Tuesday, 4 February 2025

Article : महाकुंभ महोत्सव - सोच का फ़र्क

महाकुंभ महोत्सव, जिसकी पूरे विश्व भर में चर्चा हो रही है, आपने सोचा, कभी पहले इतनी चर्चा क्यों नहीं होती थी?

आखिर इस साल ऐसा क्या हो गया है कि देश-विदेश में बच्चा-बच्चा जानता है कि महाकुंभ हर 12 वर्ष में आयोजित किया जाता है।

आखिर कैसे हर कोई जान रहा है कि महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में होता है।

आखिर क्यों इन्हीं शहरों में आयोजित होता है।

हां, अगर आप को अभी भी नहीं पता है, तो महाकुंभ महोत्सव का article पढ़ सकते हैं।

पर इतनी अधिक चर्चा के पीछे की वजह क्या है?

महाकुंभ का आयोजन तो कांग्रेस और सपा के कार्यकाल में भी होता था...

पर इतना विशाल और भव्य नहीं। क्यों? आखिर क्यों? 

तो उसकी सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही वजह है, और वो है, सोच के फ़र्क की...

महाकुंभ महोत्सव - सोच का फ़र्क




कांग्रेस के काल में, महाकुंभ महोत्सव पर पहुंचने पर tax लगता था। आयोजन की सुव्यवस्था और सुरक्षा से उनका कोई लेना-देना ही नहीं होता था। 

उनके सोच में न तो, सनातन संस्कृति का महत्व था और न ही साधु-संत लोगों की कोई कद्र... 

नतीजा, महाकुंभ के विषय में विदेश तो क्या, देश में भी लोग बहुत अधिक नहीं जानते थे...

फिर आया, सपा का काल...

जिन्होंने राम मंदिर निर्माण न होने देने के लिए कार सेवकों को जेल भेज दिया और उस धार्मिक कार्य में, न जाने कितने लोगों की मृत्यु हो गई...

आपको लगता है कि वो समझते थे, महाकुंभ की महत्ता को?....

चलिए जब बात आई है, तो बताते हैं आपको...

महाकुंभ महोत्सव, सनातन संस्कृति का बहुत बड़ा महोत्सव होता है। अतः उसके आयोजन की सुरक्षा और व्यवस्था सुचारू रूप से हो, इसके लिए लगभग एक वर्ष का अथक प्रयास और परिश्रम चाहिए होता है।

पर सपा के काल में देखा जाए तो, उनका प्रयास कांग्रेस से तो काफ़ी हद तक ठीक था, पर पूर्णतः उचित कहना न्याय संगत नहीं होगा ।

उन्होंने जनवरी में होने वाले, इतने बड़े आयोजन की सुव्यवस्था का प्रारंभ करने के लिए नवम्बर में अनुमति दी और उससे भी बड़ी बात कि इस आयोजन का प्रमुख बनाया आज़म खां को...

यह कोई सामान्य आयोजन नहीं था कि उसका संचालन किसी ऐसे हाथों में सौंप दिया जाए, जिसको सनातन का स तक न पता हो।

जिसे न तो यह पता हो कि महाकुंभ क्यों कराया जाता है, न ही पता हो, मकरसंक्रांति, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी की विशेषता का...

उसे क्या मतलब, साधु-संत लोग से? और उनके क्रिया कलापों से...

पूरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए चंद गोताखोर ही रखे गये थे, और क्या-क्या हुआ, वो तो क्या ही कहें। 

हां, क्या नहीं हुआ, वो जरूर से बता देते हैं। एक तो अखिलेश यादव, एक दिन भी नहीं गये अपने कार्यालय के महाकुंभ महोत्सव में और दूसरा है महाकुंभ महोत्सव के सुयश की देश-विदेश में चर्चा नहीं हुई....

इस बार की सुव्यवस्था की चर्चा तो संपूर्ण विश्व में ही हो रही है, फिर चाहे बात हो रही हो, देश-विदेश से आने वाले लोगों की, या महाकुंभ महोत्सव की भव्यता और दिव्यता की...

वहां की सुरक्षा व्यवस्था की, या वहां उपस्थित साधु-संत लोगों की अखंडता की...

वहां मिल रहे पुन्य की या वहां पर व्यापार या सेवा देने वाले लोगों के लाभ की...

और यह सब संभव हो रहा है, केवल सोच के कारण...

सनातन संस्कृति के महत्व को समझने के कारण...

साधु-संत लोगों को मान देने के कारण।

अपने देश को समृद्धशाली और विख्यात बनाने की इच्छा रखने के कारण...

जब सोच सही दिशा में होगी तो कार्य भी सही दिशा में ही होगा... सफल होगा, सुव्यवस्थित होगा और संपन्नता, दिव्यता, भव्यता और प्रसिद्धि लाने वाला होगा। 

फिर प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?

जो है सबके सामने है।

बहुत ही विशाल प्रांगण में आयोजन, मुफ़्त से लेकर बहुत महंगी व्यवस्था अर्थात् छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर के लोगों के रहने की, खाने-पीने की व्यवस्था, हर एक की सुचारू सुरक्षा के लिए 300 trained गोताखोर, श्रद्धालुओं को आने-जाने के लिए 50 हज़ार QR code लगाए गए हैं।

इस मेले में 75 हज़ार से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं, जिसमें जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) भी शामिल हैं।

इन पुलिसकर्मियों के अलावा, कई central agencies और paramilitary forces को भी शामिल किया गया है। साथ ही NSG के commando, special task force, anti-terror squad, NDRF, NCC के commando भी तैनात किए गए हैं।

सदियों से चले आ रहे शाही स्नान और पेशवाई का नाम बदलकर, उसे अमृत स्नान और कुंभ मेला छावनी प्रवेश रखकर उसे और अधिक सनातन संस्कृति से जोड़ दिया।

ऐसा नहीं कि प्रयागराज में बिल्कुल भी परेशानियां नहीं हो रही है, सड़कों में जाम लगना, लोगों से अनाप-शनाप मूल्य की मांग इत्यादि सब चल रहा है वहां...

पर क्या इसमें पूरी तरह सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

इतनी अधिक भीड़ की व्यवस्था, मेला प्रांगण में तो है, पर किसी शहर का क्षेत्रफल तो रातोंरात बड़ा नहीं किया जा सकता है। तो उस असुविधा को समझते हुए ही महाकुंभ के लिए प्रस्थान करना होगा।

जहां तक रही, मनमाने दाम की मांग, तो वो सरासर ग़लत है, क्योंकि यह तो उस शहर के मांग रखने वाले लोगों को सोचना चाहिए, कि उनकी चंद दिनों की कमाई, उनके अपने शहर का किस तरह अपयश कर रही है। 

उनके शहर में इतना बड़ा धार्मिक आयोजन हो रहा है तो कुछ धार्मिक सोच वो भी रख लें, लोगों से उचित दाम की मांग करें, वहां आने वाले लोगों की हर संभव मदद करें, वो भी उचित मापदंडों के साथ...

क्योंकि सरकार ने तो, मेला प्रांगण तक पहुंचने के लिए मुफ्त बस सेवा दी हुई है। पर सब तो उससे नहीं पहुंच सकते हैं।

जब सोच बड़ा करने की है, तो सोचना सही दिशा में हर एक को होगा।

हर एक को सनातन संस्कृति और देश की ख्याति को सर्वप्रथम रखकर एक साथ आगे बढ़ना होगा, तभी हमारा देश सर्वश्रेष्ठ बनेगा।

जय भारत, जय सनातन 🚩

Sunday, 2 February 2025

India's Heritage : बसंत पंचमी पर्व

आज बसंत पंचमी पर्व है। इस शुभ पर्व पर आप सभी को विशेष शुभकामनाएं 💐 

कभी आपके मन में आता होगा कि बसंत की पंचमी तिथि इतनी विशेष क्यों है, कि इस दिन को विशेष पर्व का स्थान दिया गया है?

चलिए, मां सरस्वती के आशीर्वाद के साथ ही आज का article शुरू करते हैं। मां सरस्वती का आशीर्वाद ही क्यों? वो भी बताते हैं आपको... 

आरंभ उससे करते हैं, जिस का अनुभव प्रत्येक इंसान ने किया है, जिसे सबने देखा है, जो प्रत्यक्ष है...

बसंत पंचमी पर्व


1) प्राकृतिक सौंदर्य :

भारत में पूरे साल को जिन छह ऋतुओं में बाँटा जाता था, उनमें वसंत लोगों का सबसे प्रिय मौसम होता है। और प्रिय मौसम होने के विभिन्न कारण हैं।

तब फूलों पर बहार आ जाती है, खेतों में सरसों का फूल, ऐसा प्रतीत होता है मानो सम्पूर्ण धरती पर सोना चमक रहा हो, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगती है, आम के पेड़ों पर बौर आ जाती है और हर तरफ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगती हैं। फूल-फूल भंवरे भंवराने लगते हैं। 

ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति अपना सोलह श्रृंगार कर नवयौवना सी इठला रही हो। हर ओर सौन्दर्य ही सौन्दर्य दृष्टिगोचर होता है।

अतः वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन पर एक बड़ा उत्सव मनाया जाता था, जिसमें सरस्वती माता, भगवान विष्णु और कामदेव जी की पूजा होती है, और यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था।


2) माँ सरस्वती की पूजा :

मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और विवेक की देवी हैं। दूसरे शब्दों में मनुष्यों को अज्ञानता रूपी अंधकार से निकाल कर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाली देवी... जो अंधकार से प्रकाश में ले जाएं, वो ही सर्वश्रेष्ठ है। 

धार्मिक मान्यतानुसार बसंत पंचमी के दिन ही मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। 

यही कारण है कि बसंत ऋतु की पंचमी तिथि इतनी विशेष है और माता सरस्वती की पूजा इस दिन की जाती है। भारत में कुछ स्थानों में मां सरस्वती के सम्मान में इसे सरस्वती पूजा भी कहा जाता है।

क्योंकि मां सरस्वती का दिन है, तो ज्ञान, विद्या, बुद्धि, और विवेक का भी दिन है, अर्थात् गुरु पूजन का भी दिन है। इसलिए जिस जगह भी गुरु की महत्ता ही सर्वोच्च है, उन सब जगह पर बसंत पंचमी पर्व, सबसे विशेष पर्व के रूप में पूजा जाता है।


3) बसंत पंचमी का दिन :

बसंत पंचमी को बसंत ऋतु के आगमन के रूप में भी देखा जाता है। इस वर्ष पंचांग के अनुसार, माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 2 फरवरी की सुबह 9 बजकर 14 मिनट पर हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 3 फरवरी सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर हो जाएगी।


4) बसंत पंचमी पर्व :

बसंत पंचमी को श्री पंचमी या सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह हिन्दूओं का विशेष पर्व है। 

इस दिन विद्या की देवी सरस्वती, कामदेव और विष्णु की पूजा की जाती है। यह पूजा विशेष रूप से भारत, बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है।

अतः माँ का श्रृंगार पीला, जो पुष्प अर्पित किए जाते हैं वो पीले, भक्तगणों के वस्त्र पीले और चढ़ने वाला प्रसाद भी पीला, जैसे मीठे चावल, बूंदी, मोतीचूर के लड्डू, इत्यादि और भोजन में भी पीला खाना बनाया जाता है, जैसे तहरी, मसाला भात, कढ़ी चावल इत्यादि....

शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। 

बसंत पंचमी होलिका और होली की तैयारी की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो चालीस दिन बाद होती है। पंचमी पर वसंत उत्सव (त्योहार) वसंत से चालीस दिन पहले मनाया जाता है, क्योंकि किसी भी मौसम का संक्रमण काल ​​40 दिनों का होता है और उसके बाद, मौसम पूरी तरह खिल जाता है। 


5) बसंत पंचमी पूजन मंत्र :

बसंत पंचमी पर्व में सभी बच्चों को माता सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त हो, अतः उनके साथ आप, मां सरस्वती का पूजन इन मंत्रों के साथ अवश्य कराएं :

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।


अगर बच्चे कर सकें, तो इस स्तुति से भी मां सरस्वती का पूजन कर सकते है: 

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ 1॥ 

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस प्रकार से है : 

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें...

जिनके शरीर की कांति समस्त दिशाओं में बिखरती है, अपनी छवि से जिसने शिव सागर को भी अपना दास बना लिया है. मंद मुस्कान से जिसने शरद ऋतु के चंद्रमा को भी फीका कर दिया है. ऐसी श्वेत कमल के आसन पर विराजमान हे सुंदरी सरस्वती मैं आप की वंदना करता हूं।


इसी के साथ ही अपनी कलम को विराम देते हैं। मां सरस्वती के आशीर्वाद से आप सभी का जीवन सुखद और उज्जवल रहे 🙏🏻 

Saturday, 1 February 2025

India's Heritage : प्राकट्य, माँ सरस्वती का

प्राकट्य, माँ सरस्वती का


बात उस समय की है जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया।

पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि बनाने के पश्चात् उन्होंने मनुष्य की रचना की...

जब सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण हो गया, तो वह धरती पर भ्रमण करने के लिए आए।

उन्हें अपनी हर कृति पर बहुत नाज़ हो रहा था। लहलहाती हुई प्रकृति, झूमते हुए पशु-पक्षी, सब वैसे ही थे, जैसी उन्होंने कल्पना की थी।

अंत में वो वहां गए, जहां मनुष्य थे। पर मनुष्यों को देख कर उन्हें बहुत ही ग्लानि हुई। 

क्योंकि मनुष्य को बनाकर उन्हें लगा था कि उन्होंने बहुत ही सर्वश्रेष्ठ कृति की रचना की है, पर ऐसा कुछ नहीं था। क्योंकि मनुष्यों और पशुओं में कोई विशेष अंतर नहीं था।

मनुष्य भी पशुओं के समान ही बुद्धिहीन और मूकबधिर सा प्रतीत हुआ...

क्षुब्ध होकर ब्रह्म देव, वापस ब्रह्मलोक में लौट आए।

उन्हें व्यथित देखकर भगवान श्री हरि बोले, “हे ब्रह्म देव! आप के दुःख का निवारण आपके अंदर ही निहित है।”

श्री हरि के इतना कहते ही ब्रह्म देव ने आह्वान किया तो एक अत्यन्त तेज़ और ओज से परिपूर्ण श्र्वेत वस्त्र को धारण किए हुए हंस पर विराजमान देवी प्रकट हुई। उनके हाथों में वीणा और अक्ष माला थी।

ब्रह्म देव, उन्हें देख कर बहुत प्रसन्न हुए।‌ देवी का रूप और गुण देखकर उनका नाम माता सरस्वती रखा गया।

भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु की आज्ञा का पालन करते हुए, सरस्वती माता ने धरती पर विचरण किया, और सभी मनुष्यों को वो प्रदान किया जो उन्हें पशु प्रवृत्ति से भिन्न करती थी। अर्थात् उनके भीतर ज्ञान और विवेक का संचार किया।

मनुष्य के अंदर का ज्ञान और विवेक ही है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। अर्थात् देवी सरस्वती के प्राकट्य के पश्चात् ही मनुष्य को अपना अस्तित्व मिला।

मां सरस्वती को अपने अस्तित्व को प्रदान करने के लिए, उनका पूजन, ध्यान करना। पीला प्रसाद तैयार करना, पीले पुष्प अर्पित करना पीले वस्त्र धारण करना... बस यही है, बसंत पंचमी पर्व का त्यौहार... और यही है कारण है कि बसंत पंचमी पर्व को सनातन धर्म में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।