Wednesday, 17 March 2021

Story of Life: तुम बिन (भाग -2)

तुम बिन (भाग -1) के आगे....


तुम बिन (भाग-2)

सामान pack कर के वो कमरे से निकली ही थी, कि तभी, गरिमा की सास आ गईं और गरिमा को सामान के साथ देखकर बोलीं बेटा, आज तुम्हारे पग फेरे का दिन नहीं है।

अपना सामान अंदर रख दो बेटा।

गरिमा के अब तक रुके हुए आंसू झरझरा के गिरने लगे...

माँ, उन्हें मेरी कोई चाह ही नहीं है तो रुकूं किसके लिए?

हमारे लिए बेटा।

आप के लिए? तो क्या आप जानती थीं कि उन्हें मेरी कोई चाह नहीं थी?

बेटा तुम लोगों की love marriage नहीं arrange marriage हुई है। और इस शादी में जुड़ते जुड़ते ही जुड़ पाते हैं।

मैं जानती हूँ कि तुम्हारे case में बात और ज्यादा difficult है, पर मुझे अपनी गरिमा और उसके संस्कारों पर उससे भी ज्यादा भरोसा है।

पर गरिमा के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

अच्छा लाओ, मुझे अपना सामान दे दो। आज से ठीक 6 महीने बाद तुम्हें यह सामान लौटा दूंगी। फिर तुम जहाँ कहोगी मैं खुद तुम्हें छोड़ कर आऊंगी।

गरिमा अपना सामान अपनी सास को देकर अंदर चली गई।

थोड़ी देर बाद शादी से सम्बन्धित और रस्में शुरू हो गईं। गरिमा और राहुल अपनी अपनी रस्में निभा रहे थे।

कुछ दिन बाद सब चले गए, घर में सिर्फ सास ससुर, राहुल और गरिमा रह गए थे।

गरिमा में ‌गुणी बहू के सारे लक्षण थे। उसने बहुत जल्दी सबका मन जीत लिया।

राहुल अब भी उसकी तरफ मुखातिब नहीं होता था।

वो अपने दोस्तों में ही रमा रहता।

पर अब गरिमा भी उसकी बेरुखी से खिन्न नहीं होती थी। वो तो बस 6 महीने काट रही थी।

धीरे धीरे वो सास ससुर की सेवा के साथ साथ, कब राहुल की पंसद का ध्यान भी रखने लगी, उसे पता ही नहीं चला।

उधर राहुल अपनी पसंद का सब कुछ देखकर चौंक जाता। 

राहुल अपने दोस्तों के घर में अक्सर देखता था कि लड़ाई-झगड़े हुआ करते थे। उन लोगों की जिन्दगी में कहीं कोई सामंजस्य नहीं था। पति-पत्नी दोनों ही सिर्फ अपने लिए सोचा करते थे।

एक दिन राहुल की माँ संजना जी का accident हो गया।

गरिमा जी जान से उनकी सेवा में जुट गई। उसकी सेवा से संजना जी ठीक होने लगीं।

गरिमा का मौन समर्पण, उस की सादगी, समझदारी और संस्कारों का राहुल कायल होने लगा, साथ ही गरिमा की तरफ कब और कैसे आकर्षित होने लगा, वो भी नहीं समझ पा रहा था।

संजना जी पूरा ठीक होते-होते 5 महीने हो गए। 

यह सोच कर कि अब वो गरिमा को और नहीं रोक सकती हैं, उनकी तबियत बहुत तेजी से बिगड़ने लगी।

घर में तीनों उनकी सेवा में जुट गए, पर अबकी बार संजना जी ठीक ही नहीं हो रही थीं।

आखिर वही हुआ, जिसका डर था...

आगे पढ़ेंअंतिम भाग तुम बिन (भाग-3)...

Tuesday, 16 March 2021

Story of Life : तुम बिन

तुम बिन 



बड़े ही अनमने मन से राहुल, गरिमा से शादी करने को तैयार हुआ था।

गरिमा बहुत सीधी-सादी-सी संस्कारी लड़की थी। जबकि राहुल को शुरू से modern लड़कियांँ ही रास आती थीं।

वो चाहता था कि उसकी शादी, ऐसी लड़की से हो, जो working हो, style में रहे और English fluently बोले।

पर उसकी माँ, को घरेलू और संस्करी लड़की भाती थी। वो हमेशा कहती, मुझे बहू चाहिए किसी movie ya serial बनाने के लिए heroine नहीं चाहिए।

घर में माँ की चलती थी तो यहाँ भी उनकी ही चली।

वो दिन भी आ गया, जब राहुल और गरिमा की धूमधाम से शादी हो गई।

राहुल पूरी शादी में अनमना ही रहा, उसने गरिमा को एक नज़र उठा कर भी नहीं देखा।

सुहागरात की रात, कमरा गुलाब और बेला की खुशबू से ऐसा महक रहा था कि कामदेव का मन भी डोल जाए।

पर उस रात भी राहुल दूसरी तरफ मुंह करके सो गया।

बेचारी गरिमा, उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतनी अच्छी और धनाढ्य ससुराल मिली है, उसके लिए प्रसन्न हो या पति के neglection से दुखी हो।

जिसकी बनकर वो यहाँ आयी थी, उसे तो क्षणभर को भी उसकी परवाह नहीं है।

वो शादी वाले दिन बला की खूबसूरत लग रही थी, सभी उसकी सौंदर्य की खुलकर तारीफ कर रहे थे। कोई उसे परी, कोई अप्सरा कह रहा था।

पर ऐसी खूबसूरती किस काम की, जो पति को ही ना रिझा सके।

जो दिन किसी की भी जिन्दगी का सबसे बड़ा दिन होता है, वो उसके लिए जिन्दगी भर का दुःख लेकर आया था।

और ज़िंदगी की सबसे हसीन रात, उसके लिए सिवाय तन्हाई और मायूसी के कुछ नहीं लायी थी...

अगली सुबह राहुल को सोता छोड़, गरिमा अपने सामानों की packing करने लगी। 

पूरी रात आंखों में काटने के बाद, वो पूरी तरह टूट चुकी थी। अब वो एक पल भी और रुकना नहीं चाह रही थी।

सामान pack कर के वो कमरे से निकली ही थी, कि तभी.......

आगे पढ़ें, तुम बिन (भाग -2) में..

Monday, 15 March 2021

Kids story: मेहनत और मेहनताना

मेहनत और मेहनताना


हमारे घर के पीछे एक बड़ा सा park है, जिसमें पास की बस्ती के लड़के दिन भर खेलते रहते थे।

उन्हें देखकर बेटा आर्यन बोला, माँ इन लड़कों के कितने मजे हैं।

यह दिनभर खेलते रहते हैं, ना तो इन्हें school जाना होता है ना ही कोई homework करना होता है।

काश, ऐसे ही मैं भी दिनभर मस्ती कर पाता! 

माँ, कुछ नहीं बोलीं, बस बेटे की बात सुन ली।

कुछ दिनों बाद, पूरे parking space में tiles लगाने का कार्य आरम्भ हो गया।

बहुत से मज़दूर थे, कुछ मिस्त्री और एक ठेकेदार कार्य में लगे थे।

मज़दूर दूर रखी ईंटा गारा सीमेंट लाकर देते। मिस्त्री, एक बार भी सामान लाने के लिए नहीं उठता, बैठे बैठे ही सारा काम करता।

धूप बहुत तेज थी, पर सब अपना काम तल्लीनता से कर रहे थे। 

हर रोज़ सिर्फ 3 घंटे के लिए ठेकेदार आता, सारे काम को observe करता।

अगला काम कैसे करना है, वो समझाता; क्या क्या सामान और चाहिए, इसकी list बनाता; कुछ देर तक यह देखता कि, काम ठीक से हो रहा है, और फिर चला जाता।

यह सब काम वो, एक छोटे कमरे में बैठ कर करता, जहाँ पंखा लगा हुआ था।

जिस officer ने ठेकेदार को काम दिया था, वो alternate दिन में 10 minutes के लिए आता था। बाकी समय वो अपने AC वाले office में रहता था।

कार्य शुरू हुए मात्र 1 week ही गुज़रा था, कि बहुत ज़ोर से बारिश शुरू हो गई।

मज़दूरों और मिस्त्री ने जो काम किया था वो खराब होने लगा। उन्हें फिर से मेहनत करनी पड़ी, पर भरी बरसात में भी वो लगे रहे।

 चार-पांच दिनों तक बारिश होती रही, उतने दिन में ठेकेदार दो दिन ही आया। और executive तो एक भी दिन नहीं आया।

बारिश बन्द हो गई और चंद दिनों बाद काम भी पूरा हो गया। Parking space बहुत ही सुन्दर लगने लगी।

सभी को उनकी मेहनत का मेहनताना दिया गया। 

सबसे अधिक रुपए executive को मिले, उससे कुछ कम ठेकेदार को, ठेकेदार से कम मिस्त्री को और सबसे कम रुपए मज़दूरों को मिले।

कुछ दिन बाद parking space का inauguration हुआ। सभी लोग executive officer की बहुत तारीफ कर रहे थे कि उसने बहुत अच्छा काम कराया।

चंद लोग उस ठेकेदार के काम की भी तारीफ कर रहे थे।

पर उन मिस्त्रियों और मज़दूरों के काम की प्रशंसा कोई नहीं कर रहा था। एक भी ऐसा नहीं था, जो कह रहा हो कि असली मेहनत तो मिस्त्री और मज़दूरों ने की है।

आर्यन बोला, माँ यह तो ग़लत बात है कि किसी ने भी असली मेहनत करने वालों की तारीफ़ नहीं की और ना ही उन्हें मेहनताना ज्यादा मिला।

माँ ने समझाया, बेटा जिसने ज्यादा मेहनत की है, मेहनताना उसे ही ज्यादा मिली है।

वो कैसे माँ ?

वो ऐसे कि जो बच्चे दिन भर खेलते रहते हैं और अपने बचपन का अनमोल समय व्यर्थ बर्बाद करते हैं। वो बड़े होकर किसी लायक नहीं होते हैं।

उन्हें अपना जीवन यापन करने के लिए बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। पर ना उन्हें अधिक रुपए मिलते हैं ना ही प्रशंसा। यह वो लोग हैं जो मज़दूर थे।

जो बच्चे दिन भर खेलते हैं, पर बड़े होने से पहले ही मेहनत कर के कुछ विशेष कार्य सीख लेते हैं। उन्हें बड़े होकर मेहनत थोड़ी कम और चंद रुपए ज्यादा मिल जाते हैं। यह वो लोग हैं जो मिस्त्री थे।

जो बच्चे स्कूल तो जाते हैं, पर पढ़ने में मेहनत कम करते हैं। उन्हें बड़े होकर कुछ मेहनत और कम करना पड़ता है और रुपए ज्यादा मिल जाते हैं, कभी कभी लोगों से प्रशंसा भी मिल जाती है और कुछ आदर भी। यह वो लोग हैं जैसे ठेकेदार था।

जो बच्चे स्कूल जाते हैं, अपना home work पूरा करते हैं, मेहनत से पढ़ते हैं। फिर उन्हें बड़े होकर, सबसे कम मेहनत करनी पड़ती है, मेहनताने में सबसे अधिक रुपए और बहुत सारी तारीफ मिलती है, सब लोग उनका सम्मान करते हैं। यह वो लोग हैं जो कि बड़े होकर executive officer बनते हैं।

ओह! मतलब जो बचपन में ज्यादा मेहनत करते हैं, उन्हें ही बड़े होकर कम मेहनत में ज्यादा मेहनताना मिलता है।

एकदम सही!!

उसके बाद आर्यन ने कभी नहीं कहा कि बस्ती वाले लोगों के बहुत मज़े हैं, क्योंकि अब वो उन जैसा कभी नहीं बनना चाहता था।

उसे तो बड़ा होकर कम मेहनत और ज्यादा मेहनताना चाहिए था।