 

Padma Shri award 1992 

Film fare awards for story and dialogues 1968 ( upkar)

Film fare awards for Best editing 1973 (shor)

Screen life time achievement award 2008

Guild award for life time achievement  2012

ऐसे ही बहुत सारे awards मिले हैं।

अगर as a hero मनोज कुमार‌ जी को, आजकल के बच्चों की नज़र से देखेंगे तो, वो कहेंगे कि वो तो हमारी नानी, दादी के समय के हीरो थे, पर अगर देशभक्ति के गीतों की बात करेंगे तो वो उसमें आज भी गुनगुनाते और थिरकते नजर आएंगे। 

आज भी school and college के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर मनोज कुमार जी की फिल्मों के गीत गाए जाते हैं और उन पर नृत्य किया जाता है।

आज 87 साल की अच्छी और लंबी जिन्दगी को जीते हुए, उन्होंने अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया है। 

यूं तो जन्म और मृत्यु, जीवन के अटल सत्य हैं, फिर भी जब कोई legendary personality, इस दुनिया से अलविदा लेती है तो सबकी आंखें नम हो ही जाती हैं। 

उनकी फिल्म शोर का यह अमर गीत, जिसने चंद पंक्तियों में जीवन सार समझा दिया, हमेशा ही उनकी याद दिलाता रहेगा...

एक प्यार का नग़मा है

मौजों की रवानी है

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं

तेरी मेरी कहानी है

कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है

जीवन का मतलब तो, आना और जाना है

दो पल के जीवन से, इक उम्र चुरानी है

ज़िन्दगी और…


मनोज कुमार जी, आपके देश के प्रति अपार प्रेम को शत-शत नमन 🙏🏻 

आपकी पुण्य आत्मा ईश्वर में लीन होकर शान्ति को प्राप्त करें।

Wednesday, 2 April 2025

Short Story : पुराने खिलौने

पुराने खिलौने 


किरण‌ के बच्चे बड़े हो गए थे और अपनी-अपनी नौकरी के लिए दूसरे शहर भी चले गए थे।

जिन बच्चों के शोरगुल से घर में रौनक थी, वो अब शांत और सुनसान हो चला था।

एक दिन घर के काम निपटा कर किरण बच्चों के कमरे में कुछ ढूंढने के लिए गयी, पर वो सामान कहीं नहीं मिल रहा था।

आखिरकार उसने बच्चों के खिलौने की अलमारी खोली तो धड़धड़ा कर बहुत से खिलौने नीचे गिर गये।

सभी पुराने हो चुके थे, कुछ बहुत पुराने भी...

पर उनके गिरते ही, किरण के मन में उनसे जुड़ी यादें नई हो चली थी...

कितना दीवाने थे बच्चे उन खिलौनों के लिए...  कि बंदऔर उसने कितने जतन से जोड़े थे, अलमारी भर कर खिलौने...

पर आज सब बच्चों के बिना, बेकार से प्रतीत हो रहे थे। 

वो यादों में खोई थी कि घंटी बजी, प्रेस के कपड़े लिए प्रेमा अपनी बेटी मोहिनी के साथ खड़ी थी। 

मोहिनी, अपने नाम सी ही सबको बड़ी जल्दी अपनी ओर मोह लेती थी।

किरण भी, जब वो आती थी, उसको कुछ न कुछ अवश्य देती थी।

किरण ने देखा, मोहिनी एकटक उसके हाथ की तरफ देखे जा रही थी। 

दरअसल किरण, दरवाजा खोलने आई थी तो एक छोटा सा खरगोश लिए ही चली आई थी और बच्चे तो खिलौनों के दीवाने होते ही हैं...

मोहिनी की चमकती आंखों को देख कर किरण का मन पसीज गया और उसने अपने बेटे के favourite खरगोश को मोहिनी को दे दिया।

मोहिनी खरगोश पाकर खुशी से नाचने लगी और किरण से प्यार से चिपक गई। मोहिनी के प्यार को पाकर किरण भी अभिभूत हो गई।

प्रेमा बोली, दीदी आप मोहिनी को इतना कुछ देती हैं कि आपके घर कपड़े देने आती हूं तो यह भी पीछे पीछे चली ही आती है। यह कहते हुए प्रेमा भी खुश नज़र आ रही थी। 

प्रेमा के जाने के बाद, किरण ने बारी-बारी से दोनों बच्चों को फोन किया, और बताया कि खरगोश दे दिया और बाकी भी खिलौने दें, मोहिनी को?

बेटी ने अपने कुछ favourite खिलौने छोड़ कर बाकी सभी खिलौने दें देने को बोल दिया। बेटा खरगोश देने के कारण थोड़ा नाराज़ हुआ, पर बाद में उसने भी कुछ खिलौने देने को बोल दिया।

अगले दिन किरण, एक बड़े से bag में बहुत सारे खिलौने भरकर, मोहिनी को देने ले गई।

वहां पहुंच कर उसने वो सारे खिलौने बाहर निकाल दिए...

खिलौनों को देखकर, मोहिनी कुछ बोलती, उससे पहले ही जगदीश बोल उठा, क्या मैडम, इतने‌ सारे पुराने खिलौने क्यों लेकर आ‌ई हो मेरी बेटी के लिए?

यह मोहिनी भी न, जाने क्या कह आती है सबको कि लोग अपने घर का कूड़ा हमारे घर खाली करने आ जाते हैं। और हम रद्दी वाले को रद्दी बेच बेचकर परेशान हो जाते हैं।

सुनकर किरण को बहुत बुरा लगा, वो सारे खिलौने उठाने लगी, तभी एक रद्दी वाला आया।

जगदीश ने उसको बेचने के लिए, बहुत सारे पुराने खिलौने और सामान निकाले। उनमें, किरण का दिया हुआ खरगोश भी शामिल था। 

किरण ने देखा कि सामान पुराने अवश्य थे, लेकिन सभी ठीक अवस्था में थे।

उसने तुरंत वो खरगोश उठा लिया और जगदीश को बोला, यह पुराने खिलौने, मेरे बच्चों की खुशी और मीठी यादें थी, और यह सभी एकदम ठीक हैं, कोई कूड़ा नहीं हैं। इन्हें मैं मोहिनी को इसलिए देने आई थी, क्योंकि खिलौने देखकर उसकी आंखें खुशी से चमकने लगती हैं, जो उसके सुखद बचपन को दर्शाती है।

पर जब तुम्हें कद्र नहीं है, अपनी बेटी की आंखों की चमक की, तो मैं क्यों अपने बच्चों की मीठी यादों को तुम जैसे हृदयहीन इंसान को दूं।

यह कह कर वो अपने सारे  खिलौनों को अपने साथ लौटा लाई, कभी न देने के लिए, क्योंकि यादों का बहुमूल्य होना, सिर्फ वो ही समझता है, जिसकी वो हो, बाकी के लिए वो पुराना होता है।

Tuesday, 1 April 2025

Poem : बना दिया April Fool

बना दिया April Fool



माता रानी का आगमन,

मौसम भी अनुकूल।

हर दिल से मिटाने को

भारत की संस्कृति, 

बना दिया अप्रैल फूल।


कहीं अंग्रेजों के जाने से, 

भारत को आजाद बनाने से।

उनका अस्तित्व न हो धूल,

इसी डर से उन्होंने

बना दिया अप्रैल फूल। 


पर हम कब तक छलेंगे,

उनके बनाए रिवाजों।

पर यूं ही चलेंगे,

तोड़ेंगे अब वो दस्तूर, 

नहीं बनाएंगे अप्रैल फूल।