Wednesday, 2 September 2020

Poem : काक आज तुम, कुछ बोलो,

काक आज तुम, कुछ बोलो



 काक आज तुम, कुछ बोलो,

आँगन में मेरे आकर डोलो।

तुम्हारे पास होगी उनकी पाती,

जिनकी है, हमको याद सताती।।


जो कभी थे, साथ हमारे,

अब नहीं वो पास हमारे।

संपर्क ना सध रहा है,

जब से वो, परलोक सिधारे।।


क्या कहते हैं, वो हम से,

हम को यह बतलाओ ना।

हे काक, हमारी भी पाती,

पास उनके ले जाओ ना।।


आज भी एक एक अक्षर,

उनका हम नहीं भूले हैं।

जिनके कंधों चढ़ खेले,

और बाहों में झूले हैं।।


काश, काल ना,

इतना निष्ठुर होता।

स्वर्णिम स्वप्न हमारा,

ऐसे ना बिखरा होता।।


अब तो काक, तुमसे ही,

अपनी व्यथा बताते हैं।

उनके विरह में आज भी,

नैन, अश्रुपूरित हो जाते हैं।।


काक आज, तुम कुछ बोलो,

आँगन में मेरे आकर डोलो।।

तुम्हारे पास होगी उनकी पाती,

जिनकी है, हमको याद सताती।।


आज से पितृपक्ष आरम्भ हो गया है। यद्यपि सब दिन ही आपकी याद में जातें हैं, हम पर आप, अपना नेह और आशीर्वाद बरसाते हैं।

तथापि यह 15 दिन आप को ही समर्पित, आप सभी पूर्वजों को शत् शत् नमन 🙏🏻🕉️


Tuesday, 1 September 2020

Short Stories : वो गाँव

आज अपने blog के सारे पाठकों को धन्यवाद देने की बहुत इच्छा हुई।

आप कहेंगे, ऐसा भी क्या हो गया?

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL)  द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कहानी लेखन प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, जिसमें भारत के सभी नागरिक भाग ले सकते थे।

उसका विषय था " लोगों के जीवन में खुशहाली लाता सेल " और  शब्द सीमा थी - 800 शब्द ।  

आप लोगों के द्वारा मिलने वाले निरन्तर प्रोत्साहन व आशीर्वाद से मेरी कहानी को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है।

एक बार पुनः आप सबका धन्यवाद 🙏

Thanks all of you, 

It became possible , only because of your appreciation and blessings🙏🏻😊


बस यूं ही जुड़े रहिएगा

साथ आप सब का हो, 

तब ही सफर ए मंजिल

सुहाना लगता है😊🙏🏻


वो गाँव


मेरी सेल में नयी नौकरी लगी थी, एक दिन मुझे पता चला कि हमें कुछ कपड़े और खाने-पीने का सामान बाँटने रविवार को कहीं जाना है। मैंने सोचा- ये भी होता है यहाँ पर! एक दिन तो मिला था छुट्टी का.... वो भी गया। पर कर क्या सकते थे?

हम जब वहाँ जा रहे थे, तो वहाँ कोई पक्की सड़क तो छोड़ दीजिये, पगडंडी भी नहीं बनी थी। जैसे-तैसे हम वहाँ पहुंचे। वो एक आदिवासी गाँव था। गाँव क्या- जंगल ही था।

लोगों का पहनावा, बोली, खान-पान कुछ भी तो हम सा नहीं था। आज भी वो भूख मिटाने के लिए  शिकार करते थे। वो अलग बात थी, कि उनका शिकार करने का अजब अंदाज़ था। वो बहुत फुर्तीले थे और उनका निशाना बहुत ही सटीक था।

गाँव में गंदगी, भूख, लाचारी, बीमारी दिख रही थी। स्कूल, अस्पताल का तो दूर-दूर, तक कहीं कोई नाम नहीं था।

हम सब सामान बाँट कर वापस आ गए। ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।

पाँच साल बाद मुझे मेरे बॉस ने बुलाया, और कहा- तुम पाँच साल पहले जिस गाँव में गए थे, आज वहीं तुम्हें जाना है। फिर मुझे एक तस्वीर और एक नई मोटरसाइकिल की चाभी दी, और बताया, कि इस लड़के को तुम्हें कंपनी की तरफ से, यह मोटरसाइकिल देकर आनी है।

मन तो किया बोल दूँ, आज ज़माना इतना आगे बढ़ गया है, तो मुझे जाने की क्या जरूरत है? ऑनलाइन डिलिवरी करवा दें। 

फिर चुप रह गया, कि उस पिछड़े गाँव में कहाँ होगा ये संभव। 

शायद बॉस मेरे मन की बात भाँप गए थे। वो बोले ऊपर से आदेश है, स्वयं जाकर देनी होगी।  

फिर से उस गाँव में जाना है, सोचकर ही मन खराब हो गया। तब तो मैं अकेला था, पर इस रविवार को जाना मुझे और खल रहा था। रविवार का दिन मैं अपने परिवार के साथ बिताना पसंद करता था। पर मन मारकर मुझे जाना ही पड़ा।

जब गाँव के नज़दीक पहुँचने लगा, तो पाया कि चौड़ी सड़क बन चुकी थी। गाँव भी साफ-सुथरा व्यवस्थित लग रहा था, टूटे-फूटे घर की जगह पक्के घर दिख रहे थे। खेत, दुकानें, अस्पताल, स्कूल सब ही तो बन गया था। एक बार को लगा, कि कहीं गलत गाँव में तो नहीं आ गया हूँ.......। 

सोचा किस से बात करूँ?....... भाषा भी तो नहीं समझ आएगी इनकी।

तभी वो लड़का दिख गया, जिसे मैं मोटरसाइकिल देने आया था। मैं सीधे उसी के पास पहुँच गया।

मैंने उससे कहा, मैं सेल से आया हूँ, तुम्हें मोटरसाइकिल देने।

वो लड़का मेरे ये बोलते ही, मेरे पैरों पर नतमस्तक हो गया। और कितना एहसान करेंगे आप लोग, हम गाँव वालों पर?

मुझे इस व्यहवार की एकदम उम्मीद नहीं थी, मैं विस्मित रह गया। आखिर ऐसा भी क्या हुआ है? जो ये ऐसे कह रहा है।

मैंने उसे उठाया, और पूछा, हमने ऐसा भी क्या किया?

वो बोला, आपको शायद याद ना हो, आप पाँच साल पहले भी यहाँ आए थे।

मुझे अच्छे से याद है, मैंने कहा।

बोला सर, फिर आप से क्या छुपा है, आपकी सेल बहुत ही भली है। उसने हमारे गाँव को गोद ले लिया है। उसका ही नतीजा है कि, हमारे गाँव की तो पूरी काया ही पलट गयी।

जहाँ कभी भुखमरी, बीमारी, लाचारी थी। आज वहाँ स्वछ्ता, स्वास्थ्य और सफलता है। भूख आज भी यहाँ है, पर आगे बढ़ने की, सफल होने की।

आज हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं, बीमारियों का भी उचित इलाज हो रहा है।

और सब से बड़ी बात, हम जिसमें निपुण थे, उसमें सही मार्गदर्शन देकर हमें सफलता प्रदान कराई जा रही है।

आपको पता है, आप मुझे मोटरसाइकिल देने क्यों आए हैं?

मैं तो मंत्रमुग्ध सा उसकी बात सुन रहा था। मैंने नहीं में सर हिला दिया।

मुझे राज्य स्तर में तीरंदाज़ी में प्रथम स्थान मिला है। मैं और आगे बढ़ूँ, देश का नाम रोशन करूँ, इसके लिए मुझे मोटरसाइकिल देकर प्रोत्साहित किया जा रहा है। धन्य है सेल

कुछ ही देर में गाँव के अन्य सदस्य भी आ गए, मेरी बहुत खातिरदारी हुई। मुझे वो लड़का बाहर मेन-रोड तक छोड़ गया, वहाँ से मुझे बस से वापस लौटना था।

लौट तो मैं रहा था, पर मन वहीं था। आज वो गाँव मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था कि मैं कितनी अच्छी कंपनी में काम कर रहा हूँ। जहाँ आज सारी कंपनियाँ केवल अपने मुनाफे के बारे में सोच रहीं हैं, वहीं हमारी कंपनी ना केवल अपना कार्य सुचारु रूप से कर रही है, अपितु वो अपने आस-पास के इलाकों, गाँवों का सर्वांगीण विकास करती है। सिर्फ उनके जीवन में खुशहाली ही नहीं ला रही है, उनका भविष्य भी स्वर्णिम कर रही है। गाँवों का विकास देश का विकास है। सही मायनों में आज हमारे देश को सेल जैसी कंपनियों की आवश्यकता है, जो पूरे देश में खुशहाली लाने की क्षमता रखती हों।

सच में- धन्य है हमारी सेल। आज मुझे इसका अंश होने पर गर्व है।

Monday, 31 August 2020

Short Stories : अन्नपूर्णा वाले डॉक्टर बाबू

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL)  द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कहानी लेखन प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, जिसमें भारत के सभी नागरिक भाग ले सकते थे।

उसका विषय था " लोगों के जीवन में खुशहाली लाता सेल " और  शब्द सीमा थी - 800 शब्द ।  

आज मुझे गाज़ियाबाद के श्री अभयेश्वर सहाय जी की कहानी को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

इनकी कहानी ने प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त किया है। 


अन्नपूर्णा वाले डॉक्टर बाबू



किशन घर लौटा तो, उसकी पत्नी रज्जो दुखी बैठी थी।

क्या हुआ रज्जो? आज तेरा फिर मुँह लटका हुआ है। फिर से गाँव की याद आ रही है? या फिर राधा के ससुराल वाले कुछ माँग रहे हैं? राधा की शादी क्या की, हमारा तो गाँव ही छूट गया, सब तो उसकी शादी की भेंट चढ़ गया। फिर भी मुँह ना बंद हुआ राधा की सास का।

अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। राधा का फोन आया था, तुम्हारे नाती सरजू के पैर में लोहे की सरिया घुस गयी थी। घाव हो गया है, गाँव का डॉक्टर पाँव काटने की बात कर रहा है।

हे भगवान! ये कैसे हुआ? ये सरजू भी ना हद का बदमाश है, एक जगह टिक कर बैठ ही नहीं सकता है।

अरे! बच्चे शरारत नहीं करेंगे तो क्या, हम तुम करेंगे? गाँव के और बच्चों के साथ खेल रहा था, उसी में लग गयी।

तो तू क्या सोच रही है? क्या करना चाह रही है? मुझसे पैसे रुपए की उम्मीद ना करना।

हाँ जानती हूँ, हम दोनों मिलकर भी इतना नहीं कमा रहे हैं, कि हमें पूरा पड़े, फिर रुपए पैसे की उम्मीद क्या करूंगी?

वही तो.......  फिर तू सोच क्या रही है, वो बताएगी?

सोच रही हूँ, कुछ दिन के लिए राधा को यहाँ बुलवा लूँ। एक ही तो नाती है अपना, उसका भी पैर कट जाएगा, सोच कर ही कलेजा मुँह को आ रहा है।

सुनकर तो मेरा मन भी, भीतर तक काँप गया था। पर कर क्या सकते हैं? यहाँ बुलवा लेने से क्या हल निकलेगा? कौन किसी डॉक्टर को जानते हैं।

जब राधा का फोन आया था, उस समय अपनी पड़ोसन नन्दा भी यहीं थी। वो बता रही थी, अन्नपूर्णा में बड़े अच्छे डॉक्टर बैठते हैं। कह रही थी, उन्हें दिखवा दूँ।

दिल्ली में डॉक्टर तो कई हैं, पर अपने पास पैसा भी तो होना चाहिए।

अरे मेरी पूरी बात तो सुन लो, वो मुफ़्त में देख लेंगे।

बड़ी आई! मुफ़्त में देख लेंगे!

अरे, वो सेल कंपनी वालों का अपार्टमेंट है। नन्दा बता रही थी, कंपनी हम गरीब लोगों को देखने के लिए ही डॉक्टर साहब को वहाँ बुलाती है, और हमारी फीस के पैसे कंपनी देती है।  

कंपनी देती है? तब तो डॉक्टर भी ऐसे ही होंगे।

अरे नहीं, बोल रही थी, बड़े अच्छे डॉक्टर हैं, बहुत भीड़ रहती है। नंबर लगाना पड़ता है।

तो वहीं काम करने वालों के परिवार वालों को देखते होंगे। तूने वहाँ काम पकड़ लिया है?

अरे नहीं। वो बोल रही थी, ऐसा नहीं है, कि जो वहाँ रहते हैं, या वहाँ काम करते हैं, सिर्फ उनको ही देखते हैं। नन्दा बता रही थी, सेल बड़ी भली कंपनी है, सारे गरीबों को देखने के लिए डॉक्टर आते हैं।  फिर वो चाहे कहीं भी रहता हो, कहीं भी काम करता हो।

अच्छा चल दिखा तो तू लेगी, फिर दवा का क्या होगा? वो कौन सी सस्ती आती है।

वो भी सेल देती है।

अच्छा अगर ऐसा है, तो कहना पड़ेगा, आज भी गरीबों के जीवन की खुशहाली के लिए कोई सोच रहा है। फिर मैं ऐसा करता हूँ, आज ही चला जाता हूँ।

उसकी  सास का कोई भरोसा नहीं है, कब तक उसे आने दे। देर हो गयी, तो डॉक्टर साहब भी ठीक ना कर पाएंगे।

किशन अगले दिन सुबह ही राधा को लेकर आ गया।

राधा के आते ही रज्जो अपने सारे काम छोड़कर राधा और सरजू के साथ अन्नपूर्णा भागी, क्योंकि वह डॉक्टर साहब 12 बजे तक ही बैठते थे।

जब वो लोग वहाँ पहुँचे, पहले से ही बहुत सारे गरीब लोगों की वहाँ भीड़ लगी थी। रज्जो अपने से आगे लगे लोगों से पूछने लगी, कैसे डॉक्टर हैं? सब यही कहने लगे, भगवान हैं,  डॉक्टर साहब।

कुछ देर में रज्जो का नंबर आ गया, उसने जैसा सुना था, डॉक्टर साहब वैसे ही निकले। राधा तो उन्हें देखकर रोने ही लगी, डॉक्टर साहब हमारे बच्चे को बचा लीजिये। बड़ी दूर से आए हैं, गाँव में तो डॉक्टर बोल दिया था, पाँव काट देंगे। डॉक्टर साहब ने पहले राधा को चुप कराया, फिर सरजू के पाँव को ठीक से देखा। देखकर बोले 1 महीना लग जाएगा ठीक होने में।

डॉक्टर साहब पाँव तो नहीं कटेगा, डरते डरते रज्जो बोली। नहीं, नहीं कटेगा। दवा से ही ठीक हो जाएगा। ये सुनकर रज्जो और राधा के जान में जान आई। आपको सारी दवा भी मिल जाएगी, बस सब कुछ समय से देते रहना।

डॉक्टर साहब की दवा ने जादू सा काम किया। सरजू सचमुच पूरा ठीक हो गया। उसके ठीक होने से सारा परिवार खुशी से नाच रहा था । कोई भी पूछता ये चमत्कार कैसे हुआ? तो वे बड़े खुश होकर बोलते, हमारी ज़िंदगी में खुशहली लाने का सारा श्रेय सेल का है। आज सेल के कारण पूरा भोवापुर गाँव खुश है, उसने हमें इतने अच्छे डॉक्टर जो दिये हैं- अन्नपूर्णा वाले डॉक्टर बाबू।