बहुमूल्य बूंदें
सूरज की तपती किरणों से,
सूख हो रही धरा विकल।
दूर-दूर तक नहीं दिख रहा,
प्यास बुझाने को अब जल।।
सूख रहे हैं विटप सारे,
पशु-पक्षी त्राहिमाम पुकारे।
बंजर होती यह भूमि,
हरी-भरी हो किसके सहारे?
आह! मेघ घिर आए,
नन्ही-नन्ही बूंदों को लाए।
पर क्या चंद बूंदों से,
धरती फिर हरी-भरी हो जाए?
ऐ मेघ! करो हमसे तुम वादा,
जल्द आओगे तुम जल लेकर।
सुख की छाया कर जाओगे,
तुम बहुमूल्य बूंदों को देकर।।

No comments:
Post a Comment
Thanks for reading!
Take a minute to share your point of view.
Your reflections and opinions matter. I would love to hear about your outlook :)
Be sure to check back again, as I make every possible effort to try and reply to your comments here.