Saturday, 19 December 2020

Story of Life : बहू का हिसाब (भाग - 4)

बहू का हिसाब (भाग-1),

बहू का हिसाब (भाग -2) और 

बहू का हिसाब (भाग -3 ) के आगे....


बहू का हिसाब (भाग -4)


रमा जी ने सुलझणा को अपने पास बुलाया और बोलीं, तुमने जो मूर्खतापूर्ण कार्य किया, सबको एक साथ छुट्टी पर भेजने का। 

उसका नतीजा भी सोचा है?

और जो लोगों के मन में इच्छित काम की आशा जगा दी, उसका परिणाम भी जानती हो।

इच्छित काम तो ईश्वर भी सबको नहीं दे पाते हैं, कितने ही लोगों को ऐसे काम करने होते हैं, जिसे वो नहीं करना चाहते हैं।

सब सोच समझकर किया है माँ जी।

आप की बहू हूँ, आप का आशीर्वाद और सहयोग है, मेरे साथ। 

तो घबराना कैसा? यह कहकर उसने रमा जी की गोद में अपना सिर रख दिया।

सुलक्षणा से नाराज़ होने के बावजूद उन्हें अपनी बहू की इस बात से उसके आत्मविश्वास और संस्कार पर नाज़ हो उठा।

फिर थोड़ा कड़क होकर बोलीं, मुझसे किसी तरह के सहयोग की उम्मीद मत करना।

 सुलक्षणा उनके गोद में सिर रखे रही और हल्के से मुस्कुरा दी।

अच्छा उठ अब, सबकी तो छुट्टी कर दी। आगे क्या सोचा है, वो बता दें, रमा जी ने प्यार से सुलक्षणा के गाल पर थपकी मारते हुए कहा।

माँ जी,  आप आराम कीजिए, आज का खाना बन चुका है। थोड़ी देर में पापा जी और सूरज जी भी घर आ जाएंगे, तब खाना खाते समय में सबको बता दूंगी कि किस को क्या करना है?

रमा जी, देख रहीं थीं कि सुलक्षणा के चहरे पर आत्मविश्वास और प्रेम की ऐसी झलक थी, जो उसको आज और ज्यादा खूबसूरत बना रही थी।

शाम को खाने के समय, सुलक्षणा ने, प्रेमप्रकाश जी और सूरज को नौकरों से संबंधित सारी बातें बता दी।

सब सुनकर, सूरज के मुंह से निकल गया, हे भगवान! अब घर के सारे काम कौन करेगा?

रमा जी बोलीं, तुम्हारी लाडली सुलक्षणा, अभी हम सब को काम भी सौंपने वाली है।

क्या? अब तो प्रेम प्रकाश जी भी चौंक गए......

आगे पढ़े बहू का हिसाब (भाग -5) में....

Friday, 18 December 2020

Stories of Life : बहू का हिसाब (भाग -3)

बहू का हिसाब (भाग-1) और

बहू का हिसाब (भाग -2)  के आगे...

बहू का हिसाब (भाग -3)



सुलक्षणा ने घर के सभी नौकरों को बुलाया और कहा कि इस घर में जरुरत से ज्यादा लोग काम करते हैं।

आज से मैं इस घर को अपने हिसाब से चलाऊंगी, और मुझे इतनी बड़ी संख्या में लोग नहीं चाहिए।

यह सुनकर सभी मायूस  हो गये, कि ना जाने किस पर गाज गिरने वाली है।

कुछ कहने लगे, हमने तो बरसों से सेवा की है, कभी शिकायत का मौका भी नहीं दिया है।

तो हमारे ऊपर यह जुल्म क्यों?

कुछ उनमें नाकारा भी थे, वो सिर्फ चाटुकारिता के सहारे टिके हुए थे।

वो तो रोने ही लगे, क्योंकि वो जानते थे कि, अगर उनको निकाल दिया गया, तो उन्हें कहीं और काम नहीं मिलेगा।

सुलक्षणा बोली, आप में से कोई भी व्यक्ति परेशान ना हो। मैंने कहा है कि मुझे घर में इतने लोग नहीं चाहिए, पर यह नहीं कहा कि काम से निकाल रही हूँ।

यह सुनकर सब हैरानी से एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।

आप ने ठीक सुना है कि, मैं किसी को नहीं निकाल रही हूँ।

अब सुनिए कि आप सबको करना क्या है?

आप लोगों को अपने उन कार्यों  की list बनानी है, पर इसमें आपको वो काम नहीं लिखना है, जो आप यहाँ करते थे। बल्कि वो काम लिखने हैं, जिसमें आप expert हैं।

और हाँ, मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ कि यहाँ कुछ नाकारा लोग भी हैं।

पर मेरा मानना है कि कोई नाकारा नहीं होता है। हर कोई किसी ना किसी काम में expert जरुर होता है।

तो पूरी ईमानदारी से अपना काम लिखिएगा, क्योंकि उसी के आधार पर आप को काम सौंपे जाएंगे और फिर जो अपने काम पर खरा नहीं उतरा, उसे निरस्त कर दिया जाएगा।

जिसकी जिम्मेदारी मेरी नहीं है।

इन कामों की list बनाने के लिए आप सबको 2 दिन की छुट्टी दी जा रही है। सोच समझ कर लिखिएगा।

और इस छुट्टी के आप को double पैसे दिए जाएंगे।

ऐसी घोषणा सुनकर सब के चेहरे खिल उठे।

 सब खुश थे, मर्जी का काम मिलेगा, दो दिन की छुट्टी, और उसके double पैसे, सब सुलक्षणा की जय,  कहते हुए घर चले गए।

रमा जी का एक चाटुकार, उनको सब बता कर चला गया.......

आगे पढ़े, बहू का हिसाब (भाग - 4) में.....

Thursday, 17 December 2020

Story of Life : बहू का हिसाब (भाग -2)

 बहू का हिसाब (भाग-1) के आगे...

बहू का हिसाब (भाग -2)



घर की जिम्मेदारी आते ही सुलक्षणा ने पाया कि उसकी ससुराल तो उसकी सोच से बिल्कुल अलग है।

उसकी ससुराल जितनी धनाढ्य थी, उतने ही सब careless थे।

वो कमरे में हों या ना हों, कमरे में light, fan, Ac on रहता था।

पानी का खूब wastage किया जाता।

ठंड हो गर्मी हो, ज़रुरी हो कि ना हो geyser on रहता था।

खूब खूब खाने पीने की चीजें आती और बनती, और जब वो बच जाती, तो उन्हें फेंक दिया जाता।

जहाँ एक servant से काम चल सकता है, वहाँ 4 - 4 servant लगे हुए थे।

अलमारी कपड़ों से भरी हुई थी, फिर भी और मंगवाए जाते थे।

इस तरह हर चीज़ की बरबादी देखकर सुलक्षणा को बहुत उलझन होने लगी।

इस विषय में उसने सूरज से बोला, तो उसने कहा- वो भी सब समझता है, पर अब जो जैसा चल रहा है, चलने दो।

तुम कुछ बोलोगी तो बात बढ़ेगी, व्यर्थ का क्लेश होगा। व्यर्थ में घर की शांति भंग करने से क्या लाभ? 

कुछ दिन बीत जाने दो, तुम्हारी भी आदत पड़ जाएगी।

सुलक्षणा, सूरज की बात सुनकर चुप हो गई।

कुछ दिन और बीत गए पर सुलक्षणा को अब भी यह सब नागवार लग रहा था।

जब उससे रहा नहीं गया तो उसने अपने सास ससुर से इस विषय पर बात की।

सुलक्षणा की बात सुनकर रमा जी क्रोधित हो गयीं। वो बोलीं, कैसी हो तुम? सब चाहते हैं कि घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो। खूब सारे नौकर - नौकरानी हों घर पर।

और एक तुम हो कि तुम्हें यह सब रास नहीं आ रहा है।

पर इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है, हमें ही अपने status के according बहू लाना चाहिए था।

सुलक्षणा के आंसू ढुलक गये। यह देखकर प्रेमप्रकाश जी, जो कि बहुत देर से चुप थे, बोले, रमा जी थोड़ा शांत हो जाइए। बच्ची सहम गई है। उसकी पूरी बात तो सुन लीजिए।

पर रमा जी बहुत ज्यादा क्रोधित थी, बोलीं आप ही सुनिए अपनी लाडली की बातें। आप ही इस नगीने को चुनकर लाए थे, हमारे राजमहल में सजाने के लिए।

यह कहते हुए, वो वहाँ से चलीं गईं। सुलक्षणा बराबर रोती जा रही थी।

प्रेमप्रकाश जी ने बड़े प्यार से सुलक्षणा का सिर सहलाते हुए कहा, आज से तुम अपने हिसाब से घर चलाओ।

पर ध्यान रखना कि किसी को किसी भी तरह की परेशानी ना हो। 

और हाँ हमारे घर में बहुत से लोग काम करते हैं, उनकी रोजी रोटी चलती है, इस घर से।

तो तुम अगर उन्हें हटाना चाहती हो, तो यह सोच कर हटना कि किसी की हाय! इस घर को ना लगे।

मेरी प्यारी बच्ची, मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ, तुम सब कुछ बहुत अच्छे से manage कर सकती हो।

यह सब सुनकर सुलक्षणा के आंसू थम गये।

प्रेमप्रकाश जी भी अपने कमरे में चले गए।

सुलक्षणा ने ठान लिया कि अब वो सब अच्छे से manage कर के ही रहेगी। लेकिन उसे यह सब अपने ससुर जी की बातों को ध्यान में रख कर करनी थी.......

बहू का हिसाब (भाग -3 ) में......