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Saturday, 31 October 2026

Article : Vigilant and Victorious

(I) Vigilance Awareness Week 2026 :

आजकल Vigilance Awareness Week (26 October - 1 November) चल रहा है, जो India के ‘Ironman of India’ Sardar Vallabhbhai Patel के birth-anniversary के सप्ताह के रूप में celebrate किया जाता है।

क्यों कहते हैं इस week को vigilance awareness week? Vigilance अर्थात् सतर्कता...

सतर्कता ही सफलता


(II) Major Contributions :

सरदार वल्लभभाई पटेल ने न केवल देश को independent कराने में योगदान दिया था, बल्कि बंटे हुए देश को एकसूत्र में बांध कर, unite करके, भारत देश (Part A, Part B, Part C, Part D) बनाया था।

सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्र भारत के political unity, administrative system के निर्माण, और farmer protests के जरिए देश के निर्माण में historical contribution दिया है।

उन्हें भारत के ‘लौहस्तंभ’ के रूप में जाना जाता है। देश के लिए उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं।

  • Provincial Unity- आज़ादी के बाद देश के सामने लगभग 565 से अधिक princely states को एक करने की सबसे बड़ी चुनौती थी। सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति, बातचीत और दृढ़ इच्छाशक्ति से 560 से अधिक provinces को Indian Union में मिलाया।
  • Accession Process- V.P. Menon के साथ मिलकर States Department के through ‘Instrument of Accession’ (विलय-पत्र) पर signature कराकर अधिकांश रियासतों का विलय किया गया।
  • Main Challenges- Hyderabad, Junagadh, Kashmiri, Travancore, और Bhopal जैसी रियासतों के एकीकरण में उन्होंने कूटनीति और आवश्यकतानुसार दृढ़ रुख अपनाया।
  • Iron Man- इस ऐतिहासिक और extraordinary कार्य के कारण ही उन्हें भारत का ‘लौह पुरुष’ कहा जाता है।
  • Union Public Service Commission- पटेल को ‘Father of All Indian Services’ माना जाता है। उन्होंने देश में Indian Administrative Service (IAS) और Indian Police Service (IPS) [UPSC] की स्थापना की, जो देश के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती प्रदान करती है।
  • Protests and Satyagraha- आज़ादी के पहले उन्होंने Bardoli Satyagraha (1928) और Kheda Satyagraha (1918) का नेतृत्व किया। Bardoli की महिलाओं ने उन्हें वहाँ ‘Sardar’ की उपाधि दी थी।
  • Co-operative Protests- भारत के co-operation और dairy sector की नींव रखने में उनका अहम योगदान था, जिससे आगे चलकर ‘Amul (Anand Milk Union Limited)’ जैसे बड़े organizations का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • Home Minister and Deputy Prime Minister- आज़ादी के बाद देश के लिए prime minister के रूप में पहली पसंद सरदार वल्लभभाई पटेल ही थे।


(III) Gandhi's Say :

किन्तु Mahatma Gandhi की इच्छा थी कि Jawaharlal Nehru prime ministers बने। अतः उन्होंने गांधी जी की इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए पहले गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री का पद स्वीकार किया।

पहले गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने partition के बाद refugees के पुनर्वास और internal security बहाल करने में मुख्य भूमिका निभाई।

अगर हमारे देश भारत के पास सरदार वल्लभभाई पटेल की सतर्क दृष्टि और सफल political ज्ञान न होता, तो भारत कभी सुदृढ़ और सफल नहीं होता।

देश अपने पुनर्संगठित, सुदृढ़ और सफल होने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल जी का सदैव indebted रहेगा।

उनके अनेकानेक योगदान को याद करते हुए, उनकी देश के प्रति सतर्कता को सच्ची श्रद्धांजलि देने के उपलक्ष्य में vigilance awareness week मनाता है, जिसे उनके जन्मदिवस पर अपने श्रद्धा के पुष्प अर्पित कर सम्पन्न किया जाता है।

देश के अमर स्वतंत्रता सेनानी, पहले गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री, लौह-पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जी को, जिन्होंने हमें समझाया कि सतर्कता ही सफलता है, उनके जन्मदिवस पर शत-शत नमन!

Sunday, 4 October 2026

Article : श्राद्ध पक्ष- दुःख या त्यौहार

श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं और हम इन दिनों में अपने से जुड़े हुए परिवार के सदस्यों की उनकी तिथि के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

इसमें हम उनकी पसंद के भोजन व मिष्ठान का भोग लगाते हैं, उनके नाम से कुछ रुपए निकालते हैं, जिसे अनाथ-आश्रम और पूजनीय-आश्रम में दान कर देते हैं।
  • किसी ने पूछा कि आप एक-एक की तिथि जान कर, हर साल पूजा-अर्चना क्यों करती हैं?
  • केवल मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या में ही क्यों नहीं कर देती हैं?
  • आपको क्या यह त्यौहार लगता है?
  • इस तिथि में गए हुए सदस्य के जाने का दुःख नहीं लगता है?
श्राद्ध पक्ष- दुःख या त्यौहार


हाँ, सबसे पहली बात श्राद्ध पक्ष के यह 16 दिन एक त्यौहार ही हैं, इसलिए इसे उसी तरह से मनाया जाना चाहिए।

यह त्यौहार इसलिए भी हैं, क्योंकि हमारे सनातन धर्म में इन 16 दिनों में हमारे पितरों को ईश्वर के तुल्य स्थान दिया गया है।

जो दिन, पितरों को ईश्वर के तुल्य बना दें, वो दुःख के दिन कैसे हो सकते हैं?
 
कहा जाता है कि इन दिनों अपने पितरों की पूजा-अर्चना, दान-पुण्य करने से हमें सर्वाधिक पुण्य की प्राप्ति होती है, साथ ही साथ हमारे पितरों को तृप्ति की प्राप्ति होती है।

जहाँ तक रही दुःख की बात, तो बिल्कुल होता है, अपने परिवार के सदस्यों के लिए।

पर आपको बता दें कि दुःख मनाया जाने वाला दिन वो है, जिस महीने व जिस दिन वो गए थे, यह नहीं।

यह नहीं, क्यों?

क्योंकि इस दिन में पूजा-अर्चना इसलिए की जाती है, क्योंकि अपनी तिथि-विशेष में वह सदस्य आपसे मिलने, आपको आशीर्वाद देने के लिए आता है। 

तो उस दिवस को कैसे दुःख का दिन मान लें, जब वह पुनः हमसे जुडने के लिए, हम पर कृपा बरसाने के लिए आ रहे हैं?

दूसरा, प्रत्येक व्यक्ति का आगमन अपने तिथि-विशेष में होता है, तो उस दिन को विशेषता न देकर अपनी सुविधानुसार पूजा-अर्चना और दान-पुण्य करने का क्या औचित्य?

बस यही वजह है, कि हम प्रत्येक सदस्य की तिथि को जानकर उस दिन उन्हीं के पसंद के अनुरूप भोग-प्रसाद व मिष्ठान आदि बनाते हैं, दान-पुण्य करते हैं।

आइए, श्राद्ध पक्ष के इन 16 दिनों को मिलन दिवस या त्यौहार के रूप में मनाएँ।

ईश्वर में लीन सदस्य को याद करते हुए, पूजा-अर्चना करते हुए, उनके मनपसंद भोग-प्रसाद व मिष्ठान आदि को उन्हें अर्पित करें, दान-पुण्य करें।

उनसे प्रार्थना करें कि वो सदैव हमसे जुड़कर हमारा मार्गदर्शन करें, हमें सफलता के पथ पर अग्रसर करें, हमारे सभी दुःख-कष्टों को दूर कर हमें सुख प्रदान करें, व हमें वो सामर्थ्य प्रदान करें कि हम सदैव ऐसा कर्म करें जो हमारे कुल, हमारे गौत्र का नाम रोशन करने में सहायक हो।

अपने सभी पूर्वजों व बुजुर्गों को शत-शत प्रणाम, आप सब की कृपादृष्टि सदैव हम पर बनी रहे और आपसे हमारा संपर्क सदैव बना रहे।

जय सभी पितरों की!

Tuesday, 29 September 2026

Article : हमारे अपनों के दिन

इस वर्ष पितृपक्ष या कनागत की शुरुआत 26 September (शनिवार) को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ हो चुकी है, और इसका समापन 10 October (शनिवार) को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा।

इन विशेष दिनों को हमारे अपनों के दिन भी कहा जा सकता है, क्योंकि इन दिनों में हम किसी देवी-देवता की पूजा-अर्चना नहीं करते हैं, बल्कि अपने पूर्वजों की पूजा-अर्चना करते हैं।

अपने पूर्वजों के विशेष दिन में पंडित जी को बुलाकर उनके नाम से दान-पुण्य, पूजा-हवन इत्यादि करते हैं‌।

पर यह विशेष दिन हमारे लिए और अधिक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाते हैं, क्योंकि इन दिनों में हम ईश्वर से अधिक नज़दीक हो जाते हैं…

हमारे अपनों के दिन


हमारे द्वारा की गई पूजा-अर्चना ईश्वर जल्दी स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि इस समय में की गई पूजा-अर्चना दान-पुण्य इत्यादि हमारे पूर्वजों से होते हुए ईश्वर तक पहुंचते हैं।

हमारे पूर्वज, ईश्वर के प्रिय होते हैं और हम अपने पूर्वजों के। तो हो गई न ईश्वर से नज़दीकी!

पर क्या इसमें उन्हीं पूर्वजों की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जो स्वर्गवासी या ब्रह्मलीन हो गए हैं?

नहीं, ऐसा नहीं है कि केवल उन्हीं की पूजा-अर्चना से पुण्य अर्जित किया जा सकता है। 

बल्कि उनकी पूजा-अर्चना के साथ-साथ ही अगर आप अपने जीवित दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता या सास-ससुर की सेवा करेंगे, उनकी इच्छाओं की पूर्ति करेंगे, उनके साथ समय व्यतीत करते हैं, तब भी आप को वही पुण्य मिलेगा।

यह विशेष दिन हमारे अपनों के हैं, उनकी सेवा और पूजा-अर्चना के दिन है।

भारतीय संस्कृति में यह 16 दिन इसलिए ही निर्धारित किए गए हैं, कि हर साल हम atleast 16 दिन अपने पूर्वजों से जुड़ें, उन्हें धन्यवाद दें, उनके नाम से दान-पुण्य पूजा-अर्चना करें।

पर जो चले गए, उनके लिए विधिवत कर्मकाण्ड संस्कार करना, और हमारे जो बुजुर्ग जीवित हैं उन्हें neglect करने से कुछ पुण्य अर्जित नहीं होगा।

अगर पूरी प्रक्रिया विधिवत करनी है, तो जो ब्रह्मलीन पूर्वजों के लिए पूजा-अर्चना दान-पुण्य करें और जो बुजुर्ग जीवित हैं उनकी सेवा-सुश्रुषा करें, उन्हें मान-सम्मान दें, उनके साथ समय व्यतीत करें।

तब आपकी पूजा अर्चना विधिवत पूर्ण होगी। और उनके आशीर्वाद से होंगे आपके सभी कार्य सम्पन्न व पूर्ण होगी सभी मनोकामनाएं, जिससे आप सुखी, स्वस्थ और समृद्ध रहेंगे।

एक और सबसे बड़ी बात होगी, हमारे अपनों के दिन में अपने पूर्वजों और बुजुर्गों की सेवा से, कि आपके बच्चों में संस्कार आएंगे, वो भी सबसे जुड़ेंगे और सबसे बढ़कर वो सीखेंगे। अपनों से जुड़ना, उनकी सेवा करने, उन्हें मान-सम्मान देना।

और एक दिन पलट कर यह आपको भी सुख प्रदान करेगा, क्योंकि ध्यान रखिएगा कि एक दिन बुजुर्ग सबको होना है और ब्रह्मलीन भी।

तो जाने से पहले सबकी सेवा कर लीजिए, क्योंकि ईश्वर भी उन्हीं से प्रसन्न होते हैं, जिनके पूर्वज और बुजुर्ग उनसे प्रसन्न हैं।

हमारे सभी पितर तृप्त रहें, हम से प्रसन्न रहें और उनकी कृपा दृष्टि सदैव बनी रहे।

हमारे सभी पूर्वजों व बुजुर्गों को शत-शत प्रणाम!

Saturday, 22 August 2026

India's Heritage : पार्वती जी को भी भाए सावन

सावन का पावन माह चल रहा है, शिव जी को प्रसन्न करने वाला, उनकी भक्ति में लीन होने का।

पर क्या आपको पता है, न केवल शिव जी को, बल्कि शक्ति स्वरूपा पार्वती जी को भी सावन माह में पूजा-अर्चना करते हुए प्रसन्न किया जा सकता है?

पर जैसे सावन के सोमवार में पूजा-अर्चना करने से महादेव प्रसन्न होते हैं, वैसे ही पार्वती माता की सावन माह के मंगलवार को पूजा-अर्चना की जाती है, जिसे मंगलागौरी व्रत भी कहते हैं?

पार्वती जी को भी भाए सावन


सावन (श्रावण) मास के प्रत्येक मंगलवार को माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है और मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।

  • व्रत का महत्व और नियमसमर्पण- यह दिन भगवान शिव की शक्ति और माता पार्वती को समर्पित होता है।
  • सौभाग्य प्राप्ति- विवाहित महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
  • शीघ्र विवाह- अविवाहित युवतियां मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं।
  • सोलह की संख्या- पूजा में सभी सामग्री (जैसे दीपक, चूड़ियां और प्रसाद) सोलह (16) की मात्रा या संख्या में अर्पित की जाती है।

हर-हर महादेव, माता पार्वती की जय।

Monday, 17 August 2026

India's Heritage : नागपंचमी व सावन का सोमवार

हिन्दू धर्म में सभी को सर्वश्रेष्ठ और पूजनीय स्थान दिया गया है, फिर वो चाहे देवी-देवता, प्रकृति, सूर्य, चन्द्र, शनिदेव, आकाश, पृथ्वी, गाय, या नागदेवता हों, सबकी पूजा-अर्चना के दिन निर्धारित हैं। 

इन दिनों में से नागपंचमी नागदेवता के लिए निर्धारित किया गया है।

नाग पंचमी का पावन पर्व इस साल 17 अगस्त 2026 (सोमवार) को है। 

इस दिन सावन का तीसरा सोमवार होने के कारण एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, क्योंकि भगवान शिव और नाग देवता की पूजा एक साथ की जाएगी।

महादेव को नाग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए ही उन्होंने नाग को अपनी ग्रीवा में स्थान दिया हुआ है। 

महादेव की गर्दन में नाग इस तरह से लिपटे हुए रहता है, मानो वह उनके श्रृंगार का अभिन्न अंग हो, उनके गले का हार हो।

पर क्यों है ऐसा और क्यों मनाते हैं नागपंचमी? आज India's Heritage segment में यही देखेंगे…

नागपंचमी व सावन का सोमवार


महादेव के गले में नाग क्यों :

भगवान शिव के गले में जो सांप लिपटा रहता है, उसका नाम वासुकी नाग है, जो नागों के राजा हैं। 

शिव जी ने उन्हें समुद्र मंथन के दौरान उनकी सेवा, समर्पण और कष्ट सहन करने के भाव से प्रसन्न होकर अपने गले का आभूषण बनाया था।


पौराणिक व आध्यात्मिक कारण :

इसके पीछे कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण हैं।

  • समुद्र मंथन- समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने मंदराचल पर्वत को मथने के लिए रस्सी की भूमिका निभाई थी। घर्षण से घायल होने और विष का प्रभाव सहने के उनके समर्पण को देखकर शिव जी ने उन्हें अपने गले में स्थान दिया।
  • भक्त की इच्छा- नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त थे और हमेशा उनके समीप रहना चाहते थे, इसलिए शिव ने उनकी मनोकामना पूरी की।
  • मृत्यु पर विजय- सांप को मृत्यु और काल का प्रतीक माना जाता है। गले में नाग धारण कर शिव यह दर्शाते हैं कि वे महाकाल हैं और मृत्यु तथा भय से परे हैं।
  • कुंडलिनी शक्ति- योग और तंत्र साधना में सांप को कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो मनुष्य के भीतर जागृत होने वाली चेतना का संकेत है।
  • संतुलन और शांति- एक अत्यंत विषैला और हिंसक जीव होने के बावजूद सांप शिव के गले में शांत रहता है, जो यह सिखाता है कि भयंकर ऊर्जा या क्रोध पर भी संयम रखा जा सकता है।

नागपंचमी का कारण :

अब जान लेते हैं कि क्यों मनाते हैं नागपंचमी।

नाग पंचमी का त्योहार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग देवता के प्रति सम्मान और उनकी रक्षा के लिए मनाया जाता है। इस दिन सांपों को दूध व फूल चढ़ाकर सर्पदंश से रक्षा, पारिवारिक समृद्धि और कालसर्प दोष की शांति के लिए पूजा की जाती है।


पौराणिक कथाएं और मान्यताएं :

  • आस्तिक मुनि की कथा- राजा जन्मेजय ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए विशाल सर्प यज्ञ किया था। आस्तिक मुनि ने श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन उस यज्ञ को रोककर नागों के प्राण बचाए थे, तभी से यह पर्व मनाया जाता है।
  • कालिया नाग का वध- भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन कालिया नाग को हराकर यमुना नदी को जहर से मुक्त किया था।
  • शिव व विष्णु का संबंध- भगवान शिव अपने गले में नाग रखते हैं और विष्णु जी शेषनाग पर सोते हैं, इसलिए नागों की पूजा का विशेष महत्व है।


तिथि व शुभ मुहूर्त :

  • पंचमी तिथि प्रारम्भ- 16 अगस्त 2026 को शाम 04:52 बजे।
  • पंचमी तिथि समाप्त- 17 अगस्त 2026 को शाम 05:00 बजे।
  • पूजा का शुभ मुहूर्त- सुबह 05:51 बजे से सुबह 08:29 बजे तक (कुल अवधि= 2 घंटे 37 मिनट)।
  • पूजा विधि और महत्व- सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। घर के मंदिर या पूजास्थल पर शिव परिवार के साथ नाग देवता का ध्यान करें। शिवलिंग पर जल, दूध, और बेलपत्र अर्पित करें तथा नाग देवता को दूध, खीर, चंदन व पुष्प चढ़ाएं।

इस दिन नाग देवता की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है और कालसर्प दोष का निवारण होता है। 

देवाधिदेव भगवान महादेव और उनके परम भक्त नागदेवता की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे, जिससे हम सभी दुःख-कष्ट से मुक्त होकर उनकी भक्ति में लीन रहें।

हर हर महादेव!

Friday, 1 May 2026

India's Heritage : Buddha Purnima

(I) अवतरण दिवस :

आज बुद्ध पूर्णिमा है, भगवान बुद्ध का अवतरण दिवस। आज के India's Heritage segment में भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक घटना का वर्णन कर रहे हैं। भगवान बुद्ध भगवान श्रीहरि के नवें अवतार हैं।


(II) श्रीहरि के अवतार :

  • मत्स्य (मछली)
  • कूर्म (कछुआ)
  • वराह (सूअर)

यहाँ तक विष्णु जी ने पशु रूप में अवतार लेकर सृष्टि की रक्षा की।

तत्पश्चात अपने परमभक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु व हिरण्यकश्यपु के दर्प को चूर करने के लिए नरसिंह (नर-सिंह) भगवान का अवतरण लिया, जिस रूप में वो वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए आधे पशु व आधे मनुष्य रूप में (आधे नर व‌ आधे सिंह) अवतरित हुए। 

वमन (बौना ब्राह्मण) के अवतार के साथ ही विष्णु जी ने मनुष्य रूप धारण किया और उसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण और फिर बुद्ध के रूप में अवतार लिया। दशावतार में कल्कि के रूप में भी भगवान श्री हरि अवतार लेंगे।

भगवान विष्णु जी का हर स्वरूप न केवल देखने में, अपितु भगवान विष्णु जी के हर अवतार की शिक्षाएं, संस्कार, नीति भिन्न-भिन्न रही हैं।

भगवान बुद्ध भी सबसे भिन्न थे, उसी का उल्लेख है उनसे जुड़ी हुई इस कथा में...

Buddha Purnima


(III) युवराज सिद्धार्थ :

भगवान गौतम बुद्ध जन्म से इश्वाकू वंश के शाक्य कुल के युवराज सिद्धार्थ थे, पर उन्होंने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण से इतर, परिवार से ज्यादा कर्मों को प्रधानता दी।

अपने राज्य पाठ, सुख-ऐश्वर्य, यहां तक की परिवार को त्याग कर कठिन तप के द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया और राजकुमार सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बन गए।

संसार का ज्ञान प्राप्त करने से पहले राजपुत्र सिद्धार्थ लगभग छह साल तक उस समय के योग, समाधि में लीन कहे जानेवाले अनेक ऋषि, साधु, योगी, ज्ञानीब तथा महानुभवियों के शरण में गए थे।

गौतम बुद्ध संसार का ज्ञान प्राप्त करने हेतु छह साल तक दरदर भटकते रहे। उनके आखिरी गुरु ने उनसे कहा था कि आहार-चावल के दाने कम करते जाओ, जब एक दाने पर आओगे तब तुम्हें ज्ञान की प्राप्ति होगी।

ज्ञान पाने की लालसा में बुद्ध ने वैसा ही किया। वे शारिरिक रूप से बहुत ज़्यादा कमजोर हो गए। उनका पूरा शरीर बस एक हड्डियों का पिंजर बन कर रह गया था।

एक दिन वे बहते हुए पानी से दूसरी छोर जा रहे थे। जैसे ही वे बहते पानी के मुख्य धारा में आए, कमजोरी के कारण वे बहने लगे। बड़ी प्रयास से एक पत्थर को पकड़कर उन्होंने अपनी जान बचाई, और वे थके-हारे आज के बिहार राज्य में स्थित बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे जा बैठे।

बैसाखी पूर्णिमा की बात है, इस नगर की सुजाता नाम की वधु को बड़ी मनौती के पश्चात पुत्र प्राप्ति हुई थी। पुत्र प्राप्ति के ख़ुशी में सुजाता ग्राम के सभी देवी-देवताओं को दूध-चावल की बनी खीर का भोग चढ़ाने आई। 

सिद्धार्थ का अस्थि-पिंजर शरीर देखकर उसे बड़ी करुणा आई, खीर का पात्र सिद्धार्थ के सामने रखते हुए अनायास उसके मुख से शुभकामना निकल पड़ी, “जैसे मेरी कामना पूरी हुई है, वैसे ही तुम्हारी भी हो।”

खीर का सेवन करने के बाद सिद्धार्थ के तन-मन में तृप्ति का आभास हुआ। कमजोर शरीर को ऊर्जा प्राप्त हुई, तब उन्होंने संकल्प किया- “अब जीऊँ या मरूँ, जब तक ज्ञान कि प्राप्ति न होगी इस जगह से उठूंगा नही।” और निग्रह के साथ समाधि लगाई।

सिद्धार्थ इस अवस्था मे छह-दिन छह-रात रहे। छठवें दिन  एक निमिष (पलक झपकने में जितना समय लगता है) से भी कम समय में सिद्धार्थ को ज्ञान कि प्राप्ति हुई, और वे बुद्ध बन गए।

मगर जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई तब उनकी भगवान की अवधारणा तटस्थ थी, उन्होंने कभी ज्यादा भगवान के अस्तित्व के बारे में खुल कर बात नहीं की।

उनका ज्ञान था “जीवन में दुःख है। उस दुःख का कारण है औऱ उसका उपाय है कर्म और योग-साधना।”

Monday, 27 April 2026

Article : Mohini Ekadashi

(I) Mohini Avatar :

आज मोहिनी एकादशी है। भगवान श्रीहरि के मोहिनी स्वरूप की आराधना की एकादशी। ऐसे स्वरूप की जिसका जो नाम है, वही प्रभाव भी। अर्थात् ईश्वर की साधना में मोहित होकर सर्वस्व प्राप्त कर लेना।

जी हाँ, सर्वस्व प्राप्त कर लेना। मुख्यतः कहा जाता है कि ईश्वर की आस्था में लीन होकर सर्वस्व न्यौछावर कर दो, पर यह ऐसा व्रत है, जो आपको सांसारिक सुखों की प्राप्ति से लेकर मोक्ष तक सब प्रदान करता है।


(II) Vishnu's Dashavatar :

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के प्रमुख 10 अवतार (दशावतार) माने जाते हैं, जो पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए लिए गए थे। हालांकि श्रीमद्भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों में मुख्य रूप से 24 अवतारों का भी वर्णन मिलता है। ये हैं विष्णुजी के दशावतार :

  • मत्स्य (मछली)
  • कूर्म (कछुआ)
  • वराह (सूअर)
  • नरसिंह (नर-सिंह)
  • वमन (बौना ब्राह्मण)
  • परशुराम
  • राम
  • कृष्ण
  • बुद्ध
  • कल्कि (भविष्य का अवतार)

इनमें से अब तक 23 अवतार अवतरित हो चुके हैं, जबकि 24वां (कल्कि अवतार) अभी होना बाकी है। इनके अलावा देवताओं की रक्षा हेतु भगवान श्रीहरि विष्णु जी ने एक स्वरूप भी धरा था और वो था मोहिनी का स्वरूप।

भगवान विष्णु जी का स्त्री स्वरूप सम्पूर्ण ब्रह्मांड में उपस्थित सबसे ज्यादा खूबसूरत स्त्री स्वरूप। प्रभु श्रीहरि विष्णु का हर स्वरूप मन को मोह लेता है, लेकिन भगवान श्रीहरि का मोहिनी स्वरूप हर एक को सर्वाधिक मोहित करता है।

आइए जानते हैं इसके विषय में... 

Mohini Ekadashi


(III) Ekadashi :

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। बता दें कि एक साल में कुल 24 एकादशी होती है। लेकिन इस साल अधिकमास होने के कारण कुल 26 एकादशी पड़ने वाली है। ऐसे ही वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। 

वैशाख के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी आती है। मोहिनी एकादशी को उपवास करने आपके लिए एक नहीं कई लाभ होते हैं। भगवान विष्णु की कृपा तो मिलती है, साथ ही सभी पाप भी नष्ट हो जाते हैं। अनेक जन्मों के किए हुए महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए मोहिनी एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए। 

पहले जान लेते हैं कि भगवान श्रीहरि ने मोहिनी स्वरूप क्यों धारण किया था।


(IV) Reason behind Mohini :

पौराणिक कथा के अनुसार यह सतयुग में समुद्र मंथन को अंतिम स्वरूप प्रदान करने के लिए भगवान श्री हरि ने मोहिनी स्वरूप धारण किया था। पर ऐसा क्या हुआ था, जिसके कारण समुद्र मंथन हुआ था? आइए विषयवार इस को समझते हैं।


(V) Samudra Manthan :

  • Time- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह घटना सत्ययुग में हुई थी।
  • Reason- ऋषि दुर्वासा के श्राप से इंद्र और अन्य देवता श्रीहीन (शक्तिहीन) हो गए थे, जिसे पुनः प्राप्त करने के लिए मंथन आवश्यक था।
  • Equipments- मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी (नेती) बनाया गया था।
  • Base- भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुआ) अवतार लेकर मंदराचल पर्वत को अपने कवच पर धारण किया था।
  • Conclusion- मंथन से 14 रत्न निकले, जिनमें विष (हलाहल), अमृत कलश, माता लक्ष्मी, और ऐरावत हाथी जैसे बहुमूल्य रत्न शामिल थे।

आपको बता दें कि भगवान श्रीहरि ने मोहिनी रूप धर कर देवताओं को अमृतपान कराया था, इसलिए मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत खास है।

मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब अमृत निकला था, तब उसे राक्षसों से बचाकर देवताओं को प्रदान करने के लिए भगवान श्री विष्णुजी ने मोहिनी अवतार धारण किया था और धर्म की रक्षा की थी। 

इसी कारण मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णुजी की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है और हर तरह के पापों से भी मुक्ति मिल सकती है।


(VI) Date & Time in 2026 :

मोहिनी एकादशी 27 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत में मोहिनी एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें, ये हजारों गायों को दान करने के समान पुण्य देता है।

ये व्रत तमाम तरह के मोह, बुरे कर्म से मुक्ति दिलाकर सही राह पर चलने की शक्ति देता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति के तमाम पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे राजसुख प्राप्त होता है। अगर आपको मोहिनी एकादशी व्रत की सम्पूर्ण कथा जाननी है, तो हम अगली मोहिनी एकादशी में उसे ही साझा करेंगे।

साथ ही आप को आगे यह भी बताएंगे कि दशमी-एकादशी योग या एकादशी-द्वादशी योग में से कौन-सा अधिक शुभ मुहूर्त है। अतः जुड़े रहें Shades of Life से आस्था और विश्वास के साथ।

बोलो भगवान श्रीहरि की जय!

Wednesday, 25 March 2026

Article : अष्टमी व नवमी पर्व

चैत्र नवरात्र पर्व चल रहा है, जिसमें सभी दिन‌ विशेष और शुभ होते हैं। इसमें माँ जगदंबा, भगवती या माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है, लेकिन मुख्य रूप से अष्टमी व नवमी तिथि का महत्व अधिक होता है।

अष्टमी तिथि का इसलिए कि इस दिन बहुत से लोग अपने व्रत का पारण कर कन्या पूजन करते हैं, वहीं कुछ नवमी तिथि को कन्या पूजन करते हैं।

साथ ही चैत्र नवरात्र में नवमी तिथि का विशेष महत्व यह भी है कि इस दिन प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।


तिथियों में संशय :

पिछले कुछ सालों से त्यौहारों की तिथियों  में असमंजस रहने लगा है, और इस साल नवरात्र में अष्टमी व नवमी तिथि काई असमंजस है।

सोचा आज के लेख में दोनों तिथियों के असमंजस का खुलासा एक साथ ही कर दें, कि कब और क्यों‌ है अष्टमी व नवमी तिथि...

जिससे आप के मन में किसी तरह का कोई confusion न रहे…

अष्टमी व नवमी पर्व


महाअष्टमी तिथि :

महाअष्टमी इस वर्ष 26 मार्च 2026 (गुरुवार) को मनाई जा रही है।

कारण :

अष्टमी तिथि 25 मार्च को दोपहर 1:50 बजे शुरू होकर 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे समाप्त होगी। कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त 26 मार्च को सुबह 6:18 से 7:50 और सुबह 10:55 से दोपहर 11:48 बजे तक रहेगा। 

सभी त्यौहारों की उदया तिथि को अधिक विशेषता दी जाती है, अतः अष्टमी का कन्या पूजन 26 मार्च को होगा।


महानवमी तिथि :

चैत्र नवरात्रि की महानवमी 27 मार्च 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, और इसी दिन नवरात्रि व्रत का पारण (व्रत तोड़ना) और कन्या पूजन किया जाता है।


कारण :

नवमी तिथि 26 मार्च की सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च की सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के कारण व्रत का पारण व‌ कन्या पूजन 27 मार्च को होगा।


राम नवमी तिथि :

अगर आप राम जन्मोत्सव की तिथि देख रहे हैं, तो आपको बता दें कि राम जन्मोत्सव 26 मार्च को ही किया जाएगा।


कारण :

नवमी तिथि 26 मार्च की सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च की सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव चैत्र नवरात्र की नवमी में 12 बजे किया जाता है।

26 मार्च को नवमी का मुहूर्त 11:48 मिनट से प्रारम्भ होगा, जो कि 27 मार्च को 10:06 मिनट तक ही है, अर्थात् 27 मार्च को 12 बजे तक नवमी तिथि का मुहूर्त ही नहीं है। अतः राम जन्मोत्सव 26 मार्च को ही किया जाएगा।


आप सभी को महाअष्टमी पर्व, महानवमी पर्व व राम जन्मोत्सव पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

Thursday, 5 March 2026

Article : होली भाईदूज

हमारे हिन्दू धर्म में हर रिश्ते का अपना अलग महत्व है, जितना मान और प्रेम माता-पिता, पति-पत्नी और बच्चों के रिश्ते को दिया जाता है, उतना ही मान और प्रेम भाई-बहन के रिश्ते को भी दिया जाता है।

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है रक्षाबंधन और भाईदूज, पर क्या आप जानते हैं कि भाईदूज साल में दो बार आता है? दो बार?

जी हाँ, दीपावली के बाद का भाईदूज, जिसे सब जानते हैं, विभिन्न नामों के साथ जाना जाता है, जैसे भाईदूज, यमद्वितीया, भाईफोटा इत्यादि। दूसरा भाईदूज होली के रंगोत्सव के दूसरे दिन होता है।

हालांकि बहुत से लोगों के घरों में सिर्फ दीपावली के पश्चात् यमद्वितीया ही मनाया जाता है। लेकिन होली के पश्चात मनाए जाने वाले भाईदूज की भी बराबर से मान्यता है।

आइए जानते हैं, इस विषय में, और इसके पीछे की पौराणिक कथा को भी…

होली भाईदूज


(I) संक्षिप्त विवरण :

हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। इसे भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। यह पावन पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है।

इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। विवाहित बहनें विशेष रूप से अपने भाइयों को घर आमंत्रित करती हैं और प्रेमपूर्वक, होली पर बनाए विभिन्न पकवान और भोजन कराती हैं। 

मान्यता है कि भाई दूज के दिन बहन के घर जाकर भोजन करने से भाई की आयु में वृद्धि होती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।


(II) पौराणिक कथा :

होली के बाद मनाए जाने वाले भाई दूज से जुड़ी एक लोकप्रचलित कथा इस प्रकार है-

एक नगर में एक वृद्धा अपने बेटे और बेटी के साथ रहती थी। समय के साथ बेटी का विवाह हो गया। एक बार होली के बाद बेटे के मन में अपनी बहन से मिलने और उससे तिलक कराने की तीव्र इच्छा जागी।

उसने अपनी माँ से बहन के घर जाने की अनुमति मांगी। पहले तो माँ ने टालने की कोशिश की, लेकिन बेटे के बार-बार आग्रह करने पर उसे जाने की अनुमति दे दी। बहन का गांव दूर था, रास्ते में नदी, जंगल इत्यादि पड़ने थे।

घर से निकलने के कुछ समय बाद, रास्ते में उसे एक नदी मिली। नदी बहुत उफान पर थी, मानो बोल उठी- “मैं तुम्हारा काल हूँ, जैसे ही तुम मेरे जल में उतरोगे, डूब जाओगे।”

यह सुनकर वह घबरा गया, पर साहस जुटाकर बोला- “पहले मैं अपनी बहन से तिलक करवा लूँ, उसके बाद तुम मेरे प्राण ले लेना।”

आगे बढ़ने पर जंगल में एक भयंकर शेर मिला। वह उसे खा जाने के लिए गुर्राता हुआ आगे बढ़ने लगा, उसने शेर से भी वही विनती की। 

थोड़ी दूर चलने पर एक सांप ने उसके पैर लपेट लिए। युवक ने उससे भी निवेदन किया कि पहले बहन से मिल लेने दे, फिर जो दंड देना हो दे देना।

किसी तरह वह अपनी बहन के घर पहुंच गया। बहन ने भाई को देखते ही स्नेह से गले लगाया, तिलक किया और प्रेमपूर्वक भोजन कराया। भोजन करते समय भाई को उदास देखकर बहन ने उसके दुख का कारण पूछा। तब भाई ने रास्ते में मिली सभी बाधाओं की बात बता दी। 

बहन अपने भाई को असीम स्नेह करती थी, रास्ते की बाधाएं सुनकर वह बोली- “भाई! तुम चिंता न करो, मैं तुम्हें घर तक छोड़कर आऊंगीं।”

वह कुछ तैयारी के साथ भाई के साथ हो गई। उसने शेर के लिए मांस, सांप के लिए दूध और नदी के लिए ओढ़नी साथ ले ली।लौटते समय सबसे पहले शेर मिला। बहन ने उसके आगे मांस डाल दिया, जिससे वह शांत हो गया।

आगे सांप मिला तो उसने उसके सामने दूध रख दिया, और वह भी शांत हो गया। जब वे नदी के पास पहुंचे तो लहरें पुनः तेज उठने लगीं। बहन ने श्रद्धा से नदी को ओढ़नी अर्पित की, जिससे नदी भी शांत हो गई और दोनों सुरक्षित पार हो गए।


(III) धार्मिक मान्यता :

इस प्रकार बहन ने अपने प्रेम, बुद्धिमत्ता और साहस से भाई पर आने वाली हर विपत्ति को टाल दिया। तभी से मान्यता है कि चैत्र मास की द्वितीया तिथि, अर्थात होली के अगले दिन, भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।

इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक कर उनकी लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।


(IV) अन्य कारण :

वैसे आपको हर बहन के मन की बात बताते हैं कि विवाह उपरांत, भाई के प्रति और अधिक स्नेह भाव बढ़ जाता है। 

वो अपने भाई की हर विपदा से लड़ जाती हैं, और सदैव अपने भाई की सुरक्षा और समृद्धि की कामना करती है। तो जिन भाइयों की बहन हैं, वो अपने सौभाग्य को सराहा सकते हैं।

आप सभी को होली भाईदूज की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Sunday, 1 March 2026

Article : होलिका दहन - पूजन विधि, तिथि व शुभ मुहूर्त

हिन्दू धर्म में बहुत से देवी-देवता और अनेकानेक छोटे-बड़े त्योहार हैं, जिसमें दो मुख्य त्योहार हैं; दीपावली और होली।

दोनों की अलग छटा, अलग उत्सव, कोई किसी से कम नहीं, एक अमावस्या को, तो एक पूर्णिमा को।

इस साल होलिका दहन व रंगोत्सव होली में एक दिन का अंतर है। ऐसा क्यों है, और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त क्या होगा, जान लेते हैं।

होलिका दहन - पूजन विधि, तिथि व शुभ मुहूर्त


होलिका दहन, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, हर साल यह पर्व फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।

साल 2026 में होली की तारीख को लेकर लोगों के मन में थोड़ा confusion है कि होलिका दहन 2 मार्च या 3 मार्च, कब मनाया जाएगा?


(I) तिथि :

2 या 3 मार्च-

कहीं 2 मार्च तो कहीं 3 मार्च को दहन की चर्चा हो रही थी। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि 3 मार्च को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। पंचांग के अनुसार यह इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च 2026, सोमवार की रात को किया जाएगा। हालांकि इस बार भद्रा का साया भी रहेगा, जिस वजह से सही मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना जरूरी होगा।

पूर्णिमा व भद्रा का संयोग-

पंचांग के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च 2026 को शाम के 5:18 से हो रही है। इसी समय भद्रा का वास भी शुरू हो जाएगा, जो पूरी रात और अगली सुबह 3 मार्च को 4:56 बजे तक प्रभावी रहेगा। 

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, भद्रा काल में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य करना वर्जित माना गया है। 

खासतौर पर होलिका दहन जैसे पर्व पर भद्रा का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। शास्त्रों में भद्रा को अशुभ योग माना गया है। मान्यता है कि भद्रा में किए गए शुभ कार्यों का फल विपरीत हो सकता है।


(II) शुभ मुहूर्त :

पंचांग के अनुसार इस वर्ष होलिका दहन का सबसे उपयुक्त और शास्त्रसम्मत समय रात 12:50 बजे से 2:02 बजे के बीच रहेगा। इस दौरान भद्रा का पुच्छ काल माना जा रहा है, जो होलिका दहन के लिए अनुकूल माना जाता है।

अतः होलिका दहन का सबसे उपयुक्त मुहूर्त कुल 1 घंटा 12 मिनट का है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी समय में होलिका दहन करने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

तो आप समझ गए होंगे कि इस साल के पहले चंद्रग्रहण और भद्रा काल के कारण, होलिका दहन 2 मार्च की रात को किया जाएगा, 3 मार्च को चंद्रग्रहण है अतः रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा।

हालांकि सबके घर में भिन्न-भिन्न तरह से सभी पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन होलिका दहन की अग्नि के समीप की जाने वाली पूजा विधि इस प्रकार है।


(III) पूजा विधि :

होलिका दहन से पहले परिवार के साथ विधि-विधान से पूजा करना शुभ माना जाता है।

होलिका के चारों ओर परिक्रमा करें।

कच्चा सूत, गेहूं की बालियां, नारियल और जल अर्पित करें।

साथ में होली उत्सव के लिए जो भी पकवान बनाए या आपने खरीदे हैं, जैसे गुजिया, मठरी, पापड़, मालपुआ, दही बड़े इत्यादि उनको भी साथ में लाएं और उनका अर्पण कर पकवानों को प्रसाद रूप में परिवर्तित करें।

“ॐ होलिकायै नमः” मंत्र का जाप करें।

परिवार की सुख-समृद्धि और बुरी शक्तियों के नाश की प्रार्थना करें।

अगले दिन होलिका की राख को तिलक के रूप में लगाना भी कई जगह शुभ माना जाता है।


(IV) पूजन मंत्र :

  • मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वज:, मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥
  • ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्।
  • ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्।


आप सभी को होलिका दहन व रंगोत्सव होली पर हार्दिक शुभकामनाएं।

Wednesday, 12 November 2025

Article : वंदे मातरम्@150 years

वंदे मातरम्, एक शब्द, एक उद्धोष, एक प्रेरणा, एक ज्वाला है, जिसने भारत में स्वतंत्रता की मशाल जला दी। हर बच्चा, युवा, बुजुर्ग- पुरुष और महिला, सबके मन-मस्तिष्क पर वंदे मातरम् अंकित हो गया था।

हर व्यक्ति के लिए अपने स्वार्थ के ऊपर देश था। और जब जन-जन के मन में देश प्रथम होता है, तब स्वर्णिम बेला अवश्य आती है, जो भारत में आजादी के रूप में आई।

देश की आजादी के पश्चात इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित किया गया।

वंदे मातरम्@150 years


7 नवंबर को, वन्दे मातरम् को 150 वर्ष पूरे हो गए हैं। अतः सरकार द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि इस शुभ अवसर को पूरे एक वर्ष तक उत्सव के रूप में मनाया जाएगा।

Government & public places पर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् बजाया जाएगा, साथ ही साथ समय-समय पर कुछ विशेष कार्यक्रमों को भी आयोजित किया जाएगा।

वन्दे मातरम् महान बंगला साहित्यकार और देशप्रेमी बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा संस्कृत और बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित एक गीत है।

उन्होंने इस देशभक्ति गीत की रचना 7 नवंबर 1875 में अक्षय नवमी के दिन की, जिसका publication सन् 1882 में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ था। इस गीत से सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा।

यह गीत British सत्ता के विरोध और देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत एक ऐसी कहानी है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को नये आयाम दिए। 

दरअसल उस समय पर बड़े पैमाने में राजनैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन हो रहा था। राष्ट्रीय पहचान और British सत्ता के प्रति प्रतिरोध की भावना बलवती हो रही थी।

ऐसे में वंदे मातरम् गीत ने माँ भारती को शक्ति, समृद्धि और दिव्यता के रूप में प्रतिष्ठित किया, तथा देश की एकता व अखंडता की भावना को जाग्रत करते हुए उसे एक काव्यात्मक स्वरूप दिया। जल्दी ही यह गीत भक्ति, समर्पण और अमरता का प्रतीक बन गया।

राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् को एक वर्ष तक विशेष महत्व देना, मात्र इस गीत को विशेष सम्मान प्रदान करना नहीं है वरन् उसके रूप में उन सभी देशभक्त क्रान्तिकारियों के सामने नतमस्तक होना है, जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर देश को रखा, जिन्होंने अपने बहुमूल्य जीवन को हंसते-हंसते देश की आजादी के लिए निछावर कर दिया। 

यदि उन्होंने देशभक्ति को सर्वोपरि नहीं माना होता तो भारत को स्वतंत्रता दिलाना असंभव था।

आज हम स्वतंत्र भारत में, स्वेच्छा से अपना जीवन यापन कर रहे हैं, तो उन्हीं देशभक्त क्रान्तिकारियों के कारण ही..

तो क्यों न सरकार के इस सराहनीय कार्य को और शुभ करते हैं। हम अपने बच्चों को, अपने युवाओं को उस पल के विषय में जितना अधिक जागरूक कर सकते हैं, करते हैं। उनके मन में देश-प्रथम की भावना को बलवती करते हैं।

जब हमारा भारत सर्वोपरि, सशक्त, अखंड और समर्थ होगा, तब ही सच्चा नमन होगा, राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् को और सच्ची श्रद्धांजलि देशभक्त क्रान्तिकारियों को।

जय हिन्द, जय भारत 🇮🇳 

Saturday, 1 November 2025

Article : देव‌उठनी एकादशी

आज देवउठनी एकादशी व्रत है, देवउठनी एकादशी व देवशयनी एकादशी श्रेष्ठ या सबसे बड़ी एकादशी समझी जाती हैं, पर विशेषतः देवउठनी एकादशी का महत्व अधिक है।

कारण है, कि इस दिन प्रभु श्रीहरि अपनी चार महीने की निद्रा से उठते हैं। हम हिन्दुओं में सभी शुभ कार्य, शुभ मुहूर्त व लग्न देखकर किए जाते हैं। अतः जब प्रभु श्रीहरि जाग्रत होंगे, सभी शुभ कार्य तो तभी आरंभ होंगे। इसलिए देवउठनी एकादशी का विशेष महत्व है।

देवउठनी एकादशी व्रत से जुड़ी अन्य बातों को जानने के लिए click करें -

देवउठनी एकादशी व तुलसी विवाह

https://shadesoflife18.blogspot.com/2018/11/blog-post.html?m=1

देवशयनी एकादशी

https://shadesoflife18.blogspot.com/2023/06/article_29.html?m=1

देव उठनी एकादशी व एकादशी का उद्यापन

https://shadesoflife18.blogspot.com/2023/11/article_23.html?m=1

आज हम आपको बताते हैं, कि देवउठनी एकादशी व्रत की पूजा विधि क्या है तथा आज पूजा का क्या मुहूर्त है।

देवउठनी एकादशी


पूजा विधि :

देवउठनी एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जागें, स्नान करके अपने मन, शरीर और घर-परिवार को शुद्ध करें। इसके बाद स्वच्छ एवं सम्भव हो तो पीले वस्त्र धारण करें, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु का प्रिय माना जाता है। अब भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजन से पहले आचमन करें और शुद्ध आसन पर बैठकर श्रीहरि के समक्ष पीले पुष्प, पीला चंदन, तुलसी दल और पुष्पमाला अर्पित करें। प्रसाद में पीली मिठाई, गन्ना, सिंघाड़ा, मौसमी फल और शुद्ध जल का भोग लगाएँ। फिर घी का दीपक एवं धूप प्रज्वलित कर भगवान विष्णु की मंत्रोच्चार के साथ आराधना करें। इस दिन विष्णु चालीसा, देवउठनी एकादशी व्रत कथा, श्रीहरि स्तुति और विष्णु मंत्रों का जप विशेष पुण्यदायी माना जाता है। पूजा के उपरांत विष्णु जी की आरती करें और किसी भी भूल या कमी के लिए क्षमा याचना करें। दिनभर व्रत का पालन करते हुए संयम और सात्त्विकता बनाए रखें। शाम के समय पुनः पूजा करें और घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाएं, जिससे शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। अगली सुबह द्वादशी तिथि में शुभ समय देखकर व्रत का पारण करें और भगवान विष्णु को धन्यवाद देकर प्रसाद ग्रहण करें।


लोकप्रिय भजन :

उठो देव, बैठो देव, पाटकली चटकाओ देव।

आषाढ़ में सोए देव, कार्तिक में जागे देव।

कोरा कलशा मीठा पानी, उठो देव पियो पानी।

हाथ पैर फटकारी देव, आंगुलिया चटकाओ देव।

कुवारी के ब्याह कराओ देव, ब्याह के गौने कराओ।

तुम पर फूल चढ़ाए देव, घी का दीया जलाये देव।

आओ देव, पधारो देव, तुमको हम मनाएँ देव।


मुहूर्त :

वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि - 1 नवंबर को सुबह के 9:12 पर शुरू होगी, जो 2 नवंबर को शाम के 7:32 पर समाप्त हो जाएगाी। ऐसे में गृहस्थ लोग 1 नवंबर को और वैष्णव संप्रदाय के लोग 2 नवंबर को देवउठनी एकादशी का व्रत रखेंगे। दरअसल, गृहस्थ लोग पंचांग के अनुसार और वैष्णव परंपरा के साधक व्रत का पारण हरिवासर करते हैं।


शुभ मुहूर्त :

  • ब्रह्म मुहूर्त- सुबह के 4:50 से सुबह के 5:41 मिनट तक
  • अभिजित मुहूर्त- सुबह के 11:42 से दोपहर के 12:27 तक
  • अमृत काल- सुबह के 11:17 से दोपहर के 12:51 तक
  • रवि योग- सुबह के 6:33 से शाम के 6:20 तक
  • ध्रुव योग- 1 नवंबर को सुबह के 4:31 से 2 नवंबर को सुबह 2:09 तक


जपे जाने वाले मंत्र :

  • ॐ अं वासुदेवाय नम:
  • ॐ आं संकर्षणाय नम:
  • ॐ अं प्रद्युम्नाय नम:
  • ॐ अ: अनिरुद्धाय नम:
  • ॐ नारायणाय नम:
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
  • ॐ विष्णवे नम:
  • ॐ हूं विष्णवे नम:


आखिर में “ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे” की आरती के साथ प्रथम दिन की पूजा पूर्ण करें।


पारण का समय :

1 नवंबर को व्रत रखने वाले जातक 2 नवंबर को व्रत का पारण करेंगे। इस दिन दोपहर के 1:11 से 3:23 तक पारण करना सबसे शुभ है।


हरि वासर समाप्त होने का समय :

दोपहर के 12:55 बजे।


हे श्रीहरि, देवउठनी एकादशी में सभी के घर शुभ करें, सभी के दुःख संकट हरें, सभी के घरों में सुख-समृद्धि बनी रहे, सभी निरोगी रहें 🙏🏻

Friday, 31 October 2025

Article : National Unity Day

आज राष्ट्रीय एकता दिवस है।

राष्ट्रीय एकता दिवस, यह किस उपलक्ष्य में आयोजित किया गया है?

2014 से government offices में तो लगभग सभी जानते हैं, किन्तु अभी भी बहुत से लोग नहीं जानते हैं।

राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेषतः सतर्कता पर ही कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। Slogan, essay, debate, drawing competition etc.

आज सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस है और आज उनकी 150वीं जयंती है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल जी से कौन नहीं परिचित होगा, लेकिन शायद पूरी तरह से नहीं, मतलब उनकी उपलब्धियों से या यूं कहें उनके द्वारा किए गए महान कार्यों से...

National Unity Day


सरदार वल्लभ भाई पटेल आजादी की लड़ाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी थे। 

पर जितने सक्रिय यह देश को आजादी दिलाने के लिए थे, उसके अधिक उनका विशेष योगदान, आज़ादी के बाद रहा।

देश के आजाद होने के बाद यह decide होना था कि देश का प्रधानमंत्री किसे बनाया जाए, तब सर्व सम्मति से सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम ही चुना गया था।

लेकिन नेहरू की महत्वाकांक्षा के कारण गांधी जी ने नहेरू जी को प्रधानमंत्री और पटेल जी को उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री बना दिया।

देशभक्त पटेल जी ने देशभक्ति और गांधी जी को सम्मान देते हुए इस पद को भी सहर्ष स्वीकार कर लिया।

अब शुरू होता है उनका विशेष योगदान...

अंग्रेजों ने भारत को आज़ाद करते हुए एक षड्यंत्र रचा, उन्होंने भारत को 562 रियासतों में बांट दिया, तथा भारत-पाकिस्तान का विभाजन इस तरह से किया कि भारत के बीच-बीच में पाकिस्तान का हिस्सा था। जिससे भारत और पाकिस्तान, दोनों में से कोई भी पनप न पाए, उनका विकास न हो पाए।

उस समय आज़ादी के मिलने से जितनी प्रसन्नता थी, विभाजन होने से उतना ही अवसाद...

पूरा भारत भूखमरी, गरीबी और असंतोष की भावना से जल रहा था। ऐसे में देश का नेतृत्व आसान नहीं था और 562 रियासतों को जोड़कर एक करना उससे भी कठिन।

ऐसे समय में बहुत ही सतर्क, सुदृढ़, दूरदर्शी और सशक्त व्यक्ति की आवश्यकता थी और उसी महती भूमिका को निभाया था, हमारे सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने।

पटेल जी की दूरदर्शिता, सुदृढ़ता, सतर्कता ने सशक्त रूप से निर्णय लेना आरंभ कर दिया।

उन्होंने न केवल सारी रियासतों को जोड़कर एक भारत किया, बल्कि पाकिस्तान के जो भाग भारत के बीच-बीच में थे, उन्हें सम्पूर्ण भारत बना दिया। 

उनकी ही कोशिश से कश्मीर भी भारत मे मिल पाया था।

तो अगर इसे संक्षेप में समझें तो खंड-खंड भारत का अखंड भारत बनना, सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के अथक प्रयासों के कारण ही संभव हुआ है। 

पर इसे त्रासदी ही कहेंगे कि उनके इतने बड़े योगदान को यूं ही धूमिल कर दिया गया, कि हमें अपने बचपन में कभी इससे अवगत ही नहीं कराया गया। जबकि सरदार वल्लभ भाई पटेल एक कांग्रेसी नेता ही थे। उसके पश्चात भी यह पक्षपात, केवल परिवार वाद को आगे बढ़ाने के लिए...

आप मानें या न मानें, पर धन्य है BJP government, जिसने 2014 में आकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के अमूल्य योगदान को धन्यवाद देने के लिए, उनके जन्मदिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना प्रारंभ कर दिया। 

उन्होंने 2013 में गुजरात के केवड़िया में, महान भारतीय राजनेता सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बनवाने का कार्य आरंभ किया, जो 2018 में पूरा हुआ। इसे statue of unity का नाम दिया, जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है, जिसकी ऊंचाई 182 मीटर है। इससे प्रतिवर्ष करोड़ों का revenue आता है।

आज जब उनकी 150वीं जयंती थी, तो केवड़िया में प्रधानमंत्री मोदी जी ने सरदार पटेल जी को श्रद्धांजलि प्रदान की।

उसमें आयोजित होने वाला programme इतना भव्य था, मानो 26 January में होने वाले आयोजन का छोटा-सा प्रतिरूप।

इस एकता parade में शौर्य शक्ति और अखंडता का संदेश दिया गया, जिसमें BSF, CRPF, CISF, ITBP, SSB, NSG, NDRS, विभिन्न राज्यों की पुलिस टुकड़ी आदि की parade शामिल थी।

विभिन्न राज्यों की झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए, जिनसे प्रदर्शित हो रहा था, मैं शक्ति भी सुरक्षा भी।

शौर्य शक्ति, एकता, भारतीय संस्कृति, देशभक्ति, एकता में अनेकता, सामंजस्य शक्ति, दूरदर्शिता आदि का अनूठा संगम था।

अब से हम National Unity Day को सिर्फ government offices तक सीमित नहीं रहने देंगे, बल्कि हम सब भारतीय, उनके सामने नतमस्तक होकर उनके अमूल्य योगदान को धन्यवाद देंगे।

आइए, आज सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के सपने को साकार करने का संकल्प लेते हैं।

एक भारत, श्रेष्ठ भारत 🇮🇳 

और साथ ही संकल्प लें, भारत को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का।

जय हिन्द, जय भारत 🇮🇳 

Wednesday, 29 October 2025

Article : ढलते सूर्य को प्रणाम

कल लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा का सूर्य देव को अर्घ्य कर समापन हो गया।

छठ पूजा, मुख्यतः बिहारी लोग करते हैं, और 2014 से पहले यह लगभग बिहार तक ही सीमित था।

शायद कुछ लोगों को यह अच्छा न लगे, पर सच्चाई यही है कि 2014 के बाद से भारतीय संस्कृति, तीज-त्यौहार इत्यादि, किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रह गये हैं बल्कि हर राज्य में सभी भारतीय तीज-त्यौहार अपनी छटा बिखेर रहे हैं।

अभी हाल में छठ पूजा में वही माहौल दिल्ली व अन्य राज्यों में देखने को मिला। 

ढलते सूर्य को प्रणाम


ऐसा नहीं है कि इस साल जब दिल्ली में BJP government आई है, तब ही छठ पर्व धूमधाम से मनाया गया है। उससे पहले आप सरकार के समय भी धूमधाम थी, पर इस साल धूमधाम थोड़ी और बढ़ गई है।

और यदि BJP government centre में रही, और जिस तरह का जोश लोगों में देखने को मिल रहा है, सभी तरह के त्यौहारों को प्राथमिकता मिलती ही रहेगी। 

छठ पर्व बहुत सालों से मनाया जा रहा है‌ और इसमें सूर्यदेव की हर समय की पूजा की जाती है। 

लेकिन शायद ही किसी का ध्यान, इस ओर गया हो, जिस ओर मोदी जी का ध्यान गया और वो कि सिर्फ और सिर्फ छठ पर्व में ही ढलते सूर्य की भी पूजा की जाती है।

सूरज की दो अवस्थाएं होती हैं, उगता सूरज और ढलता सूरज।

उगते सूरज को भाग्योदय, सफलता और समृद्धि से संदर्भित किया जाता है, जबकि वहीं ढलते हुए सूरज को जीवन के ढलान‌ से, जीवन के आखिरी पड़ाव आदि से संदर्भित किया जाता है।

इस तरह से हमेशा उगते सूर्य को प्रणाम किया जाता है, उसे ही मान देते हैं।

तो जो अगर डूबते हुए सूरज को भी अर्घ्य दे रहा है, तो उसमें ऐसा क्या विशेष है?

वो विशेषता है, संस्कार की...

संस्कार की! इसमें संस्कार वाली बात कहां से आ गई?

जी बिल्कुल, संस्कार ही होते हैं। उन मनुष्यों में, जो सामने वाले को उसका पद, समृद्धि और वैभव देखकर नहीं, अपितु उसको हर स्थिति में सम्मान देता है।

यहाँ यह सम्मान, किसी गरीब को देना, किसी retired बुजुर्ग को देना, जो महिलाएँ नौकरी पेशा नहीं हैं, उन्हें देना, इत्यादि। एक तरह से देखा जाए तो सबको हर स्थिति में सम्मान प्रदान करना।

और छठ पूजा, सूर्य देव की हर स्थिति में पूजा करना उसी सम्मान को दर्शाता है।

इसके साथ ही एक और बात है, जो बिहारियों को बाकी राज्यों के हिन्दूओं से श्रेष्ठ बनाता है और वो कि छठ पर्व का बहुत कठिन नियम होता है। पर आज भी वो सारे कठिन नियमों का विधिवत न केवल पालन कर रहे हैं, बल्कि पूरा परिवार एकजुट होकर कंधे से कंधा मिलाकर काम करने में एक दूसरे का साथ देते हैं।

मुस्लिमों में पांच वक्त के नमाज़ी को विशेष सम्मान दिया जाता है। उसी प्रकार हिन्दुओं को भी छठ पूजा करने वाले को विशेष सम्मान प्रदान करना चाहिए। 

बल्कि इसके इतर, बिहारियों को वो सम्मान नहीं मिलता है, जो उन्हें मिलना चाहिए।

एक कहावत है, एक बिहारी, सब पर भारी और देखा जाए तो यह कुछ हद तक सही भी है।

बिहारियों के सभी व्रत-त्यौहार सबसे कठिन होते हैं, फिर भी वो वैसे ही विधिवत पूजन करते आ रहे हैं, उनके अंदर आज भी ईश्वर के प्रति आस्था सबसे अधिक है।

अगर अपने से बड़ों को सम्मान देने की बात कहें तो वो भी सबसे अधिक इनमें मिलता है।

अगर संस्कार कहें तो वो भी बहुत कुछ पहले जैसा ही है, पहनने-ओढ़ने में, रखरखाव में, बातचीत में, खाना-पीना बनाने इत्यादि में।

और अगर शिक्षा की बात करें तो सबसे ज़्यादा IAS, PCS officer बिहार से ही select होते हैं। 

छठ व्रत रखने वाले सभी व्रतियों को सम्पूर्ण सम्मान के साथ प्रणाम।

हमें आधुनिकता के साथ-साथ अपने संस्कारों से भी सदैव जुड़े रहना चाहिए। जहां दोनों हैं, सही अर्थों में वही सफल से, समृद्ध है, भाग्यवान है।

जय छठी मैया, जय भारत 🙏🏻 

Thursday, 23 October 2025

Article : यम द्वितीया - शुरुआत भाई दूज की

आज भाई दूज, यम द्वितीया और चित्रगुप्त पूजन का दिन है।

भाई-बहन के प्यार पर बहुत कुछ लिखा है। पर आज सोचा, उस पर लिखें, जिस प्रसंग के होने के बाद से दीपावली के पंचदिवसीय पर्व में भाई-दूज भी शामिल हो गया। 

तो उस प्रसंग को प्रारम्भ करने से पहले आपको बता दें कि भाई-दूज को यम द्वितीया भी कहकर पुकारा जाता है, बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित है कि यम द्वितीया को ही कालांतर में भाई-दूज कहा जाने लगा है।

यम द्वितीया - शुरुआत भाई दूज की


यह त्यौहार यमराज जी और उनकी बहन यमुना जी से जुड़ा हुआ है। इस त्यौहार को संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है, जिनके अलग-अलग नाम है।

भाई दूज को संस्कृत में “भगिनी हस्ता भोजना” कहते हैं। कर्नाटक में इसे “सौदरा बिदिगे” के नाम से जानते हैं, तो वहीं बंगाल में भाई दूज को “भाई फोटा” के नाम से जाना जाता है। गुजरात में “भौ” या “भै-बीज”, महाराष्ट्र में “भाऊ बीज” कहते हैं, तो अधिकतर प्रांतों में भाई दूज। भारत के बाहर नेपाल में इसे “भाई टीका” कहते हैं। मिथिला में इसे यम द्वितीया के नाम से ही मनाया जाता है। 

यमराज जी और उनकी बहन यमुना जी से जुड़ी एक पौराणिक कथा है, जो यह दर्शाती है कि कैसे यह प्रसंग ही भाई-दूज के पवित्र पर्व में बदल गया।


यम द्वितीया की पौराणिक कथा :

सूर्यदेव की पत्नी छाया के गर्भ से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेह वश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर मांगने को कहा।

तब बहन यमुना ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहाँ भोजन करने आया करेंगे, तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तु' कहकर यमपुरी चले गए। 

इसीलिए ऐसी मान्यता प्रचलित हुई कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता। 

कहते हैं कि इस दिन जो भाई-बहन इस रस्म को निभाकर यमुनाजी में स्नान करते हैं, उनको यमराजजी यमलोक की यातना नहीं देते हैं। 

इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना का पूजन किया जाता है। भाई दूज पर भाई को भोजन के बाद भाई को पान खिलाने का ज्यादा महत्व माना जाता है। मान्यता है कि पान भेंट करने से बहनों का सौभाग्य अखण्ड रहता है।

भाई-दूज के साथ ही इस दिन चित्रगुप्त पूजन भी होता है, जिसके विषय में अगले चित्रगुप्त पूजन वाले दिन बताएंगे…

Wednesday, 22 October 2025

Article : गिरिराज परिक्रमा

दीपावली पर्व हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार पंच-दिवसीय होता है।

धनतेरस पर्व से लेकर भाईदूज या चित्रगुप्त पूजन तक।

इस पांच-दिवसीय उत्सव की एक विशेषता और है, कि प्रत्येक दिन अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा का प्रावधान है।

धनतेरस पर्व पर धनवंतरी जी व कुबेर जी का पूजन, छोटी दीपावली/नरक चौदस/रूप चतुर्दशी पर हनुमानजी का पूजन, दीपावली पर्व पर लक्ष्मी जी व गणेश जी का पूजन, गोवर्धन पूजा में भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत का पूजन, व पांचवें दिन यमद्वितीया/भाई-दूज/चित्रगुप्त पूजन वाले दिन यमराज व चित्रगुप्त महाराज का पूजन किया जाता है।

इस तरह से पांच दिनों तक लगातार, विभिन्न पूजा अर्चना की जाती है।

गिरिराज परिक्रमा


• Areas of celebration :

आज गोवर्धन पूजा का दिन है। इस दिन की विशेषता संपूर्ण भारत में नहीं है। गोवर्धन पूजा का महत्व मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव), आगरा, दिल्ली, मेरठ, हापुड़, मुरादाबाद आदि सभी उत्तर-प्रदेश के शहरों में, साथ ही गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी इसका भव्य आयोजन होता है। 

इन क्षेत्रों में इसका इतना अधिक महत्व है कि एक बार को दीपावली पर घर न पहुंचे, पर गोवर्धन पूजा में घर अवश्य पहुंचेंगे।


• Mt. Govardhan location :

गोवर्धन पर्वत, मथुरा जिले में स्थित है, जो कि वृन्दावन से 21 km दूर स्थित है। यह गिरिराज पर्वत के नाम से भी प्रसिद्ध है।

जिस तरह से वैष्णो देवी, बाला जी, खाटूश्यामजी, शिर्डी जाने के लिए लोग लालयित रहते हैं, वैसे ही गिरिराज जी की परिक्रमा का भी विशेष महत्व है। 

ब्रज क्षेत्रों के आसपास के लोग का तो साल में एक से दो बार परिक्रमा लगाने का नियम ही रहता है। 

आज गोवर्धन पूजा है, तो आपको गिरिराज पर्वत की परिक्रमा के विषय में ही बताते हैं।


• Parikrama (clockwise rotation) :

गिरिराज जी की परिक्रमा लगाने के लिए, आपको गोवर्धन पर्वत को दाईं ओर रखते हुए पैदल चलना होगा, जिसमें नंगे पैर रहना एक आम नियम है, हालांकि कमजोर लोगों के लिए चप्पल या जूते की अनुमति है। परिक्रमा मानसी गंगा से शुरू होकर वहीं समाप्त होनी चाहिए, जहाँ आप इसे शुरू करते हैं, और इसे अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। परिक्रमा के दौरान मानसिक पवित्रता, शांत मन और भगवान के नाम का जाप करना महत्वपूर्ण है।


• How to do Parikrama :

Initiation Rites - परिक्रमा शुरू करने से पहले, मानसी गंगा में स्नान करें, फिर गोवर्धन पर्वत को प्रणाम करें।

Path & Direction - परिक्रमा गोवर्धन पर्वत के चारों ओर दक्षिणावर्त (दाईं ओर) लगाएं, जैसे घड़ी की सुई घूमती है। 

Rules for Footwear - अधिकांश भक्त नंगे पैर परिक्रमा करते हैं। यदि आप कमजोर हैं या बच्चे साथ हैं, तो रबड़ की चप्पल या कपड़े के जूते पहन सकते हैं। 

Physical & Mental State - परिक्रमा के दौरान शांत रहें, सांसारिक बातों से बचें और हरिनाम या भजन-कीर्तन करें। क्रोध या अपशब्द बोलने से बचें। 

Closing Rites - परिक्रमा समाप्त करने के बाद, गोवर्धन पर्वत को प्रणाम करें और वहीं समाप्त करें जहाँ से आपने शुरू किया था।


• Types of Parikrama :

Whole Parikrama (21 km) - यह सबसे लोकप्रिय परिक्रमा है और इसे एक ही दिन में पूरा किया जाता है।

Small Parikrama (9 km) - इसमें गोवर्धन से उद्धव कुंड, राधाकुंड, कुसुम सरोवर होते हुए वापस गोवर्धन आना शामिल है। 

Big Parikrama (12 km) - इसमें गोवर्धन से आन्यौर, पुछरी, जतीपुरा होते हुए वापस गोवर्धन आना शामिल है। 

Obeisance (Dandvat) Parikrama - यह बहुत कठिन है और इसमें भक्त शरीर के आठों अंगों (दोनों भुजाएँ, दोनों पैर, दोनों घुटने, सीना, मस्तक) को जमीन पर छूते हुए आगे बढ़ते हैं।


• Govardhan Puja at home :

यदि आप घर पर रहकर गोवर्धन पूजा कर रहे हैं, तो गोबर से या ऐपन से चौक बनाई जाती है। भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग लगाए जातें हैं।

यदि छप्पन भोग न बना पाएँ तो विभिन्न फल, मेवा, मिठाई व खाने में कढ़ी, चावल, रोटी, अन्नकूट सब्जी (mix veg, बिना प्याज़-लहसुन की) का भोग लगाकर भी छप्पन भोग का प्रावधान मान लिया जाता है।

दरअसल, अन्नकूट सब्जी का विशेष महत्व है। अगर आप को इसकी विधि चाहिए, तो आप इस link पर click कर सकते हैं -

https://shadesoflife18.blogspot.com/2020/11/recipe.html?m=1


जय प्रभु श्रीकृष्ण की, जय गोवर्धन पर्वत की, जय गिरिराज महाराज की 🙏🏻

आपकी कृपा सभी भक्तों पर अवश्य बनी रहे 🙏🏻 

Tuesday, 21 October 2025

Article : दिल्ली में लौटा हिन्दुत्व

हिन्दूओं के सबसे बड़े पर्व, दीपावली पर कल की छटा अनुपम थी, अद्भुत थी। 

India Gate के सामने कर्तव्य पथ पर अलग ही मनोहारी दृश्य था। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात् त्रेतायुग में विचरण कर रहे हैं।

कर्तव्य पथ पर दो लाख दीये जगमगा उठे और रामायण theme पर lazer व drone show आयोजित किया गया। यह उत्सव दीपावली मनाने के लिए आयोजित किया जा रहा था, और आज  भी इतने ही दीये जलाए जाएंगे। कर्तव्य पथ का कल का वर्णन इस प्रकार है…

दिल्ली में लौटा हिन्दुत्व


• Main Attraction :

कर्तव्य पथ को दो लाख दीयों से रोशन किया गया, जो एक भव्य दृश्य प्रस्तुत कर रहा था।


• Cultural Programme :

इस अवसर पर रामायण की thems पर आधारित एक विशेष lazer और drone show आयोजित किया गया।


• Opportunity :

यह उत्सव दीपावली के उत्सव का हिस्सा है, जिसे कर्तव्य पथ पर भव्य तरीके से मनाया जा रहा था।


• Cultural Importance :

कर्तव्य पथ, जो भारत की विरासत और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है, कल भव्य प्रकाश और drone show के साथ सांस्कृतिक उत्सवों का केंद्र बना।


• Extension :

कर्तव्य पथ की सजावट के लिए केवल एक दिन नहीं, बल्कि अगले दिन भी दो लाख दीये जलाए जाएंगे, जिससे उत्सव की भव्यता बनी रहेगी। 

खाली कर्तव्य पथ में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण दिल्ली में कल अलग ही स्वर्णिम दीपावली प्रतीत हुई।

स्वर्णिम मतलब? 

मतलब बचपन वाली...

जब सुबह के पांच बजे तक पटाखों की आवाज सुनाई देती थी। ऐसा नहीं है कि जब AAP की सरकार थी, और उसने दीपावली पर पटाखों पर ban लगा दिया, तब दिल्ली में पटाखे नहीं फोड़े जाते हों, पर तब लुकेछिपे पटाखे खरीदे जाते थे। 

कोई क्यों कर अपने धर्म में किसी की तानाशाही दख़ल अंदाजी सहन करेगा।

पर अब जब दिल्ली में BJP सरकार आ गई है, तो उन्होंने दिल्ली में green पटाखे allow करा दिए हैं, तो इस साल पटाखों की धूम ही अलग रही।

So called sophisticated लोग, जिनके घरों में 2-2, 4-4 AC लगें हैं, जितने घर में प्राणी हैं, उससे ज्यादा कारें घर में मौजूद हैं। सब अकेले-अकेले कार लेकर निकलते हैं। उन्हें उससे बढ़ता pollution level नहीं दिखेगा, लेकिन कल दीपावली पर्व पर पटाखे फोड़े गए हैं, इससे भयंकर pollution level बढ़ गया है - इसका बेहद हंगामा मचा देंगे। अगर pollution level की इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं केवल cooler और पंखा use करते हैं, cars की जगह cycles क्यों नहीं use करते हैं। वो नहीं करेंगे, क्योंकि उससे उनके आराम में खलल पड़ेगा। 

पर पटाखों को, और वो सिर्फ और सिर्फ दीपावली पर्व पर फोड़े जाने पर हंगामा मचाया जाएगा, क्यों? आखिर क्यों?

क्योंकि, सिर्फ हिन्दूओं के ही पर्व पर कुठाराघात करना है। पर अब से ऐसा नहीं होगा, इस दीपावली पर्व से यह समझ में आ चुका है।

दूसरी बात, यकीन मानिए, pollution level सिर्फ उतना ही बढ़ा है, जितना हमारे, आपके बचपन में बढ़ता था। मतलब नाममात्र का, और एक-दो दिन में उसका असर ख़त्म भी हो जाएगा।

पर एक चीज़ पर अच्छा असर पड़ा है, और वो हैं - मच्छर, मक्खी, कीड़े-मकोड़े का। उनकी संख्या कम होने में गज़ब का अंतर आया है। 

अगर आप ढंग से समझेंगे तो हिन्दू त्यौहारों में होने वाले रीति-रिवाज बहुत सोच समझ कर बनाए गए हैं, जिनमें जनमानस का हित शामिल है। 

कैसे, देखिए।

होली में होलिका दहन, केवल लकड़ियां इकट्ठी करके जलाना नहीं होता है, बल्कि उसमें अक्षत (चावल), ताजे फूल, गुलाल, हल्दी, गुड़, बताशे, सूखा नारियल, उपले, और गाय के गोबर से बनी माला जैसी चीजें डाली जाती है। इनके अतिरिक्त, अच्छे स्वास्थ्य के लिए नीम के पत्ते और कपूर डालना भी शुभ माना जाते हैं।

और ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि जब होली आती है, तब मौसम बदल रहा होता है, मतलब ठंड से गर्मी आ रही होती है। उस समय में मच्छर-मक्खी, कीड़े-मकौड़े सबसे अधिक बढ़ जाते हैं, लेकिन होलिका दहन से उठने वाला धुआं कीटनाशक का काम करता है, जिससे कुछ दिनों तक मच्छर, मक्खी, कीड़े-मकौड़े से राहत मिल जाती है।

वही दीपावली पर्व के समय होता है, गर्मी जाकर ठंड आ रही होती है, तो जो काम होलिका दहन से होता है, वही इस समय, पटाखे फोड़ने से होता, पटाखों के धुंए से मच्छर, मक्खी, कीड़े-मकौड़े कम हो जाते हैं। साथ ही पटाखे फोड़ने से दीपावली के उत्सव पर चार चांद लग जाते हैं। विशेषकर बच्चों और युवाओं के लिए..

हां, पटाखे फोड़ते समय, किसी भी तरह की कोई दुर्घटना न हो, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

तो आज सुबह तक आती हुई पटाखों की आवाज यह सिद्ध कर रही है कि दिल्ली में हिंदुत्व बढ़ रहा है, लोग BJP government के आने से खुश हैं। उन्हें लग रहा है कि कोई तो ऐसा आया, जिसे एहसास है कि हिन्दू त्यौहारों के रीति-रिवाज पर तानाशाही दख़ल नहीं देना चाहिए।

उन्हें अपने त्यौहार को वैसे ही मनाने का पूरा हक़ है, जैसा स्वरूप उसका सदियों से चला आ रहा है और दिल्ली छोड़कर, बाकी प्रदेश में आज भी चल रहा है। 

जय श्रीराम 🚩 

शुभ दीपावली 🪔🎉

Saturday, 18 October 2025

Article : धनतेरस - क्या खरीदें और कब खरीदें?

आज से हिन्दुओं के सबसे बड़े त्यौहार, दीपावली के पांच-दिवसीय उत्सव का आरंभ हो गया है।

धनतेरस के उत्सव से आरंभ होकर यह भाई दूज के पर्व पर पूर्ण होता है।

धनतेरस, धन प्रदान करने वाली माँ लक्ष्मी व धन के देवता कुबेर जी, व धनवंतरी जी की विशेष पूजा का दिन है।

अतः यह दिन मुख्यतः marketing का दिन है, जिसमें लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार - gold, silver, utensils, white goods और vehicles  खरीदते हैं।

इस महंगाई में हर कोई कुछ खरीद सकें, इसके लिए ही एक list बता रहे हैं।

इसमें से कुछ तो ऐसी वस्तुएँ हैं, जो हर कोई खरीद सकता है, बल्कि खरीदना ही चाहिए।

धनतेरस - क्या खरीदें और कब खरीदें?


1) What to Buy -

• Gold & Silver :

सोना-चांदी की खरीदारी तो सबसे प्रमुख है, पर अपने सामर्थ्य के अनुसार ही लें। ध्यान रखिएगा कि अगर सोना-चांदी ले रहे हैं, तो असली ही लें। इस दिन imitation वाली jewelry न लें।


• White-goods & vehicles :

आज कल इन्हें भी दीपावली में लेने का प्रचलन बहुत अधिक चल गया है। इसलिए दीपावली पर बहुत अच्छी deals भी आती हैं। पर कहा जाता है कि लोहा धनतेरस पर नहीं लेना चाहिए। लोहा नहीं लेने की सलाह शनिवार के लिए भी कही जाती है।

इस वर्ष धनतेरस का पर्व शनिवार को ही पड़ रहा है, और इन सबमें विशेष रूप से लोहे का उपयोग होता है।

तब क्या करें? क्या न लें? 

आप ले सकते हैं। न ही अच्छी deals खाली जाने दें, न ही अपने मन को मारें, क्योंकि बड़ी चीज़ को खरीदने की इच्छा बहुत दिनों में बनती है।

तो आपको करना यह है कि billing धनतेरस के दिन कर लें और घर में delivery छोटी दीपावली या दीपावली वाले दिन में लें। 

मतलब अच्छी deal भी ले लें और धनतेरस और शनिवार को लोहा घर पर भी न लाएँ।


• Idol of Maa Lakshmi & Shri Ganesh :

इसके बिना तो दीपावली की पूजा भी संभव नहीं है, पर ध्यान रखें कि मूर्ति मिट्टी की या धातु की ही लें। Plastic, plaster of paris और bone china जैसे materials की न लें। और विशेष रूप से वो ही मूर्ति लें, जिसको भारत में बनाया गया हो। Fashion में आकर अपनी पूजा-अर्चना भंग मत करिएगा।


• 5 Paan (Betel) Leaves :

हिन्दू धर्म में सभी धार्मिक कार्यों में पान व आम के पत्तों का विशेष महत्व है। प्रधानता पान के पत्तों को दीजिए। पान के पत्ते न मिलने पर आम के पत्तों को ले सकते हैं। पर ध्यान दीजिएगा कि पूजा के लिए पांच पत्ते ही लीजिएगा।

हाँ, तोरणद्वार के लिए आप आम, अशोक या केले के पत्तों का उपयोग भी कर सकते हैं।


• Impression of Maa Lakshmi's foot : 

बाजार में माता रानी के पैर की छवि बहुत आराम से मिल जाती है, उन्हें अवश्य लें। या फिर आप एक काम और कर सकते हैं, कि ऐपन (चावल के आटे में पानी डालकर तैयार किया गया घोल) में अपनी मुट्ठी को (छोटी उंगली की तरफ वाली जगह से) dip करें। फिर जमीन पर लगाएँ, एक छवि बनेगी, जिस के ऊपर आप पांच बिंदिया बना दें। आप देखेंगे कि छोटे-छोटे पैर जैसी छवि उभर आएगी। इसे बाहर के दरवाजे से पूजा के स्थान तक बना दें। इससे ऐसा प्रतीत होगा, मानो माता रानी छोटे छोटे पैरों से आपके घर आ गई हों।

पर यह आपको दीपावली के मुख्य दिन ऐपन से पैर की छवि बनानी है।


• Kheel & Batashe - 

पहले दीपावली में खील-बताशे, उसके मुख्य पकवान और पहचान होते थे। पर आज यह लोगों को कम पसंद आते हैं, और बाजार में मिलने भी कम लगे हैं। 

पर यह शुभता के प्रतीक होते हैं, अतः थोड़ी मात्रा में अवश्य लें।

पूजा के बाद बताशे आप जब कुछ भी मीठा बना रहे हों, तो उसे उपयोग में ले लें।

और खील को आप जैसा link में दिया है, ऐसे बना लें - https://shadesoflife18.blogspot.com/2019/10/recipe-crispy-butter-kheel.html?m=1

खील हाथों-हाथ उठ जाएगी, बल्कि और खानी है, इसकी demand होगी। क्योंकि यह स्वाद में popcorn से ज्यादा tasty लगेगी।


• Common Salt (NaCl) : 

कहा जाता है कि नमक negativity को absorb करता है, साथ ही बुरी नज़र को दूर करता है और दरिद्रता को हटाता है।

फिर नमक के बिना तो भोजन में भी स्वाद नहीं आता है। 

धनतेरस के दिन नमक खरीदें और दीपावली की पूजा के बाद, अगले दिन कुछ नमक, पोछे के पानी में डालकर पोंछा लगवाएं और शेष नमक खाना बनाने में use कर लें।


• Broomstick : 

झाड़ू को माता लक्ष्मी से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि धनतेरस के दिन ली गईं झाड़ू की दीपावली में पूजा करें और अगले दिन उससे पूरे घर में झाडू लगवा दें तो पूरे साल भर घर धन-धान्य और ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहता है।

ऐसा नहीं है कि यह करने से आप रातोंरात मालामाल हो जाएंगे, पर आप की परिस्थिति सुदृढ़ रहेगी। व्यर्थ का धन व्यय नहीं होगा।


• Dried Coriander Seeds :

सूखा धनिया रखना भी धन-धान्य का प्रतीक है। धनतेरस के दिन सूखे धनिया के दाने लें। दीपावली वाले दिन, उन दानों से पूजा करें।

अगले दिन कुछ दानों की पोटली बनाकर, उसे अपनी तिजोरी में या जहाँ धन रखते हैं, वहाँ रखें। शेष दानों को पीसकर भोजन बनाने में use करें।


इस पूरी list में बहुत कुछ ऐसा है, जो हर कोई खरीद सकता है। अपने सामर्थ्य व अपनी जरूरत के अनुसार सामान खरीदें और पांच-दिवसीय उत्सव दीपावली को मनाएँ।

दीपावली में सभी कार्य शुभ हों, सभी परिणाम शुभ हों, सबका सब शुभ-शुभ हो।

जय माता लक्ष्मी, जय श्री गणेश, जय धनवंतरी, जय कुबेर 🙏🏻