Saturday, 21 March 2026

Short Story : The Silent Business

The Silent Business


राम किशोर, बेहद शांत प्रवृत्ति का प्रसन्नचित्त व्यक्ति था, कोई कुछ भी कहे, कभी पलटकर जवाब नहीं देता था।

वह नितप्रति दिन एक काम करता, बेलपत्र, भांग, धतूरा, अक्षत, दूध, गंगाजल, सरसों का तेल, काले तिल, उड़द दाल, कपूर, मौली, अक्षत, चंदन, गुड़हल फूल, आदि में से कोई चार चीजें, public place वाली lift और सड़क-किनारे चढ़ा देता, कुछ पूजा-पाठ करता और चला जाता।

लोगों के मन में curiosities उठतीं कि वह करता क्या है? कुछ तो उसे गाली-गलौज देते, प्रताड़ित करते, मारते-पीटते कि क्या जादू-टोना कर रहा है, पर कुछ न बोलता, बस प्रणाम करता, धन्यवाद देता और चला जाता।

लोगों को वो बहुत weird लगता, पर उसके शांत प्रवृत्ति ने लोगों को उसे मारने-पीटने और गाली-गलौज देने से रोक दिया, पर curiosity लोगों में तब भी बनी रही। 

अब लोगों ने प्यार से कारण पूछा, तो उसने कहा कि सब शुभ रहे, इसलिए करता है।

तो लोगों ने पूछा कि lift और road पर क्यों? मंदिर में क्यों नहीं?

जीवन चलता है, lift और road भी, तो बस इसलिए ही कि सब ठीक से चलता रहे।

तो क्या सब ठीक है?

बिल्कुल, मेरा शांत और प्रसन्नचित्त रहना इसका प्रतीक है।

बात सही थी, लोग प्रभावित होने लगे, उससे पूजा की विधि और कब क्या और कहां से सामग्री लेनी है, पूछने लगे, क्योंकि शांत और प्रसन्नचित्त तो सब रहना चाहते हैं।

उसने कहा, कुछ खास नहीं, एक तो बस यह कि जिस lift या road के किनारे यह सब चढ़ा है, वहां और नहीं चढ़ाना है।

दूसरा, पूजा किसी भी हिन्दू देवी-देवता की अपनी श्रद्धा अनुसार करनी है, उन पर विश्वास पूर्ण करना है, साथ ही प्रयास करना है, शांत और प्रसन्नचित्त रहने का।

और रही सामग्री की बात, तो वो सब जगह-जगह मिल जाएगी, बस खोजना होगा। हाँ, मैं भी किफायती कीमत पर सब उपलब्ध करा सकता हूं।

कौन मेहनत करे, जब बिना ढूंढें, किफायती कीमत में सब मिल सकता है। कुछ ही दिनों में उसके पास से बहुत लोगों ने सामग्री लेनी आरंभ कर दी।

अकरम को राम किशोर का फैलता-फूलता व्यापार रास नहीं आ रहा था, उसे लगा इसने लोगों को उल्लू बना कर अपना व्यवसाय जमा लिया है, साथ ही अंधविश्वास फैला रहा है सो अलग।

एक दिन वो राम किशोर के घर जा धमका, पर यह क्या?

राम किशोर की अवस्था, वैसी की वैसी, कोई सुधार नहीं, अकरम बोला, अमा मियां, बड़े बेवकूफ व्यवसायी हो, इतना अंधविश्वास फैला कर भी, हालत में कोई सुधार नहीं...

कैसा अंधविश्वास, महाशय? और कैसा सुधार?

जो तुमने ढोंग फैलाया है वही, फिर भी तुम्हारी लक्ष्मी जी प्रसन्न नहीं हुईं।

अपने जैसा समझे हो, जो दूसरों की खुशियों का मोल लगाकर मैं पैसा कमाऊंगा...

और मेरा silent business तो अपने ज़ोर पर है..

और वो क्या है?

मेरे चारों तरफ शांत और प्रसन्नचित्त लोगों की संख्या बढ़ गई है, मनुष्य जन्म सार्थक हो गया है, बाकी सब नश्वर है, यहीं रह जाना है। तो उसकी चिंता में घुलकर, दूसरों को क्यूं ठगूं?

अकरम, जिस जोश में राम किशोर के व्यवसाय को ठप कराने आया, उतने ही शांतचित्त से लौट गया, दूसरों में सुख-शांति की कामना फैलाने का सोच कर...

आज राम किशोर के silent business का एक और customer बढ़ गया था…

Friday, 20 March 2026

India's Heritage : क्यों पड़ा नाम दुर्गा?

माँ भगवती नें दुर्गम के साथ जब अंतिम युद्ध किया, तब उन्होंने भुवनेश्वरी, काली, तारा, छीन्नमस्ता, भैरवी, बगला तथा दूसरी अन्य महा शक्तियों का आह्वान कर के उनकी सहायता से दुर्गम को पराजित किया था।

इस भीषण युद्ध में विकट दैत्य दुर्गम को पराजित करके उसका वध करने पर माँ भगवती दुर्गा नाम से प्रख्यात हुईं।

क्यों पड़ा नाम दुर्गा?


दुर्गा नाम इस कारण पड़ा, क्योंकि माता ने प्राचीनकाल में दुर्गम नामक एक भयानक असुर का वध किया था, और इसी ‘दुर्ग’ (अर्थात् ‘असुर’) का वध करने के कारण उन्हें देवी दुर्गा कहा जाने लगा।

देवी भागवत जैसे पौराणिक ग्रंथों में इस घटना का विस्तार से वर्णन है, जिसमें बताया गया है कि दुर्गम असुर ने वेदों को छिपाकर संसार में असंतुलन पैदा कर दिया था, जिसे देवी ने अपने वध से समाप्त किया।

आइए, इस घटनाक्रम व पौराणिक कथा को विस्तार से समझते हैं।


असुर दुर्गम का अत्याचार :

एक प्राचीन असुर था जिसका नाम दुर्गम था। उसने ब्रह्माजी से वरदान पाकर वेदों को छिपा दिया था, जिससे दुनिया में अज्ञानता और पाप फैल गया था।


देवताओं की रक्षा :

देवताओं ने देवी उमा से इस संकट को दूर करने के लिए प्रार्थना की।


देवी दुर्गा का प्राकट्य :

देवताओं की रक्षा के लिए, देवी उमा ने दुर्गा का रूप धारण किया और दुर्गम असुर से युद्ध किया।


दुर्गम का वध :

भयंकर युद्ध के बाद, देवी दुर्गा ने दुर्गम असुर का वध किया और देवताओं को देवलोक वापस दिलवाया।


नाम की उत्पत्ति :

दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण ही देवी उमा को दुर्गा नाम से भी जाना जाने लगा।


जयकारा शेरावाली दा, बोलो सांचे दरबार दी जय!

Thursday, 19 March 2026

Bhajan : मेरी जगदम्बा

मेरी जगदम्बा


आती हैं संग में लेकर बहार,

लाती हैं संग में खुशियां अपार, 

बड़े दिलवाली हैं मेरी जगदम्बा। 

आशीष देने आई हैं मेरी जगदम्बा।


माँ दर्शन देने आएं तो, 

उनकी पायलें बजती हैं ऐसे,

उनकी रून-झुन सुन ले जो,

वो भक्त दीवाना न हो कैसे?


भक्तों की महारानी हैं माँ जगदंबा।

बड़े दिलवाली हैं मेरी जगदम्बा।

आशीष देने वाली हैं मेरी जगदम्बा।


माँ दर्शन देने आएं तो,

उनके कंगन खनकते हैं ऐसे,

उनकी खनखन सुन ले जो,

वो भक्त दीवाना न हो कैसे?


भक्तों की महारानी हैं माँ जगदंबा।

बड़े दिल हैं मेरी जगदम्बा।

आशीष देने वाली हैं मेरी जगदम्बा।


माँ दर्शन देने आएं तो,

उनके बिंदिया चमकती है ऐसे,

उसकी चमक देख ले जो,

वो भक्त दीवाना न हो कैसे? 


भक्तों की महारानी हैं माँ जगदंबा।

बड़े दिलवाली हैं मेरी जगदम्बा।

आशीष देने वाली हैं मेरी जगदम्बा।


बन-संवर के निकले,

आया नवरात्रि का जो महीना,

हर कोई समझे यह,

माँ का दर्शन उसी को ही मिलना।  


भक्तों की महारानी हैं माँ जगदंबा।

बड़े दिलवाली हैं मेरी जगदम्बा।

आशीष देने वाली हैं मेरी जगदम्बा।

(आने से जिसके आए बहार, जाने से जिसके जाए बहार की तर्ज़ पर)


आप सभी को चैत्र नवरात्र पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

विक्रम संवत नववर्ष 2083 की आप सभी को विशेष शुभकामनाएँ!