Thursday, 5 February 2026

Poem : उम्मीद

उम्मीद

हर रोज़ उम्मीदों को,
जुड़ते टूटते देखा है।
हम जो थे अब तक
आशाओं से भरे हुए,
उन आशाओं को 
क्षण-क्षण 
बिखरते देखा है।
जीने की जो इच्छा है,
उसको तिल-तिल 
छूटते देखा है। 
हमने बहुत पास से 
खुद को बदलते देखा है। 
ज़िंदगी गुजार दी 
जिन रिश्तों को संवारने में,
उन्हीं रिश्तों को हर पल 
बदलते हुए देखा है।। 

Wednesday, 4 February 2026

Poem : शोर

शोर 


जब से इन कानों ने,

सुनना बंद किया। 

शोर बहुत धड़कनों

का सुनाई दिया,

सपनों का सुनाई दिया, 

अपनों का सुनाई दिया,

बेइंतहा तन्हाई का

सुनाई दिया।

और बस एक ही 

बात समझ आई,

न किसी से उम्मीद करो,

न किसी को उम्मीद दो,

क्योंकि अपने हिस्से की

लड़ाई खुद लड़नी होती है।

कोई दावे कर ले जितने, 

साथ कोई चला नहीं करता।