इसमें हम उनकी पसंद के भोजन व मिष्ठान का भोग लगाते हैं, उनके नाम से कुछ रुपए निकालते हैं, जिसे अनाथ-आश्रम और पूजनीय-आश्रम में दान कर देते हैं।
- किसी ने पूछा कि आप एक-एक की तिथि जान कर, हर साल पूजा-अर्चना क्यों करती हैं?
- केवल मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या में ही क्यों नहीं कर देती हैं?
- आपको क्या यह त्यौहार लगता है?
- इस तिथि में गए हुए सदस्य के जाने का दुःख नहीं लगता है?
श्राद्ध पक्ष- दुःख या त्यौहार
हाँ, सबसे पहली बात श्राद्ध पक्ष के यह 16 दिन एक त्यौहार ही हैं, इसलिए इसे उसी तरह से मनाया जाना चाहिए।
यह त्यौहार इसलिए भी हैं, क्योंकि हमारे सनातन धर्म में इन 16 दिनों में हमारे पितरों को ईश्वर के तुल्य स्थान दिया गया है।
कहा जाता है कि इन दिनों अपने पितरों की पूजा-अर्चना, दान-पुण्य करने से हमें सर्वाधिक पुण्य की प्राप्ति होती है, साथ ही साथ हमारे पितरों को तृप्ति की प्राप्ति होती है।
जहाँ तक रही दुःख की बात, तो बिल्कुल होता है, अपने परिवार के सदस्यों के लिए।
पर आपको बता दें कि दुःख मनाया जाने वाला दिन वो है, जिस महीने व जिस दिन वो गए थे, यह नहीं।
यह नहीं, क्यों?
क्योंकि इस दिन में पूजा-अर्चना इसलिए की जाती है, क्योंकि अपनी तिथि-विशेष में वह सदस्य आपसे मिलने, आपको आशीर्वाद देने के लिए आता है।
तो उस दिवस को कैसे दुःख का दिन मान लें, जब वह पुनः हमसे जुडने के लिए, हम पर कृपा बरसाने के लिए आ रहे हैं?
दूसरा, प्रत्येक व्यक्ति का आगमन अपने तिथि-विशेष में होता है, तो उस दिन को विशेषता न देकर अपनी सुविधानुसार पूजा-अर्चना और दान-पुण्य करने का क्या औचित्य?
बस यही वजह है, कि हम प्रत्येक सदस्य की तिथि को जानकर उस दिन उन्हीं के पसंद के अनुरूप भोग-प्रसाद व मिष्ठान आदि बनाते हैं, दान-पुण्य करते हैं।
आइए, श्राद्ध पक्ष के इन 16 दिनों को मिलन दिवस या त्यौहार के रूप में मनाएँ।
ईश्वर में लीन सदस्य को याद करते हुए, पूजा-अर्चना करते हुए, उनके मनपसंद भोग-प्रसाद व मिष्ठान आदि को उन्हें अर्पित करें, दान-पुण्य करें।
उनसे प्रार्थना करें कि वो सदैव हमसे जुड़कर हमारा मार्गदर्शन करें, हमें सफलता के पथ पर अग्रसर करें, हमारे सभी दुःख-कष्टों को दूर कर हमें सुख प्रदान करें, व हमें वो सामर्थ्य प्रदान करें कि हम सदैव ऐसा कर्म करें जो हमारे कुल, हमारे गौत्र का नाम रोशन करने में सहायक हो।
अपने सभी पूर्वजों व बुजुर्गों को शत-शत प्रणाम, आप सब की कृपादृष्टि सदैव हम पर बनी रहे और आपसे हमारा संपर्क सदैव बना रहे।
जय सभी पितरों की!
