Monday, 21 September 2020

Tips : Perfect boiling for pasta /noodles

आज कल बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को pasta and noodles बहुत पसंद आते हैं।

Restaurants style pasta and noodles बनें, इसका key ingredient इसकी perfect boiling है।

तो आइए आज आपको यही बताते हैं।

Perfect boiling for pasta /noodles



  1. आप को जितना भी pasta/noodles boil करना है, दोनों में जिस किसी एक को आप बना रहे हैं,  उससे दो गुना बड़ा sauce pan ले लीजिए। 
  2. Sauce pan में इतना पानी लीजिए कि sauce pan में 2 inch की जगह रह जाए। इतनी जगह पानी boil होने के लिए छोड़नी चाहिए। जिससे proper boiling हो सके।
  3. पानी में 2tsp salt & 1tsp. Olive Oil  डालकर boil होने रख दीजिए।
  4. जब एक boil आ जाए तब उसमें pasta/ noddles को डाल दीजिएगा।
  5. Pasta/ noddles डालने के बाद 3 times slow and high flame करके 3 times boil कर लें। 
  6. अब, gas off कर के, इसे 5 to 10 minutes के लिए ढककर रख दीजिए।
  7. 10 minutes बाद आप एक बार अच्छे से pasta/noddles को चला लीजिए।
  8. फिर pasta/noddles को छन्नी से छान ठंडे पानी से अच्छे से धो लीजिए।
  9. अब इसमें 1tbsp. Olive oil डालकर toss कर लीजिए।( अगर noddles boil कर रहे हैं) 
  10. Pasta में olive oil डालकर toss करने की कोई requirement नहीं होती है। उसे ठंडे पानी से अच्छे से धो लेने से ही वो खिले-खिले हो जाते हैं।
  11. आप के खिले-खिले pasta/ noddles ready हैं।
  12. अब आप अपने taste के according इसका flavour ready कर लीजिए।
अगर आप white sauce pasta बनाना चाहते हैं तो यह link click करें।

और varities के pasta and noodles की recipes भी जल्दी post करेंगे।

So stay tuned.....

Friday, 18 September 2020

Article : जिन्दगी कैसी है, पहेली हाय!

 

जिन्दगी कैसी है, पहेली हाय!



एक पुराना गीत आज याद आ गया। 

जिन्दगी कैसी है, पहेली हाय!.....

जब अपनी शांत रहने वाली, प्रेम से भरी मामी जी से हमेशा के लिए बिछोह हो गया। तो मन वेदना से भर गया।

सच, समझ ही नहीं आता है, कि जीवन क्या है?

ईश्वर के द्वारा हमें दिये हुए कर्तव्यों से भरे पल, जिनका हमें निर्वाह करना है और कर्तव्यों की पूर्ति के बाद एक दिन फिर ईश्वर में समा जाना है।

कहाँ से आए थे हम, ना जाने कितने रिश्तों से जुड़ने के लिए, और दिन अचानक सब कुछ छोड़ कर हमेशा के लिए ना जाने कहाँ चले जाते हैं।

ना आने से पहले का ठिकाना, ना जाने के बाद की मंजिल का पता।

फिर भी हम सब ना जाने क्या और कितना बेवजह जोड़ते जाते हैं।

क्यों है इतनी चिंता? घर की, पैसों की, भविष्य की, बच्चों की, समाज की, नाम की......

जबकि कर्म भी सभी निश्चित और फल भी।

सब जानते हैं कि सब नश्वर है, फिर भी सब को चिंता है।

कोई ऐसा है ही नहीं, जो ईश्वर को यह दिखा सके कि, मैं परे हूँ, दीन-दुनिया से।

कभी तो लगता है, जिंदगी क्या है, सब पता है, इसका प्रारम्भ जन्म है और अंत मृत्यु।

पर अगले ही पल लगता है, जिंदगी अनबुझ पहेली है, क्योंकि,  ना आरम्भ का पता है, ना अंत का ठिकाना।‌

फिर किया क्या जाए?

शायद कर्तव्य निभाते हुए जीते जाएं, पर खुशी खुशी, साथ ही जो सत्य है उसे स्वीकार करते हुए।

वैसे भी जब सब निर्धारित है तो खुशी किसकी और ग़म भी किसका।

पर खुशी खुशी जीवन व्यतीत कर के, हम ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं। 

शाश्वत सत्य यही है कि अंततः सभी  आवागमन से मुक्त हो कर ईश्वर में समा कर मोक्ष प्राप्त करते हैं।

Wednesday, 16 September 2020

Short Stories : निवाला

आज आप सब के साथ मुझे डेहरी ऑन सोन,रोहतास बिहार के कहानीकार श्री विनय कुमार मिश्रा जी की कहानी साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। 

विनय जी ने अपनी कहानी के माध्यम से बताया है कि कठिन समय में साथ कैसे दिया जाता है।


निवाला



बड़ी बेचैनी से रात कटी। बमुश्किल सुबह एक रोटी खाकर, घर से अपने शोरूम के लिए निकला। आज किसी के पेट पर पहली बार लात मारने जा रहा हूँ। ये बात अंदर ही अंदर कचोट रही है।

ज़िंदगी में यही फ़लसफ़ा रहा मेरा कि, अपने आस पास किसी को, रोटी के लिए तरसना ना पड़े। पर इस विकट काल मे अपने पेट पर ही आन पड़ी है। दो साल पहले ही अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर कपड़े का शोरूम खोला था।

मगर दुकान के सामान की बिक्री, अब आधी हो गई है।अपने कपड़े के शोरूम में, दो लड़के और दो लड़कियों को रखा है मैंने। ग्राहकों को कपड़े दिखाने के लिए। लेडीज डिपार्टमेंट की दोनों लड़कियों को निकाल नहीं सकता। एक तो कपड़ो की बिक्री उन्हीं की ज्यादा है। दूसरे वो दोनों बहुत गरीब हैं।

 दो लड़कों में से एक पुराना है, और वो घर में इकलौता कमाने वाला है। जो नया वाला लड़का है दीपक, मैंने विचार उसी पर किया है। शायद उसका एक भाई भी है, जो अच्छी जगह नौकरी करता है। और वो खुद, तेजतर्रार और हँसमुख भी है। उसे कहीं और भी काम मिल सकता है। 

इन सात महीनों में, मैं बिलकुल टूट चुका हूँ। स्थिति को देखते हुए एक वर्कर कम करना मेरी मजबूरी है। यही सब सोचता दुकान पर पहुंचा। चारो आ चुके थे। मैंने चारो को बुलाया और बड़ी उदास हो बोल पड़ा..

"देखो, दुकान की अभी की स्थिति तुम सब को पता है, मैं तुमसब को काम पर नहीं रख सकता"

उन चारों के माथे पर चिंता की लकीरें, मेरी बातों के साथ गहरी होती चली गईं। मैंने बोतल  के पानी से अपने गले को तर किया

"किसी एक का..हिसाब आज.. कर देता हूँ!दीपक तुम्हें कहीं और काम ढूंढना होगा"

"जी अंकल"  उसे पहली बार इतना उदास देखा। बाकियों के चेहरे पर भी कोई खास प्रसन्नता नहीं थी। एक लड़की जो शायद उसी के मोहल्ले से आती है, कुछ कहते कहते रुक गई। 

"क्या बात है, बेटी? तुम कुछ कह रही थी?

"अंकल जी, इसके भाई का..भी काम कुछ एक महीने पहले छूट गया है, इसकी मम्मी बीमार रहती है"

नज़र दीपक के चेहरे पर गई। आँखों में ज़िम्मेदारी के आँसू थे। जो वो अपने हँसमुख चेहरे से छुपा रहा था। मैं कुछ बोलता कि तभी एक और दूसरी लड़की बोल पड़ी

"अंकल! बुरा ना माने तो एक बात बोलूं?"

"हाँ..हाँ बोलो ना!" 

"किसी को निकालने से अच्छा है, हमारे पैसे कम कर दो..बारह हजार की जगह नौ हजार कर दो आप" 

मैंने बाकियों की तरफ देखा

"हाँ साहब! हम इतने से ही काम चला लेंगे"

बच्चों ने मेरी परेशानी को, आपस में बांटने का सोच, मेरे मन के बोझ को कम जरूर कर दिया था।

"पर तुमलोगों को ये कम तो नहीं पड़ेगा न?"

"नहीं साहब! कोई साथी भूखा रहे..इससे अच्छा है, हमसब अपना निवाला थोड़ा कम कर दें"

मेरी आँखों में आंसू छोड़,ये बच्चे अपने काम पर लग गए, मेरी नज़रों में, मुझसे कहीं ज्यादा बड़े बनकर..!


Disclaimer:

इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।