Saturday, 5 June 2021

Kids story : पहले जैसी धरती

आप सभी को World Environment Day की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌍🌄🌳🌴

जब हो पर्यावरण संरक्षण, तभी संभव हो जीवन रक्षण 

आज के दिन के लिए, हमारे प्यारे प्यारे बच्चों के लिए एक प्यारी सी कहानी...

पहले जैसी धरती



गोलू कोरोना के कारण बहुत दुखी था। बहुत दिनों से वह खेलने नहीं गया था, ना ही उसके कोई दोस्त घर आ रहे थे।

दुखी गोलू बोला, माँ में बगीचे में जा रहा हूँ।

माँ बोली, बेटा मैं अभी काम कर रही हूँ। थोड़ी देर बाद आ पाऊंगी, तुम संभलकर रहना।

गोलू बहुत दुखी, बगीचे में घूम रहा था। तभी अचानक उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। वो लड़खड़ा कर गिरता उससे पहले किसी ने उसे गिरने से बचा लिया था।

तुम्हें चोट तो नहीं लगी गोलू? एक मीठी सी आवाज़ आई।

गोलू ने देखा, जिसने उसे संभाला था, वे एक बहुत सुंदर औरत थी, उसने हरे रंग की साड़ी पहनी थी। साफ़ लम्बे बालों में खूब सुन्दर फूल लगे थे।

गोलू उसे देखता रह गया। आप कौन हैं?, गोलू ने पूछा।

मैं धरती हूँ।

धरती! मैंने तो आप को कभी नहीं देखा। मैं हर रोज़ अपनी मांँ के साथ यहाँ आता हूँ।

जब तुम अपनी माँ के साथ होते हो तो, तुम्हें वे गिरने से संभाल लेती हैं। पर वे आज तुम्हारे साथ नहीं थीं, इसलिए मुझे आना पड़ा। फिर मैं अब ऐसी दिखती भी नहीं हूँ।

तो कैसी दिखती हैं?

तुम देखकर डर जाओगे।

आप कैसी दिखती हैं?, गोलू ज़िद पर अड़ गया।

उस औरत ने अपने असली रूप में आते हुए कहा, "ऐसी।" वह औरत बहुत दुखी थी।

उसके रुखे बाल में जगह जगह मिट्टी धूल व गन्दगी थी। उसने बेकार-सी कटी-फ़टी भूरी साड़ी पहनी हुई थी।

अरे! यह आपको क्या हो गया है?

गोलू, "इन्सानों" यानी कि मेरे बच्चों की इच्छाओं का अंत नहीं होने से ऐसा हुआ। वो पेड़ काटते गये। नदी-तालाब गंदे कर दिए। हर जगह गंदगी, सूखा, बीमारी, परेशानी है। किसी को मेरी चिंता नहीं है, जिसके कारण मेरी ऐसी हालत हो गई है।

गोलू धरती को देखकर रोने लगा, आप पहले जैसी खूबसूरत कैसे बनेंगी?

प्लास्टिक का इस्तेमाल करना बंद कर दो। और जब कोरोना खत्म हो जाए, तो तुम अपने सारे दोस्तों के साथ मिलकर खूब सारे पेड़ लगाना। नदी-तालाब को गंदा होने से बचाना। हर जगह सफ़ाई रखना, और इच्छा उतनी ही करना, जिससे ज़रुरत पूरी हो जाए। तो मैं फ़िर पहले जैसी हो जाऊंगी।

यह सुनकर गोलू खुश हो गया। वह बोला, कोरोना का अंत होते ही अपने दोस्तों के साथ मिलकर वैसा ही करुंगा, जैसा आपने कहा है।

अब गोलू को कोरोना के खत्म होने का इंतजार था, उसे धरती को पहले जैसी जो करना था।

Thursday, 3 June 2021

Satire : चौकीदार बन गये हम🤪

चौकीदार बन गये हम🤪



जब हम हुए तो सब हमको घेर कर खड़े हो गए। हम हुए ही थे एकदम गोरे चिट्टे, बहुत ही खूबसूरत।

कोई हमें लाल परी कहें, तो कोई दुर्गा माता। अप्रैल के महीने में नवरात्र में जो हुए थे।

पर कभी घमंड नहीं किया।

बचपन बीता, जवानी आयी। 

सबकी तरह हमारे शादी की भी बात चलने लगी।

अरे भईया, इतने रिश्ते आए कि पूछो नहीं।

एकदम स्वयंवर वाली feeling आ रही थी।

हमने भी एकदम संस्कारी रुख़ अपना लिया कि मम्मी, आप जिससे कहेंगी, उसी से शादी करेंगे।

उससे दो फायदे होने थे, एक तो माता जी प्रसन्न हमारी आज्ञाकारिता पर, दूसरा पति जी की कुछ भी कमी होने से जिम्मेदारी उनकी और हमें जिंदगी भर यह बोलने का अधिकार कि कैसे के पल्ले बांध दिया है...

खैर मम्मी भी बड़ी होशियार हैं। देख-परख कर एक सांवला सलोना बांका जवान ऑफीसर ढूंढ ही लिया।  

शादी हो गई। 

और जब आयी रातें....

तो देखते क्या हैं कि, पति जी मच्छरदानी लगा रहे हैं। हम तो पंखे की direct हवा लेने वाले, यह जाल-वाल हमें रास ना आए, ससुरी पंखे की हवा कम हो जाए सो अलग...

खैर, पंखे की समस्या को तो उन्होंने A.C. लाकर खत्म कर दी।

पर मच्छरों के प्रकोप के मारे, मच्छरदानी नहीं छूटी। करते भी क्या, मच्छर थे ही बहुत, सो मच्छरदानी तन जाती,  पर एक-दो मच्छर घुस भी जाता तो, पति जी तो आराम से सोते रहते, और सारे मच्छर हम से ही चिपटे रहते, काय कि हम गोरे चिट्टे और चिकने जो ठहरे। 

ऐसा नहीं था कि एक भी छिपकली ना हों। 

थीं, पर वो भी निरी निकम्मी, खाली शो-पीस बनी रहती, हमें डराने के लिए।

जैसे तैसे दिन रात गुज़रे, और हमारे लाल गोपाल हो गये। हमारे ही तरह गोरे चिट्टे बहुत ही सुन्दर।

इधर वो हुए और उधर सारी नर्सें, और supporting staff लगे भकाभक उसकी फ़ोटो खींचने।

हम बेहद गर्व से भर गये। तभी मन के आकाश में भविष्यवाणी हुई, जिस बालक को देखकर तुम इतनी खुश हो रही हो, वो एक दिन तुम्हें चौकीदार बना देगा.....

चंद दिनों में ही वो भविष्यवाणी सत्य साबित हो गई।

काहे कि अब मच्छरदानी में मच्छर घुसते तो, हमसे नहीं उससे ही चिपटे रहते, मस्त गोरे चिट्टे, soft soft बच्चे के आगे, अब हमारी पूछ खत्म हो गई थी। और हम मच्छर का रेकेट लेकर चौकीदारी करते। सारी रात चौकन्ने रहते कि बाल गोपाल को मच्छर ना काट लें। 

तब लगता, अभी तो मच्छर हैं, रेकेट से मर जाते हैं, पर आगे....

सच्ची, चौकीदार ही तो बन गये थे हम....🤪😛😄😄

Wednesday, 2 June 2021

Poem : कितनी कहानियाँ ले गया...

गर्मियों की छुट्टियों में रद्दी वाले का आना और घर से तमाम चीज़ें ले जाना, याद दिला देता है, गुज़रा ज़माना, आज उसी को याद कर, चंद पंक्तियाँ लिखीं हैं...


कितनी कहानियाँ ले गया...



किसी का बचपन, 

किसी की जवानी, 

किसी का बुढ़ापा ले गया

रद्दी वाला आया, 

और घर से 

कितनी कहानियाँ ले गया.....


वो पहला खिलौना, 

जो मेरा बचपन था सलौना

वो पहली साइकिल, 

जो सौगात में दी थी नानी ने

जो ख़ज़ाना था मेरा, 

वो कौड़ी के भाव ले गया।


किसी का बचपन, 

किसी की जवानी,

किसी का बुढ़ापा ले गया

रद्दी वाला आया, 

और घर से 

कितनी कहानियाँ ले गया.....


जिन किताबों ने हमें बहुत ज्ञान दिया था, 

जिसके कारण समाज ने 

बहुत सम्मान दिया था

उन किताबों को जिल्द से

अलग कर मानों, 

बेदाम ले गया।


किसी का बचपन, 

किसी की जवानी, 

किसी का बुढ़ापा ले गया

रद्दी वाला आया, 

और घर से 

कितनी कहानियाँ ले गया.....


गुलाबी कागज़ पर लिखे

वो दिल के किस्से, 

जिनकी बदौलत आप का 

साथ आया था मेरे हिस्से।

उन कागजों की रंगत 

वो सरेआम ले गया।


किसी का बचपन, 

किसी की जवानी, 

किसी का बुढ़ापा ले गया

रद्दी वाला आया, 

और घर से 

कितनी कहानियाँ ले गया.....


वो दादा जी का

 टूटा हुआ चश्मा,

जिसने उन्हें तर्जुबा 

तमाम दिया था, 

ता जिंदगी बहुत

आराम दिया था।

उनके अनुभव का 

साजों सामान ले गया।


किसी का बचपन, 

किसी की जवानी, 

किसी का बुढ़ापा ले गया

रद्दी वाला आया, 

और घर से 

कितनी कहानियाँ ले गया.....