आज की यह post एक अजीब से एहसास की दास्तान है। एक ऐसी दास्तान, जिसका अनुभव किसी को कभी न हो। शायद हुआ भी न हो, क्योंकि यह एक विकट परिस्थिति है, जिससे बहुत कम लोगों को रूबरू होना पड़ता है।
और वो एहसास है, एकांत का।
एकांत का शोर
आप कहेंगे कि आजकल एकांत का एहसास कौन-सा नया है। Joint family का culture तो लगभग खत्म ही हो चुका है, फिर बच्चों का बड़े शहरों और विदेशों में बसना, इसको बहुत बढ़ावा दिया जा रहा है। सही है, यह भी बहुत भयावह है, पर अब यह कटु सत्य बनता जा रहा है, जो अगर आप अपने परिवार में रोक सकें तो आप बहुत भाग्यशाली होंगे।
पर हम आज उस एकांत की बात कर रहे हैं, जब आप सबके बीच में हों, सब बेइंतहा आपका ध्यान रख रहे हों, आपके लिए तन-मन-धन से समर्पित हों, आप को सब दिख रहा हो, सबका एहसास भी हो, पर फिर भी आप नितांत अकेले हों, असमर्थ हों।
आप कहेंगे कि हम क्या कहना चाह रहे हैं, कुछ समझ नहीं आ रहा है? जी हांँ, ऐसी ही परिस्थिति थी, जब weather और doctor की लापरवाही के कारण pneumonia और मेरे दोनों कानों में infection हो गया, जो कि कान की हड्डियों तक पहुंच चुका था, साथ ही कान के पर्दे में छेद हो गया था। तो कान में बेहद दर्द और हमें सुनाई देना लगभग बंद हो गया।
लगभग, मतलब बिल्कुल कान के पास आकर और जोर से कोई बोले तभी सुनाई दे रहा था। अन्यथा इशारे से बातें। एक तो सुनाई नहीं दे रहा था, और ऊपर से pneumonia के कारण सांस न ले पाना और अतिशय कमजोरी, सीने में दर्द, कान के पर्दे में छेद होने की वजह से ear drops, कान से निकल कर मुंह में आ जाती, जिससे मुंह बेहद कसैला हो जाता, जिससे खाना खा पाना दूभर, इत्यादि।
मतलब कि एक बहुत भयावह और लगभग तोड़ देने वाली स्थिति, पर इस स्थिति के साथ ही एक और एहसास, एकांत के शोर का। एकांत का शोर, मतलब?
कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, पूरी दुनिया से पूरी तरह से कट गए थे, क्योंकि न किसी की बात सुन पा रहे थे और pneumonia के कारण बहुत सांस फूल रही थी, तो किसी से कुछ बात भी कर पाना मुश्किल हो रहा था।
इस तरह से सबके मध्य रहकर भी नितांत एकांत में पहुंच जाना बहुत भयावह था।
पर एकांत में शोर?
वो क्या था?
वो था, उस समय अपने शरीर के अंदर की आवाज सुनाई देना।
मतलब?
मतलब दिल की धड़कन(heart beat), जो कि तबीयत खराब होने के कारण 72 से बढ़कर 150 हो गई थी। हर पल ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो दिमाग में लगातार कोई हथौड़े चला रहा हो, कभी तो मन करता कि यह धड़कन रुक जाए, तो चैन आए।
अपना बोलना, सबसे तेज़ खुद को ही सुनाई देना, कुछ खा रहे होते तो उससे तेज़ कुछ नहीं सुनाई देना और बहुत सारी बातों का मंथन, हर पल को सालों में बदल रहा था।
ईश्वर ने हमें 5 इंद्रियां दी है। जो कोई उनमें से किसी एक से भी वंचित हैं, तो उसका जीवन बहुत कठिन होता है। किन्तु वो व्यक्ति जो पहले पूर्णतः स्वस्थ हो, पर किसी कारणवश उसकी कोई इंद्री, कुछ समय या हमेशा के लिए ख़राब हो जाए, तो उसके लिए जीवन असहनीय हो जाता है।
क्योंकि जिसके पास पहले से ही नहीं था, उसे पूर्ण अनुभव नहीं होता है कि वो क्या क्या खो रहा है।
जबकि, जो सब अनुभव कर चुका हो, उसका उस अनुभव के बाद वंचित होना बेहद कष्टकारी होता है।
पर अब कुछ बेहतर स्थिति है, थोड़ा-थोड़ा सुनाई देना, कुछ-कुछ बातें भी कर लेना, मेरा blog में वापसी, सब आप लोगों का प्यार है, जिसने एक बार फिर दिल को आप सब से जोड़ दिया।
चलिए, कल से फिर से एक बार खुशनुमा सफ़र शुरू करते हैं, एक नई शुरुआत के साथ, पर सोच में बहुत कुछ बदल गया है, शायद इसकी झलक आगे की posts में भी दिखे।
आप सभी को बहुत सारा धन्यवाद, जिन्होंने मेरे स्वास्थ्य के लिए मंगलकामनाएं की 🙏🏻
हे ईश्वर, आप से प्रार्थना है कि, सबको ही सम्पूर्णता प्रदान करें और किसी को सुख प्रदान कर यूं कभी वंचित न करें।


