Wednesday, 9 April 2025

Story of Life: वो भयानक रात (भाग -3)

व भयानक रात (भाग -1) व

वो भयानक रात (भाग -2) के आगे...

वो भयानक रात (भाग -3) 


सन्नी आगे दरवाजे की ओर बढ़ा, तभी आशा ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया... अरे क्या कर रहे हो सन्नी बाबा? 

पीछे हट जाओ, दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं है, मेरा मरद होगा.. पक्का मुझे लेने आया होगा... 

आपके पति आंटी? वो क्यों आएंगे इतनी रात में??? 

अरे मैं जानती हूं, अपने मरद को, वो ही होगा..

आशा का कहना सही था, वो आशा का पति संजीव ही था। 

वो ज़ोर ज़ोर से आशा का नाम लेकर बाहर बुला रहा था, शायद उसने बहुत अधिक शराब भी पी रखी थी... क्योंकि उसकी आवाज़ में लडखडाहट साफ सुनाई दे रहा था।

सुनकर सुरेश जी बोले, जब संजीव तुम्हें लेने आया है, तो दरवाजा भी खोलना चाहिए और तुम्हें उसके साथ जाना भी चाहिए।

आशा, सुनीता के पैरों से लिपट गई, दीदी, भैया को मना करो, वरना संजीव मुझे पीट-पीटकर अधमरा कर देगा। 

बस रात भर की बात है, सुबह होते ही मैं गांव चली जाऊंगी... तुम्हारे घर इतने दिन काम किया है, तुमने मेरा हमेशा साथ दिया है, एक आखिर बार और दे दो।

एक बार बच्चों को अपनी मां के पास गांव छोड़ आऊं, फिर ठीक से निपटूंगी संजीव से...

मुझे अपनी चिंता नहीं है, एक बार बच्चों की चिंता से मुक्त हो जाऊं, वरना यह नकारा इंसान शराब के लिए मेरे बच्चों को बेच देगा।

आशा, बिना सांस लिए बस बोले जा रही है, साथ ही वो बहुत बुरी तरह से कांप भी रही थी, न जाने डर से या क्रोध से...

उधर संजीव भी दरवाजा पीटे जा रहा था, साथ ही गाली-गलौज भी कर रहा था।

कुछ देर में उसने आशा के साथ-साथ सुनीता के घर के सब लोगों को भी गाली देना शुरू कर दिया और वो भी बहुत तेज़ स्वर में...

अब तो शोर शराबे से पूरे apartment के लोग जाग गये, कुछ के तो फोन भी आने लगे कि वो लोग आधी रात को क्या तमाशा करवा रहे हैं? दरवाजा खोलकर maid को भेज क्यों नहीं देते हैं?  

सुरेश जी भी तंग आकर सोच रहे थे कि क्या करें? एक तरफ हद का मचता हुआ शोर, दूसरी ओर आशा का गिड़गिड़ाना...

इससे पहले कि वो निर्णय लेते, बहुत तेज़ भढाम से आवाज़ हुई...

आगे पढ़े वो भयानक रात (भाग -4) में ...

Tuesday, 8 April 2025

Story of Life: वो भयानक रात (भाग -2)

वो भयानक रात (भाग -1) के आगे...

वो भयानक रात (भाग -2)




यह कहते हुए सुनीता, उस बच्चे की ओर बढ़ी, जो गिर गया था, पर उसका पैर बड़ी तेज़ी से फिसला गया... 

वो तो सन्नी ने संभाल लिया, वरना आशा के बच्चे के चक्कर में सुनिता की हड्डी ज़रूर टूट जाती...

सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वो अचानक से फिसलने कैसे लगी थी?

तभी उसने ध्यान दिया कि आशा की 1 साल की बच्ची ने शूशू कर दिया था। 

सुनीता को गिरता देख, आशा बोलने लगी, दीदी अपना ध्यान रखो, इन बस्ती के बच्चों की तो आदत है, गिरते-पड़ते, मारते-पीटते रहने की... 

हम इतनी लोलो-पोच नहीं करते, तुम बड़े लोगों जैसे, वरना तो पाल लिए बच्चे... 

तुम्हारा क्या है, दो बच्चे और office का काम, बस.... 

हमारे जैसे तुम लोग नहीं कर सकते, 10-10 बच्चे और दिनभर मैडमों के नखरे... 

दुनिया भर का शोर और आशा की फालतू की बातें, सुन-सुनकर, सुरेश जी का सिर चकराने लगा, वो अंदर जाने को मुड़े ही थे कि फिर जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी...

आह! अब कौन?...

आगे पढ़े, वो भयानक रात (भाग -3) में...

Monday, 7 April 2025

Story of Life : वो भयानक रात


वो भयानक रात (भाग -1)



रात गहरा चुकी थी, सब सो चुके थे। हर ओर सन्नाटा पसरा हुआ था।

तभी बहुत तेज दरवाजा पीटने की, साथ ही bell पर bell बजाने की आवाज आने लगी।

सुनीता, सुरेश, श्यामा और सन्नी सब जाग गये।

दरवाजा खोला, तो सामने आशा, अपने बच्चों के‌ साथ खड़ी थी।

थोड़ी ही देर में हुड़दंग और बच्चों के शोरगुल से घर की शांति भंग हो चुकी थी।

श्यामा और सन्नी, सुनीता की ओर प्रश्न सूचक नजरों से देख रहे थे, जैसे पूछ रहे हों, यह सब क्या है माँ?

शांत स्वभाव के सुरेश जी भी, इतनी रात को मंच रही चिल्ल-पों से irritate होने लगे।

सुनीता को भी आशा का इतनी रात को बच्चों के‌ साथ आ जाना, कुछ समझ नहीं आ रहा था।

बहुत संकोच के बाद उसने आखिरकार, आशा से इतना ही पूछा, क्या आशा इतनी देर में बच्चों के साथ क्यों?

पर आशा से ज्यादा बोलना भी कहां होता था, ज़रा कुछ बोलो और उसका tape recorder शुरू हो जाता था, तो बस सुनीता के इतना पूछने भर से वो लगी दहाड़े मार-मारकर रोने...

क्या रात दीदी... मेरे पर परेशानी आएगी, तो और मैं कहां जाती? तुम्हारा ही तो सहारा है... 

वरना बच्चों के साथ हमें इतनी रात को कौन अपने घर आने देगा? तुम भी ना, कुछ समझती ही नहीं हो... 

अभी आशा अपना दुखड़ा सुना ही रही थी कि उसके दो बच्चे सोफे पर ज़ोर-ज़ोर से कूदने लगे और उनके कूदने से सोफे की seat फट गई... 

Seat फटने से एक बच्चा disbalance होकर गिर गया और जोर-जोर से रोने लगा।

अब सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि लाखों रुपए के महंगे सोफे को देखकर दुखी हो या बच्चे को लगी चोट को देखे...

वो अभी ऊहापोह में ही थी कि ज़ोर-ज़ोर से चटाक-चटाक की आवाजें आई, आशा ने दोनों बच्चों को चाटें रसीद दिए थे। 

यह देख, बरबस सुनिता के मुंह से निकल गया, अरे क्या कर रही है? बच्चे को देख उसे चोट तो नहीं लगी है।

यह कहते हुए सुनीता, उस बच्चे की ओर बढ़ी, जो गिर गया था, पर उसका पैर बड़ी तेज़ी से फिसला गया... 

वो तो सन्नी ने संभाल लिया, वरना आशा के बच्चे के चक्कर में सुनिता की हड्डी ज़रूर टूट जाती...

सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वो अचानक से फिसलने कैसे लगी थी?

आगे पढें वो भयानक रात (भाग - 2) में