Friday, 16 October 2026

India's Heritage : षष्ठी क्यों विशेष?

आज शारदीय नवरात्रि पर्व की षष्ठी है, जो कि बहुत विशेष है। पर आखिर किस तरह से विशेष?

आइए, बताते हैं आपको। 

सनातन धर्म में दोनों नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) पर्व के प्रथम दिवस से ही विशेष मानते हैं।

लेकिन बंगाली समाज में, जिसमें दुर्गा माता को मुख्य विशेषता प्रदान की जाती है, उसकी मान्यता सनातन धर्म से कुछ अलग है।

वहाँ शारदीय नवरात्रि पर्व को अधिक महत्व दिया जाता है, तथा वहाँ नवरात्रि पर्व नवरात्र से एक दिन पहले, यानी महालया से प्रारंभ मानी जाती है।

महालया की क्या विशेषता है, यह हम आपको अगले साल महालया के दिन ही बताएंगे। आज षष्ठी है, तो विशेषता भी षष्ठी पर्व की ही बताते हैं…

षष्ठी क्यों विशेष?


आप कहेंगे कि हम तो बंगाली नहीं हैं, फिर कैसे बताएँगे?

तो ऐसे, कि हमारे पति की पहली posting Durgapur (West Bengal) में ही थी।

साथ ही अभी भी, हम जब दिल्ली में रहते हैं, तो यहाँ भी शारदीय नवरात्रि पर्व Bengali culture से ही मनाते हैं।

पंडाल अपनी पूर्ण सजावट से सुसज्जित हो चुका है, माता रानी का आगमन हो चुका है और इस विशेष आयोजन ने ही हमें आज की post India's Heritage segment में लिखने को प्रेरित किया है‌।

हाँ तो आप को बता दें, महालया से प्रारंभ तो होता है, लेकिन वो rituals केवल मातारानी की मूर्ति के लिए होता है।

लेकिन माता रानी के पंडाल की सम्पूर्ण सजावट और माता रानी का आगमन नवरात्रि पर्व की षष्ठी में ही होता है।

बंगाली पूजा-पंडालों में माँ दुर्गा का आगमन और उनका आह्वान मुख्य रूप से महाषष्ठी की शाम को ‘Bodhan’ नामक अनुष्ठान के साथ होता है।

महाषष्ठी की शाम को देवी का बोधन और आह्वान किया जाता है, जिससे उनकी आंखें खोली जाती हैं और प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया होती है।

एक विशेष परंपरा के अंतर्गत इससे पहले पंचमी के दिन ‘कल्पारंभ’ और बेल के पेड़ के नीचे मां को निमंत्रण देने की रस्म होती है, और षष्ठी की संध्या बेला में माँ का पंडाल में वास्तविक आगमन माना जाता है।

जिसमें माँ दुर्गा की विशाल मूर्ति महिषासुर का मर्दन करते हुए, और माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, गणेश जी और कार्तिकेय जी की मूर्तियां होती है।

दुर्गा माता की मूर्ति से थोड़ी छोटी बाकी मूर्तियां होती हैं। सभी भगवान जी की मूर्तियाँ अपने-अपने वाहन‌ पर आसीन होती है।

इस तरह से बंगाल में शारदीय नवरात्रि पर्व का मुख्य आरंभ षष्ठी से आरंभ होकर विजयादशमी पर्व तक सिंदूर खेला के पश्चात् मूर्ति विसर्जन तक होता है।

नवरात्रि पर्व के षष्ठी के साथ ही वो पूर्णतः माँ को समर्पित हो जाते हैं। इन दिनों पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, सब माँ को समर्पित रहता है।

घर में विभिन्न कार्य जैसे भोजन इत्यादि बनाना सब पंडाल में ही रहता है। अर्थात् सब को छोड़कर, सिर्फ और सिर्फ माँ की भक्ति।

विभिन्न तरह के cultural programmes भी पंडाल में आयोजित किए जाते हैं।

इसलिए ही बंगाल को आज भी culturally rich कहा जाता है।

यही कारण है कि षष्ठी को शारदीय नवरात्र में विशेष महत्त्व दिया जाता है।

वैसे हमारे लिए यह एक और कारण से भी विशेष है, क्योंकि शारदीय नवरात्रि पर्व की षष्ठी को ही मातारानी ने हमें कन्या रूपी बहुमूल्य रत्न प्रदान कर माँ बनने का विशेष सौभाग्य प्रदान किया था।

बोलो दुग्गा माई की जोय!

Thursday, 15 October 2026

India's Heritage : The Rise of Navadurga

(I) Her Emergence :

नवरात्रि पर्व चल रहा है, जिसमें जग-जननी माँ जगदम्बा की पूजा-अर्चना करते हैं। पर माँ दुर्गा का प्रकटीकरण किस प्रकार हुआ?

किस कारण हुआ? और वो शक्ति स्वरूपा क्यों कहलाती हैं। वो इतनी विशेष क्यों है? महिषासुर कौन था, उसे किस से और वरदान प्राप्त था। माँ दुर्गा क्यों उन्हें महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है?

ऐसे बहुत से प्रश्न दिमाग में घूमते हैं। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर share कर रहे हैं आज के India's Heritage segment में…

The Rise of Navadurga


(II) Traditional Stories :

पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ दुर्गा का जन्म देवताओं के सामूहिक तेज (ऊर्जा) से हुआ था। इसकी मुख्य कहानी कुछ इस प्रकार है।

महिषासुर नाम का एक अत्याचारी दुराचारी राक्षस था, लेकिन उसमें बहुत अधिक बल तब आया, जब उसने भगवान ब्रह्मा की कठिन तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया था कि किसी भी पुरुष या देवता के हाथों उसकी मृत्यु नहीं होगी।

ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर वही हुआ, जो होना था। महिषासुर के अत्यंत अहंकारी और बलशाली हो गया।

उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवराज इंद्र को हरा दिया और देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया।

महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव (शिव) के पास सहायता मांगने पहुँचे।

देवताओं की बात सुनकर त्रिमूर्ति ने विचार-विमर्श किया कि अब कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे महिषासुर का अत्याचार समाप्त हो जाए।

लेकिन रुकावट ब्रह्मा जी का वरदान बन रहा था। उनके अनुसार कोई भी पुरुष या देवता महिषासुर का अंत नहीं कर सकता था।

सोचा किसी देवी से महिषासुर का अंत करने को कहा जाए। लेकिन वरदान के पश्चात् महिषासुर अत्यंत बलशाली हो चुका था।

साथ ही त्रिदेव यह भी चाहते थे कि उसे अधिक मौके न दिए जाएँ और एक भी बार के युद्ध के साथ महिषासुर के अत्याचार को समाप्त कर दिया जाए।


(III) Shakti's Rise :

इस सोच के साथ ही माँ दुर्गा का प्रकटीकरण इस प्रकार हुआ।

  • त्रिदेवों और सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य और तेजस्वी ऊर्जा (तेज) प्रकट हुई।
  • भगवान शिव के तेज से माँ का मुख बना।
  • भगवान विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं।
  • ब्रह्मा जी के तेज से चरण बने।
  • अन्य सभी देवी-देवताओं के तेज से शरीर के विभिन्न अंग और दिव्य शक्तियाँ प्रकट हुईं।
  • इस प्रकार समस्त शक्तियों के पुंज से एक अद्युत और त्रिलोकी शक्ति माँ दुर्गा (आदिशक्ति) का प्रकटीकरण हुआ।

(IV) Her Accessories :

जब शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बा का प्रकटीकरण हो गया, तो निर्धारित किया गया कि माँ दुर्गा को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित किया जाए।

अतः त्रिदेवों व देवताओं द्वारा माँ दुर्गा को अस्त्र-शस्त्र और सवारी प्रदान किए गए।

प्रकटीकरण के बाद सभी देवताओं ने माँ दुर्गा को अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।

  • भगवान शिव ने त्रिशूल दिया।
  • भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र दिया।
  • इंद्र देव ने वज्र प्रदान किया।
  • वरुण देव ने शंख और पाश दिया।
  • हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह (शेर) भेंट किया।

इस तरह से शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बा का प्रकटीकरण हुआ। इसके पश्चात् माँ दुर्गा ने महिषासुर के साथ भीषण युद्ध किया और उसका वध किया।


इस प्रकार माँ जगदम्बा का प्रकटीकरण हुआ, महिषासुर के मर्दन के लिए, उसके बाद ही उनका नाम महिषासुरमर्दिनी पड़ा।

उनके अंदर त्रिदेवों व देवताओं की शक्ति समाहित थी, इसलिए ही उन्हें शक्ति-स्वरूपा कहा जाता है, और इसलिए वह विशेष भी हैं।

बोलो दुर्गा माता की जय!

माँ, आपके सभी भक्तों पर आपकी अनुकम्पा बनी रहे।

कल आपको बताएंगे कि सप्तमी, अष्टमी, और नवमी को अधिक महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं? उन्हें महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी क्यों कहते हैं?

Stay tuned…

Tuesday, 13 October 2026

Recipe : Aloo Lachcha Tikki

नवरात्रि चल रही है और बहुत से लोग पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, जिसमें वो फलाहारी व्यंजन ही खाते हैं। पूरे नौ दिन तक फलाहारी व्यंजन खाना हो तो variety भी चाहिए। 

आप इसके लिए हमारे fast special segment के link पर click कर सकते हैं- https://shadesoflife18.blogspot.com/search/label/Recipes%20-%20Fasts?m=0

इसी segment में आज एक और recipe share कर रहे हैं। और यह recipe जितनी easily prepare होगी, उतनी ही all time favourite भी है।

वो है आलू की टिक्की, super crispy, but without rice flour, corn flour etc…

आलू लच्छा टिक्की


Ingredients :

  • Boiled potatoes - 2 (medium)
  • Grated potatoes - 6 (medium)
  • Pink salt - as per taste 
  • Pure ghee - shallow frying


Method :

  1. उबले आलू को mash करके fine paste बना लीजिए।
  2. अब इसमें सेंधा नमक और आलू के लच्छे डालकर अच्छे से mix कर लीजिए।
  3. अब इसे टिक्की जैसा shape दे दीजिए।
  4. Pan पर शुद्ध देसी घी डालकर आलू की टिक्की को दोनों तरफ से golden brown होने तक shallow fry कर लीजिए।

Your scrumptious Aloo Lachcha Tikki is ready to serve!


Tips and Tricks :

  • इसमें उबले और कच्चे आलू के combination से टिक्की बनाते हैं।
  • पर ध्यान रखिएगा कि उबला आलू, सिर्फ इतना ही होना चाहिए, जितनी से binding हो, extra होने से टिक्की में proper crisp नहीं आएगा।
  • इसमें उबले आलू से binding होती है, जो binding के साथ टिक्की को अंदर से soft और moist बनाता है। और कच्चे आलू से crispy texture आता है।
  • यही कारण है कि इस टिक्की में rice flour और corn flour की requirement न तो binding के लिए चाहिए, न crispy texture के लिए चाहिए।
  • जबकि ऐसी बनी टिक्की का taste और crisp गजब का आता है, इसलिए आप इसे व्रत में बना सकते हैं।
  • और आलू की टिक्की की चाट के लिए भी...

व्रत न होने से भी ऐसे ही बनाएँ, और as a chaat relish करें…