Thursday, 30 April 2026

Poem : बहुमूल्य बूंदें

बहुमूल्य बूंदें


सूरज की तपती किरणों से,

सूख हो रही धरा विकल।

दूर-दूर तक नहीं दिख रहा,

प्यास बुझाने को अब जल।।


सूख रहे हैं विटप सारे,

पशु-पक्षी त्राहिमाम पुकारे।

बंजर होती यह भूमि,

हरी-भरी हो किसके सहारे? 


आह! मेघ घिर आए,

नन्ही-नन्ही बूंदों को लाए।

पर क्या चंद बूंदों से,

धरती फिर हरी-भरी हो जाए?


ऐ मेघ! करो हमसे तुम वादा,

जल्द आओगे तुम जल लेकर।

सुख की छाया कर जाओगे,

तुम बहुमूल्य बूंदों को देकर।।

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