Thursday, 5 July 2018

Article : मोक्ष

मोक्ष


मोक्ष क्या है? इसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं? आज कल इस तरफ बढ़ते रुझान का नतीजा है कि लोग ढोंगी बाबाओं की शरण में जा रहे हैं, जिसका बाबा लोग खूब फायदा उठा रहे हैं। हद तो यहाँ तक हो गयी है कि लोग आत्महत्या भी कर रहे हैं।
जहाँ तक हमें समझ आता है, मोक्ष ईश्वर की प्राप्ति करना है। पर ईश्वर को प्राप्त कैसे किया जाए? ये बहुत बड़ा सवाल है।
ईश्वर सर्वोपरि हैं, तो उनकी रचना भी सर्वोपरि होनी चाहिए, जिसमें ये सारी सृष्टि है, जीवन है।
स्वयं ईश्वर का कहना है, कि प्रत्येक प्राणी को अपना अपना कर्म करना चाहिए। आप ईश्वर के किसी भी अवतार को देख लें, वो जब भी जिस रूप में आए, उन्होने अपने कर्तव्यों से अपना मुख नहीं मोड़ा।
तब मोक्ष प्राप्ति कर्तव्यों से विमुख होना या संसार को त्याग देना कैसे हो सकता है?
ईश्वर ने प्रत्येक प्राणी को जन्म, उद्देश्य प्राप्ति के लिए दिया है। और किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति बिना कर्म के संभव नहीं है।
तब में क्या कर्म करने चाहिए?
जब बाल्यावस्था हो, तब हमे अध्ययन, उच्च संस्कार, शारीरिक विकास की ओर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए।
जब युवावस्था में हों तब जो भी कार्य हमने चुना है, उसके प्रति पूर्ण निष्ठा रखनी चाहिए। और यहाँ से हमारे कर्म बढ़ते ही जाते हैं।
जब हम विवाह सूत्र में बंध चुके हैं, तब अपने जीवन साथी, और अपने व उनके सभी परिवारी जन का विशेष ध्यान रखें।
जब माता-पिता बन जाते हैं, तब हमारा कर्तव्य सबसे अधिक बढ़ जाता है, कि हम अपने बच्चों का सर्वांगीण विकास करें, अर्थात न केवल उच्च शिक्षा प्रदान करें, अपितु उनमें उच्च संस्कारों का भी संचार करें।
क्योंकि यदि हमारे बच्चे का पूर्ण विकास होगा तभी समाज का, देश का विकास होगा।
ये तो हुई कर्म की बात।
पर इससे मोक्ष कैसे प्राप्त होगा?
जब आप एक नन्हें शिशु की किलकारी सुनेंगे तब जो सुख मिलेगा, वो मोक्ष है
जब आप अपना कार्य अच्छे से करेंगे, तो उससे दूसरों को जो खुशी मिलेगी, उसके बदले में वो आपका शुभ हो, इसकी कामना करेंगे, वो मोक्ष है
पति, या पत्नी को आपकी सेवा से जो संतुष्टि मिलेगी, और सातों जन्म में वे आपकी कामना करें, वो मोक्ष है
माता-पिता की सेवा से मिलने वाला आशीर्वाद मोक्ष है
बच्चों के सर्वांगीण विकास से मिली संतुष्टि मोक्ष है
समाज व देश के विकास में योगदान दे कर अपने जीवन को लक्ष्य प्रदान करने की अनुभूति मोक्ष है
आपके सुकर्मों के कारण आपके जाने के बाद भी आपको समाज का याद करना मोक्ष है
वो गीत अक्षरश: सही है
संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे......
जी हाँ
कर्म ही जीवन है, और उससे मिलने वाली हर छोटी-बड़ी खुशियाँ ही मोक्ष है
ऐसा मेरा मानना है, आप के इस बारे में क्या विचार हैं? मैंने अपने विचार आपके सम्मुख रखे, आप भी अपने विचार व्यक्त करें। विचार वो नदी है जितना बहेगी उतना बढ़ेगी।

Wednesday, 4 July 2018

Kids Story : फिर राजा नहीं आया

समस्या: बात-बात पर रोता है।

कहानी: फिर राजा नहीं आया।

एक राजा था जो अपने राज्य में घूम-घूम कर सबकी परेशानी दूर करता था। एक दिन वो एक घर के सामने से जा रहा था, वहाँ उसे एक बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया।
उसने बच्चे से पूछा- क्या हुआ? वो बोला- मुझे बहुत नींद आ रही है और माँ उठ कर पढ़ने के लिए कह रही है। राजा बोला इसके लिए तुम्हें रात में जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना चाहिए, क्यूंकि अगर तुम पढ़ोगे तभी अच्छे इंसान बनोगे
दूसरे दिन राजा ने देखा वो बच्चा फिर रो रहा है। राजा ने पूछा- आज क्या हुआ? वो बोला- मुझे और खाना नहीं खाना पर माँ कह रही हैं कि पहले खाना खत्म करो फिर जो करना है करो। राजा बोला माँ ठीक ही कह रही है क्योंकि खाना खाने से ही ताक़त आती है।
तीसरे दिन राजा ने फिर देखा वो बच्चा फिर रो रहा है। राजा ने पूछा- अब आज क्या हुआ? वो बोला- मेरे दोस्त हमेशा वो नहीं खेलते जो मैं खेलना चाहता हूँ। राजा बोला- हमेशा सब तुम्हारे मन का तो नहीं खेलेंगे, कभी-कभी तुम्हें भी उनके मन का खेलना पड़ेगा।
चौथे दिन राजा ने फिर देखा वो बच्चा आज भी रो रहा है। राजा ने पूछा- अब क्या हुआ? वो बोला- मुझे खेलने जाना है और माँ कह रही हैं कि सो जाओ नहीं तो तुम्हें मेले मे जाने के समय नींद आएगी। राजा बोला- माँ ठीक कह रही हैं। हमे ये समझ में आना चाहिए कि क्या ज़रूरी है क्योंकि खेल तो तुम रोज़ ही लोगे पर मेला अगर खत्म हो गया तो साल भर बाद आयेगा। और मेले के समय अगर तुम सो गए तो तुम्हें उसका साल भर इंतज़ार करना पड़ेगा।
उसके बाद राजा ने उस तरफ आना बंद कर दिया। बच्चा कुछ दिन तक उसका इंतज़ार करता रहा और जब राजा नहीं आया तो वो उसके महल में आ गया और राजा से उसके ना आने का कारण पूछा। तो राजा बोला- तुम तो हर बात पर रोते रहते हो, और जो बच्चे अपनी परेशानी खुद दूर नहीं करते और हर बात पर रोते रहते हैं उन्हे कोई पसंद नहीं करता। उस दिन से उस बच्चे ने बात-बात पर रोना बंद कर दिया और सब उसे पसंद करने लगे।


Monday, 2 July 2018

Story Of Life : वक़्त

वक़्त

धीरज का सोने का business था, उसकी दो सुंदर सुशील बेटियाँ थी, घर धन-धान्य से भरपूर था। अपनी बड़ी बेटी लक्ष्मी का विवाह धीरज ने अपने समान ही सोने के businessmen दीपक के लड़के राघव से करवा दिया। पर जब बारी छोटी बेटी नेहा की आई, उसने businessmen के घर विवाह करने से साफ मना कर दिया। अपने नाम के अनुरूप ही उसे सिर्फ प्यार ही चाहिए था, धन दौलत की चमक से वो कोसों दूर थी।
उसने अपने साथ पढ़ने वाले साधारण घर के अति बुद्धिमान विशाल से विवाह करने की बात अपने पिता को बता दी। धीरज को ये बात बिलकुल पसंद नहीं आई, वो बोले बेटा कहाँ तू महलों की पली और कहाँ ये साधारण परिवार का लड़का, ये तुझे दाल-रोटी के सिवा कुछ नहीं दे पाएगा।
नेहा बोली, मुझे उससे ज्यादा की लालसा भी नहीं है। क्या करते, बेटी की ज़िद के आगे? उन्होंने नेहा और विशाल का विवाह करा दिया, विवाह के पहले ही विशाल ने एक बड़ी कंपनी में job join कर ली थी। दोनों का जीवन हंसी खुशी बीत रहा था।
धीरज ने नया showroom खोला, तो दोनों बेटियों को बुलाया, अपनी अपनी हैसियत के अनुसार दोनों बेटियों की वेषभूषा व gift थे। जब विशाल धीरज और उनके मित्रगण के मध्य खड़ा था, तो सबने उसकी वेषभूषा का उपहास किया। ये बात विशाल को अंदर तक घर कर गयी।
उसने ठान लिया, कि अगले एक साल में ही वो अपने ससुर से अधिक धनवान हो कर दिखाएगा।
अत्यधिक मेहनती व बुद्धिमान विशाल जुट गया, अपने आपको सिद्ध करने में। उसने अपनी बुद्धि और मेहनत से मार्केट में शाख जमानी शुरू कर दी, पर इन सब में उसने नेहा को समय देना धीमे धीमे कम कर दिया। नेहा को विशाल के जुनून की वजह नहीं पता थी। विशाल में आए इस परिवर्तन से वो बिलकुल भी खुश नहीं थी। एक साल में ही शहर में विशाल ने हीरे का एक बड़ा showroom खोला, उसने inauguration में उन सबको बुलाया, जो उसके ससुर कि पार्टी में आए थे, सब चकाचौंध थे, धीरज को अपनी बेटी पर बहुत नाज हो रहा था, कि उनकी बेटी ने हीरा पसंद किया था। पर आज नेहा बहुत दुखी थी, विशाल भी उसके पिता कि तरह धन दौलत कि चकाचौंध में खोये जा रहा था। कई–2 दिन दोनों की बात भी नहीं हुआ करती थी।
नेहा माँ बनने वाली थी, पर इतनी बड़ी खबर ने भी विशाल और नेहा की बढ़ी हुई दूरी को कम नहीं कियाविशाल को अब बस धन का अंबार लगाने का जुनून छा गया था। नेहा ने प्रसव के समय विशाल को अपने नजदीक रहने को कहा, विशाल उसे शहर के सबसे बड़े hospital में ले गया, पर अचानक business call आ गया,  और वो नेहा को दर्द में ही छोड़ के चला गया।
नेहा ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया, पर विशाल वहाँ न था।
बड़े धूम-धाम से उसका नाम विजय रखा गया, क्योंकि विशाल को वो अपने विजय का प्रतीक लगता था।
विजय बड़ा होने लगा, पर उस मासूम के साथ समय बिताने के लिए विशाल के पास वक़्त ही नहीं था, अब तक तो वो नेहा के पिता से भी ज्यादा बड़ा businessmen  बन गया था।
विशाल का हर समय अपने business में खोये रहने के कारण नेहा धीमे धीमे बीमार रहने लगी। बहुत बड़े बड़े doctor  का इलाज चलने लगा, विशाल पैसा पानी की तरह बहा रहा था, पर नेहा दिन पर दिन और अधिक बीमार होती जा रही थी, विशाल समझ नहीं पा रहा था कि इसकी क्या वजह है?
विशाल नेहा के सिरहाने गया,  और उसने उससे पूछा, क्या कारण है, कि इतने बड़े-बड़े  doctor  भी तुम्हें ठीक नहीं कर पा रहे हैं, नेहा ने कहा, तुमने मुझ से वो छीन लिया है, जिसके कारण मैं तुम्हारे पास आई थी।
मैंने छीन लिया है! मैंने तो तुम्हें बस दिया ही दिया है, ये इतना बड़ा घर, ऐशो-आराम, धन दौलत। आज हमारे पास तुम्हारे पिता से भी अधिक धन-धान्य है।
नेहा बोली, मुझे इन सब की लालसा होती, तो मैं पहले ही बड़े businessmen से शादी कर लेती, तुमसे क्यूँ करती?
एक स्त्री को धन से भी ज्यादा अपने पति का वक़्त चाहिए होता है, जब वो माँ बनती है, तब उसकी पहली कामना होती है, कि उसका पति उसके साथ हो, जब उनका बच्चा बड़ा हो रहा हो, तब दोनों मिल के उसे अच्छे संस्कारों के साथ बड़ा करें, इससे अनमोल इस जहां में कुछ नहीं है, तुमने मुझसे अपना वक़्त  छीन लिया, मैं तो तब ज्यादा सुखी थी, जब हम लोगों कि जरूरतें भी पूरी हो रही थीं, और तुम्हारा साथ भी था।

विशाल अब सब समझ गया था, जीवन का सुख सिर्फ अधिकता में नहीं संतुलन में है, उसने काम का समय निर्धारण कर लिया था, अब वो नेहा और विजय को वक़्त भी देने लगा था, नेहा भी बिना किसी doctor medicine के ठीक होने लगी थी।