Thursday, 12 January 2023

Story of Life: House number 1303 (भाग-4)

House number 1303 (भाग-1) ,

House number 1303 (भाग-2) व

House number 1303 (भाग-3) के आगे...

House number 1303 (भाग-4) 



आज की रात कुछ ज्यादा ही काली और ठंडी था, सन्नाटा पसरा हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सुहा रहा था, जिस कारण हर छोटी से छोटी आवाज़ें भी बहुत तेज सुनाई दे रही थी। 

आवाज़ तेज सुनाई देने का कारण यह भी था कि कमरे की खिड़की ठीक से बंद नहीं होती थी।

सुबह से घर को लेकर इतनी बातें सुन सुनकर, रतन को भी घर अजीब सा लगने लगा था... 

रतन सोने के लिए जाने लगा तो आज, उसने कमरे के, दोनों bulb खोल दिए, एक तार के साथ झूलता हुआ 80 watt का और एक zero watt का night bulb, क्योंकि आज वो तेज़ रोशनी चाह रहा था। 

कहते हैं ना जब मन के अंदर का अंधेरा बहुत डरा रहा हो तो, बाहर की रोशनी बढ़ा देने से डर कुछ हद तक कम हो जाता है।

अभी रतन को झपकी लगी ही थी, कि थोड़ी ही देर में कमरें में रखे हुए सामान, हिलने लगे। झूलता हुआ bulb, बार-बार दीवार से टकरा रहा था, और अंततः टूट गया।

Bulb टूटने की आवाज़ से रतन की नींद टूट गई। कमरे में रोशनी कम हो गई थी।

कमरे में रखे हुए सामान, अभी भी हिल रहे थे, कुछ अब इधर से उधर सरकने भी लगे।

इन सबको देखकर, रतन डरने लगा। तभी एक बिल्ली के रोने की आवाज़ आने लगी।

साथ ही हवा चलने की आवाज़ और खिड़की के बंद खुलने का शोर, सब मिलकर कमरे को बहुत भयावह बना रहे थे। 

रमन के कान में माँ की कही बात और बाकी सबकी बातें गूंजने लगी।

मनहूस... महामनहूस.... 

उसे लगा, उसे महेश की बातों में नहीं आना चाहिए था। उसका डर अब चरम पर पहुंच गया था।

उसने आव देखा ना ताव, वो बदहवास सा घर से निकल भागा...

रास्ते में उसे building का चौकीदारी दिखा, वो रतन को देखकर चिल्लाया, कहाँ भागे जा रहे हो?

रमन भागते भागते हुए ही जोर से चिल्लाया, घर में भूत है, वो सारे सामान इधर से उधर सरकार रहा है। 

सब सही कहते हैं कि वो घर मनहूस है, महा मनहूस.... उसके बाद उसने पलट कर नहीं देखा, बस पकड़ कर सीधे गांव निकल गया।

रमन की बातों से चौकीदार भी थर-थर कांपने लगा और अपने घर को निकल गया...

रमन के जाने के दो दिन बाद, महेश गांव से लौट आया...

आगे पढ़ें House number 1303 (भाग-5) अंतिम भाग में... 

Wednesday, 11 January 2023

Story of Life : House number 1303 (भाग-3)

House number 1303 (भाग-1)

House number 1303 (भाग-2) के आगे..

House number 1303 (भाग-3) 

रतन मन कड़ा कर के रुकने को तैयार हो गया। महेश उसे घर की चाबी सौंपकर चला गया, साथ ही हिदायत दे गया कि यहां रखें कोई भी सामान से छेड़छाड़ ना करे व संभल कर रहे। और किसी चीज़ की ज़रूरत लगे तो बोल दे...

रतन ने घर की सिर्फ इतनी सफाई की, जिसमें उसका  बिस्तर बिछ जाए। बाकी सफाई, अगले दिन करेगा, सोचकर वो सो गया।

अगले दिन रतन ने थोड़ी और सफाई कर ली। 

फिर अपने गांव में फोन करके सबको उसने बता दिया कि उसे एक बड़ी सी बिल्डिंग में घर मिल गया है। उसमें एक कमरा, रसोईघर और बाथरूम है।

माँ ने पूछा, बिल्डिंग में क्यों?

माँ, यहां ऐसे ही मिलते हैं। 

उस समय रतन का दोस्त रोहित भी बैठा था। उसने तुरंत पूछा, कौन से floor, और कौन से number पर?

रतन ने कहा 1303...

1303! 

पहले 13 फिर 3..

हाय! रतन तुझे कोई और घर नहीं मिला, जो तूने, महा मनहूस घर ले लिया। 

1303, घर तो कोई भी नहीं लेता है, ना जाने उसमें कौन भूत चुड़ैल रहते हैं। 

तू घर लेने से पहले नहीं बता सकता था कि यह घर लेने वाला है। 

मां मेरी बात तो सुन...

पर 1303 सुनने के बाद मां का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वो रतन की कोई बात नहीं सुनना चाह रही थी।

रतन के बाबूजी बोले, सुन भी ले बेटे की, क्या कहना चाह रहा है।

मां, वो घर मेरे एक दोस्त के पास चौकीदारी के लिए था, उसने मुझसे बिना एक पैसा लिए रहने को दिया है। 

हां हां, ऐसे घर को पैसा देकर लेगा भी कौन?

मां, दिल्ली में घर का किराया भाड़ा बहुत है और मेरे पास पैसे कम।

थोड़ा पैसा, पढ़ाई-लिखाई के लिए भी जोड़ना चाह रहा हूं। कुछ दिनों बाद, जब थोड़े पैसे जोड़ लूंगा तो दूसरा घर ले लूंगा।

फिर बाबूजी बोले, बेटा तू मां की छोड़, तुझे जो ठीक लगे वही कर...

बात ख़त्म होने पर, रतन काम पर जाने को तैयार होने लगा, फिर उसने सोचा कि महेश से मिलते हुआ जाएगा।

यही सोच कर वो महेश के घर की ओर चल दिया। वहां पहुंचने पर उसे महेश के घर पर ताला लटका हुआ दिखा।

उसने आस-पड़ोस से पूछा कि महेश कहां गया?

वो लोग पूछने लगे कि तुम कौन हो और कहां से आए हो।

जी मैं रतन, महेश का दोस्त, यहीं पास के apartment में 1303 घर में रह रहा हूं।

1303!

अच्छा तो महेश ने तुम्हें वहां रहने को राज़ी कर लिया?

हाँ..

तभी तो...

क्या तभी तो?

तभी तो वो, सबको लेकर गांव चला गया..

गांव?... पर क्यों? 

उसे चार साल पहले से इस घर की चौकीदारी मिली थी, जिसके कारण वो अपने गांव नहीं जा पा रहा था। उसने बहुत कोशिश की कि कोई इस घर पर रह जाए, पर 1303 नंबर सुनकर कोई भी free में भी इस घर पर रहने को तैयार नहीं होता था। 

क्यों भला, कोई तैयार नहीं होता था?

भैया, 1303 में कौन रुकना चाहता है? महा मनहूस नंबर है यह तो...

पर अब जब तुम मिल गये हो, तो वो अपना बोरिया बिस्तर बांध कर निकल लिया...

अच्छा, कब तक लौटेगा, वो बता दो...

क्या जाने, कितने दिन में आएगा, पूरे चार साल बाद तो गया है।

भैया, उसका फोन नंबर या उसके गांव का फोन नंबर बता दो। मैं आज उसका नंबर लेने आया था।

अरे भैया, उसके गांव में फोन नहीं लगता है और गांव में सिर्फ इसके पास ही फोन है। 

अरे! तो मैं उससे बात कैसे करुंगा? 

अब वो तो भाई, उसके आने पर ही होगी...

रतन अपने काम पर चला गया, जब वो घर लौटा, रात हो चुकी थी। 

आज की रात कुछ ज्यादा ही काली और ठंडी था, सन्नाटा पसरा हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सुहा रहा था, पर आवाज़ें हर चीज़ की बहुत तेज सुनाई दे रही थी। 

सुबह से घर को लेकर इतनी बातें सुन सुनकर, उसे भी घर अजीब सा लगने लगा था...

आगे पढ़ें House number 1303 (भाग-4) में...

Tuesday, 10 January 2023

Story of Life: House number 1303 (भाग-2)

House number 1303 (भाग-1) के आगे...

House number 1303 (भाग-2)


बस फिर क्या था, रतन पहुंच गया दिल्ली और फिर नीरज के घर की ओर चल दिया...  

पूछते पूछते जब रतन, नीरज के सामने पहुंचा तो, दोनों एक-दूसरे को देखकर चौंक गए।

नीरज को तो पता नहीं था कि, रतन गांव से आ रहा है, तो वो वैसे ही था, जैसे रोज़ रहता था। 

फटेसटे कपड़ों में एक आदमी से डांट खाते हुए, एक हाथ में पाॅलिश व दूसरे हाथ में ब्रश पकड़े हुए। वो रतन को सामने देखकर सकपका गया।

नीरज तुम यहां, जूते पॉलिश का काम करते हो? फिर गांव में अपनी झूठी शान बघारने का काम क्यों करते हो?

अरे, मुझे क्या पता था कि एक दिन तुम यहां आ जाओगे, वो भी मुझे बिना बताए, नीरज भुनभुनाते हुए बोला ...

तुम्हारी झूठी बातों के कारण, हम सब शहर को महान, और अपने गांव को निम्न समझकर, गांव छोड़ने को आतुर हो गए हैं।

नीरज ने अपनी आंखें नीचे कर ली।

रतन, नीरज को वहां छोड़कर, अपने लिए, विद्यालय, नौकरी और घर की तलाश में आगे बढ़ गया।

शहर की दर बदर ठोकर खाने के बाद उसे एक दुकान में काम मिल गया। 

काम तो मिल गया, पर पढ़ाई-लिखाई सब छूट गई, क्योंकि उसके पास पढ़ने-लिखने के लिए, ना तो पैसा था और ना ही समय। 

काम तो उसे मिल गया था, पर एक अच्छे घर की तलाश उसकी अभी भी जारी थी।

कुछ दिनों में उसकी दोस्ती महेश से हो गई। महेश दिल्ली में पुराना रहने वाला था और बहुत से लोगों को जानता था। 

उसने एक दिन, रतन से कहा, मैं तुझे एक घर दे सकता हूं। यहीं पास के, apartment में है। एक कमरा, रसोईघर और बाथरूम है उसमें...

Apartment में! अरे, तब तो बहुत मंहगा होगा, क्यों मज़ाक कर रहे हो? मुझ गरीब के पास इतना पैसा कहाँ है? 

अरे, मेरे दोस्त मैं तुमसे पैसा नहीं लूंगा उसका, एक साहब, बहुत दिनों पहले यह घर छोड़ गए हैं और मुझे उसकी रखवाली के लिए छोड़ दिया है। 

घर थोड़ा पुराना है, अगर तुम्हें पसंद आए तो? देख लो...

सुनकर रतन खुश हो गया।दोनों apartment की ओर चल दिए। वो  lift से 13 floor पर पहुंचे। 

पुराना सा घर था, उस पर टूटी-फूटी नम्बर प्लेट लटक रही थी, घर का नंबर 1303 था।  बहुत सारी धूल और जाले थे, उस घर में। बहुत सालों से बंद था तो उससे बदबू भी आ रही थी। खिड़की, दरवाजे के खुलने में बहुत आवाज़ आ रही थी।

सब देखकर घर अजीब सा ही लग रहा था। रतन उसे देखकर सहम गया, वैसे भी वो थोड़ा डरपोक सा लड़का था।

महेश समझ गया कि रतन को घर समझ नहीं आ रहा है, वो डर रहा है। पर वो चाहता था कि रतन घर में रहने को तैयार हो जाए।

उसने रतन को ढांढस बंधाया और कहा कि, मैं यहीं पास की बस्ती में ही रहता हूं, तुम किसी बात की चिंता मत करो। बस्ती में मेरा अपना घर है, बूढ़े मां-बाप है, वो अपना घर छोड़ना नहीं चाहते हैं, और मैं उन्हें, इसलिए मैं यहां नहीं रहता हूं। अगर वैसा ना होता तो मैं खुद यहीं रहता।

यह बहुत भले इंसान का घर था, तुम मुझे भले लगे, इसलिए तुम्हें रहने को दे रहा हूं। तुम्हें रहने की जगह मिल जाएगी और उस भले इंसान के घर की रखवाली हो जाएगी।  

रतन मन कड़ा कर के रुकने को तैयार हो गया। महेश उसे घर की चाबी सौंपकर चला गया, साथ ही हिदायत दे गया कि यहां रखें कोई भी सामान से छेड़छाड़ ना करे व संभल कर रहे। और किसी चीज़ की ज़रूरत लगे तो बोल दे...

आगे पढ़ें House number 1303 (भाग-3) में...