Wednesday, 29 July 2026

Poem : हे गुरु, करूँगा मैं इसकी साधना

“गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।

गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥”

इस दोहे के साथ आज सद्गुरु महाराज को श्रद्धा के सुमन अर्पित कर रही हूं।

हे गुरु, करूँगा मैं इसकी साधना


जब मोह-माया में था मैं मस्त,

जीवन था तब अस्त-व्यस्त।

मनुष्य जीवन का नहीं था भान,

किस कारण मिला है? नहीं था ज्ञान। 

सुख, समृद्धि और सफलता,

स्वार्थ सिद्धि और प्रफुल्लता,

इसी को रहा था जीवन मान।

सच्चे उद्देश्य को नहीं रहा था जान।

तभी मिली एक सुदृढ़ छत्रछाया,

जिसने आत्मज्ञान जगाया।

मनुष्य जीवन का बताया मोल,

कहा, होता यह जीवन अनमोल। 

मनुष्य जीवन नहीं होता है खुद को पाना,

होता इसमें आत्मा को ईश्वर से मिलना।

हे गुरु, करूँगा मैं इसकी साधना,

आपसे है बस यही प्रार्थना।

जब तक न मिले हरि द्वार, 

करते रहना प्रेरित हर बार… 


गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर मेरा शत-शत प्रणाम स्वीकार करें 🙏🏻