Monday, 8 June 2026

Article : Seat or Scam?

आज का यह article एक सच्ची घटना पर आधारित है, और आप सभी को सचेत करने के लिए डाल रहे हैं।

साथ ही कुछ information भी, एक बार अंत तक अवश्य पढ़ें, सचेत और सुरक्षित रहें…

बात कुछ दिन पहले की, एक premium train की है, train का नाम mention करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ऐसी घटना किसी भी train में हो सकती है। जब एक premium train में ऐसा घटना हुई, तो किसी में भी होना कौन बड़ी बात है।

Train मुम्बई से दिल्ली की ओर जा रही थी। जगह का नाम इसलिए mention किया, क्योंकि source and destination दोनों ही बड़े शहर थे।

अब घटना विस्तार से जानते हैं…

Seat or Scam?


हम लोग BDTS (Bandra Terminus) से चढ़कर NZM (Hazrat Nizamuddin) को आ रहे थे। एक यात्री मुम्बई से चढ़कर मथुरा को आ रहा था। वो एक businessman था और premium trains से आता जाता था, तो उसे tickets के regarding rules पता थे।

आप लोगों की जानकारी के लिए बता दें कि आप जब online ticket book करते हैं, तो अगर waiting ticket है और train चलने के पहले भी अगर waiting बरकरार रहती है तो आप का ticket अपने आप automatically cancel हो जाएगा।

But अगर आप ने ticket उसकी window से (means offline) book किया है, और train चलने से पहले आप का ticket waiting category में ही रहता है, फिर भी automatically cancel नहीं होगा। वो cancel तभी होगा, जब आप ticket window पर जाकर cancel कराएंगे।

अतः आपका window से book किया हुआ ticket waiting category में होने के बावजूद आपको train में चढ़ने के लिए eligible रखेगा। हाँ, seat मिलेगी कि नहीं, वो berth availablity पर depend करता है। तो आप को उस दिन की बात बताते हैं। 

उसने ticket window से ticket book की थी। Ticket waiting ही थी। जब उसने ली थी, तब 53 waiting थीं, जो train में चढ़ने पर 10 पर पहुंच गई थीं, but still RAC or clear की category में नहीं आई थी।

वो पूरी तरह आश्वस्त था कि कुछ देर में जब TT आएगा, उसे seat available हो जाएगी। TT ticket check करने आया तो उसकी window की waiting ticket देखकर बोला situation देखकर बताएगा।

गाड़ी ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली। हमारे साथ ही वो भी BDTS से चढ़ा था। बोरिवली पर हमारी berth set के सभी passengers आ गये, अतः उसे seat से उठना पड़ा। एक-दो TT आए इस बीच, पर किसी ने उसे confirmed berth नहीं दी।

रात गहराना शुरू होने लगी। हमारी side-upper and side-lower seat थी, एकदम दरवाजे से लगी। हमें train में sound sleep नींद नहीं आती है, फिर gate से लगी seat, बार-बार खुलने-बंद होने से disturbance और सबसे बड़ी बात, हमारी तबीयत काफ़ी खराब थी, अतः बिल्कुल भी नींद नहीं आ रही थी।

अब आगे की बात सुनिए। Attendant ने gate से लगी berth पर कुछ सामान रखकर उसपर चादर डालकर एक उबड़-खाबड़ बैठने की जगह बना रखी थी। वह आदमी उसी पर बैठकर अगले TT के आने का इंतजार करने लगा।

तभी उस attendant ने मुम्बई-जैसी भाषा में उससे कहा, “आपको clear-seat मांगने का है, तो ₹1000 दो, तुरंत एकदम मस्त seat दूंगा।” Premium trains के ticket already महंगे होते हैं, उस पर सीधे ₹1000 और, उसने ₹1000 देने से मना कर दिया और TT का इंतजार करने लगा।

अब वो attendant हर आधे-घंटे में इधर-उधर से आता और ₹1000 में seat offer की बात करता, पर वो आदमी ₹1000 देने को राज़ी नहीं हुआ। अंततः उस आदमी का इंतजार खत्म हुआ, रात के लगभग 2 बजे एक TT आया।

उसने उससे seat availablity की बात की। TT ने availablity के लिए मना कर दिया। कहा अगर ₹600 दे, तो confirm seat दे सकता है। आदमी मरता, क्या न करता, उसने ₹500+₹200 के notes दिए, साथ ही उसने attendant की शिकायत भी कर दी।

Attendant को TT ने हड़काया, “क्या रे, क्या खाली-पीली परेशान करता है।” उस आदमी ने पूछा, “सर कौन-सी seat है?” वो बोला, “अभी आकर बताता हूँ।” “पर सर ₹100 तो दे दीजिए, मैंने आपको ₹700 दिए थे।”

“आता है, देता है न आकर, घाई-घाई क्यों करता है।”

आधे घंटे में फिर attendant बोला, “चलो ₹600 दो, अभी मस्त seat दिलाता है।” अब तो वो TT को पैसा दे चुका था, फिर क्यों पैसे देता। 15 minutes बाद वो attendant बोला, “फिर दूसरी जगह देख लो, यहां से जगह खाली करने का।”

रात के तीन बज रहे थे और वो आदमी मथुरा के आने के इंतजार में लुटा हुआ इधर-उधर घूम रहा था। न उसको seat मिली, न पैसे, क्योंकि वो TT लौटकर ही नहीं आया। मुम्बई में लोग बड़े ईमानदार होते हैं, सब झूठ। TT और attendant दोनों मुम्बई से थे।

Tourists और मजबूर इंसान को हर जगह बेवकूफ ही बनाते हैं, लूटते ही है, चाहे मुम्बई हो, कलकत्ता हो, लखनऊ हो, दिल्ली, जयपुर, बनारस, मथुरा इत्यादि हर जगह। अभी तक दो ही जगह मिलीं, जहाँ “अतिथि देवो भव:” दिखा, ऋषिकेश और उज्जैन।

At least हमें तो, पर आपका क्या experience रहेगा, भगवान जाने। अब इस घटना से बचने का केवल एक उपाय है कि ऐसे waiting ticket से भी तभी यात्रा करें, जब आपके साथ और भी लोग हों, जिनकी confirmed seat हो, जिससे लेटकर नहीं, तो कम से कम seat पर बैठकर तो जा सकें। विशेषता ठंड की रातों में, उन्हें काटना और कष्टप्रद होता है।

Ticket train में खरीदने से आपको seat मिलेगी या धोखाधड़ी, नहीं पता। जागरूक रहिए, सजग रहिए, सावधान रहिए, प्रसन्न रहिए। ऐसी ही और जानकारी के लिए, जुड़े रहें...

Friday, 5 June 2026

Poem : जीवन के दिन चार बचे हैं

आज आप सब के साथ मुझे भोपाल के मेजर नितिन तिवारी जी की कविता को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

आज नितिन जी ने इस कविता में माध्यम से कहा है कि, दुःख अवसाद को भूलकर आगे बढ़ना ही जीवन है, और जीवन की इस सच्चाई को उन्होंने बहुत खूबसूरती से उकेरा है।

आइए, इसका आनन्द लेते हैं…

जीवन के दिन चार बचे हैं


जीवन के दिन चार बचे हैं,

आग बुझी अंगार बचे हैं।

दबे उम्मीदों की राखड़ में,

बुझी आग के सार बचे हैं।

भीतर ही जो रहे सुलगते,

गढे हुए दो चार बचे हैं।

हमने खूब सजाया उपवन,

मानो सदा रहेगा यह तन‌। 

थे बसंत उत्सव के भागी,

चले गये सब उजड़ा मधुवन।

पत्ते छीन लिये पतझड ने,

फूल नहीं बस खार बचे हैं।

कर कमजोर थाम पतवारें,

नौका जब मझधार भंवर है।

है पुरुषार्थ सिर्फ शब्दों में,

जीवन नैया भी जर्जर है।

सांसे है गिनती की बाकी,

भोगे जो व्यवहार बचे हैं।

चार रोज तो काफी हैं यदि,

कुछ करने को संकल्पित हों।

बीती बातें सभी भुला दें,

जियें जैसे आज को ही अर्पित हो।

कल का क्या जो होगा सो हो,

जियें यही सुख सार बचे हैं।।

Thursday, 4 June 2026

Story of Life : दृढ़ संकल्प

दृढ़ संकल्प


आज एक सच्ची कहानी पर लेखनी चला रहे हैं, एक ऐसे लड़के की कहानी, जो बाकियों के लिए प्रेरणा स्रोत है।

तो बात तब की है, जब एक परिवार गांव से दिल्ली आता है, अपनी आंखों में सपने संजोए हुए।

परिवार में मां-पापा, दो बेटे और दो बेटियां। गांव के परिप्रेक्ष्य के अनुसार एक ideal परिवार।

गांव से आए थे, पढ़े-लिखे थे नहीं, अतः पत्नी ने लोगों के घर बर्तन का काम करना शुरू कर दिया। पति गुणीं था, अतः उसने भजन मंडली में वाद्य यंत्र बजाने व चौकीदारी का काम करना शुरू कर दिया।

शहर की महंगाई, इतने में बड़ी मुश्किल से गुजर-बसर हो रही थी। अतः बड़ी बेटी ने पूरे दिन घर में रहकर काम शुरू कर दिया और बड़े बेटे ने office में छोटा-मोटा काम आरंभ कर दिया।

छोटे बेटा-बेटी को छोटे होने के कारण उनसे किसी ने किसी भी तरह के काम करने के लिए नहीं कहा।

हाँ, school में admission ज़रूर करा दिया, जिससे घर में कोई तो पढ़ा-लिखा हो। वैसे भी शहर आने का कुछ लाभ तो होना चाहिए था।

उन लोगों का पढ़ाई-लिखाई कर के कुछ बड़ा हासिल करने का कोई ध्येय नहीं था। पर छोटा बेटा पढ़ने में होशियार था और उनकी पढ़ाई के लिए घर के सब लोगों के त्याग को मान भी देता था।

अतः 6 class तक आते-आते उसने अपना लक्ष्य साधना आरंभ कर दिया। उसने खेलकूद और फालतू की बातों से अपना मन खींचना शुरू कर दिया।

गांव में होने वाले शादी-विवाह आदि आयोजन में शामिल होना लगभग बंद करना आरंभ कर दिया, क्योंकि जब भी वो लोग गांव जाते थे तो उनके लौटने की कोई समय-सीमा नहीं होती थी।

इससे स्कूल की पढ़ाई छूटती थी। घर में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं जो इस नुकसान को भर दे। 

सक्षम की लगन अब स्कूल के teachers को भी दिखने लगी, वो भी चाहते कि सक्षम आगे बढ़े, यथासंभव प्रयास भी करते थे। पर सरकारी स्कूल आठवीं तक ही था तो आगे का सफ़र सक्षम को नये स्कूल से करना था।

नौवीं कक्षा थी और अब तक सक्षम ने एक कठिन संकल्प ले लिया था कि वो engineering करेगा। 

Science subject की पढ़ाई अपने आप में कठिन होती है, फिर engineering में selection बिना coaching के संभव नहीं था।

फिर इसकी preparation से लेकर engineering करने तक का ख़र्चा बहुत अधिक होना था, लोगों ने उससे कहा भी, इतना करना तुम्हारे लिए असंभव है। 

पर लोग जितना कहते, सक्षम का संकल्प और अधिक सशक्त हो जाता।

Coaching center की महंगी फीस के पैसे उसके पास नहीं थे। उसने सोचा कि super 30 में join कर ले। फिल्म आने से हर गरीब बच्चा आनंद सर तक पहुंचना चाह रहा था। Engineer बनने के सपने संजो रहा था।

पर film और serial में आने वाली बातों तक पहुंचना लगभग असंभव होता है, वो भी नहीं पहुंच पाया।

उसने online का सहारा लेना चाहा, पर mobile से आखिर कितना पढ़ता।

उसने सुबह लोगों की गाड़ियां साफ़ करना और school से लौटकर 2 घंटे waiter का काम करना, साथ ही छोटा-मोटा कुछ और काम भी करना शुरू कर दिया।

फिर उसने किश्तों में एक laptop खरीदा, online classes के लिए, और शाम को 2 घंटे के लिए एक library में जाना शुरू किया। जिसकी उसे fees भी देनी होती थी, जो कि मात्र ₹2000 थी, पर इतनी fees भी उसके लिए मात्र नहीं थी...

उसकी लगन देखकर library वाले ने उसे school की छुट्टी होने वाले दिनों में भी आने की permission दे दी।

कुछ अच्छे लोगों ने उसे Aakash and FIITJEE के notes उसे free में दे दिये।

वो अपनी मंजिल पाने तक जूझता रहा, अपनी कठिन परिस्थितियों के कारण बहुत से काम करके पैसों की कमी पूरी करने के लिए और बेइंतहा पढ़ता रहा, अपने सपने को साकार करने के लिए।

आखिरकार सक्षम के दृढ़संकल्प ने उसे उसकी मंजिल तक पहुंचा ही दिया, उसका DTU में selection हो गया।

और इससे ही यह बात सिद्ध हो गई कि जो दृढ़संकल्पित होता है, उसे मंजिल अवश्य मिलती है।

मेहनत तू किए जा, 

तुझको परिणाम मिलेगा...

यह पूरा गीत, link पर click करके आप सुन सकते हैं, आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी- https://shadesoflife18.blogspot.com/2022/07/poem.html?m=1