Wednesday, 19 August 2026

Story of Life : सावन के झूले (भाग-1)

सावन का मस्त महीना चल रहा है, पिछले 8 सालों से सावन में गीतों से सजी कहानियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, जो कि लोगों को बहुत पसंद आती है।

तो इस सावन में एक बार फिर गीतों से सजी कहानी प्रस्तुत है, इसके भी सभी अंग का आनंद लेकर मुझे कृतार्थ करें… 

सावन के झूले (भाग-1)


अनिका की नई-नई शादी हुई थी, अनिका जितनी बला की खूबसूरत थी, सुहास उतना ही handsome and romantic था।

जैसी सोची थी अनिका ने जिंदगी, यह उससे भी बहुत बेहतरीन थी। सुहास अनिका को हद से ज्यादा प्यार करता था। और हमेशा यही गुनगुनाता रहता-

“तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती 

नज़ारे हम क्या देखें”

अनिका के लिए दिन सोना और रात चांदी सी गुज़र रही थी, हर पल सुहास के साथ से उसे ऐसा लगता था, मानो उससे सुखी इस जहां में दूसरा नहीं।

सावन का romantic मौसम भी आ गया।

अनिका सुबह ही उठकर नहा-धोकर, बन-ठन कर शिव आराधना करने चली गई।

जब वो लौटी, तब तक सुहास भी उठ चुका था और अनिका के रूप को देखकर मोहित हो गया और गाने लगा-

“यह मौसम का जादू है मितवा

न अब दिल पर काबू है मितवा”

अनिका अपनी खूबसूरती पर इतरा कर सुहास की बाहों में समा गई। अभी दोनों प्रेमालाप में ही थे कि फोन घनघना उठा।

जब सुहास ने phone उठाया, तो उस बात को सुनकर वो धम्म से सोफे पर बैठ गया, उसके चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी।

सुहास को ऐसा देखकर अनिका सहम गई कि न जाने phone पर ऐसी क्या बात हुई, जिसने चहकते हुए सुहास को यूं खामोश कर दिया…

आगे पढ़ें, सावन के झूले (भाग-2) में…

Tuesday, 18 August 2026

India's Heritage : Vande Mataram after 80 Years

15 August 2026 एक ऐसा ऐतिहासिक दिन बनकर आया, जिसमें हम सब भारतवासियों के साथ आजादी के मतवाले शहीद भी शामिल हो गए।

ऐसा हम क्यों कह रहे हैं? तो उसका कारण है, स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर पर वंदे मातरम् के सम्पूर्ण गीत का गायन।

क्या आप जानते हैं, लाल किले की जान रहा यह राष्ट्रगीत 80 साल बाद मंच पर गाया गया?

“वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां मातरम्, वन्दे मातरम्!”

आइए, इस राष्ट्रगीत का निर्माण और इसके महत्व को समझते हैं…

Vande Mataram after 80 Years


यह हमारे देश भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 150 साल पहले 1875 में बनाया था।

1882 में अपनी किताब आनंदमठ में यह गीत प्रकाशित किया, उसके बाद यह घर-घर की आवाज बन गया और 1896 को इसे मंच पर रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाया।

आजादी के पूर्व आज़ादी के मतवालों के लिए यह आजादी का गीत बन गया।

जिसने अंग्रेज़ो को हिलाकर रख दिया था, उस समय इस गीत को गाना जुर्म माना जाता था, उन पर लाठीचार्ज होती थी, जेल हो जाती थी, जो यह गीत गाते थे। 

पर इसे जितना रोका गया, आजादी के मतवालों ने उतना ही अधिक गाया।

सभाओं में, गली-गली में, जुलूसों में, भीड़ में, जेल में, यहां तक कि फांसी लगते समय भी, हर पल, हर क्षण, इस एक गीत ने अंग्रेजों की नाम पर दम कर दिया था।

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल के दो टुकड़े कर दिए, इससे पूरा देश हिल गया। तब यही गीत, गीत के साथ-साथ नारा और देश को आजादी दिलाने का हथियार भी बन गया। 

हर ओर से, हर छोर से, जोर-जोर से पूरे देश में दो नारे सर्वत्र गूंज रहे थे। वंदे मातरम् और इंकलाब जिंदाबाद। इन दो नारों से ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हो गए। 

और तब मिली हमारे देश को आजादी, अविस्मर्णीय दिन आया, अथक प्रयासों, व अनेकानेक बलिदानों के बाद। वंदे मातरम् गीत को पूरा गाने पर पहले अंग्रजों को फिर मुस्लिम league को परेशानी थी। 

क्योंकि गीत के आखिरी stanza में भारत माता की तुलना दुर्गा माता से की, तो कुछ विशेष लोगों ने कहा कि उनके धर्म में ऐसे देवी अर्चना नहीं की जाती है। अतः यह निर्धारित किया गया कि वंदे मातरम् गीत के आखिरी stanza न गाएँ जाएँ। 

24 January 1950 में पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी ने यह ऐलान कर दिया था कि “जन-गण-मन अधिनायक जय हे” राष्ट्र गान है, जबकि “वन्दे मातरम्” राष्ट्रगीत निर्धारित होगा।

और जितने भी सरकारी कार्यालय, विद्यालय आदि हैं, उनमें देश से जुड़े पर्व में और किसी भी ऐसी जगह जाने में देश को represent किया जा रहा है, तो पहले वहाँ राष्ट्रगान गाया जाएगा, राष्ट्रगान के पश्चात राष्ट्रीय गीत गाया जाएगा।

पर यह बहुत अफसोस की बात है कि हममें से बहुत कम ही भारतीय हैं, जिन्हें यह राष्ट्रीय गीत आता हो, कितनों को तो यह भी पता नहीं होगा कि भारत का राष्ट्रीय गीत कौन सा है।

लेकिन इस वर्ष लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय गीत गाया और पूरा गाया गया, जिसकी यह सोच थी उसे शत-शत नमन।

क्योंकि यह गीत गाए जाने से देश ने सभी आजादी के मतवालों को उनके बलिदान को शत-शत नमन किया है, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है, उन्हें हृदय से आभार व्यक्त किया है।

आशा है आने वाले समय में वंदे मातरम् गीत को हर राष्ट्रीय पर्व पर विशेष रूप से गाया जाएगा, जिससे बच्चों-बच्चों को यह कंठस्थ हो जाए। और हम हर वर्ष आजादी दिलाने वाले वीर सपूतों को आभार प्रकट कर सकें, सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें।

वंदे मातरम्! जय हिन्द, जय भारत!

Monday, 17 August 2026

India's Heritage : नागपंचमी व सावन का सोमवार

हिन्दू धर्म में सभी को सर्वश्रेष्ठ और पूजनीय स्थान दिया गया है, फिर वो चाहे देवी-देवता, प्रकृति, सूर्य, चन्द्र, शनिदेव, आकाश, पृथ्वी, गाय, या नागदेवता हों, सबकी पूजा-अर्चना के दिन निर्धारित हैं। 

इन दिनों में से नागपंचमी नागदेवता के लिए निर्धारित किया गया है।

नाग पंचमी का पावन पर्व इस साल 17 अगस्त 2026 (सोमवार) को है। 

इस दिन सावन का तीसरा सोमवार होने के कारण एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, क्योंकि भगवान शिव और नाग देवता की पूजा एक साथ की जाएगी।

महादेव को नाग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए ही उन्होंने नाग को अपनी ग्रीवा में स्थान दिया हुआ है। 

महादेव की गर्दन में नाग इस तरह से लिपटे हुए रहता है, मानो वह उनके श्रृंगार का अभिन्न अंग हो, उनके गले का हार हो।

पर क्यों है ऐसा और क्यों मनाते हैं नागपंचमी? आज India's Heritage segment में यही देखेंगे…

नागपंचमी व सावन का सोमवार


महादेव के गले में नाग क्यों :

भगवान शिव के गले में जो सांप लिपटा रहता है, उसका नाम वासुकी नाग है, जो नागों के राजा हैं। 

शिव जी ने उन्हें समुद्र मंथन के दौरान उनकी सेवा, समर्पण और कष्ट सहन करने के भाव से प्रसन्न होकर अपने गले का आभूषण बनाया था।


पौराणिक व आध्यात्मिक कारण :

इसके पीछे कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण हैं।

  • समुद्र मंथन- समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने मंदराचल पर्वत को मथने के लिए रस्सी की भूमिका निभाई थी। घर्षण से घायल होने और विष का प्रभाव सहने के उनके समर्पण को देखकर शिव जी ने उन्हें अपने गले में स्थान दिया।
  • भक्त की इच्छा- नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त थे और हमेशा उनके समीप रहना चाहते थे, इसलिए शिव ने उनकी मनोकामना पूरी की।
  • मृत्यु पर विजय- सांप को मृत्यु और काल का प्रतीक माना जाता है। गले में नाग धारण कर शिव यह दर्शाते हैं कि वे महाकाल हैं और मृत्यु तथा भय से परे हैं।
  • कुंडलिनी शक्ति- योग और तंत्र साधना में सांप को कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो मनुष्य के भीतर जागृत होने वाली चेतना का संकेत है।
  • संतुलन और शांति- एक अत्यंत विषैला और हिंसक जीव होने के बावजूद सांप शिव के गले में शांत रहता है, जो यह सिखाता है कि भयंकर ऊर्जा या क्रोध पर भी संयम रखा जा सकता है।

नागपंचमी का कारण :

अब जान लेते हैं कि क्यों मनाते हैं नागपंचमी।

नाग पंचमी का त्योहार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग देवता के प्रति सम्मान और उनकी रक्षा के लिए मनाया जाता है। इस दिन सांपों को दूध व फूल चढ़ाकर सर्पदंश से रक्षा, पारिवारिक समृद्धि और कालसर्प दोष की शांति के लिए पूजा की जाती है।


पौराणिक कथाएं और मान्यताएं :

  • आस्तिक मुनि की कथा- राजा जन्मेजय ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए विशाल सर्प यज्ञ किया था। आस्तिक मुनि ने श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन उस यज्ञ को रोककर नागों के प्राण बचाए थे, तभी से यह पर्व मनाया जाता है।
  • कालिया नाग का वध- भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन कालिया नाग को हराकर यमुना नदी को जहर से मुक्त किया था।
  • शिव व विष्णु का संबंध- भगवान शिव अपने गले में नाग रखते हैं और विष्णु जी शेषनाग पर सोते हैं, इसलिए नागों की पूजा का विशेष महत्व है।


तिथि व शुभ मुहूर्त :

  • पंचमी तिथि प्रारम्भ- 16 अगस्त 2026 को शाम 04:52 बजे।
  • पंचमी तिथि समाप्त- 17 अगस्त 2026 को शाम 05:00 बजे।
  • पूजा का शुभ मुहूर्त- सुबह 05:51 बजे से सुबह 08:29 बजे तक (कुल अवधि= 2 घंटे 37 मिनट)।
  • पूजा विधि और महत्व- सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। घर के मंदिर या पूजास्थल पर शिव परिवार के साथ नाग देवता का ध्यान करें। शिवलिंग पर जल, दूध, और बेलपत्र अर्पित करें तथा नाग देवता को दूध, खीर, चंदन व पुष्प चढ़ाएं।

इस दिन नाग देवता की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है और कालसर्प दोष का निवारण होता है। 

देवाधिदेव भगवान महादेव और उनके परम भक्त नागदेवता की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे, जिससे हम सभी दुःख-कष्ट से मुक्त होकर उनकी भक्ति में लीन रहें।

हर हर महादेव!