Thursday, 17 January 2019

Story Of Life : जलन (भाग- २ )

अब तक आपने पढ़ा, मनीषा व शिखा दो बहने हैं । मनीषा बहुत गोरी है, जबकि शिखा सांवली है। शिखा हमेशा मनीषा से जलती है। पर जब दोनों की बेटी होती हैं, तब मनीषा की सांवली व शिखा की बेटी गोरी होती है........ 
अब आगे...... 

जलन (भाग-२)


आज पांच साल बाद बुआ की 25 anniversary में दोनों बहन फिर से मिल रहीं थी। आज दोनों पहली बार एक दूसरे की बेटी को देखने वाली थीं।
इत्तेफाक ऐसा हुआ कि दोनों एक साथ ही घर पहुंचे। पर ये क्या आज भी सब मनीषा की तरफ ही देख रहे थे।

मनीषा की बेटी साँवली जरूर थीपर वो बहुत ही मासूम, सरल, और संस्कारी भी थी। उसके कपड़े भी बिलकुल साफ थे। उसने दूर से सबको प्रणाम प्रणाम करना शुरू कर दिया था। उसकी ऐसी मासूमियत ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। यहाँ तक शिखा की माँ की भी पहली नज़र मनीषा की बेटी मृदुल पर ही गयी।
वहीं शिखा की बेटी स्नेहा, शैतान और नकचड़ी थी।
शिखा ने उसे ड्रेस तो बहुत सुदर पहनाई थी, पर उसमे कई जगह chocolate लगी थी, और कुछ कुछ जगह और भी गंदी ही हो रही थी।
वो बहुत तेज़ी से सबको धक्का देती हुई निकल गई, जिसमे शिखा की माँ गिरते गिरते बचीं, उन्हें मृदुल के नन्हें हाथों ने थाम लिया था।
शिखा माँ के पास आ कर स्नेहा की सफाई देती हुई बोली, माँ आप तो जानतीं हैं ना? स्नेहा को अगर doggy दिख जाता है, तो बस, फिर उसे किसी बात का होश नहीं रहता है। जब घर से चली थी, तभी मैंने उसे Bruno के बारे में बताया था, तभी से वो उससे मिलने को आतुर थी। बुआ खिसियानी हंसी हंसने लगी, और शिखा स्नेहा की तरफ दौड़ गयी।
दो दिन तक स्नेहा बस Bruno में ही लगी रही, जबकि मृदुल सबसे प्यारी प्यारी बातें करके सबका दिल जीतती रही। अब दोनों के लौटने का दिन आ गया, मनीषा सुबह की ट्रेन से निकल गयी, शिखा को शाम की ट्रेन पकड़नी थी। शिखा जिस किसी से बात करती, सब बस मृदुल की याद में डूबे उसकी बात करते मिलते। सब बस यही कहने में लगे हुए थे, मृदुल कितनी प्यारी है, बिलकुल माँ जैसी ही सुंदर है, और उसकी मासूम बातों का तो क्या कहना, मन मोह लेती थी। कितनी छोटी सी है, पर सबका ध्यान रखने में तो, अपनी माँ से भी आगे निकल गयी है। कितनी सलीकेदार थी मनीषा उसे सुबह तैयार करती थी, तो कपड़े बदलने तक भी उसके कपड़े साफ ही रहते थे। भगवान ऐसी बेटी सबको दें।

सब जगह बस मृदुल मृदुल..... स्नेहा की तो कोई बात भी नहीं कर रहा था, करते भी क्या? वो कहाँ किसी से घुली मिली थी, वो तो बस दिनभर शरारते करती, या Bruno के साथ खेलती, कोई कुछ बात करता तो बस बदतमीजी से भरे जवाब देती। और कपड़े, हाथ, उनका तो क्या ही कहना, शिखा दिन भर उसे अच्छे कपड़े पहनती रहती, पर वो 5 मिनट से ज्यादा देर साफ ना रहती।
शिखा मृदुल की तारीफ सुन सुन के पक गयी थी। वो अन्दर जा कर रोने लगी। उसे रोता देख नानी ने पूछा, क्या हुआ बेटा क्यों रो रही हो?
वो बोली जब मैं छोटी थी, मनीषा के गोरे रंग के कारण सब उसे ही ज्यादा प्यार देते थे। और मुझे कोई देखता नहीं था। जब उसकी साँवली और मेरी गोरी बेटी हुई।  तब भी सब मनीषा की बेटी को ही प्यार कर रहे हैं। मेरी स्नेहा, मृदुल से कितनी गोरी और सुंदर है। पर वो किसी को दिख ही नहीं रही है।
नानी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा, बोली मेरी बात ध्यान से सुनेगी ना, मेरी प्यारी सोनपरी?........
  नानी ने शिखा से क्या कहा, जानने के लिए पढ़ें जलन (भाग-३)  

Wednesday, 16 January 2019

Story Of Life : जलन

जलन

मनीषा बेहद सुन्दर थी, उसका गोरा रंग सबको अपनी ओर खींचा करता था।
उसके मोहपाश से कोई बचता नहीं था। पर उसे इस बात का कभी घमंड नहीं था। वो बहुत मिलनसार थी, जितना उसके रूप के सब दीवाने थे, उतना ही उसके अच्छे स्वभाव के कारण भी लोग उसे बहुत पसंद किया करते थे। वहीं उसकी बुआ की बेटी शिखा बिलकुल भी मिलनसार नहीं थी, उसे सबसे पहले अपनी ही परवाह रहा करती थी, रंग भी उसका सांवला था।
अतः कोई उसे विशेष पसंद भी नहीं किया करता था। शिखा, मनीषा से बेहद जलती थी, और सदैव इसी उधेढ़बुन में रहती कि कैसे मनीषा को लोगों कि नज़र से गिराया जाए।
वो आए दिन धूप में जाने का काम मनीषा से करवाने के ही चक्कर में रहा करती, जिससे उसका गोरा रंग धूमिल हो जाए। और अगर गलती से भी मनीषा कुछ गलत कर दे, तब तो बस! सबको ये बताने से ना चुकती, कि वो कितनी बड़ी वाली बेवकूफ़ है, कि इतना जरा सा काम भी वो ठीक नहीं कर पाती है।
इसी तरह से दिन गुजर रहे थे, दोनों लड़कियाँ बड़ी हो गईं। शिखा को जब भी लड़के वाले देखने आयें, मनीषा को साफ हिदायतें दे दी जाती, कि वो बिलकुल भी बाहर न निकले। शिखा के रंग-रूप व स्वभाव के कारण कितने ही लड़के आए और गए, पर रिश्ता तय नहीं हुआ।
उधर मनीषा के लिए भी रिश्ते आने लगे, जब सुयोग्य वर मिला, तो दोनों के मिलने की बात की गयी, पहली बार ही कोई मनीषा को देखने आया था, पर उसके रंग-रूप व अच्छे स्वभाव के कारण बात एक बार में ही तय हो गयी। धूमधाम से मनीषा की शादी हो गयी, शादी में शिखा मनीषा से भी ज्यादा तैयार होकर सब जगह इतराती फिर रही थी, इकलौती बहन होने के कारण वो भाव भी बहुत खा रही थी।
चंद दिनों बाद शिखा की भी शादी तय हो गयी, कितने ही रिश्तेदार बुलाये गए, नहीं बुलाया तो केवल मनीषा को। शिखा को यही डर लगता रहा, कि मनीषा आ गयी, तो मनीषा की खूबसूरती के आगे आज फिर वो मद्ध्म पड़ जायेगी। सबने उसे बहुत समझाया भी, कि अब क्या है? एक तो उसकी शादी हो गयी है, दूसरा शादी की रात दुल्हन से ज्यादा कोई खूबसूरत नहीं लगता है।
पर जब वो नहीं मानी, तो शिखा की माँ भी कहने लगीं, इसकी शादी में इसका जिसे मन करेगा, उसी को बुलाया जायेगा। मेरे लिए शिखा की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।

मनीषा अपनी इकलौती बहन की शादी में नहीं पहुँच पायी। उस दिन वो अपने मायके को याद करके पूरे दिन गुमसुम रही। जब गलत मायके में हो रहा हो, तो बेटी कहे भी तो किससे?
चंद दिनों पश्चात मनीषा के बेटी हुई, वो साँवली थी। जब ये बात शिखा को पता चली तो वो बहुत खुश थी, कि अब मनीषा को पता चलेगा, कि जब गोरा रंग नहीं होता है, तो कैसा लगता है।
शिखा के भी एक बेटी ही हुई, वो बहुत ही गोरी हुई, उसे देखकर शिखा की बांछे खिल गयी। वो अपनी बेटी को देखकर सोचने लगी, अब मनीषा से मिलना चाहिए.......

शिखा और मनीषा के मिलने पर क्या होगा? जानते हैं जलन(भाग-२)

Tuesday, 15 January 2019

Article : मकर संक्रान्ति


मकर संक्रान्ति


मकर संक्रान्ति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है , इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है।

भारत में मकर संक्रान्ति

सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व १३ जनवरी को ही मनाया जाता है।
इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है

उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है।
इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगता है जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। १४ जनवरी से ही इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। एक समय था जब उत्तर भारत में १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक पूरे एक महीने किसी भी अच्छे काम को अंजाम भी नहीं दिया जाता था। मसलन शादी-ब्याह नहीं किये जाते थे परन्तु अब समय के साथ लोगबाग बदल गये हैं। परन्तु फिर भी ऐसा विश्वास है कि १४ जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि के आख़िरी स्नान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी परम्परा है।बागेश्वर में बड़ा मेला होता है। वैसे गंगा-स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। इस पर्व पर क्षेत्र में गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े-बड़े मेले लगते है। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी खाने एवं 
खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है।

बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाता हैं।
इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है।


महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं।
तिल-गूल नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं -"लिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला" अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। इस दिन महिलाएँ आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बाँटती हैं।


बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है।
यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहाँ लोगों की अपार भीड़ होती है। इसीलिए कहा जाता है-"सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।"

तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं।
प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं।l






राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।
गुजरात में इस पर्व को बेहद रंगीला मनाया जाता है, कि जब भी हम बात मकर संक्रांति की करते हैं तो दिमाग में सबसे पहले नाम गुजरात का आता है, यहां मकर संक्रांति के दिन अलग ही रौनक देखने को मिलती है। Pp
गुजरात में मकर संक्रांति का त्योहार उत्तरायण के नाम से जाना जाता है और इस दिन पतंगबाजी का बहुत महत्व है। पूरे विश्व में गुजरात की पतंगबाजी प्रसिद्ध है। इस दिन पूरा आसमान रंग बिरंगी पतंगों से सज रहता है। हर कोई पतंग के माध्यम से अपनी प्रार्थना अपने ईश के पास भेजता है

मकर संक्रान्ति का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-
माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियाँ चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण यह पर्व प्रतिवर्ष १४ जनवरी को ही पड़ता है।

मकर संक्रान्ति का ऐतिहासिक महत्व

ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का ही चयन किया था। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।