Wednesday, 29 April 2026

Article : आशाओं के बांध टूट गये

आशाओं के बांध टूट गये


हर साल आने वाले वो चंद पल, जो निर्धारित करते हैं कि आप सफल हुए कि नहीं। कितने बड़े और कठिन होते हैं यह पल!

उनके लिए जिन्होंने सफलता प्राप्त कर ली, और उनके लिए भी जो इस सफलता को नहीं पा सके।

जिनको सफलता मिल गई, उन सबको बधाइयां! पर जो वंचित रह गए, उनसे सिर्फ यह ही कहेंगे कि वो सिर्फ़ एक पल है, पूरी जिंदगी नहीं।

जो नहीं मिली, उसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं, जैसे कि अभी वो पल नहीं आया था, जो आपका है, या शायद यह वो मंज़िल ही नहीं जो आप पाना चाहते हैं।

शायद आपकी राहें कुछ अलग हैं, मंज़िल इससे भी ज्यादा अच्छी। अपनी मेहनत को, अपनी किस्मत को कोसिए नहीं। यह मत सोचो कि आशाओं के बांध टूट गये हैं।

अभी जिंदगी के बहुत से बहुमूल्य पल हैं आपके पास, जिनमें आप सिद्ध कर सकते हैं कि जो आप में है, वो किसी और में नहीं है।

तो उठिए, और अधिक जोश, और अधिक विश्वास के साथ, उसको पाने के लिए, जो आपका है। 

साथ ही इस कविता को जरूर पढ़िए व सुनिए, शायद यह आप में आत्मविश्वास का संचार करने में सहायक हो।

पढ़ने के लिए इस पर click करें-https://shadesoflife18.blogspot.com/2022/07/poem.html?m=1

सुनने के लिए इस पर click करें-https://youtu.be/ndNNqfdaxxg?si=lQ7WKKG2kOLmOj5r

Monday, 27 April 2026

Article : Mohini Ekadashi

(I) Mohini Avatar :

आज मोहिनी एकादशी है। भगवान श्रीहरि के मोहिनी स्वरूप की आराधना की एकादशी। ऐसे स्वरूप की जिसका जो नाम है, वही प्रभाव भी। अर्थात् ईश्वर की साधना में मोहित होकर सर्वस्व प्राप्त कर लेना।

जी हाँ, सर्वस्व प्राप्त कर लेना। मुख्यतः कहा जाता है कि ईश्वर की आस्था में लीन होकर सर्वस्व न्यौछावर कर दो, पर यह ऐसा व्रत है, जो आपको सांसारिक सुखों की प्राप्ति से लेकर मोक्ष तक सब प्रदान करता है।


(II) Vishnu's Dashavatar :

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के प्रमुख 10 अवतार (दशावतार) माने जाते हैं, जो पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए लिए गए थे। हालांकि श्रीमद्भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों में मुख्य रूप से 24 अवतारों का भी वर्णन मिलता है। ये हैं विष्णुजी के दशावतार :

  • मत्स्य (मछली)
  • कूर्म (कछुआ)
  • वराह (सूअर)
  • नरसिंह (नर-सिंह)
  • वामन (बौना ब्राह्मण)
  • परशुराम
  • राम
  • कृष्ण
  • बुद्ध
  • कल्कि (भविष्य का अवतार)

इनमें से अब तक 23 अवतार अवतरित हो चुके हैं, जबकि 24वां (कल्कि अवतार) अभी होना बाकी है। इनके अलावा देवताओं की रक्षा हेतु भगवान श्रीहरि विष्णु जी ने एक स्वरूप भी धरा था और वो था मोहिनी का स्वरूप।

भगवान विष्णु जी का स्त्री स्वरूप सम्पूर्ण ब्रह्मांड में उपस्थित सबसे ज्यादा खूबसूरत स्त्री स्वरूप। प्रभु श्रीहरि विष्णु का हर स्वरूप मन को मोह लेता है, लेकिन भगवान श्रीहरि का मोहिनी स्वरूप हर एक को सर्वाधिक मोहित करता है।

आइए जानते हैं इसके विषय में... 

Mohini Ekadashi


(III) Ekadashi :

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। बता दें कि एक साल में कुल 24 एकादशी होती है। लेकिन इस साल अधिकमास होने के कारण कुल 26 एकादशी पड़ने वाली है। ऐसे ही वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। 

वैशाख के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी आती है। मोहिनी एकादशी को उपवास करने आपके लिए एक नहीं कई लाभ होते हैं। भगवान विष्णु की कृपा तो मिलती है, साथ ही सभी पाप भी नष्ट हो जाते हैं। अनेक जन्मों के किए हुए महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए मोहिनी एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए। 

पहले जान लेते हैं कि भगवान श्रीहरि ने मोहिनी स्वरूप क्यों धारण किया था।


(IV) Reason behind Mohini :

पौराणिक कथा के अनुसार यह सतयुग में समुद्र मंथन को अंतिम स्वरूप प्रदान करने के लिए भगवान श्री हरि ने मोहिनी स्वरूप धारण किया था। पर ऐसा क्या हुआ था, जिसके कारण समुद्र मंथन हुआ था? आइए विषयवार इस को समझते हैं।


(V) Samudra Manthan :

  • Time- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह घटना सत्ययुग में हुई थी।
  • Reason- ऋषि दुर्वासा के श्राप से इंद्र और अन्य देवता श्रीहीन (शक्तिहीन) हो गए थे, जिसे पुनः प्राप्त करने के लिए मंथन आवश्यक था।
  • Equipments- मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी (नेती) बनाया गया था।
  • Base- भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुआ) अवतार लेकर मंदराचल पर्वत को अपने कवच पर धारण किया था।
  • Conclusion- मंथन से 14 रत्न निकले, जिनमें विष (हलाहल), अमृत कलश, माता लक्ष्मी, और ऐरावत हाथी जैसे बहुमूल्य रत्न शामिल थे।

आपको बता दें कि भगवान श्रीहरि ने मोहिनी रूप धर कर देवताओं को अमृतपान कराया था, इसलिए मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत खास है।

मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब अमृत निकला था, तब उसे राक्षसों से बचाकर देवताओं को प्रदान करने के लिए भगवान श्री विष्णुजी ने मोहिनी अवतार धारण किया था और धर्म की रक्षा की थी। 

इसी कारण मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णुजी की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है और हर तरह के पापों से भी मुक्ति मिल सकती है।


(VI) Date & Time in 2026 :

मोहिनी एकादशी 27 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत में मोहिनी एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें, ये हजारों गायों को दान करने के समान पुण्य देता है।

ये व्रत तमाम तरह के मोह, बुरे कर्म से मुक्ति दिलाकर सही राह पर चलने की शक्ति देता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति के तमाम पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे राजसुख प्राप्त होता है। अगर आपको मोहिनी एकादशी व्रत की सम्पूर्ण कथा जाननी है, तो हम अगली मोहिनी एकादशी में उसे ही साझा करेंगे।

साथ ही आप को आगे यह भी बताएंगे कि दशमी-एकादशी योग या एकादशी-द्वादशी योग में से कौन-सा अधिक शुभ मुहूर्त है। अतः जुड़े रहें Shades of Life से आस्था और विश्वास के साथ।

बोलो भगवान श्रीहरि की जय!

Friday, 24 April 2026

India's Heritage : माँ बगलामुखी

(I) प्राकट्य दिवस :

आजकल हिन्दू देवी-देवताओं की मान्यता, पूजा-अर्चना को विशेष बल दिया जा रहा है, जो कि हिन्दू संस्कृति को सुदृढ़ करने के लिए अत्यावश्यक भी है।

माँ बगलामुखी देवी, एक ऐसा नाम, जो आज के दिन के लिए सर्वोच्च स्थान पर विराजमान हैं। कारण यह है, कि आज उनका प्राकट्य दिवस है।

पर माँ बगलामुखी कौन हैं और क्या है उनके प्राकट्य की कथा? आज India's Heritage segment में उनकी आराधना के साथ ही यह article लिख रहे हैं…

माँ बगलामुखी


(II) तिथि :

यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है, जिस दिन मां बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था। वर्ष 2026 में बगलामुखी जन्मोत्सव 24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा।

  • आरंभ- 23 अप्रैल 2026 को रात 8:50 बजे से।
  • समापन- 24 अप्रैल 2026 को शाम 7:22 बजे तक।


(III) माँ बगलामुखी :

दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या बगलामुखी, माँ पार्वती का उग्र स्वरूप हैं। इन्हें युद्ध और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली देवी माना जाता है। वशीकरण और कीलन की शक्ति देने वाली बगलामुखी के पीतांबरा, ब्रह्मास्त्र, रूपिणी आदि नाम भी प्रमुख हैं। इनका वाहन बगुला पक्षी है।

माँ बगलामुखी के प्राकट्य की दो पौराणिक कथाएं हैं, जो इस प्रकार हैं।


(IV) पहली पौराणिक कथा :

सतयुग में भीषण तूफान के कारण पृथ्वी नष्ट होने वाली थी। भगवान विष्णु चिंतित होकर भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने विष्णुजी से कहा, “इस संकट को सिर्फ आदिशक्ति ही दूर कर सकती हैं।” 

प्रभु विष्णुजी ने आदिशक्ति मां जगदम्बा (पार्वती माता) की कठोर तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर देवी जगदंबा सौराष्ट्र में हरिद्रा झील में बगलामुखी के रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने पृथ्वी को नष्ट होने से बचाया।


(V) दूसरी पौराणिक कथा :

एक राक्षस ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के ग्रंथ चुरा लिए और पाताल लोक में जाकर छिप गया। उस राक्षस से मुक्ति दिलाने के लिए बगलामुखी की उत्पत्ति हुई। उन्होंने बगुले का रूप धर कर अपनी शक्ति से उस राक्षस का वध किया और ग्रंथ ब्रह्मा को वापस सौंप दिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार सबसे पहले ब्रह्मा ने बगलामुखी साधना का उपदेश सनकादि ऋषियों को दिया था। सनकादि ऋषियों से प्रेरित होकर देवर्षि नारद ने भी देवी की साधना की। देवी के दूसरे उपासक भगवान विष्णु जी ने परशुराम को यह विद्या प्रदान की और उन्होंने इस विद्या को द्रोणाचार्य को प्रदान किया।


(VI) माँ बगलामुखी का स्वरूप :

वैदिक काल में सप्तऋषियों ने देवी बगलामुखी की साधना की। भगवान कृष्ण ने भी महाभारत के युद्ध से पूर्व पांडवों से बगलामुखी की साधना करवाई थी।

इनकी साधना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव महाकाल हैं। बगलामुखी की दो भुजाएं हैं। इनके दाहिने हाथ में गदा है तथा बायें हाथ से एक दानव की जीभ पकड़कर उसे मारते हुए दर्शाया जाता है। देवी की यह छवि उनके स्तंभन स्वरूप को प्रदर्शित करती है।


(VII) माँ बगलामुखी की सोलह शक्तियां :

कहा जाता है कि माँ बगलामुखी सोलह शक्तियों से परिपूर्ण थीं, उनकी सोलह शक्तियां इस प्रकार हैं-

  • मंगला (मंगलकारी और शुभ करने वाली)
  • वश्या (शत्रुओं और प्रतिकूल परिस्थितियों को वश में करने वाली)
  • अचलाय (स्थिर रहने वाली)
  • मुंधरा (शत्रु के मुख को बंद करने वाली)
  • स्तंभिनी (शत्रु की क्रिया, वाणी और बुद्धि को स्तंभित करने वाली)
  • बलाय (शारीरिक व मानसिक बल प्रदान करने वाली)
  • जृम्भिणि (शत्रु के ज्ञान और चेतना को जड़ करने वाली)
  • मोहिनी (मोहने वाली)
  • भाविका (भावनाओं को समझने वाली और भावातीत)
  • धात्री (संसार के धारण करने वाली)
  • कलना (समय को नियंत्रित करने वाली)
  • भ्रामिका (शत्रुओं में भ्रम पैदा करने वाली)
  • कल्पमसा (दुष्टों का नाश करने वाली)
  • कालकर्षिणि (काल को आकर्षित करने वाली)
  • भोगस्था (भोग-विलास और सुख प्रदान करने वाली)
  • मंदगमना (शांत और स्थिर गति वाली)


(VIII) माँ बगलामुखी का महत्व :

इस दिन को शत्रुओं पर विजय, वाद-विवाद, और मुकदमों में सफलता के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। माँ बगलामुखी को 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है, जो 'स्तंभन' (रोकने) की शक्ति हैं।


(IX) बगलामुखी माता का मंदिर : 

बगलामुखी देवी मंदिर, विशेषकर नलखेड़ा (मध्यप्रदेश) (उज्जैन से ~100 किमी) और कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में स्थित, अत्यंत सिद्ध और प्राचीन शक्तिपीठ हैं। पांडव कालीन यह मंदिर शत्रुओं पर विजय, कोर्ट-कचहरी बाधाओं, और तांत्रिक अनुष्ठान के लिए प्रसिद्ध हैं।

नलखेड़ा, आगर मालवा (मध्यप्रदेश) मंदिर की मुख्य बातें:

स्थान: आगर-मालवा जिले में लखुंदर नदी के किनारे, नलखेड़ा।

महत्व: यह स्वयंभू सिद्धपीठ है, जहां पांडवों ने महाभारत युद्ध से पहले विजय प्राप्ति के लिए पूजा की थी।

विशेषता: यहाँ मां बगलामुखी की तीन मुख वाली त्रिशक्ति के रूप में पूजा होती है।

पूजा: शत्रु नाशक और करियर में सफलता के लिए यहाँ विशेष तांत्रिक हवन और पूजन किया जाता है। 

दतिया (मध्य प्रदेश) स्थित श्री पीतांबरा पीठ देश का अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली शक्तिपीठ है, जो मां बगलामुखी (पीतांबरा देवी) और धूमावती देवी को समर्पित है। 1935 में स्थापित, यह मंदिर शत्रुओं के नाश, मुकदमों में जीत और तांत्रिक साधना के लिए जाना जाता है। यहाँ स्थित वनखंडेश्वर शिव मंदिर महाभारतकालीन माना जाता है।

इस वर्ष दतिया के इस मंदिर में भव्य आयोजन किया जा रहा है। अनेकानेक श्रृद्धालुओं का जमावड़ा भोर की प्रथम बेला से लग गया है।


(X) दतिया बगलामुखी मंदिर :

  • स्थान- मध्य प्रदेश के दतिया जिले में, झांसी से लगभग 30 किमी की दूरी पर।
  • स्थापना- स्वामीजी महाराज (गोलोकवासी) द्वारा 1935 के आसपास।
  • प्रमुख देवता- मां बगलामुखी (पीतांबरा देवी), धूमावती देवी (जो भारत में एकमात्र स्थान पर हैं), और वनखंडेश्वर महादेव।
  • विशेषता- बगलामुखी देवी का रंग पीला है, इसलिए उन्हें पीतांबरा भी कहते हैं और यहाँ पीत (पीले) रंग की वस्तुएं ही चढ़ाई जाती हैं। यहाँ तंत्र साधना और विशेष हवन (जैसे हल्दी हवन) कराए जाते हैं, जो कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • समय- सुबह 6:00 बजे से रात 9:30 बजे तक (मंगल आरती सुबह 6 बजे और संध्या आरती 7:30 बजे)।
  • कैसे पहुँचें- दतिया railway station (झांसी-ग्वालियर मार्ग) निकटतम है।
  • पौराणिक महत्व- मान्यता है कि पांडवों ने महाभारत युद्ध से पहले माता की पूजा की थी, और यह मंदिर स्वयंभू (स्वयं प्रकट) है।
  • पूजा विधि- माँ बगलामुखी को पीला रंग प्रिय है, इसलिए भक्त पीले वस्त्र पहनकर, पीली वस्तुओं (पीले फूल, हल्दी, पीले भोग) के साथ माता की पूजा करते हैं। 

माँ बगलामुखी की जय!

माँ सबके रुके हुए कार्य को पूरा करें, सभी को सुख प्रदान करें।


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