Monday, 6 October 2025

Poem : मिलन चांद चकोरी का

आज शरद पूर्णिमा है। एक विशेष पूर्णिमा, जिसकी सब पूर्णिमा में मुख्य भूमिका है।

कारण, इस पूर्णिमा में चांद अपनी सोलह कलाओं से युक्त होता है। अर्थात् सबसे खूबसूरत, सबसे अधिक फलदाई होता है, अमृत-वर्षा करने वाला।

इस पूर्णिमा की एक विशेषता और है, कि द्वापरयुग में श्रीकृष्ण भगवान ने गोपियों के साथ इसी पूर्णिमा में रासलीला रचाई थी।

पर जो प्रियसी अपने साजन से दूर हो, उसे तो चांद तभी रास आएगा, जब वो अपने प्रियतम के साथ हो।

एक विरह वेदना में एक प्रियसी की चांद से कामना को काव्य बध किया है।

मिलन चांद चकोरी का


चांद है सुहाना, 

देखे है ज़माना, 

मिलन चांद चकोरी का।


पर तुम बिन सजना, 

मन नहीं लगना, 

क्या देखें मिलन चकोरी का।


तुम जो न साथ हो,

हाथ में न हाथ हो, 

क्या देखें मिलन चकोरी का।


तुम उस छोर पर, 

हम इस छोर पर, 

क्या देखें मिलन चकोरी का।


चंदा, कुछ कर दो ऐसा,

फिर से साथ मिले हमेशा। 

हाथ में हाथ हो,

एक-दूजे का साथ हो। 

फिर हम भी देखेंगे, 

मिलन चांद चकोरी का।।


शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻 

Saturday, 4 October 2025

India's Heritage : बदलते युग में देवता-राक्षस

आज आपको भारतीय धरोहर segment में एक बहुत ही interesting बात बताएंगे। वैसे आप सबको यह पता है, फिर भी शायद, कभी ऐसे सोचा नहीं होगा।

तो चलिए देखते हैं, कि क्या है वो बात…

बदलते युग में देवता-राक्षस


वो बात है, देवताओं और राक्षसों की उपस्थिति की।

सतयुग था, जब देवता और राक्षस अलग-अलग लोक में रहते थे। त्रेतायुग आया तो दोनों ही एक लोक में आ गए,  द्वापरयुग आया तो देवता और राक्षस, एक ही परिवार मे होने लगे।

और अब जब कलयुग है, तब देवता और राक्षस दोनों एक ही शरीर में रहने लगे हैं।

सतयुग, वो युग है, जब सब ओर सत्य, प्रेम, भक्ति और विश्वास था। इस युग में देवता स्वर्ग-लोक में थे और इंसान और राक्षस, भू-लोक और पाताल-लोक या नर्क-लोक में रहते थे।

हाँ, जब कभी कोई राक्षस त्रिदेवों में से किसी का अनन्य भक्त होता था, तो वो अपने तप से उन्हें प्रसन्न कर अत्यंत बलशाली हो जाता था।

तब वो देवाताओं से युद्ध कर उन्हें पराजित कर स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य जमा लेता था। पर कुछ समय के लिए ही, क्योंकि त्रिदेवों में से कोई एक या आदिशक्ति मां जगदम्बा उस राक्षस का वध करके स्वर्ग लोक पुनः देवताओं को दे देते थे।

फिर आया त्रेतायुग, भगवान श्रीराम और रावण का युग, देवता और राक्षस, दोनों ही भू-लोक में थे, अपने-अपने सद्कर्म और दुष्कर्म के साथ। इसमें प्रभू श्रीराम ने रावण का वध करके सत्य की असत्य पर जीत दिलाई।

उसके बाद आया द्वापरयुग, भगवान् श्रीकृष्ण और कंस का युग, जिसमें देवता और राक्षस दोनों एक ही परिवार के सदस्य थे। वो भी ऐसे पवित्र रिश्ते में, जिसकी कल्पना भी कर पाना असम्भव था। बल्कि एक तरह से देखा जाए तो द्वापरयुग में आते-आते यह हो गया कि अपने रिश्तेदारों में भी कोई भी आपका दुश्मन हो सकता है। पर तब भी सगे रिश्ते, इस तपिश से दूर थे।

उसके बाद आया कलयुग, अर्थात् आजकल का युग। इसमें सगे रिश्तों में भी देवता और राक्षस मिलने लगे, पर अब तो इंतहा हो गई है कि एक ही शरीर में देवता और राक्षस मौजूद हैं।

पर इस युग में भी अगर कोई चाहे तो अपने अंदर के देव रूपी कृत्य को जागृत करके, और राक्षस-रूपी कृत्य को सुप्त अवस्था में ले जा सकता है। 

इस का सिर्फ एक कारण है और वो है कि देव भी आप ही हो, बस उसकी ही सुनते चलिए, राक्षस अपने आप शांत हो जाएगा। 

जय श्री हरि 🚩🙏🏻

Thursday, 2 October 2025

India's Heritage : रावण का जन्म

आज भारत की धरोहर में आपके लिए रावण के जन्म की कहानी को लेकर आए हैं।

आप सोचेंगे कि रावण के जन्म ने ऐसा क्या प्रेरित किया?

तो उसका कारण है, कि रावण ने माता सीता का अपहरण किया था, फिर भी वो भगवान के हाथों, मुक्ति को प्राप्त हुआ।

क्या दुराचार करके भी किसी को मुक्ति मिल सकती है, और वो भी स्वयं श्रीहरि के हाथों?

क्या ईश्वर को पाने के लिए दिन-रात भक्ति की कोई आवश्यकता नहीं है?

इन्हीं सब प्रश्नों का जवाब है, रावण का जन्म और विजयदशमी...

रावण का जन्म


श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार रावण पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय थे, जो अपने भाई विजय (जो बाद में कुंभकर्ण बने) के साथ थे। 

एक बार उन्होंने सनक आदि मुनियों को भगवान विष्णु से मिलने से रोका, जिससे क्रोधित मुनियों ने उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनी में रहने का श्राप दिया।

इसी श्राप के कारण जय और विजय ने पहले हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया, जिनका वध भगवान नरसिंह ने किया। दूसरे जन्म में वो रावण और कुंभकर्ण के रूप में उत्पन्न हुए, जिनका वध भगवान श्रीराम ने किया।

तीसरा शिशुपाल और दंतवक्र, जिनका वध भगवान श्रीकृष्ण जी ने किया 

अब इस बात का कुछ कारण तो आपको समझ आ गया होगा, पूरा इन बातों से समझ लेते हैं।

रावण और कुंभकर्ण कोई दुरात्मा नहीं थे, बल्कि भगवान विष्णु के द्वारपाल थे। उनका अपराध अक्षम्य नहीं था, न ही इतना बड़ा था कि उन्हें तीन जन्मों के लिए श्राप मिल जाता।

पर हमारे ऋषि-मुनि इतने सिद्ध थे कि उनके दिए गए श्राप को काटने के लिए भगवान को जन्म लेना पड़ता था।

अब जब जय और विजय उनके ही द्वारपाल थे, तो उनकी मुक्ति के लिए तो श्रीहरि को आना ही पड़ता।

पहली बार नरसिंह भगवान के रूप में, उसके विषय में विस्तार से फिर चर्चा करेंगे।

आज दशहरा है तो आज रावण को ही प्रधानता देते हैं।

हांँ, तो दूसरा जन्म रावण और कुंभकर्ण था, जिसकी मुक्ति के लिए स्वयं श्रीराम आए थे और वो भी तब जब रावण ने उनकी पत्नी माता सीता जी का अपहरण किया था।

आपने अपहरण देखा। पर क्या यह देखा कि रावण के जन्म में भी वह, कितना बड़ा शिवभक्त था। वो कितना विद्वान था, वो कितना बड़ा पंडित था, उसके राज्य में प्रजा सुखी थी, वो इतना समृद्धशाली था कि उसकी लंका सोने की थी। उसके परिवार में सुख, शांति, प्रेम और इतना अपनापन था कि पूरे कुटुम्ब ने रावण के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया।

और उसने माता सीता जी का अपहरण ज़रूर किया, पर माता सीता के उसके पास अकेले रहने के बावजूद भी कभी उसने उन पर बल का प्रयोग नहीं किया। बल्कि उनके लिए हर तरह की सुविधा का ध्यान रखा। 

अब श्रीहरि से मुक्ति चाहिए थी, वो भी पूरे कुटुम्ब के लिए, तो कोई तो बड़ा कारण होना चाहिए था। रावण ठहरा पुण्य-आत्मा, अतः उसने सम्मान सहित माता सीता जी के अपहरण को निमित्त बना लिया।

तो आपको क्या लगता है, कि श्री हरि ने एक दुराचारी को मुक्ति दी थी? नहीं, बल्कि एक पुण्य-आत्मा को ही मुक्ति दी थी, और वो भी इस बड़े संदेश के साथ कि कोई लाख अच्छे कर्म कर ले, पर उसके द्वारा किया गया एकमात्र पाप भी अक्षम्य है।

तो विजयादशमी (दशहरा) पर्व दो बातों का प्रतीक है :

  1. जो ईश्वर का भक्त है, उसकी मुक्ति सदैव ईश्वर द्वारा होगी, भले ही उसके लिए उन्हें जन्म ही लेना पड़े।
  2. व्यक्ति द्वारा किया गया एक पाप भी उसके सौ पुण्य पर भारी है।

आप सभी को विजयादशमी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻 

रावण के पुतले को जलाएँ पर उससे पहले अपने भीतर बैठे रावण को मारकर आएँ।

जय श्री राम 🚩🙏🏻