Thursday, 20 August 2026

Story of Life : सावन के झूले (भाग-2)

सावन के झूले (भाग-1) के आगे…

सावन के झूले (भाग-2)


सुहास को ऐसा देखकर अनिका सहम गई कि न जाने phone पर ऐसी क्या बात हुई, जिसने चहकते हुए सुहास को यूं खामोश कर दिया।

“क्या हुआ सुहास? तुम इतने उदास क्यों हो गए?”

“मेरा work from home खत्म हो गया है और मुझे दो दिन में ही join करना है।”

“अरे! तो क्या हो गया? कर लो join, उसमें दुःखी होने जैसा क्या है?”

“अब हम साथ में नहीं रह पाएंगे,” कहते-कहते सुहास का गला सूखने लगा।

“साथ नहीं रह पाएंगे, मतलब?” अनिका ने परेशान होते हुए पूछा।

“मुझे हर दूसरे हफ्ते अलग-अलग शहरों में जाना होगा, साथ ही बीच-बीच में abroad भी जाना होगा। तो हर जगह तुम्हें नहीं ले जा सकता हूं।”

सुनकर अनिका की आंखों से अश्रु की अविरल धारा बह निकली। 

“यह क्या हुआ, कैसे हुआ 

कब हुआ, क्यों हुआ 

अरे छोड़ो यह न सोचो”

सुहास थोड़ी देर में उठा और अपना सब सामान pack करने लगा। दो दिन कब निकल गये, packing की आपाधापी में समझ ही नहीं आए।

और सुहास अनिका को छोड़कर, joining के लिए चला गया।

अनिका का एक-एक दिन पहाड़ सा बीतने लगा। बारिश की झड़ी देखकर उसे बस यही लगता-

“हाय-हाय ये मजबूरी 

ये मौसम और ये दूरी 

मुझे पल-पल है तड़पाए 

तेरी दो टकिया की नौकरी में 

मेरा लाखों का सावन जाए”

Join करने के बाद सुहास का phone आया, अनिका ने उठाया भी, दोनों बहुत बातें करते थे, पर आज दोनों तरफ शांति थी, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि बात क्या करें। 

“चुप तुम रहो चुप हम रहें

चुप तुम रहो चुप हम रहें

खामोशी को खामोशी से

ज़िंदगी को ज़िंदगी से बात करने दो”

थोड़ी देर बाद दोनों ने phone रख दिया, और दोनों सोच रहे थे कि आखिर उनकी हंसती-मुस्कुराती जिंदगी को किसकी नज़र लग गई।

आखिर ऐसा भी क्या बिगाड़ा था, उन्होंने किसी का, जो ऐसा हुआ, एक-दूसरे की धड़कन और दिल थे दोनों, आखिर एक-दूजे से दूर रहकर कैसे जिएंगे…

आगे पढ़ें, सावन के झूले (अंतिम भाग) में…

Wednesday, 19 August 2026

Story of Life : सावन के झूले (भाग-1)

सावन का मस्त महीना चल रहा है, पिछले 8 सालों से सावन में गीतों से सजी कहानियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, जो कि लोगों को बहुत पसंद आती है।

तो इस सावन में एक बार फिर गीतों से सजी कहानी प्रस्तुत है, इसके भी सभी अंग का आनंद लेकर मुझे कृतार्थ करें… 

सावन के झूले (भाग-1)


अनिका की नई-नई शादी हुई थी, अनिका जितनी बला की खूबसूरत थी, सुहास उतना ही handsome and romantic था।

जैसी सोची थी अनिका ने जिंदगी, यह उससे भी बहुत बेहतरीन थी। सुहास अनिका को हद से ज्यादा प्यार करता था। और हमेशा यही गुनगुनाता रहता-

“तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती 

नज़ारे हम क्या देखें”

अनिका के लिए दिन सोना और रात चांदी सी गुज़र रही थी, हर पल सुहास के साथ से उसे ऐसा लगता था, मानो उससे सुखी इस जहां में दूसरा नहीं।

सावन का romantic मौसम भी आ गया।

अनिका सुबह ही उठकर नहा-धोकर, बन-ठन कर शिव आराधना करने चली गई।

जब वो लौटी, तब तक सुहास भी उठ चुका था और अनिका के रूप को देखकर मोहित हो गया और गाने लगा-

“यह मौसम का जादू है मितवा

न अब दिल पर काबू है मितवा”

अनिका अपनी खूबसूरती पर इतरा कर सुहास की बाहों में समा गई। अभी दोनों प्रेमालाप में ही थे कि फोन घनघना उठा।

जब सुहास ने phone उठाया, तो उस बात को सुनकर वो धम्म से सोफे पर बैठ गया, उसके चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी।

सुहास को ऐसा देखकर अनिका सहम गई कि न जाने phone पर ऐसी क्या बात हुई, जिसने चहकते हुए सुहास को यूं खामोश कर दिया…

आगे पढ़ें, सावन के झूले (भाग-2) में…

Tuesday, 18 August 2026

India's Heritage : Vande Mataram after 80 Years

15 August 2026 एक ऐसा ऐतिहासिक दिन बनकर आया, जिसमें हम सब भारतवासियों के साथ आजादी के मतवाले शहीद भी शामिल हो गए।

ऐसा हम क्यों कह रहे हैं? तो उसका कारण है, स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर पर वंदे मातरम् के सम्पूर्ण गीत का गायन।

क्या आप जानते हैं, लाल किले की जान रहा यह राष्ट्रगीत 80 साल बाद मंच पर गाया गया?

“वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां मातरम्, वन्दे मातरम्!”

आइए, इस राष्ट्रगीत का निर्माण और इसके महत्व को समझते हैं…

Vande Mataram after 80 Years


यह हमारे देश भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 150 साल पहले 1875 में बनाया था।

1882 में अपनी किताब आनंदमठ में यह गीत प्रकाशित किया, उसके बाद यह घर-घर की आवाज बन गया और 1896 को इसे मंच पर रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाया।

आजादी के पूर्व आज़ादी के मतवालों के लिए यह आजादी का गीत बन गया।

जिसने अंग्रेज़ो को हिलाकर रख दिया था, उस समय इस गीत को गाना जुर्म माना जाता था, उन पर लाठीचार्ज होती थी, जेल हो जाती थी, जो यह गीत गाते थे। 

पर इसे जितना रोका गया, आजादी के मतवालों ने उतना ही अधिक गाया।

सभाओं में, गली-गली में, जुलूसों में, भीड़ में, जेल में, यहां तक कि फांसी लगते समय भी, हर पल, हर क्षण, इस एक गीत ने अंग्रेजों की नाम पर दम कर दिया था।

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल के दो टुकड़े कर दिए, इससे पूरा देश हिल गया। तब यही गीत, गीत के साथ-साथ नारा और देश को आजादी दिलाने का हथियार भी बन गया। 

हर ओर से, हर छोर से, जोर-जोर से पूरे देश में दो नारे सर्वत्र गूंज रहे थे। वंदे मातरम् और इंकलाब जिंदाबाद। इन दो नारों से ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हो गए। 

और तब मिली हमारे देश को आजादी, अविस्मर्णीय दिन आया, अथक प्रयासों, व अनेकानेक बलिदानों के बाद। वंदे मातरम् गीत को पूरा गाने पर पहले अंग्रजों को फिर मुस्लिम league को परेशानी थी। 

क्योंकि गीत के आखिरी stanza में भारत माता की तुलना दुर्गा माता से की, तो कुछ विशेष लोगों ने कहा कि उनके धर्म में ऐसे देवी अर्चना नहीं की जाती है। अतः यह निर्धारित किया गया कि वंदे मातरम् गीत के आखिरी stanza न गाएँ जाएँ। 

24 January 1950 में पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी ने यह ऐलान कर दिया था कि “जन-गण-मन अधिनायक जय हे” राष्ट्र गान है, जबकि “वन्दे मातरम्” राष्ट्रगीत निर्धारित होगा।

और जितने भी सरकारी कार्यालय, विद्यालय आदि हैं, उनमें देश से जुड़े पर्व में और किसी भी ऐसी जगह जाने में देश को represent किया जा रहा है, तो पहले वहाँ राष्ट्रगान गाया जाएगा, राष्ट्रगान के पश्चात राष्ट्रीय गीत गाया जाएगा।

पर यह बहुत अफसोस की बात है कि हममें से बहुत कम ही भारतीय हैं, जिन्हें यह राष्ट्रीय गीत आता हो, कितनों को तो यह भी पता नहीं होगा कि भारत का राष्ट्रीय गीत कौन सा है।

लेकिन इस वर्ष लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय गीत गाया और पूरा गाया गया, जिसकी यह सोच थी उसे शत-शत नमन।

क्योंकि यह गीत गाए जाने से देश ने सभी आजादी के मतवालों को उनके बलिदान को शत-शत नमन किया है, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है, उन्हें हृदय से आभार व्यक्त किया है।

आशा है आने वाले समय में वंदे मातरम् गीत को हर राष्ट्रीय पर्व पर विशेष रूप से गाया जाएगा, जिससे बच्चों-बच्चों को यह कंठस्थ हो जाए। और हम हर वर्ष आजादी दिलाने वाले वीर सपूतों को आभार प्रकट कर सकें, सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें।

वंदे मातरम्! जय हिन्द, जय भारत!