Wednesday, 28 October 2020

Articles. : Benefits of breast feeding

आज कल बच्चों में immunity power बहुत कम होती जा रही है। जिससे आए दिन बच्चे बीमार हो रहे हैं।

जिसका बहुत बड़ा कारण है, breast feeding की कमी का होना। 

और यह कोई मेरी opinion नहीं है, experienced लोग और doctors का भी यही मानना है।

तभी तो आज doctors भी breast feeding पर जोर दे रहे हैं, उनका कहना है, first yellow milk and 6 months की exclusive breastfeeding, babies की mental health, physical growth and immunity power के लिए बहुत जरूरी है।


Benefits of breast feeding



आइए आपको बताएं, क्यों जरूरी है, breast feeding, और क्या हैं इसके benifits.

1. Breast milk, बच्चे की needs के according customized होता है, means उसे जितना protein, iron, calcium, carbohydrates, fat, vitamins etc. चाहिए होता है, उसके according बनता है। 
जो बच्चे के mental and physical growth को develope करता है।


तो सोचिए, एक ही formula से बना, डिब्बा बंद दूध हर बच्चे को कैसे फायदा करेगा?


और गाय, बकरी, भैंस का दूध उनके बच्चे की needs के according होता है तो वो इन्सान के बच्चे को कैसे फायदा करेगा?


2. Breast feeding वाले बच्चों के gas नहीं बनती है, indigestion भी नहीं होता है। जबकि bottle feeding वालों के gas बनती है। 


क्योंकि bottle feeding में बच्चा air भी suck करता है। उनमें आए दिन, infection and indigestion की problem भी हो जाती है।


3.Bottle feeding वाले बच्चों के teeth भी ख़राब हो जाते हैं। जबकि यह problem breast feeding से नहीं होती है।


 4. Breast feeding से  बच्चा strong हो जाता है, उसमें immunity power बढ़ जाती है। जिससे वो कम बीमार पड़ते हैं।


5. बच्चे के साथ ही यह माँ के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है, क्योंकि इससे माँ को भी breast cancer  होने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

तो breast feeding जरूर से कराएं, जिससे बच्चा और माँ दोनों healthy रहें।

बहुत सी माँ को यह problem  होती है कि sufficient Milk नहीं बन रहा है तो, क्या करें?
इस problem को लेकर बहुत से viewers की queries आ रही है।
अगर आप की भी queries है, तो इस problem को solve करने के लिए आप हमारी shortly coming tip

How to have sufficient breast milk  for your kid जरूर पढ़िएगा।


So stay tuned.....

Tuesday, 27 October 2020

Articles : एक बेमेल पर सफल विवाह

आज आप सब के साथ मुझे इंदौर से श्रीमती उर्मिला मेहता जी के आलेख को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

उर्मिला जी ने अपनी लेखनी से कालीदास और विद्योत्तमा के प्रेम को बखूबी उकेरा है, साथ ही यह बताया है कि आज के परिप्रेक्ष्य में वो कितना अनुकरणीय है।

आइए इसका आनन्द लें।


एक बेमेल पर सफल विवाह 




कहा जाता है विद्योत्तमा विक्रमादित्य की रूपवती, गुणवती एवं विदुषी पुत्री थी ।

वह सभी शास्त्रों,वेदों,पुराणों आदि में निष्णात थी विवाह के संबंध  में उसकी यह शर्त थी कि  जो  विद्वान पुरुष उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा उससे वह विवाह कर लेगी ।

अन्यथा उसे अपना अनुचर बना लेगी‌। एक के बाद एक अनेक पंडित उसे शास्त्रार्थ  में पराजित कर परिणय करने की आकांक्षा से आए, पर सभी पराजित हो गए। 

क्षुब्ध होकर प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर उन पराजित पंडितों ने विद्योत्तमा  का विवाह किसी महामूर्ख से करने का सोचा जिससे उसे अर्थात विद्योत्तमा को आजीवन पति की मूर्खता का दुख झेलना पड़े ।

उन्होंने कालिदास को शास्त्रार्थ के लिए प्रस्तुत किया । कालिदास के मौन व्रत धारण का साधन साध कर उन पंडितों ने विद्योत्तमा से  उनका शास्त्रार्थ करवाया। 

कालिदास द्वारा विद्योत्तमा की एक अंगुली का उत्तर दो अंगुलियों से तथा पांच अंगुलियों का उत्तर मुट्ठी बांधकर प्रदर्शित किया गया।

जिसे पंडितों ने इस प्रकार विश्लेषित किया कि ईश्वर एक है पर उसकी उपासना सगुण तथा निर्गुण दो प्रकार से की जाती है इसी प्रकार मुट्ठी का  यह विश्लेषण किया गया कि यद्यपि महाभूत 5 हैं परंतु उन सब से ही एक शरीर का निर्माण होता है अकेला कोई भी महाभूत अपने आप में सक्षम नहीं है।

 विद्योत्तमा  उन पंडितों की व्याख्या के जाल में फँस गई और कालिदास की विद्वता के सम्मुख नतमस्तक हो गई ।

फल स्वरूप कालिदास और विद्योत्तमा का परिणय  हो गया ।

कहते हैं कि विवाह की प्रथम रात्रि को ही जब कहीं से ऊँट के बोलने की आवाज आई तो विद्योत्तमा कालिदास से बोली, उष्ट्रः वदति  कालिदास तो जन्म से जड़मति थे। दो-तीन बार कहने पर भी उट्र उट्र कहने लगे।

विद्योत्तमा को कुछ  अंदाज पहले  भी था कि कालिदास इतने विद्वान नहीं हैं जितना उन्हें दर्शाया जा रहा है परंतु लोक लाज अथवा अपनी शर्त के कारण वे अधिक कुछ बोल नहीं सकी अब जब उनका विवाह हो गया और कालिदास उट्र उट्र  कहने लगे तो उनकी मूर्खता का ज्ञान विद्योत्तमा को  पूरी तरह से हो गया ।

उन्होंने विवाह को तो अंगीकार कर लिया पर कालिदास को पति रूप में उस समय तक स्वीकार नहीं किया जब तक कि वे  विद्वान एवं प्रकांड पंडित नहीं हो जाते, यह उसके स्वाभिमान एवं पराजित पंडितों के अहंकार को प्रत्युत्तर देने की चुनौती थी।

स्त्री पुरुष की प्रेरणा होती है, इसी रूप में उन्होंने कालिदास को ज्ञानी पंडित और अपने समकक्ष विद्वान बनाने का बीड़ा उठाया।

कालिदास भी अपनी पत्नी की विद्वत्ता के सम्मान में तथा स्वयं को पत्नी के अनुरूप निर्मित करने के कार्य में जुट गए, मां काली की अनुकंपा एवं स्वयं के स्वाध्याय से जड़मति कालिदास महाकवि कालिदास के रूप में रूपांतरित हो गए। 

निश्चित ही  विद्योत्तमा को इसका पूरा पूरा श्रेय जाता है। कहते हैं कि जब कालिदास संस्कृत के प्रकांड पंडित हो  कर घर लौटे तो द्वार पर ही विद्योत्तमा ने उनसे पूछा ,'अस्ति  कश्चित् वाग् विशेष ?' कालिदास ने विद्योत्तमा के इन तीन वाक्य खंडों से तीन काव्यों की रचना की।

अस्ति से कुमारसंभव कश्चित्  से मेघदूत तथा वाग् विशेष से रघुवंशकी रचना की । 

कुमारसंभव में कार्तिकेय, रघुवंश में रघुकुल तथा मेघदूत में यक्ष  तथा रूपवान यक्षिणी का वर्णन है ऐसा माना जाता है कि यक्षिणी के वियोग का वर्णन और कुछ नहीं वरन् विद्योत्तमा से  कालिदास के वियोग का वर्णन है। (जब कालिदास विद्वान बनने हेतु विद्योत्तमा से  अलग रहे थे)।

 विद्योत्तमा और कालिदास के विवाह को यदि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो बहुत सी  अनुकरणीय बातें हमें ज्ञात होती हैं  जैसे कि एक बार विवाह हो जाने पर उसका जीवन भर  निर्वाह करना चाहिए। ,

दूसरा पति अथवा पत्नी में से एक  के भी  योग्य अथवा समकक्ष या अनुकूल ना होने पर दूसरे साथी को अपने तुल्य या अनुकूल बनाने का प्रयास करना चाहिए।

 तीसरा पति अथवा पत्नी को जो भी उनमें सहयोग करने योग्य हो शेष अयोग्य साथी को योग्य बनाने की प्रेरणा देकर  योग्य बनाना चाहिये। 

साथ ही  उसके सद् गुणों को उभारने में सहयोग करना  चाहिये ना कि उसकी खिल्ली उड़ाना या विवाह विच्छेद जैसा अनुचित निर्णय लेना। 

कहते हैं कि  कालिदास के देहावसान के पश्चात् कुमार संभव के सातवें अथवा आठवें  सर्ग के बाद उक्त काव्य को विद्योत्तमा ने ही पूर्णता प्रदान की ।

परंतु यह अत्यंत  दुख का विषय है कि इतनी विदुषी स्त्री होते हुए भी विद्योत्तमा का  नाम साहित्य में कहीं भी उपलब्ध नहीं है जैसे कि गार्गी, मैत्रैयी तथा अन्य विदुषी स्त्रियों का महत्व पूर्ण स्थान नहीं है।

यह पुरुष प्रधान सामाजिक संरचना का का ही प्रतिफल हो सकता है।

कहा यह भी जाता है कि कालिदास रचित ग्रंथ वास्तव में विद्योत्तमा द्वारा ही लिखे गए हैं, ताकि विद्योत्तमा अपने पति की सम्मानजनक स्थिति को स्थापित कर सके साथ ही अपने आत्म सम्मान के साथ भी न्याय कर सके ।जो भी हो इस विषय में अनुसंधान की महती आवश्यकता है।

Disclaimer:
इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।


Sunday, 25 October 2020

Poem : शुभ विजय पर्व

 🕉️💐दशहरे के पावन पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ💐 🕉️

शुभ विजय पर्व 


रावण के जिस पुतले को, 

त्रेता से आज तक जलाते हैं।

चलिए आज हम आपको,

रावण की विशेषता बताते हैं।।


था राजा सफल, उसकी प्रजा,

सुख से जीवन बिताती थी।

तभी तो रावण की लंका,

सोने की कहलाती थी।।


भक्त प्रबल था महादेव का,

उन्हें चढाए, शीष पर शीष।

प्रसन्न हो महादेव ने,

दिया उसे दशानन का आशीष ।।


वो विद्वान था अपार,  

शिव तांडव स्तोत्र,

अरुण संहिता, रावण संहिता, आदि,

थे उसकी रचनाओं के भंडार।।


मायावी शक्ति का था भान,

त्रिकाल दर्शीता का भी ज्ञान।

प्रभू श्रीराम द्वारा होगा अंत,

पहले से ही गया था जान।।


आयुर्वेद, तंत्र आदि का भी,

रावण था, परम ज्ञाता।

बहुत से घातक रोगों को,

नष्ट करना, उसको था आता।।


रावण के आंगन में भी,

रहकर माता सीता का।

सतीत्व ना हुआ था भंग,

रहीं, 435 दिन रावण के संग।।

 

अपहरण किया था उसने,

माता सीता थी, निर्बल।

फिर भी एक क्षण भी उसने,

दिखाया ना अपना पौरूष बल।।


युद्ध आरंभ होने से पहले,

प्रभू श्रीराम ने हवन कराया।

कोई बाह्मण नहीं मिला, उनको,

तो रावण ही पूजन कराने आया।।


पूजन विधि कराकर उसने,

दिया था, विजेता का आशीष।

वो ऐसा महान बाह्मण था, 

ब्राह्मणवाद को रखा शीर्ष।।


मानवता भी उसके ह्रदय में,

कूट कूट कर समाई थी।

दे अनुमति, सुषेण वैद्य को,

लक्ष्मण की जान बचाई थी।।


ऐसे महान ज्ञानी ध्यानी से,

आखिर फिर क्या हुई धृष्टता।

क्यों त्रेता से आज तक?

उसका है पुतला जलता।।


रावण के होने पर भी महान

डूबा ले गया उसको अभिमान।

पर स्त्री संग किया था छल,

विनाश का यही कारण प्रबल।।


अभिमान का त्याग कर,

हर स्त्री को दो सम्मान।

तभी रावण के वध का,

पा सकते हो तुम मान।।


लोभ, मोह, द्वेष, राग को,

जब अपने भीतर से हटाओगे।

सही अर्थों में उसी दिन, तुम,

शुभ विजय पर्व मनाओगे।।


🕉️💐आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ, स्वयं पर नियंत्रण रखें और सब ओर सुख व सम्पन्नता बरसाएं💐🕉️