राखी का सौदा (भाग-1) के आगे…
राखी का सौदा (अंतिम भाग)
कृतिका ने हाँ तो कह दिया, पर उसको विश्वास नहीं था कि उसके भैया उससे राखी बंधवाए बिना रह लें। वो राखी में आई तो उसने देखा कि घर पर सचमुच ताला लगा था।
यह देखकर उसके आंसू छलक आए, भैया ने ऐसा कैसे कर लिया, वो पलटी ही थी कि उसका ध्यान गया कि ताला सिर्फ सामने लगा था, back entry पर नहीं।
वो समझ गई कि भैया-भाभी घर पर ही हैं, क्योंकि कृष security के मामले में बहुत particular था। सब जगह lock लगाकर ही वो घर से निकलता था।
कृतिका ने पीछे के door को ऐसे knock किया, जैसे राधेश्याम दूध वाले भैया करते थे। सुहाना ने दूध वाला समझकर दरवाजा खोल दिया।
पर सामने कृतिका को देखकर सकपका गई। कृतिका भी दनदनाते हुए गुस्से में सीधे कृष के कमरे में पहुंच गई।
“भैया, घर पर रहने के बाद भी ऐसा भी क्या हो गया कि राखी न बंधवाना पड़े, इसके लिए झूठ बोला आपने? अपनी बहन से बस इतना ही प्यार है आपको…” आदि, आदि।
कृतिका बोले जा रही थी और कृष सब कुछ चुपचाप सुन रहा था। तभी सुहाना आ गई और उसने झूठ बोलने का सारा कारण बताया।
सुनकर कृतिका फूट-फूटकर रोने लगी, और कहने लगी, “भैया आपने मुझे पराया कर दिया! आप एक बार अपनी परेशानी बताते, तो क्या मैं मदद न करती?”
“आप ने यह किस तरह से सोच लिया कि मैं यहां आपसे दुनिया भर के सामान लेने आती हूँ, और अगर कम दिया, तो फ़र्क पड़ जाएगा।”
“भैया, राखी का अर्थ यह नहीं है कि हमेशा भाई ही रक्षा करेगा, हमेशा वो ही बहन को देगा। बल्कि ज़रूरत पड़ने पर बहन भी दे सकती है, रक्षा कर सकती है।”
यह कहकर कृतिका ने कृष के account में 50 lakhs रुपये transfer कर दिए।
“अरे कृतिका, यह क्यों? मैं अपनी छोटी बहन से पैसा नहीं ले सकता, क्यों पाप चढ़ा रही है?”
“नहीं भैया, ऐसा कुछ नहीं है और मैंने जो दिया है, सब आपका ही दिया हुआ और अभी भी बहुत है, मेरे पास आपका दिया हुआ, अतः और लगे तो बोल दीजिए मैं transfer कर दूंगी। और हाँ भाभी, भैया तो कुछ बोलने से रहे तो आप ही बता दीजिएगा।”
“और सबसे बड़ी बात भैया, कि बहनें भाई के पास राखी का सौदा करने नहीं आती हैं, दुनिया भर के सामान बटोरने नहीं आती हैं, बल्कि वो आती हैं, अपने भैया-भाभी का प्यार बटोरने, उनके संग बिताए पलों की यादें समेटने, रिश्ते को अटूट करने और उनके सुख-दुख में जिंदगी भर जुड़े रहने के लिए। क्योंकि राखी कोई बंधन नहीं है बल्कि एक डोर है, जो मजबूती से भाई-बहन को जोड़कर रखती है।”
“राखी के धागे में बंधी होती है,
प्यार की सबसे मजबूत गांठ।
दुआ है हमेशा खुश रहो भाई,
तुम्हारी राह हो आसान।।”
इसके साथ ही कृतिका ने घर में लगे सारे locks खोल दिए, फिर अपने साथ लाए राखी व मेवा मिठाई से टीका-रुचना किया।
पूरा दिन पुरानी यादों को ताज़ा किया गया, फिर कृतिका चली गई, भैया-भाभी के मन में राखी का सही अर्थ बताकर।
लौटते हुए उसने खूब सारे सामान खरीद लिए, जिससे उसके भाई का मान उसके ससुराल में कम न हो।
कृतिका ने इतने पैसे दे दिए थे, कि कृष का business जल्द ही वापस flourish करने लगा।
अगली राखी में फिर से कृतिका का धूम-धड़ाके के साथ स्वागत किया, अब की बार राखी के तोहफे के साथ 50 lakhs भी दिए, यह कहकर कि तुमने अपने भाई का मान बचाने के लिए दिए थे, अब मान बनाए रखने के लिए ले लो।
कृष की इस बात के आगे कृतिका कुछ नहीं बोली और उसने मान के रुपये रख लिए।
आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ!


