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Saturday, 11 May 2024

Short story: किराए की साइकिल

 किराए की साइकिल  



चंदन बस्ती में रहने वाला होशियार बच्चा था। उसके पापा, किशन की किराने की दुकान थी। 

पूरी बस्ती वहीं से राशन लेती थी, बहुत लोगों का उधार भी चलता था, इस कारण किशन का बस्ती में वट था, साथ ही बच्चों में चंदन का..

इस बार चंदन की मौसी ने उसके जन्मदिवस पर उसको तोहफे मे साइकिल दी। 

अभी तक बस्ती में किसी के पास साइकिल नहीं थी। ऐसे में चंदन की चमचमाती लाल साइकिल, सारे बच्चों मे आकर्षण का केंद्र बन गई।

हर बच्चा उसे छूना, देखना चाह रहा था। चंदन ठहरा व्यापारी का बेटा... उसने सब को कहा, देखने और छूने के 5 रूपए लगेंगे। 

5 रूपए बड़ी कीमत नही थी, आधे घंटे मे सारे बच्चे घर से 5 रूपए ले आए।

चंदन ने सबकी line लगवा दी, इस सख्त हिदायत के साथ कि सब बस साइकिल को देखेंगे और छूएंगे, कोई किसी तरह की कोई छेडछाड नहीं करेगा। जिसके कारण भी साइकिल में जरा भी खराबी आई, उसे पूरे 5 हजार का भुगतान करना पड़ेगा। 

इस तरह से चंदन के पास पूरे 250 रूपए एकत्रित हो गए। उसने एक बढ़िया चश्मा खरीदा और बड़ी शान से रोज, पूरी बस्ती के, साइकिल से चक्कर लगाने शुरू कर दिए। बच्चों के पास, उसे ललचाते हुए देखने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

हफ्ता-दस दिन बाद चंदन साइकिल चला-चला कर बोर हो गया। अब उसके दिमाग में एक तिकड़म आई।

उसने सारे बच्चों को बुलाया और कहा, जो-जो भी साइकिल चलना चाहता है, उसे किराया देना होगा। कितनी देर के लिए साइकिल लोगे, उसी के अनुसार किराया देना होगा। 20, 50, 70, 100 रूपए... साथ मे यह हिदायत तो थी ही कि, जिसके कारण भी साइकिल में जरा भी खराबी आई, उसे पूरे 5 हजार का भुगतान करना पड़ेगा। 

बच्चो मे खुशी की लहर दौड़ गई। वो दौड़े चले गए रूपए लेने...

अब तो हर रोज, सुबह से शाम साइकिल चलती और चंदन की कमाई बढ़ती जाती। 

कुछ ही दिनों मे साइकिल की पूरी कीमत निकल आई। अब चंदन ने एक और साइकिल खरीद ली और उसे भी किराए पर चलाने के लिए लगा दी। और ऐसे ही उसका किराए की साइकिल चलावाए जाने का business चल पड़ा...

चंदन के पापा किशन अपने बेटे की व्यापारी-बुद्धि देखकर अति प्रसन्न हुए और बोले, मैं तो हर रोज कितना राशन खरीदने और दुकान मे दिनभर खटने के बाद रूपए कमा पाता हू; और तुम घर बैठे, किराए की साइकिल चलवा कर कमा रहे हो... गजब दिमाग पाया है, ऐसे ही खूब कमाओ। 

धन्यवाद पापा, आगे मोटरसाइकिल और कार‌ की भी planing है...

किशन जोर से हंस दिया, फिर बोला, बहुत सही जा रहे हो...

Friday, 2 June 2023

Kids story : वक्त से पहले

वक्त से पहले 


आज सुबह-सुबह ही फ़ोन की घंटी बज उठी, रचना ने रंजीत को कहा, मैं चाय बना रही हूं, आप फ़ोन उठा लेंगे? 

हां, हां.. उठाता हूं अभी, यह कहकर रंजीत ने फ़ोन उठाया... Hello.., आप कौन बोल रहे हैं? 

Hello Sir.., मैं शुभ के school से बोल रहा हूं, मैं आप से शुभ के regarding कुछ बात करना चाहता हूं...

रंजना तब तक चाय लेकर आ चुकी थी, किस का फ़ोन है?

शुभ के school से है..

शुभ के school से शाम को? Speaker पर रखिए...

Sir, आपको शुभ ने बताया, कि आज उसनेे क्या किया?

नहीं ऐसा तो कुछ नहीं कि, आप का फ़ोन आ जाए..

उसने आज बस चलाई है...

बस!.. क्या बोल रहे हैं आप? वो अभी मात्र 11 साल का है- रचना ने कहा...

जी वही मैं भी सोच रहूं Ma'am, वो अभी मात्र 11 साल का ही है, फिर भी उसने यह कमाल कर दिया...

आपको शुभ ने बताया नहीं? फिर कुछ सोचते हुए, शुभ के Sir बोले, हो सकता है कि इसलिए नहीं बताया हो, क्योंकि उसे कोई बड़ी बात ना लगी हो!...

पर आप यह बताइए कि उसने बस चलाई ही क्यों? और आप लोग, इस बात की तारीफ कर रहे हैं या उसके द्वारा, ग़लत काम करने की बात कहने के लिए फ़ोन किया है, रंजीत ने थोड़ा झुंझलाहट में बोला...

Sir, शुभ की तारीफ करने के लिए ही फ़ोन किया है।

दरअसल बात यह है कि आज सुबह, बस driver की तबीयत अचानक से बिगड़ गई और वो उसी अवस्था में बस चला रहा था।

शुभ ने, बस driver की तरफ देखा और चंद ही मिनटों में समझ गया कि driver की तबीयत ख़राब हो रही है। वो तुरंत उसके पास पहुंचा और driver की guidance में उसने बस को किनारे लगा दिया।

उसके बाद driver के फोन द्वारा हमें सभी परिस्थितियों से अवगत कराया।

कुछ ही मिनटों में हम उस जगह पर पहुंच गए और सभी बच्चे school आ गये। 

आज अगर आप का बेटा, alert and responsible नहीं होता,‌‌ तो सारे बच्चे मुश्किल में पड़ जाते...

हमारे पूरे school को गर्व है शुभ पर...

यह सुनकर, रंजीत और रचना, दोनों ने समवेत स्वर में धन्यवाद किया।

Sir, हमें जितना गर्व है शुभ पर, उतनी ही इस बात की curiousity भी कि, केवल शुभ ही क्यों? आखिर क्या ख़ास है उसमें?

रंजीत ने बहुत ही गर्व से सधे हुए शब्दों में कहा, उसके पास mobile नहीं है...

Mobile नहीं होना कौन सी खासियत होती है?

आजकल की बढ़ती आधुनिकता और दिखावे के चलन के कारण, छोटे-छोटे बच्चों के पास भी मोबाइल फोन रहने लगा है, जिसके कारण उनके अंदर alertness and responsibilities ख़त्म होती जा रही है।

साथ ही उन्हें बहुत छोटी उम्र में उन बातों का exposure भी मिल रहा है, जो नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि वो उनके बचपन को नष्ट और भविष्य को बर्बाद कर रहा है। 

हम चाहते थे कि हमारा शुभ, alert, responsible, intelligent and sensible बने और उसका भविष्य उज्जवल बने।

आप ने जो आज देखा, वो उसी खासियत के कारण हुआ। 

Mobile ज़रूरी है पर ठीक समय पर, वक्त से पहले नहीं... 

बिल्कुल सही कहा आपने.. एक बार फिर से शुभ और आपकी परवरिश को कोटि कोटि प्रणाम 🙏🏻

हम अपने school में इस बात का जिक्र अवश्य करेंगे, जिससे बाकी के parents and students भी इससे aware रहें।

Wednesday, 11 May 2022

Kids Story : The Friendly Fish

आज की kids story, एक छोटे से बच्चे Advay Sahai ने लिखी है, वो अपनी कहानी के जरिए अपने friends को एक बात बता रहा है।

जो कि है तो छोटी सी, पर बहुत जरूरी भी, क्योंकि जो बच्चे, इस बात का ध्यान नहीं रखते हैं, उन्हें बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है।

तो आइए देखते हैं कि उसने अपनी कहानी में ऐसी कौन सी बात कही है। 

उसको motivate करने के लिए, कहानी पसन्द आने पर, like and comments ज़रुर कीजिए।

The Friendly Fish 

सोनू का जन्मदिन आने वाला था। वो यह बात सोच-सोचकर हर समय बहुत खुश रहता। इस बार जनाब को अपने parents के तरफ़ से birthday gift में एक pet animal चाहिए था। उसने यह बात अपने parents से कही। 

उसके parents ने भी सोनू की इच्छा पूरी कर दी और उसे एक friendly fish दी और कहा, "यह fish बहुत friendly है। अगर तुम एक good boy की तरह रहोगे तो यह तुम्हारी friend बन जाएगी और तुम्हारे साथ बातें करेंगी और games खेलेगी।" 

सोनू यह सुनकर खुश हो गया और अपने parents को "Thank you." कहकर अपने friends के साथ खेलने चला गया।

सोनू हर दिन की तरह, आज भी अपनी books और notebooks, table पर छोड़कर चला गया था। Fish ने भी यह देख लिया।

जब सोनू लौटकर आया तो उसे दिखा की उसकी books तो ठीक हैं पर उसकी notebooks गीली हो गई हैं। यह देखकर सोनू कस-कसकर रोने लगा। 

Fish ने उससे पूछा, "क्या हुआ सोनू? तुम रो क्यों रहे हो?" सोनू ने कहा, "मेरी notebooks गीली हो गई हैं।" Fish ने कहा, "मुझे तो नहीं लग रहा।" 

सोनू को fish की बात समझ में नहीं आयी तो उसने fish से पूछा, "क्या मतलब?" 

Fish ने समझाया, "पहले तुम confirm करो की ये तुम्हारी used notebooks हैं भी या नहीं।" सोनू ने check किया। वो तो सोनू की new notebooks निकलीं! यह देखकर सोनू ने रोना बंद कर दिया। 

तभी fish ने कहा, "देखा! यह तो तुम्हारी new notebooks निकलीं। पर अगर तुम हर दिन अपनी books और notebooks को ऐसे ही छोड़कर चले जाओगे तो किसी दिन ऐसा तुम्हारी used notebooks के साथ भी हो सकता है। बात सिर्फ books और notebooks की ही नहीं है बल्कि तुम्हारी हर चीज़ की है। तुम्हें अपनी हर चीज़ को अपनी place पर और organised way में रखना चाहिए।"

सोनू को fish की बात समझ में आ गई और तब से वो अपनी हर चीज़ (including books and notebooks) को अपनी place पर और organised way में रखने लगा।

सोनू good boy बन गया और friendly fish उसकी best friend बन गई।

Friday, 25 March 2022

Kids story : New School Bag

आज की कहानी, छोटे से समझदार बच्चे अद्वय सहाय द्वारा लिखी हुई है। 

वो अपनी कहानी के जरिए अपने दोस्तों को समझना चाहता है कि हमेशा उन्हीं सामानों की demand करनी चाहिए, जिनकी हमें requirement हो।

इस कहानी को अपने बच्चों को अवश्य सुनाएं, जिससे उन्हें भी पैसे और समय की कद्र रहे।

New School Bag

Results आ चुके थे, बच्चे pass हो चुके थे। New class, new books सब कुछ नया, बच्चों में इसका अलग ही craze रहता है।

सोनू भी उन्हीं बच्चों में से था, जिन्हें हर साल school के लिए नयी-नयी चीजें चाहिए होती हैं।

कोरोना के कारण पिछले दो साल से school ठीक से नहीं खुल रहे थे तो सोनू के सभी सामान काफ़ी अच्छी condition में थे।

इसके बावजूद सोनू जिद्द कर रहा था कि उसे सब कुछ नया चाहिए। 

Specially New School Bag, वो भी doraemon वाला।

माँ ने समझाया भी कि क्या जरूरत है, नये bag की। अभी पिछले साल ही तो छोटा भीम वाला bag लिया था, और तुम school, मुश्किल से महीने भर भी नहीं गये हो। वो bag बिल्कुल नया जैसा ही है।

माँ, आप समझती नहीं हैं, अब मैं बड़ा हो गया हूँ, छोटा भीम वाला bag नहीं ले जा सकता हूँ, मुझे doraemon वाला new bag ही चाहिए। फिर सारे friends भी हर बार new bag लाते हैं तो मैं क्यों नहीं। 

पापा बोले, छोड़ो, मैं देखता हूँ। अगर वो bag मिलता है तो।

पापा की बात सुनकर सोनू खुश हो गया और doraemon, doraemon... का गाना गाते हुए खेलने चला गया।

लौटने पर उसने देखा कि doraemon उसके कमरे में उसका इंतजार कर रहा था।

सोनू, खुशी से उछल पड़ा, doraemon तुम?

हाँ मैं, doraemon ने जवाब दिया।

तुम यहाँ कैसे आ गये?

तुम से यह पूछने कि तुम्हारा bag कहाँ-कहाँ से फटा है? 

कहीं से नहीं! 

अभी पापा ने पिछले साल ही तो लिया था और मैं एक महीने भी school नहीं गया था तो वो बिल्कुल नया जैसा ही है।

क्या उसमें तुम्हारी new books, pencil box, tiffin box नहीं आएंगे?

बिल्कुल आएंगे, बहुत बड़ा bag है, वो मेरा।

अच्छा देखने में बहुत गन्दा और पुराना लगने लगा है?

नहीं... कहा तो बिल्कुल नये जैसा है।

तो क्या कारण है कि तुम्हें new bag चाहिए, सिर्फ इसलिए कि उसके cartoon में छोटा भीम बना है। या सिर्फ इसलिए कि और बच्चे new bag लाएंगे।

हाँ यही कारण है। 

तो तुम बिल्कुल ग़लत हो, हमें कोई सामान तभी लेना चाहिए, जब उसकी requirement हो, ना कि दूसरों की देखा-देखी या show-off करने के लिए।

अगर हम बिना requirement के एक ही सामान को बार-बार लेते रहेंगे तो वो पैसे की और समय की बर्बादी है। 

अगर हम इसका ध्यान रखें तो हमारे पास बहुत variety की चीजें होंगी, साथ ही हमारे पैसे और समय की बचत होगी।

अच्छा ठीक है, मैं समझ गया doraemon, कि तुम क्या कहना चाहते हो। अब से मैं केवल उन्हीं सामानों को लूंगा, जिसकी मुझे requirement हैं। व्यर्थ में पापा के पैसे और समय बर्बाद नहीं करूंगा।

यह कहकर वो पापा, पापा चिल्लाने लगा।

पापा और मम्मी सोनू के कमरे में आते हैं, वो देखते हैं कि सोनू सोते-सोते, पापा पापा चिल्ला रहा है।

उन्होंने सोनू को जगाकर पूछा कि क्या हुआ?

तब सोनू को समझ आया कि doraemon उसके सपने में आकर समझा रहा था। पर उसे doraemon की कही हुई बात अभी भी याद थी।

उसने अपने पापा से कहा, पापा अब मुझे new bag नहीं चाहिए।

क्यों, क्या हुआ बेटा?

पापा अब मुझे अच्छे से समझ आ गया है कि उन्हीं सामानों की demand करनी चाहिए, जिसकी मुझे requirement हो। 

मम्मी और पापा ने सोनू को बहुत सारा प्यार किया।

Saturday, 6 November 2021

Kids Story: पनीर का टुकड़ा

 पनीर का टुकड़ा


चंदन आज बहुत खुश था। भाईदूज में बुआ जी घर आ रही थीं। 

माँ पूरे घर की साफ-सफाई और सजावट में लगी हुई थी।

दुकान से उधार पर सामान लेकर आई थीं। घर, पकवानों की खुशबू से महक रहा था।

तभी माँ ने चंदन को आवाज लगाई...

चंदन, मेरे अच्छे बच्चे, ज़रा बगल की दुकान से पनीर ले आओ, तुम्हारी बुआ जी को पनीर बहुत पसंद है।

यह कहकर माँ ने तुड़ा-मुड़ा सा एक नोट पकड़ा दिया। और इसमें से 1 रुपया बचेंगे उससे तुम toffee ले लेना। 

चंदन बहुत खुश हो गया। एक तो माँ बहुत स्वादिष्ट पनीर बनाती थीं, दूसरा सालों बाद पनीर बना रही थीं, ऊपर से माँ ने 1 रुपया की toffee लेने को भी बोल दिया था।

चंदन मन ही मन सोच र में चुनावहा था कि आज तो बहुत ऐश होने वाली है।

माँ ने बहुत ही स्वादिष्ट पनीर भी बना लिया।

शाम को बुआ जी आ गयीं। उनके साथ फूफा जी, और उनके बच्चे, चीकू-पीकू व बुआ के देवर और ननद भी।

सबको देखकर चंदन मायूस हो गया। इतने सारे लोग, अब नहीं बचेगा माँ का बनाया tasty-tasty पनीर।

उसके मुंह में आया पानी, उसके मुंह में ही रह गया।

बुआ जी इतने सारे लोग को लेकर चली आई और साथ में लेकर चली आई, बस ½ kg बूंदी के लड्डू... 

खैर माँ-बाप के संस्कार ऐसे मिले थे कि चाह कर भी कुछ बोल ना सके।

सबका खाना लगा, सबके खाने लगने पर चंदन दौड़-दौड़ कर खाना परोसने लगा।

एक बार खींसे निपोरते हुए फूफा जी बोले भी, आजा चंदन तू भी बैठ जा।

वो बोला नहीं, मैं माँ के साथ खा लूंगा। बुआ जी बोलीं, रहने दो ना, खा लेगा बाद में उसका कौन कहीं जाना है।

बुआ जी सोच रही थीं कि अगर चंदन भी बैठ जाएगा तो परोसने की भाग-दौड़ उन्हें करनी पड़ेगी। और वो कामचोर ऐसी थीं कि भाई के घर आकर भी कभी एक हाथ नहीं हिलाती थीं।

भाभी को ही चक्करघिन्नी बना कर रखती थीं।

सबने खाना, खाना शुरू कर दिया।

धक्का-पेल सब पूड़ी पर पूड़ी उड़ाए पड़े थे। और बेचारा चंदन सब खत्म होते हुए देख रहा था। 

साथ ही सब खाने की बहुत तारीफ करते जा रहे थे। फूफा जी बोले, भाभी आप के द्वारा बनाया गया भोजन बहुत ही स्वादिष्ट होता है, पेट भर जाता है पर मन नहीं। मैं जब भी आता हूँ, ज्यादा ही खा जाता हूँ। यह कहकर उन्होंने 2 पूड़ी और ले लीं। 

और धीरे-धीरे, पनीर की सब्जी भी खत्म होती जा रही थी। बस दो टुकड़े ही तो बचे थे, कि फूफा जी के बेटे चीकू ने एक टुकड़ा जल्दी से अपनी plate में रखना चाहा। 

पर यह क्या, वो पनीर का टुकड़ा जमीन में गिर गया, फूफा बोले-क्या रे चीकू, ठीक से खा, अभी तेरी मामी और चंदन भी खाना खाने को रह गए हैं..

क्या है, आप तो हमेशा चीकू को डांटते रहते हैं। अरे कटोरे में कितनी सब्जी तो दोनों खा लेंगे। यह कहते हुए उन्होंने झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाते हुए पनीर का आखिरी टुकड़ा भी चीकू के plate में रख दिया।

सब खाना खा कर जा चुके थे। सब्जी के कटोरों में लगी-पुछी सी सब्जी बची थी।

माँ ने चंदन से कहा, आजा मेरे राजा अब तू भी खाना खा ले।

चंदन ठुनकते हुए बोला, क्या खाऊं? 

खाली पूड़ी? 

पनीर की सब्जी में केवल जरा सा रसा बचा है, एक भी पनीर का टुकड़ा नहीं है।

सूखी mix veg से मुझे खाना नहीं खाना।

मेरा तो सारा पेट सबको खाना खिलाकर भर गया।

माँ रसोई में गई, एक plate में दो फूली पूड़ी और सब्जी लेकर आती हैं। अब भी खाना नहीं खाएगा?

माँ के हाथ में plate देखकर चंदन उछल पड़ा, माँ पनीर के चार-चार टुकड़े। यह कहाँ से आए?

क्यों मैं अपने लाडले का ध्यान नहीं रखूंगी?

चंदन माँ से चिपक गया, मेरी प्यारी माँ...

फिर वो माँ के हाथ से खाना खाने लगा, हमेशा की तरह कमाल का पनीर बना था। उसने माँ को भी अपने हाथ से खाना खिलाया....


भाईदूज पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ🎉💐💞

Thursday, 16 September 2021

Kid's Story : क्यों करना

क्यों करना 




नीरा बहुत ही दयालु प्रवृत्ति की स्त्री थी। जो कोई भी उसके पास आता, वो उसके सारे दुःख कष्ट को दूर करने की कोशिश करती थी।

लोगों की हर संभव मदद करने की कोशिश करती थी। इस वजह से बहुत बार वो अपने बेटे मेहुल पर कम ध्यान दें पाती थी।

मेहुल को अपनी मांँ की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आती थी। वो अक्सर माँ से कहता- माँ सब के लिए, क्यों करना।

कोई भी तो आप के लिए नहीं करता है। ना समझता है कि आप कितनी अच्छी हैं।‌‌‌‌‌फिर आपको ही क्यों करना?

माँ उसकी बात पर हंस देती....

एक दिन मेहुल माँ के पीछे पड़ गया कि आप बताइए क्यों करती हैं, आप सब के लिए इतना? 

नीरा ने बड़े प्यार से मेहुल के सिर पर हाथ फिराया और कहा, बेटा ईश्वर ने हमें सिर्फ अपने लिए नहीं भेजा है। उन्होंने हमें जो दिल दिया है, वो सिर्फ इसलिए नहीं कि वो अच्छे से धड़के और हम जीवित रह सकें, बल्कि इसलिए भी दिया है कि हम दूसरों के दुःख दर्द और परेशानियों को भी समझ सकें।

और यह दिमाग सिर्फ अपनी चिंता करने के लिए ही नहीं दिया है बल्कि इसलिए भी दिया है कि हम दूसरों की परेशानियों को कैसे हल कर सकते हैं, यह भी समझ सकें। 

यही सोच हमें, पशु से इंसान बनातीं है। 

माँ, इससे क्या? 

बेटा ईश्वर ने हम सबको भेजा है और जो लोग अच्छे काम करते हैं, उसे कोई और समझे ना समझे, पर ईश्वर समझते हैं।

और जो लोग अच्छे काम करते हैं, ईश्वर सदैव उनके साथ रहते हैं और उनके सभी कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होते हैं।

सच माँ?

हाँ बिल्कुल सच।

इसलिए अच्छे कार्य करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे कोई आप के काम आए या नहीं। चाहे आप को कोई अच्छा समझे या नहीं।

पर सतत् करते रहने से देर से ही सही पर वो समय आता जरुर है, जब सबको समझ आता है कि आप अच्छे हो। 

अब समझ आ गया कि अच्छे काम क्यों करना चाहिए?

बिल्कुल! बहुत अच्छे से, यह कहकर मेहुल खेलने चला गया...

Thursday, 26 August 2021

Kids Story : माँ की दवाई

 माँ की दवाई




कुंदन रोज़ घर से 20 गुब्बारे लाता और चौराहों में दौड़-दौड़ कर बेचा करता। 

इससे मुश्किल से उसके पास इतना ही पैसा इकट्ठा हो पाता कि एक दिन खाना मिलता और एक दिन फांकों में गुजरते क्योंकि माँ की दवाई में बहुत पैसे लग जाते थे।

फिर भी कुंदन पूरे जोश से गुब्बारे बेचता रहता।

एक दिन कुंदन गुब्बारे बेचने के लिए, एक car के नज़दीक गया।

Car में एक समाजसेवी बैठा था। कुंदन को देखकर बोला...

 तुम गुब्बारे क्यों बेचते हो?

पढ़ाई क्यों नहीं करते हो?

यह बताइए, क्या होगा पढ़ाई कर के?

समाजसेवी बोला, तुम पढ़-लिख जाओगे तो बड़े होकर पैसे कमाओगे।

कुंदन बोला, वो तो मैं अभी भी कमा रहा हूँ।

समाजसेवी बोला, अरे, इतने कम नहीं और ज्यादा कमा सकते हो।

अच्छा, पर जब मैं पढ़ाई करुंगा, तब पैसे कहाँ से आएंगे और मेरी पढ़ाई के लिए... वो पैसे कहाँ से आएंगे। खाने-पीने के लिए भी तो पैसे चाहिए।

अरे, छोटी सी जान! अभी से तुझे पैसे की कितनी फ़िक्र है। मैं दूंगा तुझे पैसे, पढ़ने, खाने-पीने सब के लिए।

कुंदन बोला, मेरी माँ बहुत बीमार रहती हैं, उसकी दवाई के लिए ही मैं गुब्बारे बेचता हूँ। अगर मैं पढ़ने जाऊंगा तो वो बिना दवाई के नहीं बचेंगी।

मुझे नहीं पढ़ना।

समाजसेवी बोला -कुंदन, अगर मैं उसके लिए भी पैसे दे दूं तो?

कुंदन सुनकर खुशी से झूम उठा, बोला अगर आप मेरी माँ की दवाई के पैसे देंगे और मुझे सिर्फ एक time ही खाना देंगे तो भी चलेगा। मुझे बहुत सारा काम करना भी मंजूर है...

पर आप ने जिस दिन से मेरी माँ की दवाई के पैसे नहीं दिए, मैं सब छोड़कर आ जाउंगा।

समाजसेवी, कुंदन का माँ के प्रति प्रेम देखकर गदगद हो गया। वो बोला, बेटा ऐसा कभी नहीं होगा, अगर तुम मन लगाकर पढ़ोगे। 

आप जो कहेंगे, सब करुंगा...

कुंदन मन लगाकर पढ़ने लगा, उसे रोज़ खाना भी मिल रहा था और माँ का उचित इलाज भी हो रहा था। 

कुंदन का माँ के प्रति प्रेम और कर्तव्य उसे आगे बढ़ने को प्रेरित करता रहा क्योंकि वो माँ की दवाई के लिए कुछ भी करने को तैयार था।

Tuesday, 6 July 2021

Kids Story : नन्हें पौधे

 नन्हें पौधे



राज और नंदनी, पापा से बोले- इस बार बहुत गर्मी पड़ रही है कि पंखा भी बहुत गर्म हवा दे रहा है।

पापा बोले, हाँ बच्चों गर्मी तो बहुत है, साथ ही हम लोग इस बार top floor पर हैं, इसलिए और भी ज्यादा गर्मी लग रही है।

नंदनी बोली पापा, top floor से क्यों?

पापा बोले, क्योंकि छत गर्म होने से हमारा घर भी गर्म हो जाता है।

ओह! मतलब हम पूरी गर्मी में ऐसे ही परेशान होंगे, दुखी होकर राज बोला।

पापा के जाने के बाद, नंदनी और राज सोचने लगे कि क्या किया जाए कि गर्मी से राहत मिले।

अभी वो बैठ कर सोच ही रहे थे कि राज बोला मुझे एक idea आया है। चल माँ से पुराने डिब्बे लेकर आते हैं।

पुराने डिब्बे....

उनका क्या करोगे भइया ?

अरे तू चल तो....

राज ने माँ से पूछा, माँ आप ने पुराने डिब्बे कहाँ रखें हैं?

क्यों, क्या करना है तुम्हें?

माँ, आप दीजिए ना?

अच्छा भाई, वहाँ कोने पर plastic bag में रखें हैं।

प्यारी माँ कह कर राज ने माँ को गले लगा लिया।

फिर plastic bag लेकर नंदनी के साथ बाहर आ गया।

चल नंदनी, सारे डिब्बों में मिट्टी भरनी है।

डिब्बों में मिट्टी भरकर दोनों बच्चे छत पर पहुंच गए।

माँ कुछ चने, मेथी, धनिया, और जो कुछ भी बीज आप के पास हों दे दीजिए।

क्यों चाहिए, तुम्हें?

माँ मुझे पौधे लगाने हैं?

इतनी घूप में कौन से पौधे उग आएंगे?

तुम एक काम करना, मेरे संग nursery चलना, वहाँ से गर्मी में लगने वाले पौधे ले लेना।

वो लोग शाम को गुड़हल, सूरजमुखी, गेंदा आदि के नन्हेे-नन्हे पौधे लेकर आ गये।

उन पौधों को पूरी छत में जगह जगह रख दिया। सब में पानी भी डाल दिया।

अब तो दोनों बच्चे रोज़ सुबह-शाम पौधों में पानी डालते।

कुछ दिन में उन नन्हें पौधों में फूल खिल आए।

इससे दो काम हो गये, पहला तो छत खिले हुए फूलों से बहुत सुन्दर लगने लगी। दूसरा छत पर पौधे रखे थे इसलिए, उन पर सुबह-शाम पानी डालने से छत भी ठंडी रहने लगी थी।

इसका असर यह हो रहा था कि कमरा भी ठंडा रह रहा था। अब पंखा गर्म हवा नहीं दे रहा था। साथ ही फूलों की खुशबू से घर भी महक रहा था।

एक शाम पापा ने, राज और नंदनी को अपने पास बुलाया और कहा कि तुम दोनों की मेहनत ने तो कमाल ही कर दिया।

एक अच्छी सोच और परिस्थितियों से मुकाबला करने की तुम लोगों की इच्छा ने घर को बहुत बेहतरीन बना दिया है।

राज बोला, पापा यह तो नन्हें पौधों का कमाल है।

हाँ बेटा, हम पौधों के लिए थोड़ा भी करें, तो वो हमें बहुत कुछ देते हैं। और इनके लिए वो मेरे बच्चों के नन्हें हाथों ने किया है।

यह कहकर पापा ने दोनों बच्चों को गले लगा लिया और दोनों को दो-दो बड़ी सी chocolate 🍫 दी।

Thank you Papa, हम जा रहे अपने नन्हें पौधों को पानी देने।

Saturday, 5 June 2021

Kids story : पहले जैसी धरती

आप सभी को World Environment Day की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌍🌄🌳🌴

जब हो पर्यावरण संरक्षण, तभी संभव हो जीवन रक्षण 

आज के दिन के लिए, हमारे प्यारे प्यारे बच्चों के लिए एक प्यारी सी कहानी...

पहले जैसी धरती



गोलू कोरोना के कारण बहुत दुखी था। बहुत दिनों से वह खेलने नहीं गया था, ना ही उसके कोई दोस्त घर आ रहे थे।

दुखी गोलू बोला, माँ में बगीचे में जा रहा हूँ।

माँ बोली, बेटा मैं अभी काम कर रही हूँ। थोड़ी देर बाद आ पाऊंगी, तुम संभलकर रहना।

गोलू बहुत दुखी, बगीचे में घूम रहा था। तभी अचानक उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। वो लड़खड़ा कर गिरता उससे पहले किसी ने उसे गिरने से बचा लिया था।

तुम्हें चोट तो नहीं लगी गोलू? एक मीठी सी आवाज़ आई।

गोलू ने देखा, जिसने उसे संभाला था, वे एक बहुत सुंदर औरत थी, उसने हरे रंग की साड़ी पहनी थी। साफ़ लम्बे बालों में खूब सुन्दर फूल लगे थे।

गोलू उसे देखता रह गया। आप कौन हैं?, गोलू ने पूछा।

मैं धरती हूँ।

धरती! मैंने तो आप को कभी नहीं देखा। मैं हर रोज़ अपनी मांँ के साथ यहाँ आता हूँ।

जब तुम अपनी माँ के साथ होते हो तो, तुम्हें वे गिरने से संभाल लेती हैं। पर वे आज तुम्हारे साथ नहीं थीं, इसलिए मुझे आना पड़ा। फिर मैं अब ऐसी दिखती भी नहीं हूँ।

तो कैसी दिखती हैं?

तुम देखकर डर जाओगे।

आप कैसी दिखती हैं?, गोलू ज़िद पर अड़ गया।

उस औरत ने अपने असली रूप में आते हुए कहा, "ऐसी।" वह औरत बहुत दुखी थी।

उसके रुखे बाल में जगह जगह मिट्टी धूल व गन्दगी थी। उसने बेकार-सी कटी-फ़टी भूरी साड़ी पहनी हुई थी।

अरे! यह आपको क्या हो गया है?

गोलू, "इन्सानों" यानी कि मेरे बच्चों की इच्छाओं का अंत नहीं होने से ऐसा हुआ। वो पेड़ काटते गये। नदी-तालाब गंदे कर दिए। हर जगह गंदगी, सूखा, बीमारी, परेशानी है। किसी को मेरी चिंता नहीं है, जिसके कारण मेरी ऐसी हालत हो गई है।

गोलू धरती को देखकर रोने लगा, आप पहले जैसी खूबसूरत कैसे बनेंगी?

प्लास्टिक का इस्तेमाल करना बंद कर दो। और जब कोरोना खत्म हो जाए, तो तुम अपने सारे दोस्तों के साथ मिलकर खूब सारे पेड़ लगाना। नदी-तालाब को गंदा होने से बचाना। हर जगह सफ़ाई रखना, और इच्छा उतनी ही करना, जिससे ज़रुरत पूरी हो जाए। तो मैं फ़िर पहले जैसी हो जाऊंगी।

यह सुनकर गोलू खुश हो गया। वह बोला, कोरोना का अंत होते ही अपने दोस्तों के साथ मिलकर वैसा ही करुंगा, जैसा आपने कहा है।

अब गोलू को कोरोना के खत्म होने का इंतजार था, उसे धरती को पहले जैसी जो करना था।

Monday, 15 March 2021

Kids story: मेहनत और मेहनताना

मेहनत और मेहनताना


हमारे घर के पीछे एक बड़ा सा park है, जिसमें पास की बस्ती के लड़के दिन भर खेलते रहते थे।

उन्हें देखकर बेटा आर्यन बोला, माँ इन लड़कों के कितने मजे हैं।

यह दिनभर खेलते रहते हैं, ना तो इन्हें school जाना होता है ना ही कोई homework करना होता है।

काश, ऐसे ही मैं भी दिनभर मस्ती कर पाता! 

माँ, कुछ नहीं बोलीं, बस बेटे की बात सुन ली।

कुछ दिनों बाद, पूरे parking space में tiles लगाने का कार्य आरम्भ हो गया।

बहुत से मज़दूर थे, कुछ मिस्त्री और एक ठेकेदार कार्य में लगे थे।

मज़दूर दूर रखी ईंटा गारा सीमेंट लाकर देते। मिस्त्री, एक बार भी सामान लाने के लिए नहीं उठता, बैठे बैठे ही सारा काम करता।

धूप बहुत तेज थी, पर सब अपना काम तल्लीनता से कर रहे थे। 

हर रोज़ सिर्फ 3 घंटे के लिए ठेकेदार आता, सारे काम को observe करता।

अगला काम कैसे करना है, वो समझाता; क्या क्या सामान और चाहिए, इसकी list बनाता; कुछ देर तक यह देखता कि, काम ठीक से हो रहा है, और फिर चला जाता।

यह सब काम वो, एक छोटे कमरे में बैठ कर करता, जहाँ पंखा लगा हुआ था।

जिस officer ने ठेकेदार को काम दिया था, वो alternate दिन में 10 minutes के लिए आता था। बाकी समय वो अपने AC वाले office में रहता था।

कार्य शुरू हुए मात्र 1 week ही गुज़रा था, कि बहुत ज़ोर से बारिश शुरू हो गई।

मज़दूरों और मिस्त्री ने जो काम किया था वो खराब होने लगा। उन्हें फिर से मेहनत करनी पड़ी, पर भरी बरसात में भी वो लगे रहे।

 चार-पांच दिनों तक बारिश होती रही, उतने दिन में ठेकेदार दो दिन ही आया। और executive तो एक भी दिन नहीं आया।

बारिश बन्द हो गई और चंद दिनों बाद काम भी पूरा हो गया। Parking space बहुत ही सुन्दर लगने लगी।

सभी को उनकी मेहनत का मेहनताना दिया गया। 

सबसे अधिक रुपए executive को मिले, उससे कुछ कम ठेकेदार को, ठेकेदार से कम मिस्त्री को और सबसे कम रुपए मज़दूरों को मिले।

कुछ दिन बाद parking space का inauguration हुआ। सभी लोग executive officer की बहुत तारीफ कर रहे थे कि उसने बहुत अच्छा काम कराया।

चंद लोग उस ठेकेदार के काम की भी तारीफ कर रहे थे।

पर उन मिस्त्रियों और मज़दूरों के काम की प्रशंसा कोई नहीं कर रहा था। एक भी ऐसा नहीं था, जो कह रहा हो कि असली मेहनत तो मिस्त्री और मज़दूरों ने की है।

आर्यन बोला, माँ यह तो ग़लत बात है कि किसी ने भी असली मेहनत करने वालों की तारीफ़ नहीं की और ना ही उन्हें मेहनताना ज्यादा मिला।

माँ ने समझाया, बेटा जिसने ज्यादा मेहनत की है, मेहनताना उसे ही ज्यादा मिली है।

वो कैसे माँ ?

वो ऐसे कि जो बच्चे दिन भर खेलते रहते हैं और अपने बचपन का अनमोल समय व्यर्थ बर्बाद करते हैं। वो बड़े होकर किसी लायक नहीं होते हैं।

उन्हें अपना जीवन यापन करने के लिए बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। पर ना उन्हें अधिक रुपए मिलते हैं ना ही प्रशंसा। यह वो लोग हैं जो मज़दूर थे।

जो बच्चे दिन भर खेलते हैं, पर बड़े होने से पहले ही मेहनत कर के कुछ विशेष कार्य सीख लेते हैं। उन्हें बड़े होकर मेहनत थोड़ी कम और चंद रुपए ज्यादा मिल जाते हैं। यह वो लोग हैं जो मिस्त्री थे।

जो बच्चे स्कूल तो जाते हैं, पर पढ़ने में मेहनत कम करते हैं। उन्हें बड़े होकर कुछ मेहनत और कम करना पड़ता है और रुपए ज्यादा मिल जाते हैं, कभी कभी लोगों से प्रशंसा भी मिल जाती है और कुछ आदर भी। यह वो लोग हैं जैसे ठेकेदार था।

जो बच्चे स्कूल जाते हैं, अपना home work पूरा करते हैं, मेहनत से पढ़ते हैं। फिर उन्हें बड़े होकर, सबसे कम मेहनत करनी पड़ती है, मेहनताने में सबसे अधिक रुपए और बहुत सारी तारीफ मिलती है, सब लोग उनका सम्मान करते हैं। यह वो लोग हैं जो कि बड़े होकर executive officer बनते हैं।

ओह! मतलब जो बचपन में ज्यादा मेहनत करते हैं, उन्हें ही बड़े होकर कम मेहनत में ज्यादा मेहनताना मिलता है।

एकदम सही!!

उसके बाद आर्यन ने कभी नहीं कहा कि बस्ती वाले लोगों के बहुत मज़े हैं, क्योंकि अब वो उन जैसा कभी नहीं बनना चाहता था।

उसे तो बड़ा होकर कम मेहनत और ज्यादा मेहनताना चाहिए था। 

Wednesday, 3 February 2021

Kids story : सब कुछ बताना और पूछ्ना

 सब कुछ बताना और पूछ्ना




सूरज बहुत ही मेहनती और समझदार बच्चा था। उसके पिता सुरेश दूसरों के खेत पर काम करते थे। सूरज उनके साथ रोज काम करने जाता था। साथ ही रात को school पढ़ने जाता था।

एक दिन सूरज के महेश चाचा, शहर से किसी काम के सिलसिले में आए थे। 

सुबह काम खत्म करके महेश, जब सूरज और अपने भाई के साथ खाना खा रहा था तो, उन्हें बातों के जरिए पता चला कि सूरज पढ़ने में बहुत होशियार है और साथ ही बहुत आज्ञाकारी भी।

महेश ने कहा- सुरेश दद्दा, कब तक गांव से बंधे रहोगे, ना तो अपने खेत खलिहान हैं, ना घर मकान। फिर तुमने जो क़र्जा लिया था, भाभी के इलाज के लिए, वो भी पट गया है। मेरे संग शहर चलो, वहाँ एक कमरा तुम भी ले लेना।

सूरज थोड़ा बड़ा भी हो गया है और होनहार भी बहुत है, इसका यहाँ कोई भविष्य नहीं है।

शहर में तुम दोनों मिलकर मेहनत मजदूरी कर लेना, तो दोनों की गुजर हो जाएगी।

रात में सूरज सरकारी स्कूल में पढ़ लेगा, भगवान ने चाहा तो कुछ बन जाएगा।

भाई की बात, सुरेश को सही लगी। सूरज की माँ के जाने से घर भी काटने को आता था।

सुरेश और सूरज दोनों शहर आ गये। महेश ने कमरा और काम दोनो दिलवा दिए, साथ ही सूरज का night school में admission भी करा दिया।

सूरज होनहार था, बहुत जल्दी वो अपने school में first आने लगा।

वहाँ के एक अध्यापक को सूरज बहुत अच्छा लगने लगा, वो बोले, बेटा तुम बहुत होशियार हो, night school की जगह तुम सुबह के school में आना शुरू कर दो। और काम रात में कर लो।

सूरज बोला, पापा से पूछकर बताऊंगा।

वो बोले, तुम्हारे पापा क्या करते हैं?

वो बोला, जी मजदूर हैं।

मजदूर......, तो वो तुम्हे क्या बता पाएंगे? जब वो खुद पढ़े-लिखे नहीं है।

सूरज बोला सर जी, मैं अपने पापा को सब कुछ बताकर और पूछकर ही करता हूँ।

बहुत अच्छा है, तुम पूछकर बता देना।

सूरज ने अपने पापा से कहा, कि उसको teacher जी, बोल रहे हैं कि, वो अब से दिन का school और रात में काम करना शुरू कर दें। 

तो क्या वो ऐसा कर ले?

सुरेश बोला, बेटा मैं कहाँ पढ़ा-लिखा हूँ।  teacher जी अच्छे के लिए बोल रहे हैं, तू कर ले, उनका कहा।

सूरज ने teacher को बता दिया। तब से उसने सुबह पढ़ना और शाम को काम करना शुरू कर दिया।

होनहार सूरज, आगे ही आगे बढ़ता गया, पर वो जो कुछ भी करता, तो अपने पापा से अपनी सारी बात उन्हें बताकर और पूछकर करता।

सुरेश हमेशा कहता, बेटा मैं कहाँ पढ़ा-लिखा हूँ। अब तो तुम्हें मुझसे ज्यादा समझ है, हर बात की, तुम समझ लो, क्या करना है।

पर सूरज ना पूछ्ना छोड़ता, ना बताना। और काम भी वही करता, जिसमें उसे पापा, हाँ करते।

बेटे की आदत के कारण सुरेश अपनी समझ से कभी हाँ और कभी ना कर देता।

सूरज IAS officer बन गया। बहुत से Newspapers वाले उसका interview लेने आए, सबने उसकी सफलता का कारण पूछा।

उसने सबसे कहा, मैं अपनी सारी बातें अपने पापा को बताता था और पूछता था कि क्या करूं। वो जो भी कहते थे, मैं वहीं करता था। तो आज मैं जो कुछ भी हूँ, उनके कारण हूँ।

Newspaper वालों को जब पता चला कि सूरज के पिता जी अनपढ़ हैं और मामूली से मजदूर हैं तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतना बड़ा officer अपने पिता जी को कितना मान देता है।

अगले दिन अखबारों की सुर्खियों में था, IAS officer सूरज की सफलता का राज उनकी मेहनत, लगन और अपने पिता जी पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है।

सभी को सफलता प्राप्त करना है तो अपने माता-पिता को सब कुछ बता कर और पूछकर करें। ऐसे लोगों पर ईश्वर जल्दी कृपा करते हैं और उन्हें जल्दी सफलता मिलती है।

Wednesday, 9 December 2020

Kids Story : सुन्दर

 सुन्दर




सुन्दर और उसकी माँ, बस दो प्राणी थे घर में।

सुन्दर बचपन से पढ़ने में बड़ा होशियार था।

माँ दूसरों के घर, बर्तन झाड़ू-पोछा करती, और सुन्दर को पालती-पोसती, पढ़ाती-लिखाती ।

पर कोरोना आ जाने से माँ को काम के लिए नहीं जाना होता था, सब उसे पैसे तो दे रहे थे, पर कुछ कम। 

इधर school भी लोगों को घर में रहकर, Mobile और laptop में करने थे।

 सुन्दर की माँ को इतना ही पैसा मिल रहा था कि खाना-पीना तो हो जा रहा था, पर अतिरिक्त पैसे नहीं थे कि वो अच्छा mobile खरीद सके।

कुछ दिन बाद सब थोड़ा normal होने लगा, माँ वापस काम पर जाने लगी।

पर school अब भी online चल रहे थे।

सुन्दर अब पहले जितना छोटा भी नहीं था, वो 5th class में था।

उसकी बस्ती के बच्चे बड़े खुश थे, कि school नहीं जाना है, उनके मां-बाप के पास इतना पैसा नहीं है कि mobile खरीदें। तो बस दिन भर आवारा गर्दी।

पर सुन्दर उदास रहने लगा, क्योंकि उसकी class छूटती जा रही थी।

एक दिन वो मांँ से बोला, मैं भी काम पर चलूंगा।

क्या कर पाएगा तू? अभी बहुत छोटा है।

नहीं हूँ छोटा, फिर घर में रहकर भी क्या कर रहा हूँ?

मांँ, उसे अपने साथ ले गयी। वहाँ पहुंच कर सुन्दर ने देखा,  उस घर पर बच्चों की online class चल रही थी, पर वो पढ़ना नहीं चाह रहे थे।

 माँ ने कहा, madam जी, इसके लिए कोई काम होगा?

आज से यह भी काम करना चाह रहा है।

यह क्या काम कर पाएगा?

आंटी जी, मैं आपके कपड़े फैला दूंगा, fold कर दूंगा। Dusting कर दूंगा, बाजार से सामान ला दूंगा।

आप के हाथ पैर दबा दूंगा। और आप जो कुछ कहेंगी, वो सब कर दूंगा।

और मुझे इन सब कामों के लिए पैसे नहीं चाहिए।

अच्छा तो क्या चाहिए।

आप से रोज़ चार घंटे के लिए mobile and data.

और वो क्यूं? 

माँ बोली, Madam जी पढ़ने का ऐसा दीवाना है कि खाना-पीना छोड़ देता है। 

वो school की पढ़ाई चल रही है ना, mobile पर। यही कारण से बोल रहा है।

तू रोज चार घंटे पढ़ेगा, तो काम क्या घंटा करेगा?

नहीं आंटी जी, मैं पढ़ते पढ़ते काम भी कर दूंगा।

Madam जी सोचने लगी, यहाँ तो खाली पढ़ना होता है, तब भी बच्चे नहीं पढ़ते हैं तो ये क्या पढ़ेगा?

फिर सोचने लगी, mobile तो दो चार बेकार ही पड़े हैं, और internet तो unlimited है।

तो अलग से कोई खर्च नहीं होगा और सारे काम के लिए मस्त नौकर मिल जाएगा।

सुन मैं दे दूंगी, पर काम में कोताही नहीं चलेगी।

नहीं बिल्कुल शिकायत का मौका नहीं दूंगा आंटी जी।

अब सुन्दर रोज़ काम करने लगा, और पढ़ाई भी। सुन्दर खुश रहने लगा।

Madam जी, भी खुश थी, खूब रगड़ कर काम ले रही थीं, मुफ्त के नौकर से।

पर माँ दुःखी थी, सोच रही थी, जल्दी school खुले तो उसका बेटा सिर्फ पढ़ाई कर सके और लोग उसकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाएं।

Friday, 6 November 2020

Kids story : Bruno

Bruno




एक छोटा सा कुत्ते का बच्चा, बहुत अधिक ठंड से ठिठुर रहा था।

ना जाने कैसे वो अपनी माँ से बिछुड़ गया था।

शायद वो कुछ आलसी सा था, तभी तो जब माँ को कोई भगाता, उसके सारे बच्चे उसके साथ हो लेते, पर यह छुटकू, कुछ देर से ही हरकत में आता था।

उसका ही नतीजा हुआ कि आज वो अकेला रह गया।

पर अब बहुत अधिक ठंड से वो परेशान हो गया, फिर भूख भी बहुत जोर से लग रही थी, आज माँ जो नहीं थी पास उसकी भूख मिटाने के लिए।

तभी उसकी कूं कूं सुनकर कुछ बच्चों की टोली वहाँ चली आई।

किसी को वो बड़ा प्यारा लग रहा था, तो कुछ को शरारत सूझ रही थी।

किसी ने उसकी पूंछ खींची, किसी ने धक्का दिया तो कुछ बच्चे घर से खाने को बिस्कुट और चाॅकलेट भी ले आए।

भूख तो मिट गयी, पर ठंडा अभी भी लग रहा था।

तो वो बच्चे उसको उठाकर गार्ड अंकल के ब्लोअर के पास छोड़ गए।

गार्ड अंकल, पहले नाराज़ हुए फिर बच्चों की मासुमियत और छोटे से कुत्ते के बच्चे पर उन्हें दया आ गई।

अगले दिन बच्चे उसके लिए, फटा सा blanket और चादर ले आए साथ ही उसके खाने के लिए दूध और बिस्कुट।

आज उन लोगों ने बड़े प्यार से उसका नाम Bruno रख दिया था।

Bruno की एक माँ चली गई थी पर अब उसका ध्यान रखने को बहुत सारे लोग थे।

छोटे छोटे बच्चों के कारण उसे नाम और घर दोनों मिल गया था।

Bruno बड़ा हो गया था, साथ ही वो appartment उसका घर बन गया था। 

अब वो उस appartment की रखवाली करने लगा था, वो बहुत वफादार और तेज़ हो गया था।

आसपास के इलाकों में चोरियां हो रही थीं, पर Bruno के रहते चोर इस appartment में आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

गार्ड अंकल, आज भी Bruno को अपने पास रखते थे, और बड़े शान से कहते, बच्चों ने मेरी help के लिए Bruno को रखा है।

Bruno भी खुश होकर पूंछ हिलाता और खूब जोर से भौंकता।

जिससे सारे डर जाते और गार्ड अंकल खूब जोर से हंसते।

Thursday, 8 October 2020

Kids stories : खिलौने

खिलौने



टिन्नी अपने मम्मी पापा की इकलौती संतान थी। उसके मम्मी-पापा दोनों job करते थे और दोनों ही high post पर थे।

तो दोनों ही के पास समय नहीं था। जिस के कारण, वो टिन्नी की हर बात को सिर-माथे रखते थे। उसकी सारी फरमाइश, जरुरत हो या ना हो, झट पूरी कर देते थे।

टिन्नी के पास, खिलौनों की भरमार थी, फिर भी हर महीने ना जाने कितने और आ जाते।

टिन्नी एक भी खिलौने ढंग से नहीं रखती थी। मंहगे से मंहगे खिलौने, चंद दिनों में ही बेकद्री की भेंट चढ़ जाते।

टिन्नी की माँ ने टिन्नी की देखभाल के लिए एक नई कामवाली को रख लिया।

कामवाली के साथ उसकी बेटी कमली भी आती, जो  टिन्नी की हमउम्र थी।

जब तक कमली की माँ काम करती, टिन्नी कमली के साथ खेला करती।

कमली को टिन्नी के खिलौने बहुत भाते, वो बड़ ललचाई नज़रों से उन्हें देखा करती।

एक दिन कमली की माँ भांप गई, कि कमली खिलौने देखकर ललचाती है तो वो अनहोनी के डर से अंदर तक कांप गई। उसे अपने अच्छे काम छूटने का डर सताने लगा।

उसने कमली को बहुत समझाया, कि दूसरे की चीज़ देखकर नहीं ललचाते, पर कमली का बाल मन खिलौने देखकर, सब भूल जाता।

एक दिन कमली नहीं आयी, केवल उसकी माँ ही आयी।

उस दिन टिन्नी के मम्मी पापा देर से आने वाले थे।

तो टिन्नी पीछे पड़ गई, कि उसे कमली से मिलने जाना है।

कमली की माँ समझाने लगी, उनका घर बहुत छोटा है, टिन्नी को वहाँ अच्छा नहीं लगेगा।

 चलना है, चलना है, कहकर टिन्नी रोने लगी।

कमली की माँ, उसे अपने साथ ले गयी। जब टिन्नी वहाँ पहुंची तो उसने देखा, घर सचमुच बहुत छोटा था। पर कमली को देख कर वह बहुत खुश हो गई।

कुछ देर बाद वो कमली के पीछे पड़ गई कि कमली अपने खिलौने लेकर आए, और वो लोग खेल सके।

कमली अपने पुराने और टूटे-फूटे खिलौने लेकर चली आई।

टिन्नी ने देखा, कमली ने पुराने और टूटे-फूटे खिलौने भी बहुत संभाल कर रखे थे।

टिन्नी का पुराने और टूटे-फूटे खिलौनों में बहुत मन नहीं लगा, वो जल्दी अपने घर लौट आई।

आते ही सब से पहले वो अपने खिलौनों के पास गयी।

शाम को जब मम्मी पापा घर आए, तो उन्होंने देखा कि टिन्नी ने अपनी खिलौनों की shelf को बहुत अच्छे से सजा लिया था। साथ ही कुछ खिलौने उसने नीचे भी सजाकर रखें थे।

उन लोगों ने टिन्नी की, shelf सजाने के लिए बहुत सारा प्यार किया और तारीफ भी की।

फिर उन्होंने पूछा, कुछ खिलौने नीचे क्यों हैं?

तो टिन्नी ने बताया कि वो आज कमली के घर गयी थी, जहाँ उसने अपने पुराने, टूटे-फूटे खिलौने भी बहुत संभाल कर रखे थे।

यह देखकर उसने decide किया कि वो भी अपने खिलौने भी ढंग से रखेगी। साथ ही कुछ अच्छे खिलौने कमली को भी दे दे, जिससे कमली को पुराने, टूटे-फूटे खिलौनों से ना खेलना पड़े।

टिन्नी के मम्मी पापा उसकी, समझदारी व अच्छी सोच से बहुत खुश हुए।

टिन्नी अब सारे खिलौने बहुत ढंग से रखने लगी, हर महीने ढेरों खिलौने लेना भी उसने बंद कर दिया।

कमली, अब टिन्नी के खिलौने देखकर ललचाती नहीं थी, पर अब उसे टिन्नी से बहुत प्यार हो गया था।


Monday, 28 September 2020

Kids story : दीदी

दीदी



कुसुम की दो बेटियां थी, सरला और चंचला। दोनों ही अपने नाम के अनुरूप थीं।

कुसुम लोगों के घरों में घर बर्तन का काम करती थी। उसने सभी बड़े बड़े घरों में काम पकड़ा था।

तो आए दिन, नये से कपड़े और अच्छा अच्छा खाना उसे मिलता रहता था।

कुसुम ऐसे कपड़े ज्यादा लेती थी, जो सरला को आ जाएं, क्योंकि जब वो छोटे होते, तो चंचला के आ जाते थे। इससे होता यह था कि एक बार के एहसान से उसकी दोनों बेटियों के कपड़े हो जाते थे।

पर यह बात चंचला को बिल्कुल नहीं भाती थी। वो नहीं जानती थी कि माँ दूसरे घरों से कपड़े लाती है, वो सोचती माँ, सिर्फ दीदी के लिए नए कपड़े लाती है, मुझे तो हमेशा दीदी के पुराने कपड़े मिलते हैं। वो अपनी दीदी से बहुत चिढ़ती।

जब सरला  16 साल की हो गई, तो उसके मन में इच्छा हुई, वो कुछ ऐसा करें, कि माँ को घर घर काम ना करना पड़े।

उसने पता किया, कि एक पार्लर में 5 हजार का course कराने के बाद वहीं काम करने का मौका भी मिल जाता है।

सरला के सपने बड़े थे, उसने सोचा पार्लर का काम सीख कर वो खुद का पार्लर खोल लेगी।

पर माँ के पास इतने पैसे नहीं थे। तो सरला की माँ ने कहा, कुछ महीने का दिनभर का काम कर लो। पैसे जोड़ लेना, तो अपने सपने भी पूरे कर लेना।

सपना ने दो महीने के लिए काम पकड़ लिया, अब वो घर में नहीं रहती थी।

चंचला इस बात से बहुत खुश थी, अब माँ सब मेरे लिए ही लाएगी।

इधर कुसुम को कपड़े नहीं मिल रहे थे।

दिन गुजरते गये, चंचला की Birthday आने वाली थी, वो माँ से बोली, एक हफ्ते पहले ही बता दें रही हूँ, मुझे नयी frock चाहिए। हमेशा ही दीदी के छोड़े कपड़े पहने हैं, उस दिन नहीं पहन सकती।

माँ ने एक घर से अच्छी सी frock मांग ली। Frock देखकर चंचला बहुत खुश हुई।

वो अपनी birthday वाले दिन, इतराती हुई frock पहन कर उसी appartment में चली गई, जहाँ से माँ वो frock लायी थी।

सारे बच्चों ने उसका बहुत मज़ाक उड़ाया, और कहा, यह तो birthday में भी दूसरों के दिए हुए कपड़े पहनती है।

उसे आज पहली बार पता चला कि दीदी भी कभी नये कपड़े नहीं पहनती थी, उसका दिल टूट गया,वो रोती रोती घर आ गई।

सरला दो महीने बाद, आज वापस आ गई थी। चंचला को रोता देखकर  सरला बोली, माँ जहाँ जहाँ भी काम करती हो, उन सारे बच्चों को बोल देना आज़ हम शाम को चंचला की Birthday करेंगे, सब आ जाएं।

क्या बोल रही हो सरला, वो सब बहुत अमीर हैं, कोई नहीं आएगा। और अगर आ गये, तो हमारी गरीबी का बहुत मज़ाक उड़ाएंगे।

कोई नहीं उड़ाएगा, बस बुला लेना सबको, यह कहकर वो, चंचला को लेकर घर से निकल गई।

2 घंटे बाद दोनों लौटे तो उनके हाथ में बहुत सारे packets थे।

शाम को सारे बच्चे आ गये। चंचला बहुत सुन्दर red frock, red shoes और सब पहनकर बिल्कुल लाल परी लग रही थी।


Party में cake, pizza, burger and cold drink सब थे। सारे बच्चे चंचला और party की बहुत तारीफ करते हुए चले गए। चंचला बहुत खुश थी।

जब सब चले गए, चंचला अपनी dress change करने चली गई।

माँ, सरला से बोल रही थी, बेटा तुमने कितनी मेहनत से पैसे कमाए थे, अपने सपने के लिए, वो सब टूट गए।

सरला बोली, माँ सपने की टूटन से दिल की टूटन ज्यादा चुभती है। आज जो चुभन चंचला को हुई है, वही चुभन मैंने बहुत बार महसूस की है।

सपने के लिए,  मैं कल से फिर चली जाऊंगी, पैसे भी आ जाएंगे। पर मेरी छोटी का दिल आज ही जुड़ना ज़रुरी था।

चंचला, सब अन्दर से सुन रही थी, उसकी दीदी उसे कितना प्यार करती है, उसके लिए उसने अपना सपना तोड़ दिया। 

जबकि चंचला उससे हमेशा चिढ़ती थी,  सरला का उसे छोटी बोलना..... तो उसे बर्दाश्त ही नहीं था।

पर आज उसे अपनी दीदी, माँ से भी ज्यादा अच्छी लग रही थी। वो रोती हुई सरला से चिपक गई।

क्या हुआ छोटी? अब क्यों रो रही है?

दीदी आप बहुत अच्छी हैं, मुझे बहुत प्यार करती हैं, अब मैं कभी किसी बात की जिद्द नहीं करुंगी, आप का सपना जल्दी पूरा होगा। पर मैं अब आप से दूर नहीं रहना चाहती हूँ। आप को अपने काम से हर रविवार की छुट्टी लेनी होगी।

सरला ने कहा, बिल्कुल छोटी। पहले रोना बन्द करो, मैं तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकती।

चंचला बोली, मेरी दीदी सबसे best. फिर दोनों खिलखिलाने लगीं।

Tuesday, 28 July 2020

Kids' Stories ( Advay the hero series- Green friends)


Advay the Hero - Green Friends
 

बहुत दिनों से corona के कारण कहीं बाहर ना निकल पाने से सारे बच्चे परेशान हो गए थे।

सब्र का बांध अब Advay का भी टूटने लगा था।

कितने दिनों से वो सब आपस में नहीं मिले थे, बहुत दिन बीत गए थे उन्हें आपस में मस्ती किए हुए।

अकेले-अकेले, खेल कर वो थक चुके थे और बहुत बोर भी हो चुके थे।

School की online classes की देखा देखी, उन्होंने online मस्ती भी शुरू कर दी थी।

पर साथ में खेलने वाले बच्चों को virtually कब तक मज़ा आता?

तो वो उसमें भी बोर हो गए।

अब उन्हें कुछ नया चाहिए था, जिसे करने के लिए उन्हें बाहर ना जाना पड़े, क्योंकि कोई भी parents इसकी permission नहीं दे रहे थे।

तो वो नया ऐसा चाहिए था, जो घर में ही कर लें, पर उसमें रोज नया surprise हो, जो बच्चों को बांधे भी रखे।

उन्हीं दिनों Advay के school में Sow Good की classes start हो गई।

उसमें Advay को हर रोज नया और surprising element मिल रहा था, तो उसे बहुत मज़ा आ रहा था।

उसने सोचा apartment में भी सारे friends को बता देता हूँ, तो सबको मज़ा आएगा।

उसने सारे friends को call किया, कि मैंने कुछ new friends से friendship की है।

सब उनसे friendship कर लें तो वो सबके घर आ जाएंगे। और parents उन्हें आने से मना नहीं करेंगे, बल्कि सब उन्हें प्यार करेंगे।

और वो हमें corona से बचाने में भी माहिर हैं।

सारे बच्चे surprise हो गये, कौन हैं ऐसे वो?

सब नाम पूछने लगे।

Advay बोला, मेरे Green friends.

Green friends, यह क्या है... ? 

कोई जादू है क्या.....?

हाँ, जादू ही तो हैं वो, हमारे साथ रहेंगे, हर रोज़ नए-नए रूप में आएंगे। हमें corona से बचाएंगे, साथ ही हम उन्हें खा भी सकते हैं।

सुनकर सारे बच्चे बहुत खुश हुए और कहने लगे, हमें भी उनसे दोस्ती करनी है।

Advay ने उन्हें micro-greens  को लगाने का सारा method बता दिया।



सारे friends के घरों में आसानी से मिलने वाले, चना, मेथी, मूंग, धनिया के छोटे छोटे-छोटे पौधे लहलहाने लगे।

सारे बच्चों को रोज़ कुछ नया देखने और करने को मिल रहा था।

Advay ने सारे friends को बोला, हम लोग हर 4 days बाद अपने green friends की pic share करेंगे और हर week online में मिलकर अपना experience share करेंगे।

सारे बच्चों ने ऐसा करना शुरू कर दिया, अब सबके पास बताने को बहुत कुछ था, साथ ही हर समय उनके साथ उनके Green-friends भी थे।



एक बार फिर से पूरे apartment के बच्चों में खुशी की लहर दौड़ गई।

एक बार फिर बच्चों ने corona को अपनी खुशी छीनने से रोक दिया था।

Wednesday, 24 June 2020

Kids Story : वीरा


वीरा


वीरा केवल नाम की वीरा थी, वरना तो कोई छोटा सा puppy भी देख लेती तो mumma mumma करने लग जाती थी। और एक छोटा सा कीड़ा भी उसे अपनी जगह से हिलाने की क्षमता रखता था। इस कदर डरपोक थी, कि अब तो वो शक्ल से भी दब्बू ही लगती थी।

वीरा के माँ-पापा बहुत ही साहसी थे। 

पर वीरा के ऐसा होने से उसकी बुआ, उसकी माँ से हमेशा यही कहा करती थी, भाभी आपने क्या सोच कर इसका नाम वीरा रख दिया, इसका नाम तो भीरु रखना चाहिए। वो हमेशा उसे दब्बू ही कह कर बुलाती थी। 

माँ को बहुत बुरा लगता था। पर क्या करती, जब अपना ही सिक्का खोटा हो।

मेम साहब, हम जा रहे हैं, वीरा दीदी घर वापस आ गयी हैं। कह कर काम वाली चली गयी। 

पर हमेशा की तरह, उस दिन भी जब वीरा स्कूल से घर आई, तो आते से ही उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया था। 

उस दिन माँ की तबीयत ठीक नहीं थी। वे दवा खाकर लेटी थीं, उन्होंने लेटे लेटे ही वीरा से कहा, बेटा तेरा खाना microwave में रखा है। गुड्डा,  गरम करके आज खाना अपने आप ले लेगी, या मैं उठूँ?

नहीं! माँ, मैं ले लूँगी अपने आप। 

स्कूल जाते वक़्त वीरा के पापा ने उसे सख्त हिदायत दी थी, कि “माँ को आराम करने देना। और आज खाना भी अपने आप ले लेना”।

सुन कर कि, वीरा खाना ले लेगी, माँ सो गयी। वीरा भी कपड़े बदलने चली गयी।

तभी कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगीं, वीरा कपड़े बदल कर बाहर आई। 

तो उसने देखा दो अजनबी घर के अंदर घुस आए थे। वीरा की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ था, उसने दरवाज़ा जो नहीं बंद किया था।

उसमें से एक के हाथ में बंदूक और दूसरे के हाथ में चाकू था। उनकी शक्ल से ही साफ साफ समझ आ रहा था, कि वे चोर थे।

उन्हें देख कर वीरा बुरी तरह से घबरा गयी थी। माँ दवाई खा कर सो रहीं थीं, काम वाली जा चुकी थी। पापा के आने में अभी काफी समय था।

वीरा पर बंदूक तानते हुए एक चोर ने पूछा, घर में कौन कौन है?

कोई.... कोई भी नहीं।

वीरा माँ के बारे में नहीं बताना चाह रही थी, क्योंकि माँ बीमार थीं, और दवाई के असर से गहरी नींद में सो भी चुकी थीं। 

अकेली हो....  कह कर चोर हँसने लगे।

अच्छा चल बता, तेरी माँ गहने कहाँ रखती हैं?

जी, उस कमरे के अंदर एक कमरा है, वहीं माँ गहने और पैसे रखती हैं।

बड़ी समझदार लड़की है, सब बता दे रही है, दूसरे चोर ने कहा। 

अंकल मैं खाना खाने जाऊँ? मैं अभी स्कूल से आयीं हूँ ना, मुझे बड़ी भूख लगी है।

वीरा के सब बता देने, और उसके दब्बू चेहरे के कारण, चोर उसकी तरफ से आश्वस्त थे। वे कमरे की तरफ मुड़ गए, और वीरा kitchen की तरफ।

जब वे उस कमरे में पहुंचे, वहाँ बड़ा अंधेरा था, जब वो पलट कर वापस आने लगे तो, उन्होंने पाया कि दरवाज़ा बंद था। 

वो ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा पीटने लगे, पर वीरा ने दरवाज़ा नहीं खोला। उन्होंने अंदर का समान भी तोड़ना- फोड़ना शुरू कर दिया था। पर उसका भी वीरा पर असर नहीं हुआ।

कुछ ही देर में, पुलिस, और वीरा के पापा, घर आ गए थे। चोर पकड़े गए। 

थोड़ी देर में माँ भी उठ गयीं, तो उन्होंने भी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद पाया। वे जब दरवाज़ा knock करने लगीं, तो पापा ने दरवाज़ा खोला।

माँ ने पूछा, दरवाज़ा क्यों बंद किया था?

तब वीरा ने बताया, कि चोर घुस आए थे, आप सो रहीं थीं, आपके पास आवाज़ें न जाएँ, इसलिए आपका दरवाज़ा भी बंद कर दिया था। 

चोरों को store room का गलत पता बता कर, kitchen में जाने का झूठा नाटक करके उन्हें भी बंद कर दिया था। 

फिर पापा को फोन कर दिया था। पापा, पुलिस अंकल को ले आए, और चोर पकड़े गए।

माँ ने पूछा, तुम्हें डर नहीं लगा?

लगा था, माँ! पर आपको कुछ नुकसान ना हो, जब ये सोचा, तो ना जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी। 

माँ और पापा ने उसे बहुत सारा प्यार किया।

 जब बुआ ने सुना, तो वो देखने चलीं आयीं। 

तब वीरा की माँ ने बड़े गर्व से कहा, दीदी ये आपके भैया और मेरी बेटी है, इसलिए इसका नाम वीरा है। 

उसके बाद से वीरा की बुआ ने उसे दब्बू कहना बंद कर दियाऔर वीरा ही कहने लगीं।           


Monday, 1 June 2020

Kids story (Advay the hero series) : Patience

Advay the hero series : Patience




 Lockdown का अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया है।
जिसका क्या अंत है, कोई नहीं जानता है।

सभी का कठिन समय चल रहा है। पर सबसे कठिन समय है, छोटे छोटे बच्चों का।

दिन भर धमाचौकड़ी मचाने वाले, आज घरों में बंद हैं।
आज ना तो पहले से tasty fast food मिल रहें हैं, ना अपने friends.

Advay के apartment में ही निशांत भी रहता था।
कुछ दिन तो उसने चुपचाप निकाल दिए, पर अब उससे सहन नहीं हो रहा था।

वो अपने Mumma- Papa से उद्धम मचाने लगा, कि उसे पिज्जा बर्गर खाना है, पार्क जाकर अपने friends के साथ  खेलना है।

निशांत की Mumma ने Advay की Mumma को phone किया और पूछा क्या करें?

Advay की Mumma बोलीं, कुछ सोच कर बताऊंगी।

Advay की Mumma ने Advay से पूछा, क्या तुम्हें मन नहीं करता कि पार्क जाकर अपने friends के साथ खेलो और पिज्जा बर्गर खाओ?

Advay बोला करता तो है, पर अगर अभी बाहर जाएंगे और बाहर का खाना खाएंगे तो बीमार हो जाएंगे।

तब कुछ दिन ही मस्ती कर पाएंगे, अगर अभी patience रखेंगे तो ज्यादा दिन मस्ती कर पाएंगे।

यह दिन बहुत ज्यादा दिन नहीं चलने वाला, सब जल्दी ठीक हो जाएगा, फिर हम friends के साथ खेलेंगे भी, और खूब मस्ती भी करेंगे।

अभी तो हम phone पर बात कर सकते हैं या कभी-कभी एक दूसरे के साथ online खेल सकते हैं।

अपने बेटे की समझदारी और patience को देखकर Advay की Mumma बहुत खुश हो गई।

अगले दिन वो निशांत की Mumma से बोलीं, मैंने इस topic पर Advay से बात की थी, और मुझे उसका Idea भी अच्छा लगा, कि  उन्हें एक दूसरे से phone पर बात करा सकते हैं, उन्हें net पर एक दूसरे के साथ game खिलवा सकते हैं।

 हम बच्चों को अभी मिलने तो नहीं दे सकते हैं, पर ऐसे उन्हें एक दूसरे का साथ मिल जाएगा।

और सबसे जरुरी, हम बच्चों की पसंद की dishes एक-दूसरे से सीख कर हफ्ते में दो से तीन दिन बना सकते हैं, इससे उनका कठिन समय निकल जाएगा।

उसके बाद से पूरे apartment से tasty dishes की खुशबू आने लगी, और सारे बच्चे दूर दूर होने पर भी खुश रहने लगे।

सबको Advay का Idea बहुत पसंद आया। सब Advay and उसकी Mumma को thank you बोल रहे थे।

पर Advay की Mumma को अपने बेटे के patience और समझदारी पर नाज था।