आजकल मन अशांत-सा रहता है, ऐसा प्रतीत होता है मानो दुनिया में सबसे अधिक दुःख हमें ही है।
न किसी से मिलने की इच्छा, न कहीं जाने की। मानो दुनिया रुकी-सी, थमी-सी हो गई हो। आपको भी कभी ऐसा लगता होगा?
पर एक बात कहें, मानो तो आप ही सबसे ज़्यादा दुःखी, और अगर चारों ओर नजर घुमाएंगे तो एहसास होगा कि पूरी दुनिया ही दुखों की है। A true sense of melancholy!
दुखों की दुनिया
कहीं कोई सुखी है ही नहीं। किसी को किसी बात की परेशानी, तो किसी को किसी और बात का ग़म।
सच में इधर कुछ ऐसे लोगों से मुलाकात हुई कि एहसास हुआ कि अभी भी हम ही भाग्यशाली हैं कि अभी भी हम बहुत सुखी हैं।
दरअसल हम मनुष्यों की एक विशेष आदत होती है, कि हम दूसरे के दुःख को कम और अपना बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं।
जबकि दुख तो दुःख होता है, कम या ज़्यादा कहाँ होता है। वैसे ही जैसे दर्द तो दर्द होता है, किस जगह हो रहा है, उससे उसकी intensity में कोई फर्क नहीं पड़ता है।
तो दूसरों की तकलीफ़, कष्ट, परेशानी की समझने का प्रयास कीजिए, उसे खत्म करने की कोशिश कीजिए। इससे देखिएगा, आपके कष्ट अपने आप कम लगने लगेंगे।
और शायद सचमुच दूसरों के दुःख कम करते-करते आपके दुःख कम हो जाएँ या फिर शायद खत्म ही हो जाएँ।
कबीरदास जी का यह दोहा शायद आपने सुना होगा-
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।”
आज उसी दोहे की तर्ज़ पर-
“दुःखी जो देखन मैं चला, दुःखी मिलिया सब कोय।
जो दिल खोजा आपना, मेरा दुःख ही कम होय।।”
हे ईश्वर, आपसे कामना है कि इस दुखों की दुनिया में से सबके दुखों को खत्म कर दें और सभी को सुखी करें।
सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे भवन्तु निरामया...


