Monday, 23 March 2026

India's Heritage‌‌ : सनातन कितना आधुनिक?

आज के अपने विरासत के इस अंक के लिए, ऐसी विशिष्ट विशेषता पता चली है कि उसे आप सबसे साझा किए बिना नहीं रहा जा सकता है।

हम किस विषय में बात कर रहे हैं, वो तो बाद में बताते हैं, पहले इस विषय में बात कर लेते हैं कि त्रेतायुग सत्य है और कितना आधुनिक है, क्यों हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, सनातन है, सत्य है... 

सनातन कितना आधुनिक?


(I) त्रेतायुग व पुष्पक विमान :

त्रेतायुग में पुष्पक-विमान हिन्दू पौराणिक महाकाव्य रामायण में वर्णित वायु-वाहन था। इसमें लंका का राजा रावण आवागमन किया करता था।

युद्ध के लिए अग्नि, जल व वायु के तीर उपयोग में लिए जाते थे, जो वैसे ही हैं, जैसे आजकल missiles को छोड़ा जाता था।


(II) सनातन की अत्याधुनिकता :

यह सिद्ध करता है कि वायु-वाहन missiles का अविष्कार तो त्रेतायुग में ही हो गया था, अर्थात् भारत सदियों से ही अत्याधुनिक था।

यह ही है भारत का सत्य, भारत का इतिहास, पर इन्हें पौराणिक कथा का नाम देकर भारतीय संस्कृति को संकीर्ण कर दिया गया।

आगे हम जिस विषय में बताने जा रहे है, उसे हम सब में से ना जाने कितने लोगों ने पढ़ा होगा, पर ऐसा लिखा क्यों है, इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया होगा।


(III) रामचरितमानस :

बात कर रहे हैं तुलसीदास की रामचरितमानस की, हिन्दूओं के पवित्र ग्रंथ की।

तुलसीदास जी ने सुन्दरकांड में लंका में हनुमानजी के पहुंचने की बड़ी सुंदर व्याख्या की है, उसके 25वें दोहे में जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।”

अर्थ- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो भगवान की प्रेरणा से उन्चास तरह की पवन चलने लगी। हनुमान जी अट्टहास करके गरजे और उन्होंने अपना आकार इतना अधिक बढ़ा लिया कि वे आकाश तक पहुंच गए।

पर इन उन्चास मारुत का क्या अर्थ है? हवाएं तो इतनी नहीं होती हैं, फिर इस दोहे का क्या अर्थ है?

क्या तुलसीदास जी ने मारुति के लिए अतिशयोक्ति का प्रयोग किया? नहीं! 


(IV) वायु की शाखाएं :

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्कंद पुराण और वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।

अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।  

तो कैसा है? आइए जान लेते हैं।


(V) वायु के प्रकार :

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है, उसका वेद-पुराणों में अलग नाम है और आकाश में स्थित वायु का अलग नाम है, अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग।

नाम अलग होने का कारण यह है कि सबका गुण और व्यवहार अलग-अलग हैं। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।


(VI) मारुत सप्तप्रकार :

मारुति के 7 प्रकार हैं-

  • प्रवह
  • आवह
  • उद्वह
  • संवह
  • विवह
  • परिवह
  • परावह


(VII) विस्तृत जानकारी :

अब इन हवाओं के विषय में भी विस्तार से जान लेते हैं।

  1. प्रवह- पृथ्वी को लांघकर मेघ मंडल पर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और यही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं। 
  2. आवह- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
  3. उद्वह- तीसरी प्रकार की वायु का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है। 
  4. संवह- चौथी वायु का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
  5. विवह- पांचवीं वायु का नाम विवह है और यह ग्रहमंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है। 
  6. परिवह- छठी वायु है परिवह, जो सप्तऋषि मंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तऋषि आकाश में भ्रमण करते हैं।
  7. परावह- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।


(VIII) वायु के सप्तगण :

इन 7 वायु के सात-सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक की दक्षिण दिशा। इस तरह 7×7=49। कुल 49 मारुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं। 

जो सालों पहले तुलसी दास जी लिख गए, उसका ज्ञान आज भी ना जाने कितने विकसित देशों को नहीं होगा?

इस दोहे को हमने भी बहुत बार पढ़ा था, पर हमारा भी ध्यान नहीं गया था, पर आज जब पता चला, तो लगा कि, आह! कितना आधुनिक, कितना सत्य है सनातन, इसलिए चिरकालिक भी है।

गर्व कीजिए कि हम भारतीय हैं, सबसे पुरातन, सबसे आधुनिक।

आप इसे पढ़ें, साझा करके अपने अपनों को पढ़वाएं, जिससे सबको पता चल सके कि क्यों है हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ, सनातन, जितना प्राचीन उतना ही नवीन।

जय भारत, जय सनातन!

Saturday, 21 March 2026

Short Story : The Silent Business

The Silent Business


राम किशोर, बेहद शांत प्रवृत्ति का प्रसन्नचित्त व्यक्ति था, कोई कुछ भी कहे, कभी पलटकर जवाब नहीं देता था।

वह नितप्रति दिन एक काम करता, बेलपत्र, भांग, धतूरा, अक्षत, दूध, गंगाजल, सरसों का तेल, काले तिल, उड़द दाल, कपूर, मौली, अक्षत, चंदन, गुड़हल फूल, आदि में से कोई चार चीजें, public place वाली lift और सड़क-किनारे चढ़ा देता, कुछ पूजा-पाठ करता और चला जाता।

लोगों के मन में curiosities उठतीं कि वह करता क्या है? कुछ तो उसे गाली-गलौज देते, प्रताड़ित करते, मारते-पीटते कि क्या जादू-टोना कर रहा है, पर कुछ न बोलता, बस प्रणाम करता, धन्यवाद देता और चला जाता।

लोगों को वो बहुत weird लगता, पर उसके शांत प्रवृत्ति ने लोगों को उसे मारने-पीटने और गाली-गलौज देने से रोक दिया, पर curiosity लोगों में तब भी बनी रही। 

अब लोगों ने प्यार से कारण पूछा, तो उसने कहा कि सब शुभ रहे, इसलिए करता है।

तो लोगों ने पूछा कि lift और road पर क्यों? मंदिर में क्यों नहीं?

जीवन चलता है, lift और road भी, तो बस इसलिए ही कि सब ठीक से चलता रहे।

तो क्या सब ठीक है?

बिल्कुल, मेरा शांत और प्रसन्नचित्त रहना इसका प्रतीक है।

बात सही थी, लोग प्रभावित होने लगे, उससे पूजा की विधि और कब क्या और कहां से सामग्री लेनी है, पूछने लगे, क्योंकि शांत और प्रसन्नचित्त तो सब रहना चाहते हैं।

उसने कहा, कुछ खास नहीं, एक तो बस यह कि जिस lift या road के किनारे यह सब चढ़ा है, वहां और नहीं चढ़ाना है।

दूसरा, पूजा किसी भी हिन्दू देवी-देवता की अपनी श्रद्धा अनुसार करनी है, उन पर विश्वास पूर्ण करना है, साथ ही प्रयास करना है, शांत और प्रसन्नचित्त रहने का।

और रही सामग्री की बात, तो वो सब जगह-जगह मिल जाएगी, बस खोजना होगा। हाँ, मैं भी किफायती कीमत पर सब उपलब्ध करा सकता हूं।

कौन मेहनत करे, जब बिना ढूंढें, किफायती कीमत में सब मिल सकता है। कुछ ही दिनों में उसके पास से बहुत लोगों ने सामग्री लेनी आरंभ कर दी।

अकरम को राम किशोर का फैलता-फूलता व्यापार रास नहीं आ रहा था, उसे लगा इसने लोगों को उल्लू बना कर अपना व्यवसाय जमा लिया है, साथ ही अंधविश्वास फैला रहा है सो अलग।

एक दिन वो राम किशोर के घर जा धमका, पर यह क्या?

राम किशोर की अवस्था, वैसी की वैसी, कोई सुधार नहीं, अकरम बोला, अमा मियां, बड़े बेवकूफ व्यवसायी हो, इतना अंधविश्वास फैला कर भी, हालत में कोई सुधार नहीं...

कैसा अंधविश्वास, महाशय? और कैसा सुधार?

जो तुमने ढोंग फैलाया है वही, फिर भी तुम्हारी लक्ष्मी जी प्रसन्न नहीं हुईं।

अपने जैसा समझे हो, जो दूसरों की खुशियों का मोल लगाकर मैं पैसा कमाऊंगा...

और मेरा silent business तो अपने ज़ोर पर है..

और वो क्या है?

मेरे चारों तरफ शांत और प्रसन्नचित्त लोगों की संख्या बढ़ गई है, मनुष्य जन्म सार्थक हो गया है, बाकी सब नश्वर है, यहीं रह जाना है। तो उसकी चिंता में घुलकर, दूसरों को क्यूं ठगूं?

अकरम, जिस जोश में राम किशोर के व्यवसाय को ठप कराने आया, उतने ही शांतचित्त से लौट गया, दूसरों में सुख-शांति की कामना फैलाने का सोच कर...

आज राम किशोर के silent business का एक और customer बढ़ गया था…

Friday, 20 March 2026

India's Heritage : क्यों पड़ा नाम दुर्गा?

माँ भगवती नें दुर्गम के साथ जब अंतिम युद्ध किया, तब उन्होंने भुवनेश्वरी, काली, तारा, छीन्नमस्ता, भैरवी, बगला तथा दूसरी अन्य महा शक्तियों का आह्वान कर के उनकी सहायता से दुर्गम को पराजित किया था।

इस भीषण युद्ध में विकट दैत्य दुर्गम को पराजित करके उसका वध करने पर माँ भगवती दुर्गा नाम से प्रख्यात हुईं।

क्यों पड़ा नाम दुर्गा?


दुर्गा नाम इस कारण पड़ा, क्योंकि माता ने प्राचीनकाल में दुर्गम नामक एक भयानक असुर का वध किया था, और इसी ‘दुर्ग’ (अर्थात् ‘असुर’) का वध करने के कारण उन्हें देवी दुर्गा कहा जाने लगा।

देवी भागवत जैसे पौराणिक ग्रंथों में इस घटना का विस्तार से वर्णन है, जिसमें बताया गया है कि दुर्गम असुर ने वेदों को छिपाकर संसार में असंतुलन पैदा कर दिया था, जिसे देवी ने अपने वध से समाप्त किया।

आइए, इस घटनाक्रम व पौराणिक कथा को विस्तार से समझते हैं।


असुर दुर्गम का अत्याचार :

एक प्राचीन असुर था जिसका नाम दुर्गम था। उसने ब्रह्माजी से वरदान पाकर वेदों को छिपा दिया था, जिससे दुनिया में अज्ञानता और पाप फैल गया था।


देवताओं की रक्षा :

देवताओं ने देवी उमा से इस संकट को दूर करने के लिए प्रार्थना की।


देवी दुर्गा का प्राकट्य :

देवताओं की रक्षा के लिए, देवी उमा ने दुर्गा का रूप धारण किया और दुर्गम असुर से युद्ध किया।


दुर्गम का वध :

भयंकर युद्ध के बाद, देवी दुर्गा ने दुर्गम असुर का वध किया और देवताओं को देवलोक वापस दिलवाया।


नाम की उत्पत्ति :

दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण ही देवी उमा को दुर्गा नाम से भी जाना जाने लगा।


जयकारा शेरावाली दा, बोलो सांचे दरबार दी जय!