Monday, 29 May 2023

Article : विरासत और आधुनिकता साथ साथ

 विरासत और आधुनिकता साथ-साथ


कल भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने नये संसद भवन, का उद्घाटन किया था। 

बहुत से लोगों ने इस उद्धाटन का प्रसारण देखा होगा, उन्हें गर्व और हर्ष की अनुभूति भी हुई होगी, जबकि वहीं बहुत से ऐसे लोग भी होंगे, जिन्हें पता भी नहीं होगा कि कल भारत के लिए विशेष और सम्मान से परिपूर्ण दिन था।

साथ ही, कुछ ऐसे लोग भी होंगे, जिन्हें यह पता होगा, पर उनके लिए, यह कोई सम्मान का विषय ना होकर, विवाद का, व्यर्थ के व्यय और भर्त्सना का विषय मात्र ही होगा।

उनका कहना होगा कि क्यों व्यर्थ का खर्च करना? देश में कितने गरीब लोग हैं, उनके लिए सोचना चाहिए था, रुपए पैसों से उनकी सहायता करनी चाहिए थी...

आप को इसके लिए, सिर्फ इतनी ही कहना चाहेंगे कि आप अपनी सुविधा का ध्यान रखने से पहले कितनी बार किसी जरुरतमंद के लिए सोचते हैं? 

जो अपनी गरीबी को दूर करने के लिए, कठिन परिश्रम और प्रयास करते हैं, उनकी ही गरीबी दूर होती है पर जो पुरुषार्थ का त्याग करके, मात्र दूसरों पर ही आश्रित रहते हैं, वो सदैव गरीबी के दुःख में अपनी जिंदगी गुजार देते हैं।

तो किसी एक के सोचने से या सरकार के करने से ग़रीबी दूर नहीं होगी, बल्कि सभी को इस विषय में सोचना होगा और सर्वाधिक उसे जो गरीब है, क्योंकि उसके स्वयं के मेहनत और प्रयास बिना कुछ संभव नहीं है। 

सरकार का कार्य, वैसे भी हर क्षेत्र में सोचना है, किसी एक क्षेत्र में नहीं। उसे देश की आर्थिक व्यवस्था, सुरक्षा, विस्तार, विरासत, आधुनिकता, आदि सभी विषयों में ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

और उन सभी का मिश्रित संगम है, नया संसद भवन...

जिसमें विस्तार भी है, विरासत भी और आधुनिकता भी और उसके साथ ही आत्मनिर्भरता और सम्मान भी.. 

आत्मनिर्भरता और सम्मान की पहले बात कर लेते हैं। देश की आजादी के 70 साल बाद, हमारे देश की सरकार अपने निर्णय, अपने द्वारा स्थापित संसद भवन में लिया करेगी। अर्थात, अब हम इतने सक्षम हो चुके हैं, जो यह निर्धारित कर सकते हैं कि हमारी क्या आवश्यकता है, और उसे हमें किस तरह से पूर्ण कर सकते हैं।

अब बात करते हैं, विरासत और आधुनिकता की.. 

विरासत

भारत में जब चोल साम्राज्य था, यह बात तब की है। तब एक राजा, सत्ता को दूसरे राजा को सौंपते समय सेंगोल दिया करता था। सेंगोल सदैव उस राजा के पास रहता  था, जो राज्य करता था। वह देश से संबंधित कोई भी निर्णय लेते समय सेंगोल अपने पास ही रखता था।

अब जानते हैं सेंगोल है क्या? जानते हैं उसकी कहानी, उसी की जुबानी

मैं सेंगोल हूं... निष्पक्ष, न्यायपूर्ण शासन का प्रतीक सेंगोल। मैं हिंदुस्तान के इतिहास का हिस्सा हूं, वर्तमान का किस्सा हूं, और एक बार फिर हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक भविष्य का हिस्सा बनने पर रोमांचित हूं।

मैं उस स्वतंत्रता का प्रतीक हूं, जिसे पाने के लिए भारत के ना जाने कितने वीर हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। और ना जाने कितने मतवालों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारत की आज़ादी की पहली अनूठी सूरत हूं मैं। मैं सेंगोल हूं...

सेंगोल एक राजदंड(राजा के हाथ में रहता है) के रुप में होता है, जो कि चांदी की एक छड़ है, जिस पर सोने का पानी चढ़ा हुआ है, उस छड़ के शीर्ष पर न्याय पूर्ण, निष्पक्ष नन्दी बैल स्थापित है। 

देश की आजादी के समय भी, अंग्रेजों से सत्ता स्थानांतरण का कार्य, नेहरू जी ने इसी सेंगोल को धारण करके किया था।

अतः हमारे विरासत से देश की आजादी तक के साक्षी सेंगोल को 11 धर्मों के गुरुओं ने विधि-विधान, पूजा-पाठ के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को सौंप दिया था।  जिसे मोदी जी ने, नये संसद भवन में speaker के स्थान से एकदम नजदीक में स्थापित किया।

आधुनिकता 

भारत को मिला नया संसद भवन कई खूबियां लिए हुए है। अगले 150 सालों की जरूरतों को ध्यान में रख कर बनाए गए इस भवन में सांसदों, संसदीय कार्यों और आयोजनों की आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा गया है। इसमें सुरक्षा के साथ-साथ इस भूकंपरोधी इमारत को पर्यावरण के अनुकूल भी बनाया गया है। इसकी डिजाइन और इसके निर्माण के उपयोग में लाई गई सामग्री तक लोगों के लिए कौतूहल है। 

इस इमारत की खास बात है इसका विशाल क्षेत्रफल जो कि कुल 64500 वर्ग मीटर है। इसमें लोकसभा के लिए 888 सीटें हैं, जबकि राज्यसभा की 384 सीटें हैं। जबकि अभी तक जो संसद भवन था, उसमें लोकसभा की 543 सीटें और राज्यसभा की केवल 250 सीटें ही हैं। सेंट्रल विस्टा में लोकसभा के कक्ष में सीटों की संख्या 1272 तक बढ़ाने का विकल्प है। लोकसभा का कक्ष संसद के संयुक्त अधिवेशन चलाया जा सके इसके लिए भी तैयार किया गया है। 

नए भवन की design में इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि वह पर्यावरण के अनुकूल हो। इसके निर्माण में ग्रीन तकनीकों का उपयोग किया गया है। पुरानी संसद से बड़ी होने के बाद भी इसमें बिजली की खपत में करीब 30% की कमी आ जाएगी। इसके साथ ही इसमें Rainwater harvesting, and water recycling system लगाए गए है और इसे अगले 150 साल की जरूरतों के मुताबिक design किया गया है। 

नया संसद भवन, जितना सुरक्षित है, अंदर से उतना ही खूबसूरत भी। लोकसभा का कक्ष मोर की theme पर आधारित है जसकी दीवारों और छत पर मोर के पंखों की design है। वहीं राज्यसभा का कक्ष कमल की theme पर बनाया गया है जिसमे लाल कालीन हैं। दोनों सदनों में एक बेंच पर दो सांसद बैठ सकेंगे और उनकी डेस्क touch screen रहेगी। 

इमारत में धौलपुर का बलुआ पत्थर, जैसलमैर राजस्थान का ग्रेनाइट, नागपुर की खास लकड़ी का उपयोग कर मुंबई के काष्ठ कारों ने लड़की की आकृतियों का आकर दिया है। 

खूबसूरती के साथ ही इसकी सुरक्षा व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।

इमारत में तीन तरफ से प्रवेश द्वार हैं, जहां से अवसरों के अनुसार राष्ट्रपति, स्पीकर, प्रधानमंत्री जैसे गणमान्य व्यक्ति विशेष तौर पर आवागमन कर सकें। 

जहां सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया है, वहीं जनसामान्य और संसद भवन की सैर करने वाले दर्शकों के लिए भी प्रवेश, parliament street के जरिए दिया जाएगा। सभी प्रवेश द्वारों पर कई जानवरों की मूर्तियां रक्षकों की तरह लगाई गई है जिसमें हाथी, घोड़े, चील, हंस, मगर आदि शामिल हैं, जो कि, एक अलग ही आकर्षण पैदा करते हैं।

इस तरह से विरासत और आधुनिकता की मिली-जुली इमारत, भारत को नये संसद भवन सेन्ट्रल विस्टा के रूप में मिली है।

अगर आपको, अपने साथ-साथ, अपने देश के विकास, विस्तार, विरासत से प्यार है, तो नये संसद भवन के उद्घाटन से आपको गर्व महसूस हुआ होगा, अन्यथा यह आपके लिए सामान्य दिवस भर रह गया होगा या विपक्ष की तरह अवसाद और विवाद का विषय बन गया होगा... खैर जिसकी जैसी सोच...

मुझे गर्व है, इस नए भारत पर, जहां विरासत और आधुनिकता साथ साथ विकास कर रही है...

जय हिन्द जय भारत 🇮🇳🙏🏻😊

Thursday, 25 May 2023

Short Story : बहुमूल्य रत्न

 बहुमूल्य रत्न 




बहुत पुरानी बात है, एक सौदागर था विक्रम, जिसे पूरी दुनिया से नायाब चीजें एकत्रित करने का शौक था।

उसके खजाने में एक से एक नायाब रत्न थे। तिजोरियों में सोने चांदी का अंबार लगा हुआ था।  उसके अस्तबल में एक से बढ़कर एक घोड़े, ऊंट और गाय थी। बहुत से गोदाम मेवा, अनाज, फल, सब्जियों से भरे हुए थे। 

देखा जाए तो वो बस नाम का ही सौदागर था, वरना उसकी धन-दौलत, किसी बादशाह से कम नहीं थी।

पर इतना सब होने के बाद भी जब भी वो कोई सौदा करता था, तो बहुत तोल-मोल कर के, एक नये पैसे की भी कमी उसे बर्दाश्त नहीं थी। इसलिए ही सब उसे उसके नाम से कम और सौदागर नाम से ज्यादा जानते थे।

एक बार की बात है, वो एक पशु मेले में पहुंचा। वहां उसे एक ऊंचे कद का आकर्षक सा अरबी घोड़ा दिखाई दिया।

वो घोड़ा, लंबा, ऊंचा, हट्टा-कट्टा, तगड़ा, काले रंग का चिकना घोड़ा था। धूप की किरण, उस पर कुछ इस तरह से पड़ रही थी कि, उसके अलावा मेलें में कोई जानवर दिख ही नहीं रहा था।

सौदागर भी अपने को रोक नहीं पाया और घोड़े के मालिक के पास पहुंच गया। 

उसने घोड़े के मालिक मंगलू से उस घोड़े के दाम पूछे - मंगलू ने बहुत गर्व से अपने घोड़े के बहुत ऊंचे दाम बताएं।

सौदागर ने कुछ पल सोचा, फिर बोला, तुम ज़्यादा ही उम्मीद नहीं कर रहे हो? सही सही बताओ..

मंगलू, उसी गर्वीली आवाज़ में बोला, साहेब दाम तो कम ही बताया है, वरना आप को इतने में, बादल को कोई नहीं देगा। 

अच्छा, इसमें ऐसा भी क्या है?

साहेब, यह हमारी जान है, हम आप को गारंटी दे सकते हैं इसकी, पसंद नहीं आए तो हम से दुगने पैसे ले जाना।

विक्रम ने घोड़ा खरीद लिया। मंगलू, अच्छे दाम में घोड़ा बेच कर खुश था और विक्रम बहुत ही बेहतरीन घोड़ा खरीद कर खुश था।

घर पहुंच कर विक्रम ने अपने नौकर हरिया से कहा, घोड़े की काठी बदल कर, मखमली काठी लगा दो, फिर इसे अस्तबल में ले जाकर चने खिला देना। 

हरिया बोला- साहब,आप घोड़ा बहुत बढ़िया लाए हैं, मंगलू से लिया है क्या?

हाँ, विक्रम ने सिर हिला दिया। 

अच्छा, उसके पास बहुत अच्छे घोड़े हैं और यह कहकर हरिया, घोड़े की काठी बदलने लगा।

जैसे ही उसने काठी बदलने के लिए पुरानी काठी निकाली, तो काठी के साथ एक थैली भी गिर गई और उसमें से बहुमूल्य रत्न बिखर गए। 

उन्हें लेकर हरिया, सौदागर के पास गया और थैली के विषय में बताया।

सौदागर बोला, जाओ बादल को ले आओ, मैं अभी मंगलू को उसकी थैली दे आऊं। 

हरिया बोला, क्या साहब? जब घोड़ा आपका तो थैली भी आपकी, कौन किसी को पता चलेगा, वैसे भी मंगलू ने कौन कम पैसों में इसे बेचा होगा... 

(हरिया, मंगलू के गांव का ही था और अपने पास अच्छे घोड़े होने के कारण वो सबसे बहुत अकड़ कर बात करत  था। जिसके कारण हरिया को मंगलू एक आंख ना भाता था )

नहीं हरिया, मैंने सिर्फ घोड़ा खरीदा है यह रत्न नहीं, फिर कैसे वो मेरे हुए? मैं अभी इन्हें वापस कर के आता हूं। 

हरिया ने अनमने मन से थैली पकड़ा दी।

विक्रम उल्टे पांव, मेले में लौट गया। 

विक्रम को आया देखकर, मंगलू सोच में पड़ गया, कि ना जाने बादल ने क्या किया? जो इसे वापस करने आ गये... और बड़ी परेशानी उसकी यह थी कि वो दुगने पैसे कहां से लाएगा?

क्या हुआ साहेब? बादल पसंद नहीं आया?

अरे नहीं मंगलू, तुमने सही कहा था, बादल सच में बहुत अच्छा है, मुझे बहुत पसंद आया...

फिर! फिर क्या हुआ, मंगलू ने असमंजस में पड़ कर पूछा...

तुमने बादल की काठी में यह थैली रखी थी, वही वापस लौटाने आया था...

मंगलू के थैली देखकर, खुशी के आंसू निकल आए, उसने विक्रम से कहा, साहेब आप धन्य हो, जो मेरे रत्न लौटाने आ गए।

फिर वो बोला, आप, मेरे इतने सारे रत्न वापस करने आए हैं, मैं आपको धन्यवाद के रूप में दो रत्न देना चाहता हूं, कृपया अपने पसंद का कोई दो रत्न ले लीजिए।

विक्रम मना करता रहा और मंगलू देने का आग्रह करता रहता।

बहुत ना-नुकुर के बाद विक्रम ने मंगलू से सकुचाते हुए कहा, मैंने आने से पहले ही दो बहुमूल्य रत्न अपने पास रख लिए थे।

सुनकर मंगलू, सकपका गया,उसने पूरी थैली पलट दी‌ और उसको अच्छे से देखने लगा, फिर बोला सब कुछ तो है, तो आप ने ऐसे कौन से दो बहुमूल्य रत्न ले लिए?

अपनी ईमानदारी और अपना स्वाभिमान...

मंगलू ने विक्रम के पैर छुए और कहा, आपने आज मुझे सबसे बहुमूल्य रत्न के विषय में बता दिया, आप सचमुच सबसे बड़े सौदागर हो...

विक्रम ने घर आकर, हरिया को दस सोने की अशर्फियां दीं और कहा कि मेरे पास तो अथाह है, तब मैंने ईमानदारी और स्वाभिमान रखा। पर तुम्हारे पास, उतना नहीं है, तुम मुझे बिना बताए, वो थैली रख सकते थे, पर तुमने वो थैली मुझे दे दी।

हरिया बोला, साहब कहते हैं कि जैसा अन्न खाओ, वैसी ही बुद्धि हो जाती है। तो आप का दिया अन्न खाते हैं तो आप के साथ गलत कैसे कर सकते थे। ना वो घोड़ा मेरा, ना उसमें मिले रत्न मेरे। तो मैं कैसे रख सकता था,उस पर आपका या मंगलू का ही अधिकार था। 

यह कहकर उसने अशर्फियां वापस कर दी।


जिसके पास भी स्वाभिमान और ईमानदारी जैसे बहुमूल्य रत्न हैं, वो संसार का सबसे सुखी इंसान हैं..

Wednesday, 24 May 2023

Article : अभाव जिंदगी का

 अभाव जिंदगी का  

किसकी ज़िन्दगी कैसी है? इस विषय में बरसों से बातें होती आई है। सोचा आज हम भी इसी पर मनन करें।

किसकी ज़िन्दगी कितने सुख से भरी है और कितने अभाव से... जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि कौन सबसे बेहतर जिंदगी जी रहा है।

 खान-पान 

जो निर्धन है, वो तो अभाव में है ही, उसके पास तो जो रुखा सूखा हो, उससे ही भोजन बनाता है। कभी उसकी किस्मत चमक गई तो दान के रूप में लोग उन्हें बढ़िया पकवान दे जाते हैं। 

जो धनाढ्य हैं, वो भी अभाव में हैं, आप कहेंगे वो कैसे?

तो पहला तो यह कि उन्हें आधी चीज़ मना होगी और आधे का उन्होंने कभी स्वाद ही नहीं चखा होगा, साथ ही उनके घर में बनता तो बहुत कुछ होगा, पर उसमें स्वाद नहीं होगा, क्योंकि उनके घर खाना बनाने वाली कोई घर की स्त्री (माँ, बहन और पत्नी, आदि) नहीं होगी, बल्कि अपनी जीविका चलाने वाला कोई स्त्री या पुरुष होगा। जो खाना इसलिए नहीं बनाता है कि उसे घर वालों से प्रेम है, बल्कि इसलिए बनाता है क्योंकि यही उसकी जीविका का साधन है।

जो मध्यम वर्गीय है, उसके पास सब खाने-पीने की व्यवस्था भी होती है, उन्हें बहुत कुछ मना भी नहीं होगा और उन्होंने सब कुछ चखा भी होगा साथ ही उनके घर के बने खाने में स्वाद भी बहुत होगा, क्योंकि उनके घर पर खाना घर की स्त्री (माँ, बहन और पत्नी आदि) बनाती है। जो सिर्फ इसलिए खाना बनाती है, क्योंकि उसे घर वालों से प्रेम है, उनकी चिंता है। 

मतलब एक सुचारू जीवन जीने के लिए, ना अर्थव्यवस्था का अभाव, ना प्रेम का अभाव ना समय का। 

त्यौहार

जो निर्धन है, उसके तो क्या त्यौहार... रोज़ की ही रोटी की व्यवस्था होना मुश्किल होता है, फिर त्यौहार तो उन्हें सिर्फ अपनी गरीबी पर उड़ाया हुआ मज़ाक ही प्रतीत होता है।

धनाढ्य वर्ग के लिए सब त्यौहार wine and dine party से ज्यादा कुछ नहीं होता है। त्यौहार कोई भी हो, खुशी कोई भी हो, होली दीवाली, जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि, सभी में वही होगा wine and dine... ना होली में रंगों की बौछार होगी ना दीपावली में पटाखों की बहार, ना ही किसी त्यौहार का बेसब्री से इंतजार, ना ही हर त्यौहार की अलग छटा..

वहीं मध्यम वर्ग के लिए, हर त्यौहार, हर ख़ुशी का अपना अलग रंग अपनी अलग छटा होती है। होली के आने के एक महीने पहले से ही उसकी तैयारी शुरू कर दी जाती है, ना जाने कितने पकवान बनाए जाते हैं। यही पापड़, गुझिया, रंग-गुलाल, खील-बताशे ही तो होली की द्योतक है। ऐसे ही दीपावली आने के एक महीने पहले से ही साफ-सफाई, रंगाई-पुताई, साज-सजावट शुरू कर दी जाती है। साज-सजावट, दीप, पटाखे, मेवा-मिठाई यही तो द्योतक हैं, दीपावली के। ऐसे ही सभी त्यौहार, पूजा पाठ, खुशी के विशेष अवसर, हर एक की अलग छटा, अलग रंग है मध्यम वर्ग में। 

ना विविधता का अभाव, ना खुशियों का अभाव 

विविध रूप 

निर्धन वर्ग के पास ना तो इतनी सुविधा होती हैं ना इतना ज्ञान कि, वो विविध रूप रख सकें।

धनाढ्य वर्ग के पास तो बहुत अधिक सुविधाएं होती है, पर उन सुविधाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए, उससे भी ज्यादा लोग होते हैं अतः उनमें विविध रूप का सदैव अभाव रहता है।  

पर मध्यम वर्ग में जितनी सुविधाएं रहती हैं, उनको सुचारू रूप से चलाने के लिए उनके पास उतने लोग नहीं रहते हैं, अतः अपनी सभी सुविधाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्हें विविध रूप धारण करना पड़ता है। जैसे वो office में जिस भी job में हो, पर घर में वो electrician, carpenter, plumber, mechanic सब रुप में रहता है। इससे ही उनके घर की जहां सब सुविधाएं सुचारू रूप से चलती है, वहीं विविध रूप के कारण सर्वगुणसंपन्न की जो feelings होती है, वो तो अतुलनीय है। 

ना विविध रूप का अभाव ना ही सर्वगुणसंपन्न होने का अभाव..

आज के article में इतना ही वर्णन कर रहे हैं, आगे फिर कभी... पर आप इसे पढ़कर मनन कीजिएगा कि 

मध्यम वर्ग में एक सुचारू जीवन जीने के लिए ना अभाव है अर्थव्यवस्था का, ना प्रेम का, ना समय का, ना विविधता का, ना खुशियों का, ना विविध रूप का, ना ही सर्वगुणसंपन्न होने का अभाव.. 

मतलब, सच्चा और सुखद जीवन के लिए जो चाहिए, वो सब है, उनके पास.. 

इसलिए आज से यह कहना बंद कीजिए कि मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है, उन्हें ही सबसे अधिक कष्ट है, उनकी ही जिन्दगी नर्क है।

क्योंकि दूसरे अर्थों में कहें तो, मध्यम वर्ग ने ही जीवन को, समाज को, त्यौहारों को, हंसी-खुशी को, सपनों को, अपनों को, सार्थकता प्रदान की है। वो है, इसलिए ही दुनिया हसीन है...

सोच positive रखें तो हर ओर सुख है हर ओर प्रसन्नता है 🙏🏻😊