Thursday, 26 March 2026

India's Heritage : मंत्रों से बढ़कर तेरा नाम

आज आप सब के साथ मुझे उत्तराखंड के भुवन चंद्र अवस्थी जी के विचार को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

भुवन जी बहुत ही ज्ञानी, जीवन्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक भाव के प्राणी है। 

उनके साथ विचार-विमर्श के पश्चात्, बहुत से प्रश्न उठे, जिनका सिलसिलेवार तरीके से अध्ययन किया।

जो पता चला, वो बहुत ही रोचक व अंतरात्मा को शांति प्रदान करने वाला था, तो सोचा उसे ही साझा करें।

आज के India's Heritage segment में वही, जिस सत्य के बिना हम नहीं।

हम हिन्दुओं में राम नाम का बहुत महत्व है, पर क्यों? क्यों भारत में लोग एक-दूसरे से मिलने पर good morning, सुप्रभात इत्यादि न कह कर राम-राम कहा करते थे? और क्यों एक बार राम न कह कर दो बार राम नाम दोहराते थे, अर्थात् राम न कहकर राम-राम कहा करते थे।

आज इसी को बताने जा रहे हैं, उनके शब्दों में...

मंत्रों से बढ़कर तेरा नाम


राम-राम का महत्व :

सबसे पहले तो good morning या सुप्रभात कहने से आप एक-दूसरे के उस सुबह के शुभ होने की कामना करते हैं। पर पता है, जब आप राम-राम कहते हैं तो क्या होता है?

राम नाम की अगर मात्रा का जोड़ करते हैं तो: 

र्+अ+म् = 54 आता है।

दो बार अगर राम बोलते हैं तो:

54+54 = 108 

मतलब आप दो बार राम नाम बोलते हैं तो उसका प्रभाव 108 बार जाप करने के बराबर हो जाता है।

जब आप राम-राम कहते हैं तो प्रतिउत्तर में अगला भी राम-राम कहता है, अर्थात् उसने भी 108 बार राम नाम का जाप कर लिया।


108 बार मंत्र-जाप की परंपरा :

मंत्र जाप जब भी किया जाता है तो 108 बार जाप करने की परंपरा है, पर क्यों? यह भी देख लेते हैं।

जप (मंत्रों का जाप) 108 बार करने की परंपरा के पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं। माना जाता है कि 108 बार जाप करने से ब्रह्मांड के कंपन के साथ सामंजस्य स्थापित करने में मदद मिलती है, और यह संख्या पवित्र मानी जाती है।


इसके प्रमुख कारण :

  • वैदिक संस्कृति में महत्व- 108 को वैदिक संस्कृति में पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। 
  • सूर्य, चंद्रमा व पृथ्वी का संबंध- सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी से औसत दूरी उनके व्यास का 108 गुना है। 
  • ऊर्जा रेखाएँ- 108 ऊर्जा रेखाएँ हृदय चक्र में मिलती हैं, जो जीवन का केंद्र है।
  • माला में मोती- हिंदू मालाओं में 108 मनके होते हैं, जो 108 बार जाप करने का प्रतीक हैं। 
  • श्वासों की संख्या- कुछ लोगों का मानना है कि 108 संख्या 24 घंटे में मनुष्य द्वारा ली जाने वाली 21,600 सांसों से संबंधित है। 
  • नक्षत्र और चरण- 27 नक्षत्रों और प्रत्येक के 4 चरणों को मिलाकर 108 बनता है। 
  • ज्योतिषीय महत्व- 12 राशियाँ और 9 ग्रहों का गुणनफल 108 होता है। 
  • ब्रह्मांड का प्रतीक- 108 संख्या ब्रह्मांड की संपूर्णता और गति का प्रतिनिधित्व करती है।

संक्षेप में, 108 बार जाप करने से आध्यात्मिक लाभ, ऊर्जा का प्रवाह, और ब्रह्मांड के साथ संबंध स्थापित करने में मदद मिलती है।


अर्थात् आपके good morning या सुप्रभात कहने से आप एक-दूसरे के लिए केवल उस सुबह को शुभ बनाते हैं, लेकिन राम-राम कहकर, आप केवल एक सुबह, एक दिन को नहीं बल्कि उसके सम्पूर्ण जीवन को संपूर्णता देकर शुभ बनाते हैं और यदि सब प्रत्येक दिन राम-राम कहते हैं, तो उनका मानव जन्म लेना सार्थक हो जाता है। 

सोचिए कितना सहज और सरल है, इस विधि से प्रभू की आराधना करना, जिसमें एक निमिष मात्र पल में आपने 108 बार का जाप कर लिया और बाकी जितनों ने उसका उत्तर दिया, उन सभी ने भी 108 बार का मंत्र जाप कर लिया।

बस यही है राम नाम की महिमा, और इसलिए कहा भी गया है:

“मंत्रों से बढ़कर तेरा नाम, 

जय श्री राम, जय श्री राम, 

जय श्री राम, राजा राम!”

इतनी सहज, सुलभ, सरल और प्रभावशाली संस्कृति है, भारतीय संस्कृति और सभ्यता, और बस यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को सर्वोपरि माना जाता है।

आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय श्री राम!

भुवन जी, आपका विशेष धन्यवाद।


Wednesday, 25 March 2026

Article : अष्टमी व नवमी पर्व

चैत्र नवरात्र पर्व चल रहा है, जिसमें सभी दिन‌ विशेष और शुभ होते हैं। इसमें माँ जगदंबा, भगवती या माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है, लेकिन मुख्य रूप से अष्टमी व नवमी तिथि का महत्व अधिक होता है।

अष्टमी तिथि का इसलिए कि इस दिन बहुत से लोग अपने व्रत का पारण कर कन्या पूजन करते हैं, वहीं कुछ नवमी तिथि को कन्या पूजन करते हैं।

साथ ही चैत्र नवरात्र में नवमी तिथि का विशेष महत्व यह भी है कि इस दिन प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।


तिथियों में संशय :

पिछले कुछ सालों से त्यौहारों की तिथियों  में असमंजस रहने लगा है, और इस साल नवरात्र में अष्टमी व नवमी तिथि काई असमंजस है।

सोचा आज के लेख में दोनों तिथियों के असमंजस का खुलासा एक साथ ही कर दें, कि कब और क्यों‌ है अष्टमी व नवमी तिथि...

जिससे आप के मन में किसी तरह का कोई confusion न रहे…

अष्टमी व नवमी पर्व


महाअष्टमी तिथि :

महाअष्टमी इस वर्ष 26 मार्च 2026 (गुरुवार) को मनाई जा रही है।

कारण :

अष्टमी तिथि 25 मार्च को दोपहर 1:50 बजे शुरू होकर 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे समाप्त होगी। कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त 26 मार्च को सुबह 6:18 से 7:50 और सुबह 10:55 से दोपहर 11:48 बजे तक रहेगा। 

सभी त्यौहारों की उदया तिथि को अधिक विशेषता दी जाती है, अतः अष्टमी का कन्या पूजन 26 मार्च को होगा।


महानवमी तिथि :

चैत्र नवरात्रि की महानवमी 27 मार्च 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, और इसी दिन नवरात्रि व्रत का पारण (व्रत तोड़ना) और कन्या पूजन किया जाता है।


कारण :

नवमी तिथि 26 मार्च की सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च की सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के कारण व्रत का पारण व‌ कन्या पूजन 27 मार्च को होगा।


राम नवमी तिथि :

अगर आप राम जन्मोत्सव की तिथि देख रहे हैं, तो आपको बता दें कि राम जन्मोत्सव 26 मार्च को ही किया जाएगा।


कारण :

नवमी तिथि 26 मार्च की सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च की सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव चैत्र नवरात्र की नवमी में 12 बजे किया जाता है।

26 मार्च को नवमी का मुहूर्त 11:48 मिनट से प्रारम्भ होगा, जो कि 27 मार्च को 10:06 मिनट तक ही है, अर्थात् 27 मार्च को 12 बजे तक नवमी तिथि का मुहूर्त ही नहीं है। अतः राम जन्मोत्सव 26 मार्च को ही किया जाएगा।


आप सभी को महाअष्टमी पर्व, महानवमी पर्व व राम जन्मोत्सव पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

Monday, 23 March 2026

India's Heritage‌‌ : सनातन कितना आधुनिक?

आज के अपने विरासत के इस अंक के लिए, ऐसी विशिष्ट विशेषता पता चली है कि उसे आप सबसे साझा किए बिना नहीं रहा जा सकता है।

हम किस विषय में बात कर रहे हैं, वो तो बाद में बताते हैं, पहले इस विषय में बात कर लेते हैं कि त्रेतायुग सत्य है और कितना आधुनिक है, क्यों हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, सनातन है, सत्य है... 

सनातन कितना आधुनिक?


(I) त्रेतायुग व पुष्पक विमान :

त्रेतायुग में पुष्पक-विमान हिन्दू पौराणिक महाकाव्य रामायण में वर्णित वायु-वाहन था। इसमें लंका का राजा रावण आवागमन किया करता था।

युद्ध के लिए अग्नि, जल व वायु के तीर उपयोग में लिए जाते थे, जो वैसे ही हैं, जैसे आजकल missiles को छोड़ा जाता था।


(II) सनातन की अत्याधुनिकता :

यह सिद्ध करता है कि वायु-वाहन missiles का अविष्कार तो त्रेतायुग में ही हो गया था, अर्थात् भारत सदियों से ही अत्याधुनिक था।

यह ही है भारत का सत्य, भारत का इतिहास, पर इन्हें पौराणिक कथा का नाम देकर भारतीय संस्कृति को संकीर्ण कर दिया गया।

आगे हम जिस विषय में बताने जा रहे है, उसे हम सब में से ना जाने कितने लोगों ने पढ़ा होगा, पर ऐसा लिखा क्यों है, इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया होगा।


(III) रामचरितमानस :

बात कर रहे हैं तुलसीदास की रामचरितमानस की, हिन्दूओं के पवित्र ग्रंथ की।

तुलसीदास जी ने सुन्दरकांड में लंका में हनुमानजी के पहुंचने की बड़ी सुंदर व्याख्या की है, उसके 25वें दोहे में जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।”

अर्थ- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो भगवान की प्रेरणा से उन्चास तरह की पवन चलने लगी। हनुमान जी अट्टहास करके गरजे और उन्होंने अपना आकार इतना अधिक बढ़ा लिया कि वे आकाश तक पहुंच गए।

पर इन उन्चास मारुत का क्या अर्थ है? हवाएं तो इतनी नहीं होती हैं, फिर इस दोहे का क्या अर्थ है?

क्या तुलसीदास जी ने मारुति के लिए अतिशयोक्ति का प्रयोग किया? नहीं! 


(IV) वायु की शाखाएं :

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्कंद पुराण और वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।

अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।  

तो कैसा है? आइए जान लेते हैं।


(V) वायु के प्रकार :

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है, उसका वेद-पुराणों में अलग नाम है और आकाश में स्थित वायु का अलग नाम है, अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग।

नाम अलग होने का कारण यह है कि सबका गुण और व्यवहार अलग-अलग हैं। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।


(VI) मारुत सप्तप्रकार :

मारुति के 7 प्रकार हैं-

  • प्रवह
  • आवह
  • उद्वह
  • संवह
  • विवह
  • परिवह
  • परावह


(VII) विस्तृत जानकारी :

अब इन हवाओं के विषय में भी विस्तार से जान लेते हैं।

  1. प्रवह- पृथ्वी को लांघकर मेघ मंडल पर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और यही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं। 
  2. आवह- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
  3. उद्वह- तीसरी प्रकार की वायु का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है। 
  4. संवह- चौथी वायु का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
  5. विवह- पांचवीं वायु का नाम विवह है और यह ग्रहमंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है। 
  6. परिवह- छठी वायु है परिवह, जो सप्तऋषि मंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तऋषि आकाश में भ्रमण करते हैं।
  7. परावह- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।


(VIII) वायु के सप्तगण :

इन 7 वायु के सात-सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक की दक्षिण दिशा। इस तरह 7×7=49। कुल 49 मारुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं। 

जो सालों पहले तुलसी दास जी लिख गए, उसका ज्ञान आज भी ना जाने कितने विकसित देशों को नहीं होगा?

इस दोहे को हमने भी बहुत बार पढ़ा था, पर हमारा भी ध्यान नहीं गया था, पर आज जब पता चला, तो लगा कि, आह! कितना आधुनिक, कितना सत्य है सनातन, इसलिए चिरकालिक भी है।

गर्व कीजिए कि हम भारतीय हैं, सबसे पुरातन, सबसे आधुनिक।

आप इसे पढ़ें, साझा करके अपने अपनों को पढ़वाएं, जिससे सबको पता चल सके कि क्यों है हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ, सनातन, जितना प्राचीन उतना ही नवीन।

जय भारत, जय सनातन!