सावन के झूले (भाग-1) के आगे…
सावन के झूले (भाग-2)
सुहास को ऐसा देखकर अनिका सहम गई कि न जाने phone पर ऐसी क्या बात हुई, जिसने चहकते हुए सुहास को यूं खामोश कर दिया।
“क्या हुआ सुहास? तुम इतने उदास क्यों हो गए?”
“मेरा work from home खत्म हो गया है और मुझे दो दिन में ही join करना है।”
“अरे! तो क्या हो गया? कर लो join, उसमें दुःखी होने जैसा क्या है?”
“अब हम साथ में नहीं रह पाएंगे,” कहते-कहते सुहास का गला सूखने लगा।
“साथ नहीं रह पाएंगे, मतलब?” अनिका ने परेशान होते हुए पूछा।
“मुझे हर दूसरे हफ्ते अलग-अलग शहरों में जाना होगा, साथ ही बीच-बीच में abroad भी जाना होगा। तो हर जगह तुम्हें नहीं ले जा सकता हूं।”
सुनकर अनिका की आंखों से अश्रु की अविरल धारा बह निकली।
“यह क्या हुआ, कैसे हुआ
कब हुआ, क्यों हुआ
अरे छोड़ो यह न सोचो”
सुहास थोड़ी देर में उठा और अपना सब सामान pack करने लगा। दो दिन कब निकल गये, packing की आपाधापी में समझ ही नहीं आए।
और सुहास अनिका को छोड़कर, joining के लिए चला गया।
अनिका का एक-एक दिन पहाड़ सा बीतने लगा। बारिश की झड़ी देखकर उसे बस यही लगता-
“हाय-हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल-पल है तड़पाए
तेरी दो टकिया की नौकरी में
मेरा लाखों का सावन जाए”
Join करने के बाद सुहास का phone आया, अनिका ने उठाया भी, दोनों बहुत बातें करते थे, पर आज दोनों तरफ शांति थी, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि बात क्या करें।
“चुप तुम रहो चुप हम रहें
चुप तुम रहो चुप हम रहें
खामोशी को खामोशी से
ज़िंदगी को ज़िंदगी से बात करने दो”
थोड़ी देर बाद दोनों ने phone रख दिया, और दोनों सोच रहे थे कि आखिर उनकी हंसती-मुस्कुराती जिंदगी को किसकी नज़र लग गई।
आखिर ऐसा भी क्या बिगाड़ा था, उन्होंने किसी का, जो ऐसा हुआ, एक-दूसरे की धड़कन और दिल थे दोनों, आखिर एक-दूजे से दूर रहकर कैसे जिएंगे…
आगे पढ़ें, सावन के झूले (अंतिम भाग) में…


