Tuesday, 11 June 2019

Article : संस्कार


संस्कार


आजकल जब भी news paper उठाएँ, आधा paper crime से ही भरा मिलता है। किसी की चंद रुपयों की खातिर, या बदला लेने के लिए हत्या कर दी गयी, दिन दहाड़े चोरी हो गयी, एक लड़की के साथ बहुत से लोगों ने.....

दिल दहल जाता है, ऐसी घटनाओं को पढ़कर, तो सोचिए जिनके साथ ऐसा होता है, उन पर क्या बीतती होगी?

बहुत सोचा ऐसा क्या है जो बहुत तेज़ी से बदलता जा रहा है? क्यों समाज में इस कदर crime बढ़ता जा रहा है?

बस एक ही जवाब, कौंधा- लुप्त होते संस्कार  
आपको नहीं लगता, भारत में बहुत तेज़ी से संस्कार ही नहीं संस्कार शब्द भी विलुप्त होता जा रहा है?

आज-कल हम संस्कारों को बकवास, old fashion, आदि की संज्ञा देकर उनसे दूर होते जा रहे हैं।

बड़ों के पैर छूना, उनको आदर देना, उनकी सेवा करना।

मेहमान को ईश्वर तुल्य समझ कर, उनके आने पर प्रसन्न होना, उनकी आवभगत करना।  

त्यौहारों में घरों में विभिन्न पकवान बनाना, उत्साह और उमंग से सभी रीति-रिवाज पूर्ण करना।

बच्चों के साथ समय व्यतीत करना, उन्हें सही-गलत की सीख देना

उन्हें अपने सभी काम खुद से करने की सीख देना। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं है, सभी को समान दृष्टि से देखें। 

स्त्रियों का सम्मान करें, उन्हें बुरी दृष्टि से ना देखें।

जो आपका नहीं है, उसका ना तो लालच करें, ना दूसरों से छीने, ना चिढ़े-जलें, ना बदले की भावना रखें, बल्कि मेहनत करके उसे पाने की कोशिश करें।

जो चीज़ अपनी मेहनत से मिलती है, वो हमेशा आपकी रहती है। और मेहनत करके प्राप्त करने से ही सबसे ज्यादा खुशी मिलती है।

असफलता से हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, सतत परिश्रम करने वाले को मंजिल अवश्य मिलती है।

Life short cuts से नहीं चलती है।  

बेईमानी, धोखा, झूठ और चोरी केवल क्षणिक खुशी देते हैं, इसके सहारे ज़िंदगी नहीं कटती है।

क्या आपको भी नहीं लगता? अब ये सब बातें केवल moral science की books तक ही सीमित रह गयी हैं।

ये कितनी बड़ी त्रासदी है, कि जो बातें हमने अपने माँ-पापा से ज़िंदगी में बड़े होते-होते सीख ली थी, आज बच्चों को वही बातें सीखने के लिए moral science subject का सहारा लेना पड़ता है।

पर इन सब का ही नतीजा है, कि देश में, मारकाट, हत्या, चोरी-चकारी, झूठ, बेईमानी, छीना-झपटी, आतंकवाद, लड़कियों के साथ छेड़छाड़, .....  आदि की दरें दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं।

अगर देश का प्रत्येक नागरिक अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे, तो सभी एक दूसरे के बारे में अच्छा ही सोचेंगे, अच्छा ही करेंगे। दूसरों का सम्मान करेंगे, सब से प्रेम करेंगे। मेहनत को सर्वोपरि समझेंगे।

तो आप ही बताइये, क्या ऐसा होने से स्वस्थ और सुरक्षित समाज का गठन नहीं होगा?

सब कुछ मोदी जी, पर मत छोड़िए। कुछ काम हमें भी करने होंगे, क्योंकि वो हमारे द्वारा ही संभव हो सकते हैं। तो सोच क्या रहे हैं?


आइये हम सब शपथ लेते हैं, कि आज से बेटा हो या बेटी दोनों में ही अच्छे संस्कार develop करेंगे। और स्वस्थ समाज को बनाने में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करेंगे। और भारत को भारतीयता के साथ विश्व में प्रथम स्थान पर ले जाएंगे।

जो छोड़ चुके हैं 
चलो फिर से करते हैं 
भारत को फिर से 
पहले सा भारत करते हैं 

Monday, 10 June 2019

Kids Story : Advay the hero : नई कार


Advay the hero : नई कार

पापा को कार लिए हुए 15 साल हो रहे थे, और दिल्ली में ये नियम लागू हो गया था, कि 15 साल बाद कार change करनी होती है।

तो पापा सबसे बोल रहे थे, कि जो कार पसंद हो बता दो तो, वो ही नई कार ले ली जाए। सब लोग laptop में रोज नई कार देखने लगे।

सबके साथ advay भी देखने बैठ जाता था। एक दिन advay खेल के लौटा, तो उसने देखा mumma papa आपस में, नई कार खरीदने के लिए रुपए के arrangement की बात कर रहे थे। तो advay उनके पास चला गया। उसने पापा से कहा, पापा मैंने बहुत सारी कार देखी हैं। कार तो बहुत महंगी होती हैं।

पापा बोले, तुम्हें कैसे पता, कार महंगी होती हैं?

मैंने जब देखी थी ना, तभी उसके price भी देख लिए थे। शुरू से ही advay काफी intelligent और sincere बच्चा था।

Very good, बेटा, पापा ये सुनकर खुश हुए।

हाँ बेटा, कार महंगी तो होती ही है, पापा ने कहा।

Advay बोला- पापा, फिर आप इतने सारे रुपए कहाँ से लाएँगे?

सोचते हैं, मैंने saving करके रखी है, उसी से लेंगे, पापा ने कहा।

Saving क्या होती है, पापा?

जैसे तुम गुल्लक में पैसे रखते हो, वैसे ही मैंने bank में रुपए जमा किए हैं।

अच्छा पापा, रुकिए मैं अभी आता हूँ, कह कर advay दौड़ के चला गया। थोड़ी देर बाद वो अपनी गुल्लक ले आया, और बोला पापा मेरे पास बहुत सारे रुपए इकठ्ठा हो गए हैं।

पूरे 20 thousand हैं, आप ये सारे ले लीजिये, और उनसे नई कार ले आइएगा। तब आपके पैसे कम लगेंगे।

पापा ने mumma से पूछा, इसके पास इतने सारे रुपए कैसे आ गए? 

तब माँ बोलीं, इस साल कुछ ज्यादा ही लोग आए थे, और आपका बेटा सबका लाडला है ना। तो सबने जो जाते समय जो रुपए दिये थे, उन्हीं को ये इकठ्ठा करता रहता है।

पापा को advay की मासूमियत पर बहुत प्यार आ रहा था, और उसकी समझदारी पर बहुत फक्र भी हो रहा था।




Friday, 7 June 2019

Story Of Life : फ़र्ज़ ( भाग - 3)

अब तक आपने पढ़े फ़र्ज़ (भाग - 1) और फ़र्ज़ (भाग - 2)
अब आगे:

फ़र्ज़ ( भाग - 3) 

आप कुछ मत सोचिए डॉक्टर जी, आप बस जल्दी से इलाज शुरू कीजिये, शायद यही नियति है। कहीं देर ना हो जाए.....

ईला तुरंत operation में जुट गयी, उसने रेखा को बचा लिया। 

फिर वो bone marrow transplant की preparation करने लगी। एक हफ्ते बाद bone marrow transplant का भी operation था। operation वाले दिन ईला से अखिल मिलने आया, और बोला, हमे पूरा विश्वास है कि, आप दोनों का बचा लेंगी, बस आप हिम्मत मत हारना। आज आपको अपने दोनों फ़र्ज़ में जीतना है।

ऐसी बात सुनकर ईला नए जोश से दोनों को बचाने के लिए operation theater में चली गयी। ईला की मेहनत रंग लायी, operation successful रहा। दोनों ही सुरक्षित थे।

ईला ने आकर अखिल को बताया, operation successful रहा, दोनों ही सुरक्षित हैं, ये केवल आपके कारण संभव हो सका। 

अखिल बोला, आप बहुत अच्छी डॉक्टर हैं, इसलिए ही दोनों बच्चे सुरक्षित हैं।

ईला बोली, अगर आप बुरा ना मानें, तो क्या मैं रेखा को गोद ले लूँ। आज वो ना होती तो, मेरा बेटा मुझसे हमेशा के लिए दूर हो जाता। आपका बोझ भी कम हो जाएगा, मैं आपको बहुत सारे रुपए भी दूँगी।

नहीं, मुझे कुछ भी रुपए नहीं चाहिए। मुझे अपनी रेखा बहुत प्रिय है, मैं आपको उसे नहीं दे पाऊँगा।

पर तब तो आप, अपनी बीवी और मुझसे कह रहे थे, कि .....

ईला की बात बीच में काटते हुए अखिल बोला, बेटियाँ बाप पर कभी बोझ नहीं होती हैं। वो तो रेखा की हालत बहुत खराब थी, उसके ना बचने से रेखा की माँ को बहुत दुख ना हो, इसलिए उससे ऐसा बोला था।

और आप से इसलिए कहा था, कि आपके मन में बोझ नहीं होगा, तो आप ज्यादा अच्छे से operation कर पाएँगी, आपका हाथ नही काँपेगा।

अखिल की बातें ईला के दिल को छू गईं, वो उनके सामने नतमस्तक हो गयी, उसने अखिल को बहुत सारा धन्यवाद दिया, और साथ ही अखिल के बहुत मना करने के बावजूद उन्हें ये कह कर बहुत सारे रुपए दे दिये, कि आपकी वजह से ही मैं अपने माँ और डॉक्टर दोनों के फ़र्ज़ निभा सकी हूँ। आप मुझे रेखा को गोद मत दीजिये, पर उसका खर्चा उठाने में सहयोगी तो बना रहने दीजिये।  

आज ईला बहुत खुश थी, उसने अपने दोनों फ़र्ज़ बहुत अच्छे से निभाये थे।