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Thursday, 17 September 2026

Poem : आपदा को अवसर

भारत के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी एक प्रेरणास्रोत हैं। उनकी जीवन यात्रा अत्यंत कठिन रही है, फिर भी वो डिगे नहीं, डटे रहे और उन्होंने वो प्राप्त किया जो आसान नहीं था।

उनके जन्मदिवस पर यह कविता उनकी ऊर्जा और शक्ति को समर्पित है। इस का मुख्य कारण उनका शांति से हर कठिनाई से जूझना है और उनके जीवन का एक मूलमंत्र है।

आज उसी को कविता में पिरोया है। इसका सार समझने का प्रयास कीजिएगा, तो जीवन में सफल होंगे यह सुनिश्चित है…

आपदा को अवसर



जीवन कठिन है,

कठिनता ही जीवन है। 

हम इस बात को,

भूल क्यों जाते हैं?

थककर, बैठकर,

उसे कोसते क्यों जाते हैं?

उससे कुछ हल नहीं होगा,

नए जोश के साथ,

चलो, उठो, लड़ो। 

और आओ मन में, 

नया उत्साह जगाते हैं।

जो दे न सकी ज़िंदगी, 

उसे छीनकर लाते हैं। 

चलो इस आपदा को 

अवसर बनाते हैं…


आज की इस कविता को पढ़कर, बहुत से लोग हमें मोदी भक्त कहेंगे, तो कोई अंधभक्त, तो कुछ शायद चाटुकार भी बोल दे।

उनकी सब बातें हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह कविता मोदी जी पर नहीं, बल्कि उनके अथक प्रयासों और परिश्रम के ऊपर आधारित है।

नमन है एक ऐसे मनुष्य को जिसने साबित कर दिया कि परिश्रमी मनुष्य सफलता के शिखर पर अवश्य पहुंचता है।

अगर आप कविता का सार समझेंगे तो अवश्य ही जान जाएँगे कि यह कविता प्रेरणा स्रोत की ज्योति है, जिसने अपने अंदर जला ली वो सफल अवश्य होगा…

Monday, 14 September 2026

Poem : गणपति व हिन्दी

आज का दिन अतिविशेष है, हमारी जिंदगी को सजाने-संवारने वाली, माँ जगदम्बा और माँ भारती, दोनों के लाडले बेटे और लाडली बेटी का आगमन एक साथ ही है। गणेश चतुर्थी और हिंदी दिवस एक ही दिन है।

जब दोनों साथ आ रहे हैं, तो भव्य स्वागत भी साथ में होना चाहिए, तो आज की यह कविता दोनों के श्रीचरणों में समर्पित है। दोनों ही हम सब का कल्याण करें…

गणपति व हिन्दी


सत्य सनातन के तुम स्वामी,

गणपति तुम हो अंतर्यामी। 

तुम ही हो अंत, तुम्हीं हो आरंभ,

जीवन का हो तुम से शुभारंभ।।


भारत माँ की लाडली बेटी, 

सौंदर्य को खुद में है समेटी।

जगमग करती है उसकी बिंदी, 

माँ की सबसे बड़ी बेटी है हिंदी। 


एक है आदि-अंत,

एक है अविरल धारा।

दोनों के आशीष बिना,

संभव नहीं संसार हमारा।।


एक की माँ है जगदम्बा,

एक की माँ है भारती।

आ रहे दोनों ही साथ में,

आओ उतारें उनकी आरती।।


मोदक का हम भोग लगाकर,

गणेश जी की जय हिन्दी में गाएँ।

शीश झुकाकर, जयघोष लगाकर,

दोनों से नित-नित आशीष पाएँ।।


गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया!

जय हिन्द, जय हिन्दी!

Saturday, 5 September 2026

Poem : A Day Without Teachers

Apart from parents, only teachers guide us to the right path and celebrate our accomplishments. Like air is essential for survival, a true mentor is essential for dignity and self-respect. 

Advay's poem beautifully highlights this role. Let's enjoy it and appreciate him if you find it worthwhile…

A Day Without Teachers


Several verses, I read, about the divinity of teachers

Written by several saints, poets, and public preachers.

Maybe I, however, do not share the same thought,

I think, “Do teachers really have a key role or not?”


To answer this question, let us all do assume, 

Without teachers, what would be a classroom?

No teaching staff, how would a school look like?

And, would social ethics face a downward spike?


In teacher’s absence, each student degrades, 

Be it a master of one, or a jack of all trades.

Rules are still there, but now no one abides,

School ramps are now their playground slides.


All educational institutions are now centres of havoc.

Earlier a regulator, now it is an unwound clock.

In the minds of students, there’s not even a bit of fear.

They are like free bicycles, without anyone to steer.


At first, the best friends have their fullest fun, 

They dance, they play, they sing, and they run.

But later, they have a feeling of an unusual void, 

Previously excited, yet now they’re highly annoyed.


Even the troublemakers now wanted to study,

To teach them, they eagerly waited for somebody.

They missed even the most brutal red pen,

For this tragedy, who can be considered the villain?


From that day onwards, they had learnt a lesson,

Their insatiable curiosity, only teachers can lessen.

The hatred converted into emotional attachment,

In their behaviour, we could see a major assent.


Now I know, that my thinking was definitely wrong,

We all are deeply indebted to our teachers, lifelong.

On this special occasion, therefore, let us all acclaim,

If students are an unlit torch, the teacher is the flame.


Happy Teacher's Day!

Friday, 4 September 2026

Poem : तुम हुए साकार

मेरी बेटी अद्विका ने brush से उकेर कर नारायण के निराकार रूप को कान्हा के साकार रूप में बनाया।

तो मन बरबस ही उस ओर खिंचा चला गया और कलम ने यह भाव उकेर दिए, आज जन्माष्टमी महोत्सव के पावन पर्व पर उसी को साझा कर रहे हैं…

तुम हुए साकार


तुम निराकार,

तुम हुए साकार,

नारायण, कान्हा बनकर।


मुरली की तान,

मीठी मुस्कान,

नटवर गिरिधारी बनकर।


मोरपंख का मान,

भक्तों की शान,

श्याम वर्ण कृष्णा बनकर।


लकुटी को बांध,

दिया सुख का भान,

रक्षक बनवारी बनकर।


तुम निराकार,

तुम हुए साकार,

नारायण, कान्हा बनकर।


आप सभी को जन्माष्टमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

Saturday, 15 August 2026

Poem : स्वतंत्रता और हरियाली

मिट्टी की खुशबू और चारों तरफ हरियाली से जुड़े दो बड़े पर्वो का मेल हुआ है इस वर्ष, स्वतंत्रता दिवस और हरियाली तीज का।

तो आइए, यह देखते हैं, कि किस प्रकार से ये दोनों ही त्यौहार हमारे जीवन में बहुत अहम हिस्सा निभाते हैं…

स्वतंत्रता और हरियाली


दोनों ही महत्वपूर्ण, दोनों ही सुखद,

जैसे ज़िन्दगी को मिल गई हो हद।

बिन आजादी जीवन था असंभव,

हरियाली के संग ही जीवन संभव।

दोनों तो हैं एक-दूजे के ही मेल,

दोनों के बिन जीवन हो जाए अझेल। 

आओ मिलकर सभी उत्सव मनाएं,

झंडा फहराकर, गीत तीज के गाएं।

तिरंगे की आन-बान-शान को शीश झुकाएं,

झूले में बैठ, हवा संग आसमान को छू आएं।

झंडों से सजे देश की है छटा निराली, 

संगत दे रही उसको तीज़ मतवाली।


आप सभी को स्वतंत्रता दिवस और हरियाली तीज पर विशेष शुभकामनाएँ!

Sunday, 2 August 2026

Poem : Friendship - An Asset

Friendship is a precious asset. A true friend is someone who makes life worth it. Advay has inculcated and elaborated the same feeling in this poem of his. Let's enjoy and celebrate this friendship day…

Friendship - An Asset


For humans, friendship is the greatest quality.

It is capable enough, to surpass even the biggest polity.

Friendship is an institution which always stays strong.

Friends shape your future, be it right or wrong.


If this world's a garden, friendship is the flowers.

In which, the friends kept chattering for hours.

There were times when the weather was unfavorable.

Yet, the flowers bloomed, because the stem was stable. 


If this universe is a sea, friendship is the boat.

The only structure on which people can float.

Without it, the sea becomes a major threat.

But with it, we can use the sea as an asset.


If this earth is a sky, friendship is the sun.

It can be irritating, but is usually the source of fun.

Though we might think that the sun is always not required.

But without the sun, the earth can no longer be admired.


We celebrate it this day, with colourful wrist bands.

We give it to those, who were our helping hands.

Friendship are not the pillars, it is the entire building.

On an ordinary iron statue, it is the valuable gilding.


Happy Friendship Day!!

Wednesday, 29 July 2026

Poem : हे गुरु, करूँगा मैं इसकी साधना

“गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।

गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥”

इस दोहे के साथ आज सद्गुरु महाराज को श्रद्धा के सुमन अर्पित कर रही हूं।

हे गुरु, करूँगा मैं इसकी साधना


जब मोह-माया में था मैं मस्त,

जीवन था तब अस्त-व्यस्त।

मनुष्य जीवन का नहीं था भान,

किस कारण मिला है? नहीं था ज्ञान। 

सुख, समृद्धि और सफलता,

स्वार्थ सिद्धि और प्रफुल्लता,

इसी को रहा था जीवन मान।

सच्चे उद्देश्य को नहीं रहा था जान।

तभी मिली एक सुदृढ़ छत्रछाया,

जिसने आत्मज्ञान जगाया।

मनुष्य जीवन का बताया मोल,

कहा, होता यह जीवन अनमोल। 

मनुष्य जीवन नहीं होता है खुद को पाना,

होता इसमें आत्मा को ईश्वर से मिलना।

हे गुरु, करूँगा मैं इसकी साधना,

आपसे है बस यही प्रार्थना।

जब तक न मिले हरि द्वार, 

करते रहना प्रेरित हर बार… 


गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर मेरा शत-शत प्रणाम स्वीकार करें 🙏🏻

Thursday, 9 July 2026

Poem : जन्मदिवस पर स्नेहाशीष

एक माँ का अपने बेटे के लिए स्नेहाशीष…

जन्मदिवस पर स्नेहाशीष


मनुष्य जन्म को तब,

आधार मिलता है।

जब मां-पापा बनने का,

अधिकार मिलता है।

जीवन की बगिया में, 

वो जो पुष्प खिलता है।

सम्पूर्णता मिल गई हो जैसे, 

यह एहसास मिलता है।

अपने अस्तित्व को भूल,

मां-बाप उसमें ही खो जाते हैं। 

उसके इर्द-गिर्द ही अपनी, 

दुनिया सजाते हैं।

पर यह बच्चे पर भी,

निर्भर करता है।

सुखद जीवन मिले उन्हें,

वो अपने कर्मों से तय करता है।

फिर अगर मिल जाए,

अद्वय-सा बच्चा।

सुखद जीवन का स्वप्न,

हो जाए सच्चा।

कुशाग्र बुद्धि, बेहद सरल,

जैसे बहता अविरल जल।

जितना चंचल, उतना कोमल,

डिगे नहीं, चाहे हो जो पल।

संस्कृति, विज्ञान का वो संगम,

उजला तन उजला ही मन।

उसकी हर एक को कामना,

सुखद रहे जीवन उसका, 

यही है ईश्वर से मेरी प्रार्थना। 


हे ईश्वर, कोटि-कोटि आभार आपको, जैसे बच्चे की कामना होती है सबको, वैसा ही बच्चा आपने दे दिया हमको।

जन्मदिवस पर विशेष शुभकामनाएँ हमारे प्यारे बेटे अद्वय!

Sunday, 21 June 2026

Poem : पिता और योग

आज जिंदगी को सम्पूर्णता प्रदान करने वाले दो दिवस एक साथ हैं, पिता दिवस (International Father's Day) और योग दिवस (International Yoga Day), और दोनों के बिना सुखद जीवन असंभव है।

आज दोनों को एक कविता में पिरोकर प्रस्तुत किया है, आशा है पसंद आएगी। तो चलिए, इसका आनन्द लेते हैं…

पिता और योग 


जब माँ से पिता का,

होता है योग।

सृष्टि में जीवन का,

तभी बनता संयोग।।


पिता की मेहनत के योग से, 

जीवन सुखद हो जाता है।

पिता का साया न हो,

वो घर कहां भाता है?


पिता के अनुभव के योग से,

सफलता कदम चूमती है।

उनके आने की आहट से,

परिवार में खुशियां झूमती है।। 


जैसे स्वस्थ शरीर के लिए,

योग होता है ज़रूरी।

वैसे ही पिता का साथ,

जिंदगी करता है पूरी।।


इसलिए प्रतिदिन जीवन में, 

तुम योग का धरो ध्यान। 

सुखद जिंदगी पाने के लिए, 

पिता को दो पूर्ण सम्मान।। 


आज बच्चों द्वारा बनाए गए card के साथ ही कविता को प्रस्तुत किया है।

Friday, 5 June 2026

Poem : जीवन के दिन चार बचे हैं

आज आप सब के साथ मुझे भोपाल के मेजर नितिन तिवारी जी की कविता को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

आज नितिन जी ने इस कविता में माध्यम से कहा है कि, दुःख अवसाद को भूलकर आगे बढ़ना ही जीवन है, और जीवन की इस सच्चाई को उन्होंने बहुत खूबसूरती से उकेरा है।

आइए, इसका आनन्द लेते हैं…

जीवन के दिन चार बचे हैं


जीवन के दिन चार बचे हैं,

आग बुझी अंगार बचे हैं।

दबे उम्मीदों की राखड़ में,

बुझी आग के सार बचे हैं।

भीतर ही जो रहे सुलगते,

गढे हुए दो चार बचे हैं।

हमने खूब सजाया उपवन,

मानो सदा रहेगा यह तन‌। 

थे बसंत उत्सव के भागी,

चले गये सब उजड़ा मधुवन।

पत्ते छीन लिये पतझड ने,

फूल नहीं बस खार बचे हैं।

कर कमजोर थाम पतवारें,

नौका जब मझधार भंवर है।

है पुरुषार्थ सिर्फ शब्दों में,

जीवन नैया भी जर्जर है।

सांसे है गिनती की बाकी,

भोगे जो व्यवहार बचे हैं।

चार रोज तो काफी हैं यदि,

कुछ करने को संकल्पित हों।

बीती बातें सभी भुला दें,

जियें जैसे आज को ही अर्पित हो।

कल का क्या जो होगा सो हो,

जियें यही सुख सार बचे हैं।।

Monday, 11 May 2026

Poem : चली थी जहाँ से

आज आप सब के साथ मुझे भोपाल के मेजर नितिन तिवारी जी की कविता को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

आज नितिन जी की लेखनी ने प्रेम-रस बरसाया है, कुछ ही शब्दों का उपयोग कर के बहुत ही खूबसूरत कविता लिखी है।

आइए, इसका आनन्द लेते हैं…

चली थी जहाँ से


चली थी जहां से,

वहीं फिर चली।

कली-सी महकती,

है कविता कली।

खिला रूप यौवन,

चमन में खिला।

चली मिलने मोहन,

से राधा चली।

कई ठांव आए,

गए भी कई।

चली जो थी कहने,

वो कहने चली।

चली थी जहां से,

वहीं फिर चली…

Sunday, 10 May 2026

Poem : माँ ऐसा कैसे करती हैं

माँ ऐसा कैसे करती हैं


मैंने देखा है कि,

माँ जब अपनी माँ से,

और उनकी माँ जब अपनी मां से,

फ़ोन पर बातें करती हैं।

सच कहती हूँ,

वो भी बिल्कुल 

मुझ-सी ही लगती हैं।

वैसी ही वो हंसती हैं,

नखरे भी वैसे ही करती हैं,

रूठना-मनाना भी बिल्कुल 

मुझ जैसा ही करती हैं‌

पर जब वो मेरी 

माँ का रूप धरती हैं,

न जाने, तब क्यों वो

अलग रूप में लगती हैं। 

अपने सपनों को बिसराने वाली ,

कष्ट में भी मुसकाने वाली,

काम हो कितना भी अधिक, 

मिनटों में निपटाने वाली। 

हरदम खुद से पहले

वो मुझको ही रखती हैं।

समझ नहीं आता है कि 

माँ, ऐसा कैसे करती हैं?

अपने बच्चों की खातिर 

खुद को कितना बदलती हैं। 


मातृ दिवस के शुभ अवसर पर सभी माँ और उनकी ममता को कोटि-कोटि नमन।


Thursday, 30 April 2026

Poem : बहुमूल्य बूंदें

बहुमूल्य बूंदें


सूरज की तपती किरणों से,

सूख हो रही धरा विकल।

दूर-दूर तक नहीं दिख रहा,

प्यास बुझाने को अब जल।।


सूख रहे हैं विटप सारे,

पशु-पक्षी त्राहिमाम पुकारे।

बंजर होती यह भूमि,

हरी-भरी हो किसके सहारे? 


आह! मेघ घिर आए,

नन्ही-नन्ही बूंदों को लाए।

पर क्या चंद बूंदों से,

धरती फिर हरी-भरी हो जाए?


ऐ मेघ! करो हमसे तुम वादा,

जल्द आओगे तुम जल लेकर।

सुख की छाया कर जाओगे,

तुम बहुमूल्य बूंदों को देकर।।

Wednesday, 22 April 2026

Poem : चलो वृक्षारोपण करते हैं

आज पृथ्वी दिवस के पावन पर्व पर आइए, उसे धन-धान्य से परिपूर्ण करने का प्रण लेते हैं।

उसी प्रण को काव्यरूप में प्रस्तुत किया है।

चलो वृक्षारोपण करते हैं


क्या कभी सोचा है यूं,

पृथ्वी को धरा कहते हैं क्यूं?


क्योंकि वो ही है जो

माँ की तरह ही 

हम सबके दुःखों को,

अपने अंक में धरती है।


और बदले में देने को,

अपनी झोली तुम्हारे

सुखों से भरती है।


देती है वो अविरल बहता,

कल-कल करता जल।

फल-फूल, सब्जी, और

सुनहरे भविष्य का कल।


तो चलो हम भी,

कुछ ऐसा करते हैं।

धरित्री के अंक को,

हरियाली से भरते हैं।


वो सदैव धन-धान्य से,

परिपूर्ण रहे,इसके लिए 

चलो वृक्षारोपण करते हैं।


 Happy Earth Day!

Thursday, 2 April 2026

Poem : हनुमान जी का जन्मोत्सव

पवनपुत्र, मारुति, केसरी नंदन, अंजनी सुत, संकटमोचन, महावीर, बजरंग बली, ऐसे और बहुत से नामों के स्वामी भक्त शिरोमणि हनुमानजी के जन्मोत्सव पर विशेष शुभकामनाएँ! 

हे संकटमोचन, हर कष्ट हरो, हर एक को सुखी करो।

पूरे संसार में सिर्फ हनुमानजी ही हैं, जिनका जन्मोत्सव, साल में दो बार मनाया जाता है। पर क्यों?

इसे ही कविता में ढालने का प्रयास किया है। आइए इस कविता के माध्यम से उनका आशीर्वाद प्राप्त करें…

हनुमान जी का जन्मोत्सव


ईश्वर जो हैं, सर्व शक्तिमान, 

भक्तशिरोमणि हनुमान। 

क्यों दो-दो दिन होता है,

उनके जन्मोत्सव का प्रावधान?


एक कार्तिक, एक चैत्र, 

क्या दोनों एक समान? 

क्यों दो-दो दिन होता है,

उनके जन्मोत्सव का प्रावधान?


कार्तिक मास की चतुर्दशी को, 

भए प्रगट वीर हनुमान।

उनके जन्मोत्सव का यही है 

शुभ प्रथम प्रावधान।। 


पिता केसरी, माता अंजना, 

मारुति रखा था नाम। 

छोटे से पवनपुत्र 

करते थे बड़े-बड़े काम।।


भूख की पीड़ा से पीड़ित, 

हो रहे थे व्याकुल परेशान।

सूर्य को‌ ही निगल गये

वो, फल आम का जान।।


इन्द्र ने करके व्रज प्रहार, 

किया सूर्य निकालने का काम। 

टूटी इससे मारुति की ठुड्ढी,

तब से वो कहलाए हनुमान।। 


कुपित हो गये पवनदेव,

पुत्र की ऐसी गति जान।

नहीं रहेगी वायु कहीं भी,

गर पुत्र में फिर न आए प्राण।। 


ईश्वरीय आशीष से,

मारुति में आ गयी जान।

चैत्र की पूर्णिमा थी उस दिन, 

हुआ जब दूसरे जन्म का प्रावधान।। 


दिन विशेष दोनों ही,

दोनों ही एक समान। 

इसलिए ही जन्मोत्सव के

उनके हैं दो-दो प्रावधान।।


हनुमान जी की कृपा से, 

होते सफल, सुजान। 

प्रातः स्मरण जो करे उनका,

उसका सदा होए कल्याण।।


आप सभी को हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।


हनुमान जी से जुड़ी हुई और जानकारी प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए links पर click करें -

Tuesday, 31 March 2026

Poem : डेढ़ इंच के परमवीर

मौसम बदल रहा है, साथ ही बढ़ रही है मच्छरों की संख्या...

पर सीखो तो, यह छोटा सा जीव भी हमें बहुत कुछ सीखा जाता है। 

आज की कविता उसी को बयां करती हुई...

डेढ़ इंच के परमवीर


उनकी आठ दिन की ज़िंदगी,

हमारे अस्सी साल पर भारी। 

जो तबीयत से काट लिया एकबार,

तो समझो, अस्पताल जाने की तैयारी।।


हमारे पास उन्हें मारने के,

तरीके हैं कई हजार।

और उनके पास सदियों से,

रहा सिर्फ एक हथियार।।


उन्हें देखकर फिर क्यों, 

हम बहुत अधिक डर जाएं?

होने वाली ढेरों बीमारियों को, 

सोच-सोचकर घबराएँ?


वो डेढ़ इंच के परमवीर,

डटकर सामने खड़े हो जाएं। 

हम पर हमला करने को,

अपनी विशाल सेना ले आएं।।


वो छोटा-सा जीव,

दुनिया को यही सिखाता है।

डटकर खड़े रहना ही,

वर्चस्व तुम्हें दिलाता है।।

Sunday, 8 March 2026

Poem : क्या ऐसा कर पाओगे?

स्त्री और पुरुष के परम पवित्र रूपों को बदल कर एक कवि ने कविता रची, जिसने दिल को छू लिया। उसी कविता के सार को अपने शब्दों में पिरोकर आपके सामने प्रस्तुत किया है, पढ़कर बताएं, आपको कैसी लगी?

क्या ऐसा कर पाओगे?


 चलो कुछ ऐसा करते हैं, 

जो कभी नहीं हुआ है. 

उसकी कल्पना करते हैं, 

स्त्री और पुरुष को 

एक-दूसरे का रूप धरते हैं।


मैं बनूँ राम, और तुम

सीता बन जाना।

मर्यादा चुनुंगी मैं, 

तुम अग्नि परीक्षा दे आना।।

क्या ऐसा कर पाओगे?


जो बनूँ मैं कान्हा,

तुम राधा बन जाना। 

कर्तव्य चुनुगीं मैं,

तुम विरह वेदना सह जाना।।

क्या ऐसा कर पाओगे?

 

शिव का रूप धरूँ जो मैं, 

तुम शक्ति बन जाना। 

योग चुनुगीं मैं,

तुम अग्नि में तप आना।।

क्या ऐसा कर पाओगे?


 ईश्वरीय रूप छोड़ो,

हम इन्सानी रूप में आते हैं। 

उनकी दिव्यता को हम सब,

शत-शत शीश नवाते हैं।।


पुरुष बन जाऊँ गर,

तुम स्त्री बन जाना। 

मैं चुनुगीं खुद को, 

तुम मेरे लिए सबसे लड़ जाना। 

क्या ऐसा कर पाओगे?


क्या एक बार ऐसा करने का, 

तुम अपना मन बनाओगे?

क्या स्त्री की व्यथा, 

कभी तुम समझ पाओगे?

क्या ऐसा कर पाओगे? 


Happy Women's Day!

Wednesday, 4 March 2026

Poem : The Story of Holi

What is the folklore behind the celebration of Holi, and what it teaches all of us. This has been weaved into a beautiful poem by Advay. Let's enjoy this poem and awaken the good within us. Happy Holi!

The Story of Holi


We lit a bonfire, play with colours.

We tend to forget who're ours & others.

Gujhiyas & Malpuas steal the spotlight.

The New Year begins after a fortnight.


Yes, Holi's the name of this festival.

With all the clues, it's way too guessable.

But why's it celebrated & why this name?

In this poem, let's understand the same.


Hiranyakashyapu was Lord Vishnu's enemy.

While his son Prahlad, was Vishnu's devotee.

The father's a demon, the son's a follower.

This clash led to rage & anger all over.


The devil once became hot under the collar.

To burn Prahlad, was his unjust & cruel order.

Hiranyakashyapu's sister Holika stepped ahead.

With the boon, even in the fire, she didn't become dead.


Everything happened according to the ogre's desire.

Prahlad was in Holika's lap, & Holika in the fire.

Prahlad continuously chanted the name of the almighty.

Hardly anxious, because of his belief in the deity.


To everyone's surprise, Holika went on flames.

Whilst Prahlad was all right, he himself claims.

The monster could not digest this fact.

He now couldn't see his son fully intact.


And ahead he stepped, to kill his kid.

With his enemy's votary, he wanted to get rid.

Prahlad didn't stop chanting the word ‘Hari’.

Aware of the fact that the decision was arbitrary.


The sword was lifted, and the situation became tense.

God himself had to step in, to stop this barbarism immense.

Killing the ‘asur’ required a situation bizarre.

Thus, Lord Vishnu appeared in Narsimha Avatar.


Hiranyakashyapu was killed, and Prahlad survived.

The evil had declined, and the good had thrived.

To do the same inside ourselves, Holi is celebrated.

In Hinduism, this occasion is eagerly awaited.

Thursday, 5 February 2026

Poem : उम्मीद

उम्मीद

हर रोज़ उम्मीदों को,
जुड़ते टूटते देखा है।
हम जो थे अब तक
आशाओं से भरे हुए,
उन आशाओं को 
क्षण-क्षण 
बिखरते देखा है।
जीने की जो इच्छा है,
उसको तिल-तिल 
छूटते देखा है। 
हमने बहुत पास से 
खुद को बदलते देखा है। 
ज़िंदगी गुजार दी 
जिन रिश्तों को संवारने में,
उन्हीं रिश्तों को हर पल 
बदलते हुए देखा है।। 

Wednesday, 4 February 2026

Poem : शोर

शोर 


जब से इन कानों ने,

सुनना बंद किया। 

शोर बहुत धड़कनों

का सुनाई दिया,

सपनों का सुनाई दिया, 

अपनों का सुनाई दिया,

बेइंतहा तन्हाई का

सुनाई दिया।

और बस एक ही 

बात समझ आई,

न किसी से उम्मीद करो,

न किसी को उम्मीद दो,

क्योंकि अपने हिस्से की

लड़ाई खुद लड़नी होती है।

कोई दावे कर ले जितने, 

साथ कोई चला नहीं करता।