आज के अपने विरासत के इस अंक के लिए, ऐसी विशिष्ट विशेषता पता चली है कि उसे आप सबसे साझा किए बिना नहीं रहा जा सकता है।
हम किस विषय में बात कर रहे हैं, वो तो बाद में बताते हैं, पहले इस विषय में बात कर लेते हैं कि त्रेतायुग सत्य है और कितना आधुनिक है, क्यों हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, सनातन है, सत्य है...
सनातन कितना आधुनिक?
(I) त्रेतायुग व पुष्पक विमान :
त्रेतायुग में पुष्पक-विमान हिन्दू पौराणिक महाकाव्य रामायण में वर्णित वायु-वाहन था। इसमें लंका का राजा रावण आवागमन किया करता था।
युद्ध के लिए अग्नि, जल व वायु के तीर उपयोग में लिए जाते थे, जो वैसे ही हैं, जैसे आजकल missiles को छोड़ा जाता था।
(II) सनातन की अत्याधुनिकता :
यह सिद्ध करता है कि वायु-वाहन missiles का अविष्कार तो त्रेतायुग में ही हो गया था, अर्थात् भारत सदियों से ही अत्याधुनिक था।
यह ही है भारत का सत्य, भारत का इतिहास, पर इन्हें पौराणिक कथा का नाम देकर भारतीय संस्कृति को संकीर्ण कर दिया गया।
आगे हम जिस विषय में बताने जा रहे है, उसे हम सब में से ना जाने कितने लोगों ने पढ़ा होगा, पर ऐसा लिखा क्यों है, इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया होगा।
(III) रामचरितमानस :
बात कर रहे हैं तुलसीदास की रामचरितमानस की, हिन्दूओं के पवित्र ग्रंथ की।
तुलसीदास जी ने सुन्दरकांड में लंका में हनुमानजी के पहुंचने की बड़ी सुंदर व्याख्या की है, उसके 25वें दोहे में जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -
“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।”
अर्थ- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो भगवान की प्रेरणा से उन्चास तरह की पवन चलने लगी। हनुमान जी अट्टहास करके गरजे और उन्होंने अपना आकार इतना अधिक बढ़ा लिया कि वे आकाश तक पहुंच गए।
पर इन उन्चास मारुत का क्या अर्थ है? हवाएं तो इतनी नहीं होती हैं, फिर इस दोहे का क्या अर्थ है?
क्या तुलसीदास जी ने मारुति के लिए अतिशयोक्ति का प्रयोग किया? नहीं!
(IV) वायु की शाखाएं :
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्कंद पुराण और वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।
अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।
तो कैसा है? आइए जान लेते हैं।
(V) वायु के प्रकार :
दरअसल, जल के भीतर जो वायु है, उसका वेद-पुराणों में अलग नाम है और आकाश में स्थित वायु का अलग नाम है, अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग।
नाम अलग होने का कारण यह है कि सबका गुण और व्यवहार अलग-अलग हैं। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।
(VI) मारुत सप्तप्रकार :
मारुति के 7 प्रकार हैं-
- प्रवह
- आवह
- उद्वह
- संवह
- विवह
- परिवह
- परावह
(VII) विस्तृत जानकारी :
अब इन हवाओं के विषय में भी विस्तार से जान लेते हैं।
- प्रवह- पृथ्वी को लांघकर मेघ मंडल पर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और यही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।
- आवह- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
- उद्वह- तीसरी प्रकार की वायु का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।
- संवह- चौथी वायु का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
- विवह- पांचवीं वायु का नाम विवह है और यह ग्रहमंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।
- परिवह- छठी वायु है परिवह, जो सप्तऋषि मंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तऋषि आकाश में भ्रमण करते हैं।
- परावह- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।
(VIII) वायु के सप्तगण :
इन 7 वायु के सात-सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-
ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक की दक्षिण दिशा। इस तरह 7×7=49। कुल 49 मारुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।
जो सालों पहले तुलसी दास जी लिख गए, उसका ज्ञान आज भी ना जाने कितने विकसित देशों को नहीं होगा?
इस दोहे को हमने भी बहुत बार पढ़ा था, पर हमारा भी ध्यान नहीं गया था, पर आज जब पता चला, तो लगा कि, आह! कितना आधुनिक, कितना सत्य है सनातन, इसलिए चिरकालिक भी है।
गर्व कीजिए कि हम भारतीय हैं, सबसे पुरातन, सबसे आधुनिक।
आप इसे पढ़ें, साझा करके अपने अपनों को पढ़वाएं, जिससे सबको पता चल सके कि क्यों है हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ, सनातन, जितना प्राचीन उतना ही नवीन।
जय भारत, जय सनातन!


