Wednesday, 9 October 2019

Story Of Life : हमने घर बदल लिए

हमने घर बदल लिए

रिया की आज सगाई थी, वो सजधज कर तैयार बैठी थी, पर उसकी नज़रें दरवाज़े पर ही लगी थी। तभी रिया की दोस्त कीर्ति ने उसे छेड़ा, आय-हाय, देखो तो रिया को, कैसे कार्तिक का इंतज़ार कर रही है? इन madam जी की तो नज़र दरवाज़े से हट ही नहीं रही है, अपने would be के दीदार के लिए।  

तभी रिया खुशी से खिल गयी, पर ये तो कार्तिक नहीं था, बल्कि बहुत ही handsome and beautiful couple था।

कीर्ति से रहा नहीं गया, ये कौन हैं रिया? तुझे इनका इंतज़ार था? हाँ, ये मेरी मौसी की बेटी रैना दी और राज जीजू हैं।

उन दोनों के आने से महफिल में चार चाँद लग गए। राज सबमें इतने घुले-मिले थे, कि समझ ही नहीं आ रहा था, वो दामाद हैं। सभी important decision के लिए उन्हें आवाज़ लगाई जा रही थी, उनके आते ही कुछ महत्वपूर्ण काम भी उन्हें सौंप दिये गए। कीर्ति देख रही थी, सारे काम वो बखूबी कर भी रहे थे।

कीर्ति ने रिया से कहा, तेरे जीजू तो बड़े expert हैं, हर काम बखूबी कर रहे हैं। साथ ही उनके आने से महफिल में रंग भी जम गया है। 

रिया बोली, वो हैं ही इतने अच्छे कि सभी को उनका बहुत इंतज़ार रहता है। 

सच ऐसे लोगों की चाह सबको रहती है, काश मेरे पति भी ऐसे हीं हों। कीर्ति मन ही मन सोचने लगी।

सगाई बहुत अच्छे से हो गयी। कीर्ति की रैना दी और राज जीजू से अच्छी पहचान हो गयी। रैना दी बोली, कीर्ति अगर कभी दिल्ली में काम पड़े तो हमारे घर भी जरूर आना।

कीर्ति बोली दी, मुझे दिल्ली में एक exam के सिलसिले में जाना था, सोच रही थी, कहाँ रुकूँगी? पर अब tension नहीं है, आपके घर ही आऊँगी।

चंद दिनों बाद ही कीर्ति दिल्ली आई, राज जीजू उसे लेने station पहुँच गए। जब वो रैना दी के घर पहुंची तो उसने पाया, कि रैना दी अपने सास-ससुर के साथ रहती हैं।

रैना दी बोलीं, कीर्ति fresh हो जाओ, फिर साथ में breakfast करेंगे। तब तक मैं मम्मी जी, पापा जी को juice और दवाई दे कर आती हूँ।

ये कह कर वो जूस के दो ग्लास लेकर अपने सास के room में चली गईं। कीर्ति का room बगल वाला ही था, इसलिए उसे सब बात सुनाई पड़ रही थी......

आगे पढ़े हमने घर बदल लिए (भाग- 2)  में....

Tuesday, 8 October 2019

Poem : थोड़ा राम बन जाते हैं

थोड़ा राम बन जाते हैं

आया शुभ दशहरा,
क्या हम इतना कर पाएंगे?
भीतर के रावण को जलाकर
मन में राम जगाएंगे?

मन के भीतर बसा है रावण,
हम पुतले को जलाते हैं
धनुष मात्र उठा लेने से,
क्या हम राम बन जाते हैं?

राम गुणों की खान हैं,

हिंदूत्व की शान हैं,
बहुत ना अपना सकें तो,
कुछ ही हम अपनाते हैं

पिता के वचन की खातिर,

वो राजसुख छोड़ आए
मात-पिता की सेवा से,
हम भी मुख ना चुराएं

भ्रातृ-प्रेम की अमरता के,

अमिट मिसाल वो कहलाएं
अपनों को एक में जोड़ कर,
कुछ राम-गुण लें आएं

गुरुओं को दें अनन्त सम्मान,

वो परम शिष्य  थे कहलाए
गुरु को वो ही मान,
पुनः हम सब दिलवाएं

पर-स्त्री सम्माननीय है,

उनका कथन महान कहलाए
रक्षा करें हर स्त्री की,
किसी का हनन ना होने पाए

आओ इस दशहरे में,

कुछ उनके गुणों को अपनाते हैं
पूरा तो नहीं बन सकते,
पर थोड़ा राम बन जाते हैं। 

दशहरे के पावन दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।।।

Sunday, 6 October 2019

Article : वो दिन......


वो दिन......



भारत ऐसा देश है जहाँ धर्म-कर्म का विश्व में सर्वाधिक बोल बाला है, पर कुछ दूसरे पहलू भी हैं, जिनमें विचार की आवश्यकता भी है, जैसे सबसे ज्यादा कर्मकांड भी, और दुनिया भर के नियम कानून भी।

आज का मेरा ये article कुछ अलग सोच पर है, पर पूरा article पढ़कर एक बार सोचिएगा जरूर।

आज कल नवरात्रि अर्थात- माता रानी के दिन चल रहे है। भारत ऐसा देश है, जहाँ स्त्री को देवी रूप में पूजा जाता है।

माता रानी अर्थात स्त्री का माँ रूप।

माँ को ईश्वर रूप में माना जाता है। आप ने कभी सोचा है, क्यों स्त्री को ईश्वर तुल्य माना जाता है? क्योंकि ईश्वर का एक गुण सृजन कर्ता भी है। सृजन कर्ता अर्थात जन्म देने वाला। और ये शक्ति ईश्वर ने स्त्री को भी प्रदान की है।

स्त्री जब संतानोत्पत्ति करती है, माँ बन जाती है। सम्पूर्ण हो जाती है, तब वह ईश्वर तुल्य हो जाती है। तो अगर माँ होना, इतना पवित्र है, तो उससे जुड़ी process अपवित्र कैसे हो सकता है।

माँ बनने के ही process की ही एक कड़ी हैं- वो दिन(Periods)....... 

इस कड़ी के फलस्वरूप ही स्त्री माँ बन सकती है, यदि किसी के यह ना हो तो, वो माँ भी नहीं बन सकती है।

अगर आप scientifically देखेंगे, तब भी आपको यही पता चलेगा, कि period, माँ बनाने की natural process है, उसके बिना माँ नहीं बना जा सकता।

फिर जब स्त्री इस process में होती है, तो उस समय उसके साथ अछूतों जैसा भेदभाव क्यों? उसे उस समय मंदिर जाने, ईश्वर को छूने देने की सख्त मनाही कर दी जाती है। 

अगर इसका कारण रक्त स्त्राव है, तो रक्त स्त्राव तो चोट लग जाने से भी होता है, तो क्या किसी को लगी छोटी सी चोट भी उसे पूजा के लिए अयोग्य कर देती है?

जब स्त्री माँ बनती है, तब वो तो मंदिर नहीं जा सकती, यहाँ तक कि उस घर में पूजा करना तक निषेध कर दिया जाता है।

जब मेरी बेटी हुई थी, तब उसे मंदिर ले जाया गया था, पर मेरा जाना निषेध कर दिया था। जब मेरे पति को इसका कारण पता चला, तो वह बोले यदि उसके माँ बनने से वो अपवित्र है, तो पिता तो मैं भी बना हूँ। तब तो मुझे भी नहीं जाना चाहिए। सब के लाख कहने पर भी कि पुरुष को दोष नहीं लगता है, वो भीतर नहीं गए, मेरे साथ बाहर ही खड़े रहे।

जब पुत्र हुआ, सावन का महीना चल रहा था, सब ने कहा, इस सावन घर में पूजा निषेध है। तब वह बोले, जिस समय हमें ईश्वर को सर्वाधिक धन्यवाद देना चाहिए, कि उन्होंने हमें सन्तान प्रदान की है। तब ही पूजा ना की जाए, मैं ऐसा नहीं करूंगा। शिव जी मेरे आराध्य हैं, और मैं सावन में ही उनकी पूजा ना करूँ, ये असंभव है, और वह नियम से पूजा करते रहे।

उनका मानना है, कि ईश्वर प्रेम से पाये जा सकते हैं, कर्म कांड से नहीं। धन्य हूँ, जो मुझे ऐसे पति मिले हैं, जिनके लिए कर्मकांड से ज्यादा प्रेम सर्वोपरि है।

मुझे मेरे पिता ने भी सदैव यही कहा था, आप कर्मकांड कितना करते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता है, ईश्वर के लिए। ईश्वर यह देखते हैं, कि आप कितना मन से उनकी पूजा अर्चना करते हैं। अर्थात जब आप ईश्वर की पूजा कर रहे हैं, तब सारा ध्यान सिर्फ ईश्वर आराधना में ही होना चाहिए।

हे ईश्वर, आपका कोटि कोटि धन्यवाद, आप ने मुझे ऐसे पिता व पति प्रदान किए।  

क्या आप को लगता है, ईश्वर यह चाहते हैं? कि उन दिनों उनकी पूजा अर्चना ना हो, उन्हें छुआ ना जाए, कदापि नहीं। अगर ऐसा होता तो, ना तो उन्होंने periods बनाए होते, ना स्त्री को सृजनकारी बनाया होता।

ईश्वर कभी भी कर्म कांड से नहीं प्राप्त होते हैं, अगर ऐसा होता तो सारे कर्म कांडियों को ईश्वर की प्राप्ति हो जाती। ईश्वर की प्राप्ति का सरल व सुगम मार्ग सिर्फ प्रेम है, उन पर श्रद्धा है, विश्वास है।

इसका सीधा और सच्चा उदाहरण है, प्रभू श्री राम का शबरी के झूठे बेर खाना, मीरा का भगवान श्री कृष्ण को पाना, और सबसे बड़ा उदाहरण है, कृष्ण जी को  राधा जी के साथ पूजा जाता है।

ईश्वर को प्रेम से पाने की कोशिश कीजिये, आप कब उनकी शरण में आ जाएंगे, आपको पता भी नहीं चलेगा।