आज India's Heritage segment में एक ऐसी कहानी share कर रहे हैं, जिस को पढ़कर आप कह उठेंगे कि “मेरा भारत महान”।
आज की कहानी से आप को समझ आएगा कि (Isaac) Newton और अकबर को महान कहने से पहले कोई ऐसा सम्राट आया था, जो सच में महान था और महान थे उनके नवरत्न।
हम बात कर रहे हैं राजाओं के राजा, सम्राट विक्रमादित्य की और उनके नवरत्नों में एक रत्न आचार्य वराहमिहिर की।
सम्राट विक्रमादित्य पहले महाराज थे जिनके राज में नवरत्न थे, जो सभी एक से बढ़कर एक थे, बहुत प्रसिद्ध थे।
अकबर ने महाराजा विक्रमादित्य की देखा-देखी अपने मंत्रीमंडल का नाम नवरत्न रखा था। तो जो किसी की नकल करे, वो कैसे महान? महान तो वो हुआ न, जिसकी हर कोई नकल करना चाहे।
अब बात करते हैं विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक आचार्य वराहमिहिर की…
Varahamihira - A Legend (Part-1)
विज्ञान के क्षेत्र में Isaac Newton को विशेष स्थान दिया गया है, उन्हें sir की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
तो आपको बता दें कि वराहमिहिर 6th c. CE (प्राचीन काल) में और आइजैक न्यूटन 17वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी (आधुनिक काल) में आए थे।
और विज्ञान का जो ज्ञान Newton ने 17-18 शताब्दी में दिया था, वो Varahamihira 6वीं शताब्दी में दे दिया था।
तो चलिए जानते हैं, कौन थे आचार्य वराहमिहिर और हम क्यों कह रहे हैं उन्हें महान?
आचार्य वराहमिहिर का बचपन :
वराहमिहिर का मूल नाम केवल ‘मिहिर’ था, जिसका अर्थ ‘सूर्य’ होता है। उनके पिता आदित्यदास सूर्य देव के उपासक थे, इसलिए उन्होंने उनका नाम मिहिर रखा था। ‘मिहिर’ के साथ ‘वराह’ उपाधि जुड़ने के पीछे एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और ज्योतिषीय कहानी है।
राजकुमार की भविष्यवाणी :
जब सम्राट विक्रमादित्य के यहाँ पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने मिहिर को अपने पुत्र की कुंडली बनाने और भविष्य बताने को कहा।
कठोर भविष्यवाणी :
मिहिर ने गणना की और अत्यंत दुखी होकर कहा कि राजकुमार की आयु बहुत कम है। ठीक 18वें वर्ष में एक निश्चित दिन और समय पर एक जंगली सूअर (वराह) के हमले से राजकुमार की मृत्यु हो जाएगी।
राजा के प्रयास :
विक्रमादित्य ने अपने पुत्र को बचाने के लिए कड़े इंतजाम किए। महल के चारों तरफ ऊंचे पहरे लगा दिए गए और उस क्षेत्र के सभी जंगली सूअरों को दूर खदेड़ दिया गया।
भविष्यवाणी का दिन :
जब वह निश्चित दिन आया, तो राजकुमार को महल की सबसे ऊपरी मंजिल पर पूरी सुरक्षा में रखा गया। राजा को लगा कि आज का दिन बीत जाने पर ज्योतिष झूठा साबित हो जाएगा।
अचानक हुई दुर्घटना :
महल की छत पर लोहे का एक बड़ा विजय-स्तंभ लगा था, जिसके शीर्ष पर राजचिन्ह के रूप में लोहे का एक सूअर (वराह) बना हुआ था। अचानक एक भयंकर आंधी आई और वह भारी लोहे का वराह स्तंभ से टूटकर सीधे नीचे खेल रहे राजकुमार के ऊपर गिर गया। लोहे के वराह के नुकीले हिस्से से चोट लगने के कारण राजकुमार की मौके पर ही मृत्यु हो गई।
‘वराह’ की उपाधि :
राजा अपनी नियति पर बहुत रोए, लेकिन उन्हें ज्योतिष विज्ञान की सटीकता पर अचंभा हुआ। उन्होंने मिहिर को दरबार में बुलाया और कहा, “विज्ञान की जीत हुई, मैं हार गया।” विक्रमादित्य ने मिहिर के अचूक ज्ञान का सम्मान करते हुए उन्हें अपने राज्य का सर्वोच्च पुरस्कार दिया और उनके नाम के आगे ‘वराह’ जोड़ दिया। तब से उन्हें वराहमिहिर कहा जाने लगा।
अब एक सवाल और उठता है कि किसी का राज्य चिन्ह वराह कैसे हो सकता है, तो आइए इसके पीछे की कहानी को जान लेते हैं। साथ ही, आचार्य वराहमिहिर के मुख्य योगदान और उनकी प्रसिद्धि का अवलोकन भी कर लेते हैं।
यह सब जानेंगे, Varahamihira - A Legend (Part-2) में…


