Thursday, 3 September 2020

Stories of Life : कौआ बनने से बचा लिया

 आज आप सब के साथ मुझे भोपाल के श्रेष्ठ  कहानीकार मेज़र नितिन तिवारी जी की कहानी को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

हम सोचते हैं कि हमारे भारतीय सैनिक, सिर्फ सरहद पर युद्ध करना बखूबी जानते हैं, और यह बहुत सख्त स्वभाव के होते हैं। 

पर हमारे भारतीय सैनानी भी हम सा ही दिल और हम जैसी ही योग्यता भी रखते हैं।

 नितिन जी की लेखनी ने सिद्ध कर दिया है कि वो जितनी वीरता से सरहद पर युद्ध लड़ते हैं, उतने ही बखूबी लेखनी भी चला सकते हैं।

आज कल पितृपक्ष चल रहा है, और नितिन जी ने अपनी यादों को कहानी के जरिए बखूबी प्रदर्शित किया है। आप सभी कहानी का आनन्द लीजिए।


🌟सत्य घटना 🌟

कौआ बनने से बचा लिया 

😢😢



जैसा कि हम सभी को विदित है कि,वर्तमान समय श्राद्ध पक्ष या सरल शब्दों में कहें तो कडवे दिन का चल रहा है। आज अचानक मुझे न जाने क्यों उसकी छवि मेरी आँखों के सामने आकर व उसके द्वारा कहे कथनों ने मेरी आँखों को नम कर दिया।और न चाहते हुए भी मेरी आँखों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी।जिसको देखकर मेरे तमाम साथियों ने जो कि उस समय हम सभी अपने कार्यलय में बैठे अपना अपना कार्य कर रहे थे। उन्होंने मेरा हाल देखकर सभी सहकर्मी हतप्रभ रह गये ,व कारण जानने की कोशिश करने लगे की अचानक तिवारी जी को हो क्या गया?


मैंने अपने आप को नोर्मल करते हुए बताया कि, यार उक्त घटना जो कि न तो काल्पनिक हैं,और न ही किसी अन्य पात्रों के ऊपर घटित है। यह हादसा मेरे व मेरे लंगोटिया यार के साथ सन् 2016 में सितम्बर माह में हुआ।


मै जब अपनी छ:वर्ष की आयु में बीना से भोपाल शिफ्ट हुआ तो सबसे पहले मेरी माँ एंव मामाजी ने माँ के कार्यलय के नजदीक लगभग दो कि.मी.की दूरी पर उसका ही घर जो कि दो मंजिला का था। जिसमें उसके माता पिता और वो नीचे रहते थे और ऊपर वाले हिस्से को किराये पर दे देते थे। तो माँ ने उस ऊपर वाले हिस्से को किराये से ले लिया,और हम सब उसी में रहने लगे।


समय के पहिये के साथ हम सभी घूमते हुए, न जाने कब एक दूसरे के इतने करीब आ गये कि, उठने~बैठने सोने,खाने, पढने लिखने, खेलने~कूदने इत्यादि समस्त कार्य हम दोनों के एक साथ व एक जैसे ही होते थे और सबसे बढ़िया बात ये रही कि उसके माता पिता और मेरी माँ एवं मामाजी का सपोर्ट हम दोनों के ऊपर बराबर का होता था।चूंकि हम दोनों हम उम्र के थे। तो एक साथ एक ही स्कूल में, व एक ही कक्षा में और एक ही सेक्सन में कक्षा पहली से बारवीं तक रहें।और तो और कालेज मे भी तीन साल तक साथ रहें।


वो मेरे जीवन का शायद पहला और आखरी शख्स ही था। जिसको स्कूल में ध्रुव के नाम से और घर में शेंकी के नाम से जानते थे। हम दोनों की एक दाँत काटी रोटी थी। यदि किसी दूसरे से लडना तो साथ लडना,जो भी करना तो साथ ही करना अब चाहे वो उचित कार्य हो या अनुचित कार्य हो, किंतु कुछ भी व कैसा भी कार्य करके हम दोनों की खासियत यह थी कि बाद में घर वालो के द्वारा मिलने वाले फल(कुटाई) की चिंता न वो करता था और न ही मै। यदि घर वाले चाहे मेरे हों या उसके कूटते थे तो दोनों को ही, और यदि शाबाशी मिलती तो भी दोनों को ही।और शाबाशी के रूप में हम दोनों को टीबी मे विडियो गेम एक घंटे खेलने की खुली आजादी मिल जाया करती थी चूंकि हम दोनों का फेवरेट मारियो गेम था। 😁😁😁


समय का पहिया चलते चलते अब शायद कुछ लडखडाने की कगार तक आ पहुँचा था ,शायद हम लोगों की किस्मत में यही तक का साथ था। समय के साथ बढे हुए ,अब हम दोनों की चुनौती अपने अपने पैरों पर खड़े होने की थी। तो हम दोनों ने सोचा कि नौकरी भी हम लोगो की ऐसी लगे कि साथ ही रहें।


 पर हम जो सोचते हैं, अक्सर ऐसा बहुत ही कम होता है। या होता ही नहीं है। 


हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। कालेज में टेलीकॉम कंपनी का केम्पस आया,और उसको चयनित कर लिया गया और मुझे वेटिंग मे डाल दिया गया। जिसके कारण मुझे और उसको एक दूसरे से न चाहते हुए भी दूर होना पड़ा, फिर भी मैंने और उसने हिम्मत न हारी, और हरसंभव अपनी प्लानिंग के अनुसार रेल्वे मे,और अनेक प्रकार की राज्यस्तरीय शासन  की सेवा के लिए दोनों साथ में फार्म डालते रहे। किंतु परिणाम हमारे पक्ष में न निकल सका। फिर अचानक बिलासपुर में भारतीय सेना मे हम दोनों ने एक साथ भर्ती देखी कुछ हद तक हम दोनों साथ रहे किंतु विधाता ने हम लोगो की किस्मत में कुछ और ही लिखा था सो कुछ न हुआ।और उसको मेडिकल में अनफिट कर दिया गया।और मुझे भारतीय सेना मे, सी.टी./डी.वी.आर. के पद पर चयनित कर लिया गया। जिसके कारण मुझे दु:ख ज्यादा और हर्ष बहुत कम हुआ । किंतु समय की धारा के साथ हम दोनों ने बहते हुए अपने अपने प्रोफेशन को ऊपर वाले की मर्जी मानकर चुन लिया।😔


समय का चक्र चलता रहा, न चाहते हुए भी हम एक दूसरे से दूर हो गये।उपर वाला भी हम दोनों के कढ़े इम्तिहान लेता रहा जब कभी मेरा छुट्टी पर घर आना होता तो वो न आ पाता,और जब वो आता तो मै न आ पाता। इस तरह कई वर्षों तक हम लोगों का मिलना न हो सका। अब हद तो तब और हो गई, जब वो मेरी शादी में सम्मिलित न हो सका।


 किंतु कहते हैं कि ऊपर वाला निर्दयी नहीं बल्कि दयालु होता है। उसने हम दोनों का स्थानांतरण सन् 2014 में मेरा/2015मे उसका , भोपाल में कर दिया। और हम दोनों फिर एक बार मिल गये।चूंकि अब हम लोगो का मिलना पहले की तरह ना हो पाता था,क्योंकि एक तो आर्मी की नौकरी ही ऐसी कि, जो जितना भी थोडा बहुत समय मिलता तो घर की, अपनी माँ एंव श्रीमति जी कि भी जिम्मेदारी रहती चूंकि उनके पैर भारी हो चुके थे,तो बमुश्किल ही यदा कदा मेरा व उसका मिलना हो पाता था। लेकिन जब भी हम लोगो को मौका मिलता तो चाहे 10मिनिट के लिए ही क्यों न मिले पर मिलते जरूर थे।


ऐसे ही एक रोज मै बारिश के चलते अपने घर से आर्मी कैंम्प (अपने आफिस) कार से गया और शाम को वापस आते वक्त उसका फोन आया कि मै तेरा एम पी नगर में वेट कर रहा हूँ कब तक पहुँच रहा है तू.......

आगे पढ़ें, कौआ बनने से बचा लिया (भाग -2).......


Disclaimer:

इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Wednesday, 2 September 2020

Poem : काक आज तुम, कुछ बोलो,

काक आज तुम, कुछ बोलो



 काक आज तुम, कुछ बोलो,

आँगन में मेरे आकर डोलो।

तुम्हारे पास होगी उनकी पाती,

जिनकी है, हमको याद सताती।।


जो कभी थे, साथ हमारे,

अब नहीं वो पास हमारे।

संपर्क ना सध रहा है,

जब से वो, परलोक सिधारे।।


क्या कहते हैं, वो हम से,

हम को यह बतलाओ ना।

हे काक, हमारी भी पाती,

पास उनके ले जाओ ना।।


आज भी एक एक अक्षर,

उनका हम नहीं भूले हैं।

जिनके कंधों चढ़ खेले,

और बाहों में झूले हैं।।


काश, काल ना,

इतना निष्ठुर होता।

स्वर्णिम स्वप्न हमारा,

ऐसे ना बिखरा होता।।


अब तो काक, तुमसे ही,

अपनी व्यथा बताते हैं।

उनके विरह में आज भी,

नैन, अश्रुपूरित हो जाते हैं।।


काक आज, तुम कुछ बोलो,

आँगन में मेरे आकर डोलो।।

तुम्हारे पास होगी उनकी पाती,

जिनकी है, हमको याद सताती।।


आज से पितृपक्ष आरम्भ हो गया है। यद्यपि सब दिन ही आपकी याद में जातें हैं, हम पर आप, अपना नेह और आशीर्वाद बरसाते हैं।

तथापि यह 15 दिन आप को ही समर्पित, आप सभी पूर्वजों को शत् शत् नमन 🙏🏻🕉️


Tuesday, 1 September 2020

Short Stories : वो गाँव

आज अपने blog के सारे पाठकों को धन्यवाद देने की बहुत इच्छा हुई।

आप कहेंगे, ऐसा भी क्या हो गया?

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL)  द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कहानी लेखन प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, जिसमें भारत के सभी नागरिक भाग ले सकते थे।

उसका विषय था " लोगों के जीवन में खुशहाली लाता सेल " और  शब्द सीमा थी - 800 शब्द ।  

आप लोगों के द्वारा मिलने वाले निरन्तर प्रोत्साहन व आशीर्वाद से मेरी कहानी को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है।

एक बार पुनः आप सबका धन्यवाद 🙏

Thanks all of you, 

It became possible , only because of your appreciation and blessings🙏🏻😊


बस यूं ही जुड़े रहिएगा

साथ आप सब का हो, 

तब ही सफर ए मंजिल

सुहाना लगता है😊🙏🏻


वो गाँव


मेरी सेल में नयी नौकरी लगी थी, एक दिन मुझे पता चला कि हमें कुछ कपड़े और खाने-पीने का सामान बाँटने रविवार को कहीं जाना है। मैंने सोचा- ये भी होता है यहाँ पर! एक दिन तो मिला था छुट्टी का.... वो भी गया। पर कर क्या सकते थे?

हम जब वहाँ जा रहे थे, तो वहाँ कोई पक्की सड़क तो छोड़ दीजिये, पगडंडी भी नहीं बनी थी। जैसे-तैसे हम वहाँ पहुंचे। वो एक आदिवासी गाँव था। गाँव क्या- जंगल ही था।

लोगों का पहनावा, बोली, खान-पान कुछ भी तो हम सा नहीं था। आज भी वो भूख मिटाने के लिए  शिकार करते थे। वो अलग बात थी, कि उनका शिकार करने का अजब अंदाज़ था। वो बहुत फुर्तीले थे और उनका निशाना बहुत ही सटीक था।

गाँव में गंदगी, भूख, लाचारी, बीमारी दिख रही थी। स्कूल, अस्पताल का तो दूर-दूर, तक कहीं कोई नाम नहीं था।

हम सब सामान बाँट कर वापस आ गए। ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।

पाँच साल बाद मुझे मेरे बॉस ने बुलाया, और कहा- तुम पाँच साल पहले जिस गाँव में गए थे, आज वहीं तुम्हें जाना है। फिर मुझे एक तस्वीर और एक नई मोटरसाइकिल की चाभी दी, और बताया, कि इस लड़के को तुम्हें कंपनी की तरफ से, यह मोटरसाइकिल देकर आनी है।

मन तो किया बोल दूँ, आज ज़माना इतना आगे बढ़ गया है, तो मुझे जाने की क्या जरूरत है? ऑनलाइन डिलिवरी करवा दें। 

फिर चुप रह गया, कि उस पिछड़े गाँव में कहाँ होगा ये संभव। 

शायद बॉस मेरे मन की बात भाँप गए थे। वो बोले ऊपर से आदेश है, स्वयं जाकर देनी होगी।  

फिर से उस गाँव में जाना है, सोचकर ही मन खराब हो गया। तब तो मैं अकेला था, पर इस रविवार को जाना मुझे और खल रहा था। रविवार का दिन मैं अपने परिवार के साथ बिताना पसंद करता था। पर मन मारकर मुझे जाना ही पड़ा।

जब गाँव के नज़दीक पहुँचने लगा, तो पाया कि चौड़ी सड़क बन चुकी थी। गाँव भी साफ-सुथरा व्यवस्थित लग रहा था, टूटे-फूटे घर की जगह पक्के घर दिख रहे थे। खेत, दुकानें, अस्पताल, स्कूल सब ही तो बन गया था। एक बार को लगा, कि कहीं गलत गाँव में तो नहीं आ गया हूँ.......। 

सोचा किस से बात करूँ?....... भाषा भी तो नहीं समझ आएगी इनकी।

तभी वो लड़का दिख गया, जिसे मैं मोटरसाइकिल देने आया था। मैं सीधे उसी के पास पहुँच गया।

मैंने उससे कहा, मैं सेल से आया हूँ, तुम्हें मोटरसाइकिल देने।

वो लड़का मेरे ये बोलते ही, मेरे पैरों पर नतमस्तक हो गया। और कितना एहसान करेंगे आप लोग, हम गाँव वालों पर?

मुझे इस व्यहवार की एकदम उम्मीद नहीं थी, मैं विस्मित रह गया। आखिर ऐसा भी क्या हुआ है? जो ये ऐसे कह रहा है।

मैंने उसे उठाया, और पूछा, हमने ऐसा भी क्या किया?

वो बोला, आपको शायद याद ना हो, आप पाँच साल पहले भी यहाँ आए थे।

मुझे अच्छे से याद है, मैंने कहा।

बोला सर, फिर आप से क्या छुपा है, आपकी सेल बहुत ही भली है। उसने हमारे गाँव को गोद ले लिया है। उसका ही नतीजा है कि, हमारे गाँव की तो पूरी काया ही पलट गयी।

जहाँ कभी भुखमरी, बीमारी, लाचारी थी। आज वहाँ स्वछ्ता, स्वास्थ्य और सफलता है। भूख आज भी यहाँ है, पर आगे बढ़ने की, सफल होने की।

आज हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं, बीमारियों का भी उचित इलाज हो रहा है।

और सब से बड़ी बात, हम जिसमें निपुण थे, उसमें सही मार्गदर्शन देकर हमें सफलता प्रदान कराई जा रही है।

आपको पता है, आप मुझे मोटरसाइकिल देने क्यों आए हैं?

मैं तो मंत्रमुग्ध सा उसकी बात सुन रहा था। मैंने नहीं में सर हिला दिया।

मुझे राज्य स्तर में तीरंदाज़ी में प्रथम स्थान मिला है। मैं और आगे बढ़ूँ, देश का नाम रोशन करूँ, इसके लिए मुझे मोटरसाइकिल देकर प्रोत्साहित किया जा रहा है। धन्य है सेल

कुछ ही देर में गाँव के अन्य सदस्य भी आ गए, मेरी बहुत खातिरदारी हुई। मुझे वो लड़का बाहर मेन-रोड तक छोड़ गया, वहाँ से मुझे बस से वापस लौटना था।

लौट तो मैं रहा था, पर मन वहीं था। आज वो गाँव मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था कि मैं कितनी अच्छी कंपनी में काम कर रहा हूँ। जहाँ आज सारी कंपनियाँ केवल अपने मुनाफे के बारे में सोच रहीं हैं, वहीं हमारी कंपनी ना केवल अपना कार्य सुचारु रूप से कर रही है, अपितु वो अपने आस-पास के इलाकों, गाँवों का सर्वांगीण विकास करती है। सिर्फ उनके जीवन में खुशहाली ही नहीं ला रही है, उनका भविष्य भी स्वर्णिम कर रही है। गाँवों का विकास देश का विकास है। सही मायनों में आज हमारे देश को सेल जैसी कंपनियों की आवश्यकता है, जो पूरे देश में खुशहाली लाने की क्षमता रखती हों।

सच में- धन्य है हमारी सेल। आज मुझे इसका अंश होने पर गर्व है।