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Tuesday, 8 September 2026

India's Heritage : Varahamihira - A Legend (Part-2)

कल आपको India's Heritage segment में आचार्य वराहमिहिर के विषय में जानकारी दी थी, जिससे आप समझ सकें कि क्यों है भारत महान और सबसे अधिक प्रतिष्ठा सनातन धर्म को क्यों दी जाती है।

इस link पर click करके आप उस post को पढ़ सकते हैं- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-varahamihira-legend.html?m=1

आइए, उसके आगे जानते हैं आज के अंक में…

Varahamihira - A Legend (Part-2)


(I) Symbol Reason :

उज्जयिनी और गुप्त साम्राज्य का ‘वराह चिन्ह’ ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से सम्राट विक्रमादित्य (जिन्हें गुप्त वंश के चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ से भी जोड़ा जाता है), भगवान विष्णु के परम भक्त थे।

  • धर्म की रक्षा का प्रतीक- सनातन परंपरा में भगवान विष्णु ने पृथ्वी को हिरण्याक्ष नामक राक्षस से बचाने और समुद्र के तल से बाहर निकालने के लिए वराह अवतार लिया था।
  • राजचिन्ह का चयन- विक्रमादित्य ने जब शकों और विदेशी आक्रांताओं को पराजित कर धर्म और राष्ट्र की रक्षा की, तो उन्होंने भगवान वराह को अपना आदर्श माना। जिस तरह वराह देव ने पृथ्वी को संकट से उबारा था, उसी तरह विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को संकट से बचाया था।
  • सिक्कों और ध्वज पर स्थान- इसी के प्रतीक स्वरूप सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयिनी के राजचिन्ह, शाही मुहरों और सिक्कों पर ‘वराह’ (सूअर) की आकृति को अंकित करवाया। यह चिन्ह वीरता, भूमि की रक्षा और अन्याय के खिलाफ विजय का प्रतीक माना गया।
  • वराह उपाधि से सम्मान- भविष्यवाणी के सत्य साबित होने पर राजा विक्रमादित्य ने उनकी विद्वता से प्रसन्न होकर उन्हें राज्य के सर्वोच्च सम्मान ‘वराह’ चिह्न से अलंकृत किया। 


(II) Varahamihira :

वराहमिहिर प्राचीन भारत के एक महान खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और ज्योतिषी थे, जो अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पंचसिद्धांतिका’ और ‘बृहत् संहिता’ के लिए जाने जाते हैं। उनके मुख्य योगदान और उनकी प्रसिद्धि का अवलोकन भी कर लेते हैं।

  • Astronomy- उन्होंने अपनी पुस्तक पंचसिद्धांतिका में पांच खगोलीय सिद्धांतों का संकलन किया। उन्होंने यह भी बताया कि चंद्रमा और ग्रह स्वयं के प्रकाश से नहीं, बल्कि सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं।
  • Mathematics- उन्होंने गणित और त्रिकोणमिति में महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने pascal's triangle का प्रारंभिक रूप और magic squares का निर्माण किया। 
  • Brihat Samhita- यह उनका एक विश्वकोश जैसा ग्रंथ है, जिसमें architecture, ग्रहों की गति, ग्रहण, वर्षा, कृषि, और रत्न शास्त्र जैसी विभिन्न विषयों की जानकारी दी गई है। 
  • Astrology- उन्होंने होराशास्त्र पर 'बृहज्जातक' और 'लघुजातक' जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे, जो भारतीय ज्योतिष में आज भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। 

शायद अब आपको भी एहसास हुआ होगा कि मेरा भारत महान और सबसे ऊपर है सनातन की पहचान...

Monday, 7 September 2026

India's Heritage : Varahamihira - A Legend (Part-1)

आज India's Heritage segment में एक ऐसी कहानी share कर रहे हैं, जिस को पढ़कर आप कह उठेंगे कि “मेरा भारत महान”।

आज की कहानी से आप को समझ आएगा कि (Isaac) Newton और अकबर को महान कहने से पहले कोई ऐसा सम्राट आया था, जो सच में महान था और महान थे उनके नवरत्न।

हम बात कर रहे हैं राजाओं के राजा, सम्राट विक्रमादित्य की और उनके नवरत्नों में एक रत्न आचार्य वराहमिहिर की।

सम्राट विक्रमादित्य पहले महाराज थे जिनके राज में नवरत्न थे, जो सभी एक से बढ़कर एक थे, बहुत प्रसिद्ध थे।

अकबर ने महाराजा विक्रमादित्य की देखा-देखी अपने मंत्रीमंडल का नाम नवरत्न रखा था। तो जो किसी की नकल करे, वो कैसे महान? महान तो वो हुआ न, जिसकी हर कोई नकल करना चाहे।

अब बात करते हैं विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक आचार्य वराहमिहिर की…

Varahamihira - A Legend (Part-1)


विज्ञान के क्षेत्र में Isaac Newton को विशेष स्थान दिया गया है, उन्हें sir की उपाधि से सम्मानित किया गया है। 

तो आपको बता दें कि वराहमिहिर 6th c. CE (प्राचीन काल) में और आइजैक न्यूटन 17वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी (आधुनिक काल) में आए थे।

और विज्ञान का जो ज्ञान Newton ने 17-18 शताब्दी में दिया था, वो Varahamihira 6वीं शताब्दी में दे दिया था।

तो चलिए जानते हैं, कौन थे आचार्य वराहमिहिर और हम क्यों कह रहे हैं उन्हें महान?


आचार्य वराहमिहिर का बचपन :

वराहमिहिर का मूल नाम केवल ‘मिहिर’ था, जिसका अर्थ ‘सूर्य’ होता है। उनके पिता आदित्यदास सूर्य देव के उपासक थे, इसलिए उन्होंने उनका नाम मिहिर रखा था। ‘मिहिर’ के साथ ‘वराह’ उपाधि जुड़ने के पीछे एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और ज्योतिषीय कहानी है।


राजकुमार की भविष्यवाणी :

जब सम्राट विक्रमादित्य के यहाँ पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने मिहिर को अपने पुत्र की कुंडली बनाने और भविष्य बताने को कहा।


कठोर भविष्यवाणी :

मिहिर ने गणना की और अत्यंत दुखी होकर कहा कि राजकुमार की आयु बहुत कम है। ठीक 18वें वर्ष में एक निश्चित दिन और समय पर एक जंगली सूअर (वराह) के हमले से राजकुमार की मृत्यु हो जाएगी।


राजा के प्रयास :

विक्रमादित्य ने अपने पुत्र को बचाने के लिए कड़े इंतजाम किए। महल के चारों तरफ ऊंचे पहरे लगा दिए गए और उस क्षेत्र के सभी जंगली सूअरों को दूर खदेड़ दिया गया।


भविष्यवाणी का दिन :

जब वह निश्चित दिन आया, तो राजकुमार को महल की सबसे ऊपरी मंजिल पर पूरी सुरक्षा में रखा गया। राजा को लगा कि आज का दिन बीत जाने पर ज्योतिष झूठा साबित हो जाएगा।


अचानक हुई दुर्घटना :

महल की छत पर लोहे का एक बड़ा विजय-स्तंभ लगा था, जिसके शीर्ष पर राजचिन्ह के रूप में लोहे का एक सूअर (वराह) बना हुआ था। अचानक एक भयंकर आंधी आई और वह भारी लोहे का वराह स्तंभ से टूटकर सीधे नीचे खेल रहे राजकुमार के ऊपर गिर गया। लोहे के वराह के नुकीले हिस्से से चोट लगने के कारण राजकुमार की मौके पर ही मृत्यु हो गई।


‘वराह’ की उपाधि :

राजा अपनी नियति पर बहुत रोए, लेकिन उन्हें ज्योतिष विज्ञान की सटीकता पर अचंभा हुआ। उन्होंने मिहिर को दरबार में बुलाया और कहा, “विज्ञान की जीत हुई, मैं हार गया।” विक्रमादित्य ने मिहिर के अचूक ज्ञान का सम्मान करते हुए उन्हें अपने राज्य का सर्वोच्च पुरस्कार दिया और उनके नाम के आगे ‘वराह’ जोड़ दिया। तब से उन्हें वराहमिहिर कहा जाने लगा।


अब एक सवाल और उठता है कि किसी का राज्य चिन्ह वराह कैसे हो सकता है, तो आइए इसके पीछे की कहानी को जान लेते हैं। साथ ही, आचार्य वराहमिहिर के मुख्य योगदान और उनकी प्रसिद्धि का अवलोकन भी कर लेते हैं।

यह सब जानेंगे, Varahamihira - A Legend (Part-2) में…

Saturday, 22 August 2026

India's Heritage : पार्वती जी को भी भाए सावन

सावन का पावन माह चल रहा है, शिव जी को प्रसन्न करने वाला, उनकी भक्ति में लीन होने का।

पर क्या आपको पता है, न केवल शिव जी को, बल्कि शक्ति स्वरूपा पार्वती जी को भी सावन माह में पूजा-अर्चना करते हुए प्रसन्न किया जा सकता है?

पर जैसे सावन के सोमवार में पूजा-अर्चना करने से महादेव प्रसन्न होते हैं, वैसे ही पार्वती माता की सावन माह के मंगलवार को पूजा-अर्चना की जाती है, जिसे मंगलागौरी व्रत भी कहते हैं?

पार्वती जी को भी भाए सावन


सावन (श्रावण) मास के प्रत्येक मंगलवार को माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है और मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।

  • व्रत का महत्व और नियमसमर्पण- यह दिन भगवान शिव की शक्ति और माता पार्वती को समर्पित होता है।
  • सौभाग्य प्राप्ति- विवाहित महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
  • शीघ्र विवाह- अविवाहित युवतियां मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं।
  • सोलह की संख्या- पूजा में सभी सामग्री (जैसे दीपक, चूड़ियां और प्रसाद) सोलह (16) की मात्रा या संख्या में अर्पित की जाती है।

हर-हर महादेव, माता पार्वती की जय।

Tuesday, 18 August 2026

India's Heritage : Vande Mataram after 80 Years

15 August 2026 एक ऐसा ऐतिहासिक दिन बनकर आया, जिसमें हम सब भारतवासियों के साथ आजादी के मतवाले शहीद भी शामिल हो गए।

ऐसा हम क्यों कह रहे हैं? तो उसका कारण है, स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर पर वंदे मातरम् के सम्पूर्ण गीत का गायन।

क्या आप जानते हैं, लाल किले की जान रहा यह राष्ट्रगीत 80 साल बाद मंच पर गाया गया?

“वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां मातरम्, वन्दे मातरम्!”

आइए, इस राष्ट्रगीत का निर्माण और इसके महत्व को समझते हैं…

Vande Mataram after 80 Years


यह हमारे देश भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 150 साल पहले 1875 में बनाया था।

1882 में अपनी किताब आनंदमठ में यह गीत प्रकाशित किया, उसके बाद यह घर-घर की आवाज बन गया और 1896 को इसे मंच पर रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाया।

आजादी के पूर्व आज़ादी के मतवालों के लिए यह आजादी का गीत बन गया।

जिसने अंग्रेज़ो को हिलाकर रख दिया था, उस समय इस गीत को गाना जुर्म माना जाता था, उन पर लाठीचार्ज होती थी, जेल हो जाती थी, जो यह गीत गाते थे। 

पर इसे जितना रोका गया, आजादी के मतवालों ने उतना ही अधिक गाया।

सभाओं में, गली-गली में, जुलूसों में, भीड़ में, जेल में, यहां तक कि फांसी लगते समय भी, हर पल, हर क्षण, इस एक गीत ने अंग्रेजों की नाम पर दम कर दिया था।

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल के दो टुकड़े कर दिए, इससे पूरा देश हिल गया। तब यही गीत, गीत के साथ-साथ नारा और देश को आजादी दिलाने का हथियार भी बन गया। 

हर ओर से, हर छोर से, जोर-जोर से पूरे देश में दो नारे सर्वत्र गूंज रहे थे। वंदे मातरम् और इंकलाब जिंदाबाद। इन दो नारों से ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हो गए। 

और तब मिली हमारे देश को आजादी, अविस्मर्णीय दिन आया, अथक प्रयासों, व अनेकानेक बलिदानों के बाद। वंदे मातरम् गीत को पूरा गाने पर पहले अंग्रजों को फिर मुस्लिम league को परेशानी थी। 

क्योंकि गीत के आखिरी stanza में भारत माता की तुलना दुर्गा माता से की, तो कुछ विशेष लोगों ने कहा कि उनके धर्म में ऐसे देवी अर्चना नहीं की जाती है। अतः यह निर्धारित किया गया कि वंदे मातरम् गीत के आखिरी stanza न गाएँ जाएँ। 

24 January 1950 में पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी ने यह ऐलान कर दिया था कि “जन-गण-मन अधिनायक जय हे” राष्ट्र गान है, जबकि “वन्दे मातरम्” राष्ट्रगीत निर्धारित होगा।

और जितने भी सरकारी कार्यालय, विद्यालय आदि हैं, उनमें देश से जुड़े पर्व में और किसी भी ऐसी जगह जाने में देश को represent किया जा रहा है, तो पहले वहाँ राष्ट्रगान गाया जाएगा, राष्ट्रगान के पश्चात राष्ट्रीय गीत गाया जाएगा।

पर यह बहुत अफसोस की बात है कि हममें से बहुत कम ही भारतीय हैं, जिन्हें यह राष्ट्रीय गीत आता हो, कितनों को तो यह भी पता नहीं होगा कि भारत का राष्ट्रीय गीत कौन सा है।

लेकिन इस वर्ष लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय गीत गाया और पूरा गाया गया, जिसकी यह सोच थी उसे शत-शत नमन।

क्योंकि यह गीत गाए जाने से देश ने सभी आजादी के मतवालों को उनके बलिदान को शत-शत नमन किया है, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है, उन्हें हृदय से आभार व्यक्त किया है।

आशा है आने वाले समय में वंदे मातरम् गीत को हर राष्ट्रीय पर्व पर विशेष रूप से गाया जाएगा, जिससे बच्चों-बच्चों को यह कंठस्थ हो जाए। और हम हर वर्ष आजादी दिलाने वाले वीर सपूतों को आभार प्रकट कर सकें, सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें।

वंदे मातरम्! जय हिन्द, जय भारत!

Monday, 17 August 2026

India's Heritage : नागपंचमी व सावन का सोमवार

हिन्दू धर्म में सभी को सर्वश्रेष्ठ और पूजनीय स्थान दिया गया है, फिर वो चाहे देवी-देवता, प्रकृति, सूर्य, चन्द्र, शनिदेव, आकाश, पृथ्वी, गाय, या नागदेवता हों, सबकी पूजा-अर्चना के दिन निर्धारित हैं। 

इन दिनों में से नागपंचमी नागदेवता के लिए निर्धारित किया गया है।

नाग पंचमी का पावन पर्व इस साल 17 अगस्त 2026 (सोमवार) को है। 

इस दिन सावन का तीसरा सोमवार होने के कारण एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, क्योंकि भगवान शिव और नाग देवता की पूजा एक साथ की जाएगी।

महादेव को नाग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए ही उन्होंने नाग को अपनी ग्रीवा में स्थान दिया हुआ है। 

महादेव की गर्दन में नाग इस तरह से लिपटे हुए रहता है, मानो वह उनके श्रृंगार का अभिन्न अंग हो, उनके गले का हार हो।

पर क्यों है ऐसा और क्यों मनाते हैं नागपंचमी? आज India's Heritage segment में यही देखेंगे…

नागपंचमी व सावन का सोमवार


महादेव के गले में नाग क्यों :

भगवान शिव के गले में जो सांप लिपटा रहता है, उसका नाम वासुकी नाग है, जो नागों के राजा हैं। 

शिव जी ने उन्हें समुद्र मंथन के दौरान उनकी सेवा, समर्पण और कष्ट सहन करने के भाव से प्रसन्न होकर अपने गले का आभूषण बनाया था।


पौराणिक व आध्यात्मिक कारण :

इसके पीछे कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण हैं।

  • समुद्र मंथन- समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने मंदराचल पर्वत को मथने के लिए रस्सी की भूमिका निभाई थी। घर्षण से घायल होने और विष का प्रभाव सहने के उनके समर्पण को देखकर शिव जी ने उन्हें अपने गले में स्थान दिया।
  • भक्त की इच्छा- नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त थे और हमेशा उनके समीप रहना चाहते थे, इसलिए शिव ने उनकी मनोकामना पूरी की।
  • मृत्यु पर विजय- सांप को मृत्यु और काल का प्रतीक माना जाता है। गले में नाग धारण कर शिव यह दर्शाते हैं कि वे महाकाल हैं और मृत्यु तथा भय से परे हैं।
  • कुंडलिनी शक्ति- योग और तंत्र साधना में सांप को कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो मनुष्य के भीतर जागृत होने वाली चेतना का संकेत है।
  • संतुलन और शांति- एक अत्यंत विषैला और हिंसक जीव होने के बावजूद सांप शिव के गले में शांत रहता है, जो यह सिखाता है कि भयंकर ऊर्जा या क्रोध पर भी संयम रखा जा सकता है।

नागपंचमी का कारण :

अब जान लेते हैं कि क्यों मनाते हैं नागपंचमी।

नाग पंचमी का त्योहार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग देवता के प्रति सम्मान और उनकी रक्षा के लिए मनाया जाता है। इस दिन सांपों को दूध व फूल चढ़ाकर सर्पदंश से रक्षा, पारिवारिक समृद्धि और कालसर्प दोष की शांति के लिए पूजा की जाती है।


पौराणिक कथाएं और मान्यताएं :

  • आस्तिक मुनि की कथा- राजा जन्मेजय ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए विशाल सर्प यज्ञ किया था। आस्तिक मुनि ने श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन उस यज्ञ को रोककर नागों के प्राण बचाए थे, तभी से यह पर्व मनाया जाता है।
  • कालिया नाग का वध- भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन कालिया नाग को हराकर यमुना नदी को जहर से मुक्त किया था।
  • शिव व विष्णु का संबंध- भगवान शिव अपने गले में नाग रखते हैं और विष्णु जी शेषनाग पर सोते हैं, इसलिए नागों की पूजा का विशेष महत्व है।


तिथि व शुभ मुहूर्त :

  • पंचमी तिथि प्रारम्भ- 16 अगस्त 2026 को शाम 04:52 बजे।
  • पंचमी तिथि समाप्त- 17 अगस्त 2026 को शाम 05:00 बजे।
  • पूजा का शुभ मुहूर्त- सुबह 05:51 बजे से सुबह 08:29 बजे तक (कुल अवधि= 2 घंटे 37 मिनट)।
  • पूजा विधि और महत्व- सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। घर के मंदिर या पूजास्थल पर शिव परिवार के साथ नाग देवता का ध्यान करें। शिवलिंग पर जल, दूध, और बेलपत्र अर्पित करें तथा नाग देवता को दूध, खीर, चंदन व पुष्प चढ़ाएं।

इस दिन नाग देवता की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है और कालसर्प दोष का निवारण होता है। 

देवाधिदेव भगवान महादेव और उनके परम भक्त नागदेवता की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे, जिससे हम सभी दुःख-कष्ट से मुक्त होकर उनकी भक्ति में लीन रहें।

हर हर महादेव!

Monday, 10 August 2026

India's Heritage : सावन शिव को क्यों मनभावन?

एक प्रश्न मन में उठता है कि आखिर सावन माह ही इतना विशेष क्यों? और यह माह ही शिव जी इतना प्रिय क्यों है, क्या है इसका कारण?

शिव जी का प्रिय माह और समर्पित दिन है आज, सावन का दूसरा सोमवार। तो इससे अच्छा कौन-सा दिन हो सकता है, इस जानकारी के लिए। फिर आज आपके समक्ष इसे ही प्रस्तुत कर रहे हैं…

सावन शिव को क्यों मनभावन?


धार्मिक व पौराणिक कारण :

इस के कुछ धार्मिक व पौराणिक कारण हैं, तो चलिए उन्हें जान लेते हैं।


(1) समुद्र मंथन -

हिन्दू धर्म का एक बहुत बड़ा प्रसंग है, समुद्र मंथन, जिसमें बहुत से देवताओं व राक्षसों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।समुद्र मंथन के दौरान कुल 14 दिव्य रत्न (मूल्यवान वस्तुएं) निकले थे। इनमें कालकूट (हलाहल) विष, कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा अप्सरा, माता लक्ष्मी, वारुणी (मदिरा), चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धन्वंतरि और अमृत कलश शामिल हैं।

इसमें सबसे पहले निकला था कालकूट (हलाहल) विष, जिसे कोई धारना नहीं करना चाहता था। उस प्रसंग का विस्तार इस प्रकार है।

  • विष पान- सावन मास में ही समुद्र मंथन हुआ था। संसार की रक्षा के लिए शिव जी ने हलाहल विष पिया और नीलकंठ कहलाए। विष की गर्मी शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल चढ़ाया। तभी से शिवलिंग पर जल अभिषेक की परंपरा शुरू हुई। 
  • माता पार्वती का तप- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए सावन (श्रावण) महीने में सोमवार का व्रत और निराहार रहकर कठोर नियमित तपस्या की थी। उन्होंने बालू (रेत) का शिवलिंग बनाकर उसकी विधिवत पूजा की और अपना यह व्रत पूरा किया था, जिससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था।

एक और पौराणिक कथा इस प्रकार है, जिसके कारण शिव जी सावन माह पसंद है।


(2) ससुराल आगमन -

  • शिव का ससुराल आगमन- मान्यता है कि सावन में शिव जी अपने ससुराल आते हैं, जहां उनका स्वागत जलाभिषेक से होता है।


यह सब कारण हैं, कि क्यों शिव जी को सावन का महीना सर्वप्रिय है।

भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे!

हर हर महादेव!

Sunday, 9 August 2026

India's Heritage : Kanwar Yatra

सावन का पावन माह और कांवड़ यात्रा एक-दूसरे के पूरक हैं। पर क्या महत्व है सावन माह में कांवड़ यात्रा का, उसके क्या नियम हैं, किसने आरंभ की थी और भक्त को क्या लाभ मिलता है इस कठिन यात्रा को कर के?

आज India's Heritage segment में इसी पर चर्चा करते हैं। कांवड़ यात्रा महादेव के अनन्य भक्त निकालते हैं। यह बहुत ही कठिन यात्रा या कहें बेहद कठोर तप है।

कांवड़ यात्रा के दौरान यात्री कांवड़ (लकड़ी का पलड़ा) में कलश रखकर घर से निकलता है, फिर हरिद्वार या बैद्यनाथ धाम पहुंच कर गंगा मैय्या का जल कलश में भरकर महादेव पर जल अर्पित करता है, तत्पश्चात गंगा मैय्या से पुनः जल भरकर अपने घर की ओर आ जाते हैं और जिस शहर में रहते हैं, वहां के शिव मंदिर में जाकर लाया हुआ कुछ जल अर्पित कर देते हैं, शेष अपने घर पर रख लेते हैं। जब अपने शहर के मंदिर में जलाभिषेक करते हैं, उस समय उनके परिवार के सदस्य व बन्धु बांधव भी जुड़कर इस यात्रा का कुछ हिस्सा पुन्य अर्जित कर लेते हैं।

इस यात्रा को वह पैदल चलकर पूर्ण करता है, बहुत से कांवड़ यात्री चप्पल-जूते इत्यादि भी नहीं पहनते हैं, वहीं कुछ कांवड़िए लोग गाड़ियों में भरकर नाचते-गाते हुए भी जाते हैं…

कांवड़ यात्रा


I. कांवड़ यात्रा का कारण :

कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति, तपस्या और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है। इसमें भक्त पवित्र नदियों (विशेषकर गंगा) से जल लाकर सावन मास में शिवजी का जलाभिषेक करते हैं, जिससे शिव जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्ट दूर होते हैं।


II. धार्मिक व पौराणिक मान्यताएं :

  • समुद्र मंथन- कथा है कि समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिवजी ने पिया था। उस विष की उष्णता/गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने उनपर गंगाजल अर्पित किया था।
  • भगवान परशुराम- मान्यता है कि उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत (पुरा महादेव) में शिवजी का जलाभिषेक किया था।
  • लंकापति रावण- शिव भक्त रावण को भी पहला कांवड़िया माना जाता है, जो कावड़ में गंगाजल भरकर ले गया था। 
  • श्रवण कुमार- इन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। 


III. यात्रा के मुख्य नियम :

इस यात्रा के कुछ मुख्य नियम भी हैं, जो इस प्रकार हैं।

  • शुचिता- यात्रा के दौरान पूरी तरह शाकाहारी भोजन, संयम और पवित्रता का पालन किया जाता है।
  • कठिन तप- अधिकांश भक्त नंगे पांव यात्रा करते हैं और कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते।
  • शिव आराधना- पूरे मार्ग में 'बोल बम' के जयकारे गूंजते रहते हैं और भक्त शिवमय हो जाते हैं। 


IV. आध्यात्मिक व धार्मिक लाभ :

अंत मे यह भी जान लेते हैं कि इसका क्या लाभ है? जब इतना कठोर तप है तो इसके धार्मिक लाभ का भी विशेष महत्व है।

  • पापों से मुक्ति- ऐसा विश्वास है कि कांवड़ यात्रा के दौरान उठाए गए हर एक कदम से व्यक्ति के पिछले और वर्तमान जन्म के पाप कट जाते हैं। 
  • मनोकामना पूर्ति- भक्त अपनी किसी विशेष मन्नत या संकल्प के पूरा होने पर यह यात्रा करते हैं और जलाभिषेक के बाद उनकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। 
  • वंश-कुल का कल्याण- इस कठिन तपस्या से न केवल कांवड़िया बल्कि उसके पूरे परिवार और कुल की उन्नति व सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।


V. मानसिक व शारीरिक लाभ :

  • संयम और अनुशासन- लंबी पदयात्रा करने से शरीर में सहनशक्ति, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन की भावना विकसित होती है।
  • नकारात्मकता का अंत- यात्रा के दौरान निरंतर शिव मंत्रों (ॐ नमः शिवाय, बोल बम) के जाप से मन एकाग्र और शांत रहता है।
तो बोलो, हर हर महादेव!

Tuesday, 30 June 2026

India's Heritage : चरण स्पर्श का औचित्य

आज हम India's Heritage segment में भारतीय संस्कृति से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा को discuss करेंगे। 

भारतीय परंपरा में बड़ों से मिलने के लिए विशेष भंगिमाएं हैं, जिन्हें शिष्टाचार का प्रतीक मानते हैं।

पर कभी सोचा है कि यह विशेष भंगिमाएं क्यों? क्या इसके पीछे कोई वजह है? क्या वो वजहें scientific भी हैं?

तो सबसे पहले आप को बता दें कि भारतीय संस्कृति सनातन है, और इसमें किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के पीछे जितना आध्यात्मिक कारण है, उतना ही scientific भी।

आज बात करेंगे चरण स्पर्श की...

चरण स्पर्श का औचित्य


हमारी संस्कृति में बड़े-छोटों सभी को Hi-Hello कहकर नहीं मिला जाता है।

भारतीय संस्कृति में अपने से बड़े (उम्र में या पद में) या शिक्षक हों, उनसे मिलकर अभिवादन का तरीका यह है कि उनके चरणों को स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया जाए। 

आशीर्वाद, किस लिए? उससे क्या हो जाएगा? क्या आशीर्वाद कुछ होता भी है? और क्यों जरूरी है आशीर्वाद लेना?

देखिए, हर बात विश्वास पर टिकी है, मानों तो भगवान, न मानो तो पत्थर। पर सच यह है कि ईश्वर हैं, उनका अस्तित्व है, उनकी supreme power है। संसार को वही चला रहे हैं।

उसी तरह आशीर्वाद है, उसमें असीम divine power है, और जिनके पास अपने बड़ों का आशीर्वाद रहता है, वह अधिक सुखी और संतुष्ट रहते हैं।

भारतीय संस्कृति में सृष्टि में व्याप्त हर एक को एक विशेष स्थान दिया गया है।

फिर हमसे जुड़े रिश्ते तो सर्वोपरि हैं, फिर वो चाहे मां-पापा का हो, गुरु का हो, या हमसे जुड़ें किसी भी बड़े का, उन सबका स्थान ईश्वर के बाद, सर्वाधिक वंदनीय माना गया है।

अब जान लेते हैं कि चरण स्पर्श करने का scientific effect क्या होता है।

भारतीय संस्कृति में बड़ों के ‘चरण स्पर्श’ (पैर छूने) की परंपरा केवल संस्कार या शिष्टाचार नहीं है, बल्कि इसके पीछे deep physical, mental और scientific importance भी है। यह प्रक्रिया energy level को balance करने और विनम्रता विकसित करने में मदद करती है।


Scientific Effects :

  • Energy Flow and Circuits- Scientifically, human body में neuro-electric energy का flow लगातार होता रहता है। इसमें brain को North Pole और पैरों को South Pole माना जाता है। जब कोई व्यक्ति बड़ों के चरण छूता है, तो उसके हाथ और सामने वाले के पैर मिलकर एक Energy Circuit complete करते हैं, जिससे positive energy का flow होता है। Positive energy मतलब सब कुछ अच्छा।
  • Blood Circulation- जब चरण स्पर्श किया जाता है, तो जिस posture में झुककर आशीर्वाद लेते हैं, उससे (जैसे घुटनों के बल बैठकर या झुककर) blood flow सिर और चेहरे की ओर तेजी से बढ़ता है। इससे brain function बेहतर होता है और आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
  • Mental Peace and Balance- जब चरण स्पर्श किया जाता है, तो जिस posture में झुककर आशीर्वाद लेते हैं, उससे झुकने की मुद्रा हमारे अहंकार को कम करती है। Psychological perspective से, यह अभ्यास, हमें mental peace और emotional balance प्रदान करता है, जो overall mental health के लिए लाभदायक है।
  • Pressing of Accupressure Points- पैरों के अंगूठे और तलवों में ऊर्जा केंद्र होते हैं। हाथों से पैर छूने पर ये accupressure points active हो जाते हैं, जो nervous system को आराम देने में सहायक होते हैं। अर्थात् आप के चरण स्पर्श से आपके बड़े को शारीरिक रूप से आराम मिलता है। 

और इन सबसे प्रसन्न होकर उनके मन के भीतर से आपको आशीर्वाद मिलता है, जिसमें आपके शुभ की, आपकी सफलता की, आपकी सुख, समृद्धि, शांति और सुकून की कामना होती है, और जब कामना मन के प्रसन्न होने से की जाती है, तो वो शत-प्रतिशत पूर्ण होती है।

पर यह परंपरा कुछ-कुछ भारतीय घरों से विलुप्त होने लगी है, जो कि नहीं होनी चाहिए। 

जो उचित न हो, अत्यंत कष्टकारी हो, और जिससे कोई लाभ न हो, उसे discard किया जाए, समझ आता है। पर जो सरलतापूर्वक हो जाए, उससे scientifically, psychologically, emotionally और spiritually लाभ मिलता हो, उस परंपरा को कायम रखने का औचित्य है।

चरण स्पर्श का औचित्य है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहे, इसकी जिम्मेदारी हमारी है, कि जो सुख और संतोष हमें मिला, वो हमारे बच्चों को भी मिले।

जय सनातन संस्कृति!

Saturday, 20 June 2026

India's Heritage : जामुन की बहार, वर्षा कम इस बार

आज India's Heritage segment में एक ऐसी बात share कर रहे हैं, जिसे पढ़कर शायद आप को लगे कि यह India's Heritage कैसे है।

तो पहले उसे ही clear करते हैं, कि पहले जमाने में लोग पढ़े-लिखे उतने नहीं होते थे जैसे आज हैं।

पर उनके अनुभव का ज्ञान इतना अधिक था, जिससे वो बिना पढ़े-लिखे ही आज से अधिक सक्षम थे, अपने सभी कार्यों को सुचारू रूप से करने में।

वैसे यह ज्ञान आज भी बड़े-बूढ़े और ग्रामीण इलाकों में लोगों के पास मौजूद है।

तो उसी अनुभव का सार है, आज की यह India's Heritage segment की post…

जामुन की बहार, वर्षा कम इस बार


“जामुन ज़्यादा तो बारिश कम”, यह एक लोकप्रिय पारंपरिक कहावत है जो बताती है कि यदि जामुन का bumper उत्पादन हो, तो यह उस क्षेत्र में सूखे या कम बारिश का संकेत हो सकता है।

दरअसल प्रकृति में कुछ जीव ऐसे हैं, जिन्हें मौसम का पूर्वानुमान हो जाता है, जैसे चातक, पपीहा और मोर।

ऐसे ही वनस्पतियों में जामुन के वृक्ष को भी मौसम का पूर्वानुमान हो जाता है।

बारिश से पहले ही जामुन की भरमार, जानकार लोगों में इस बात से मौसम को लेकर बेचैनी बढ़ गई है।

इस पारंपरिक मान्यता और इसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बारे में आइए अधिक जानते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से इस मान्यता को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है।

  • Stress Fruiting- Botany में इसे कभी-कभी “Masting” या तनाव फलना कहा जाता है। 
  • Survival Instinct- जब पेड़ों को जमीन के नीचे नमी या पानी की कमी महसूस होती है, तो वे खतरे को भांप लेते है। अपनी species को बचाए रखने के लिए पेड़ अपनी सारी energy अधिक से अधिक फल (जैसे जामुन) पैदा करने में लगा देते है।
  • Direct Connection- इसलिए, बहुत ज्यादा जामुन का आना वास्तव में आने वाले मौसम में पानी की कमी या सूखे की ओर इशारा कर सकता है।

जामुन के वृक्ष का ऐसा इशारा चिन्ता का विषय है…

Saturday, 16 May 2026

India's Heritage : महायोग दुःख-कष्ट निवारण का

16 मई का यह दिन बहुत ही शुभ योग लेकर आया।

जैसा कि आप जानते होंगे, कि अमावस्या में बरगद अमावस्या (वट सावित्री अमावस्या) को सबसे शुभ और सबसे बड़ी मानी गई है।

फिर इस अमावस्या के साथ सुहाग का इतना बड़ा पर्व भी जुड़ा हुआ है, अतः यह सबसे फलदाई भी मानी‌ जाती है। इस बार संयोग यह है कि साथ में शनि जयंती भी है।

महायोग दुःख-कष्ट निवारण का


शनि जयंती :

हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को पड़ता है। इस साल शनि जयंती 16 मई को मनाई जा रही है।

  • दुर्लभ संयोग- शनि जयंती शनिवार के दिन ही पड़ने के कारण इसे बेहद शक्तिशाली और शुभ माना गया।
  • ज्योतिषीय महत्व- कर्म और न्याय के देवता शनि देव को समर्पित इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और दान से साढ़े साती और ढैय्या के कष्टों से मुक्ति मिलती है।
  • पूजा और उपाय- इस दिन शनि मंदिरों में तेल चढ़ाने, व्रत रखने, हनुमान चालीसा का पाठ करने और गरीबों को दान देने का विधान है।


पूजा की विधि :

सबसे पहले घर पर पोछा कराते समय पानी में नमक डाल कर पोछा लगवाएँ। अगर आप की maid जा चुकी है, तो आप एक mug में पानी लेकर उसमें नमक डालकर मिलाएं। इस पानी को दहरी (जहां-जहां घर में दरवाजे हैं) पर छिड़क कर पोंछ दीजिए।

नमक वाले पानी का पोछा आप प्रत्येक शनिवार को भी लगवा सकते हैं, इससे negativity घर में नहीं आती है और सब शुभ होता है। उसके पश्चात व्रत रखकर वटवृक्ष के नीचे जाकर या वटवृक्ष की डाल को घर में लाकर विधिवत पूजा कीजिए।

 पूरी पूजा विधि के लिए link पर click करें- वट सावित्री या बरगद अमावस्या व्रत

अगर आप के घर पर वटसावित्री व्रत नहीं किया जाता है, तब भी आप वटवृक्ष को जल अवश्य चढ़ाएं, इससे भी शुभ फल मिल जाएगा।

इस व्रत के प्रभाव से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है, साथ ही पति-पत्नी का सुख-समृद्धि के साथ जीवन-यापन होता है और दोनों को एक-दूसरे का प्यार से परिपूर्ण साथ मिलता है।

शनिवार हनुमानजी का भी दिन माना जाता है, फिर ज्येष्ठ मास, हनुमान जी की पूजा का विशेष माह माना गया है। अतः सुन्दरकाण्ड पाठ, हनुमान चालीसा पाठ और हनुमान जी की आरती, इनमें से आप कुछ भी अवश्य कीजिए, यदि आप तीनों कर लें तो आप पर विशेष कृपा होगी।

हनुमान जी संकटमोचन हैं, हर तरह के दुःख-कष्ट निवारण के देवता। अतः जिसने इन्हें अपना इष्ट देव बना लिया, उसके तो सभी दुःखों का हरण करने के लिए वो खुद तत्पर रहते हैं।

शाम के समय में मंदिर जाकर हनुमान जी और शनिदेव के दर्शन करें, सरसों का तेल चढ़ाएं, दीया जलाएं व सुहाग के सामान, पांच फल (खरबूजा, तरबूज, खीरा, आम व केला), मेवा, मिठाई, पंखों आदि का दान कीजिए।

अगर आप के घर में शनि के तेल का दान मांगने या नींबू मिर्ची लगाने के लिए लोग आएं तो विशेष रूप से करें। रात्रि में 8 बजे पीपल के वृक्ष पर जल व तेल चढ़ाएं और दीया जलाएं। 

सभी विधि दुःख-कष्ट निवारण हेतु किए गए प्रयास मात्र हैं, इन्हें करने से सुख समृद्धि के योग बनते हैं। 

पूरा करना, आधा करना या नहीं करना आपकी इच्छा है। ईश्वरीय आराधना, ईश्वर तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया होता है, पर पूर्ण फल हमारे कर्म और ईश्वर की कृपा पर निर्धारित होता है।

जय हनुमान जी, जय शनिदेव जी, जय वटवृक्ष! आप सभी हम सब के सभी दुःखों का निवारण कर सुख प्रदान करें।

Tuesday, 5 May 2026

India's Heritage : बड़ा मंगल पर प्रसाद

शनिवार 2 मई से ज्येष्ठ मास (जेठ महीना) प्रारंभ हो गया है, और कल पहला बड़ा मंगल है।

ज्येष्ठ मास में आने वाले मंगल को बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल क्यों कहते हैं, यह हम इन दोनों posts (बड़ा मंगल, बड़ा मंगल क्यों) में share कर चुके हैं। आपको इन दोनों पर click करने से सम्पूर्ण जानकारी मिल जाएगी।

बड़ा मंगल इस साल बहुत विशेष है, क्योंकि आठ साल बाद वो विशेष वर्ष आया है, जब 8 बड़े मंगल एक साथ आएंगे, जो कि आज से 23 June तक 8 बड़े मंगल हैं।

इस विशेष वर्ष पर उज्जैन के मायापति हनुमान मंदिर में विशाल आयोजन किया जा रहा है, जिसमें:

  • 8 लाख मूल‌ मंत्र जाप
  • 800 हनुमान चालीसा पाठ 
  • 8 किलो सिन्दूर से अभिषेक

ये सभी चीजें की जाएँगी।

वहीं हनुमान गढ़ी मंदिर में आज 11000 मूल मंत्र जाप करे जाएंगे।

बड़ा मंगल पर प्रसाद


हनुमान जी को ‘अष्टसिद्धि नवनिधि’ के दाता कहा जाता है। यह मान्यता है कि बड़े मंगल में हनुमानजी की पूजा-अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

हनुमान जी को प्रसन्न करने हेतु चढ़ाए जाने वाले आठ प्रसाद इस प्रकार हैं:

  • मोतीचूर के या बेसन के लड्डू- हनुमान जी को मुख्यतः मोतीचूर के या बेसन के लड्डू चढ़ाने से भक्ति बढ़ती है और जीवन में शुभ फल मिलते हैं। 
  • चना-गुड़- हनुमान जी को चना और गुड़ बेहद प्रिय हैं। गुड़ ऊर्जा और चना बल का प्रतीक है। इसे अर्पित करने से मंगल दोष शांत होता है और ताकत बढ़ती है।
  • मीठा पान- बिना तंबाकू वाला मीठा पान चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है। यह हनुमान जी को बहुत पसंद है।
  • कच्चा नारियल- पूरा कच्चा नारियल चढ़ाना शुभ माना जाता है। इससे इच्छाओं की पूर्ति और कामनाएं स्वीकार होने का विश्वास है।
  • इमरती- शुद्ध घी में बनी इमरती का भोग लगाने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं।
  • केसर भात- केसर वाला भात अर्पित करने से मंगल दोष कम होता है और सुख-समृद्धि आती है।
  • रोटी- घी लगी सादी रोटी चढ़ाने से रोग और बाधाएं दूर होती हैं, साथ ही स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
  • पंचमेवा- किशमिश, काजू, मखाना, छुहारा और चिरौंजी से बना पंचमेवा चढ़ाने से कार्य सिद्धि और सफलता मिलती है।

मान्यता है कि इन प्रसादों को सच्चे मन और श्रद्धा से अर्पित करने पर हनुमान जी भक्तों के कष्ट दूर करते हैं, खासकर बड़ा मंगल के दिन इनका भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है।

साथ ही हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और रामचरितमानस का पाठ करने से विशेष फल मिलता है।

हनुमानजी की कृपा सदैव बनी रहे, बड़ा मंगल हम सभी के लिए शुभ व मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला हो।

Friday, 1 May 2026

India's Heritage : Buddha Purnima

(I) अवतरण दिवस :

आज बुद्ध पूर्णिमा है, भगवान बुद्ध का अवतरण दिवस। आज के India's Heritage segment में भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक घटना का वर्णन कर रहे हैं। भगवान बुद्ध भगवान श्रीहरि के नवें अवतार हैं।


(II) श्रीहरि के अवतार :

  • मत्स्य (मछली)
  • कूर्म (कछुआ)
  • वराह (सूअर)

यहाँ तक विष्णु जी ने पशु रूप में अवतार लेकर सृष्टि की रक्षा की।

तत्पश्चात अपने परमभक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु व हिरण्यकश्यपु के दर्प को चूर करने के लिए नरसिंह (नर-सिंह) भगवान का अवतरण लिया, जिस रूप में वो वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए आधे पशु व आधे मनुष्य रूप में (आधे नर व‌ आधे सिंह) अवतरित हुए। 

वमन (बौना ब्राह्मण) के अवतार के साथ ही विष्णु जी ने मनुष्य रूप धारण किया और उसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण और फिर बुद्ध के रूप में अवतार लिया। दशावतार में कल्कि के रूप में भी भगवान श्री हरि अवतार लेंगे।

भगवान विष्णु जी का हर स्वरूप न केवल देखने में, अपितु भगवान विष्णु जी के हर अवतार की शिक्षाएं, संस्कार, नीति भिन्न-भिन्न रही हैं।

भगवान बुद्ध भी सबसे भिन्न थे, उसी का उल्लेख है उनसे जुड़ी हुई इस कथा में...

Buddha Purnima


(III) युवराज सिद्धार्थ :

भगवान गौतम बुद्ध जन्म से इश्वाकू वंश के शाक्य कुल के युवराज सिद्धार्थ थे, पर उन्होंने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण से इतर, परिवार से ज्यादा कर्मों को प्रधानता दी।

अपने राज्य पाठ, सुख-ऐश्वर्य, यहां तक की परिवार को त्याग कर कठिन तप के द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया और राजकुमार सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बन गए।

संसार का ज्ञान प्राप्त करने से पहले राजपुत्र सिद्धार्थ लगभग छह साल तक उस समय के योग, समाधि में लीन कहे जानेवाले अनेक ऋषि, साधु, योगी, ज्ञानीब तथा महानुभवियों के शरण में गए थे।

गौतम बुद्ध संसार का ज्ञान प्राप्त करने हेतु छह साल तक दरदर भटकते रहे। उनके आखिरी गुरु ने उनसे कहा था कि आहार-चावल के दाने कम करते जाओ, जब एक दाने पर आओगे तब तुम्हें ज्ञान की प्राप्ति होगी।

ज्ञान पाने की लालसा में बुद्ध ने वैसा ही किया। वे शारिरिक रूप से बहुत ज़्यादा कमजोर हो गए। उनका पूरा शरीर बस एक हड्डियों का पिंजर बन कर रह गया था।

एक दिन वे बहते हुए पानी से दूसरी छोर जा रहे थे। जैसे ही वे बहते पानी के मुख्य धारा में आए, कमजोरी के कारण वे बहने लगे। बड़ी प्रयास से एक पत्थर को पकड़कर उन्होंने अपनी जान बचाई, और वे थके-हारे आज के बिहार राज्य में स्थित बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे जा बैठे।

बैसाखी पूर्णिमा की बात है, इस नगर की सुजाता नाम की वधु को बड़ी मनौती के पश्चात पुत्र प्राप्ति हुई थी। पुत्र प्राप्ति के ख़ुशी में सुजाता ग्राम के सभी देवी-देवताओं को दूध-चावल की बनी खीर का भोग चढ़ाने आई। 

सिद्धार्थ का अस्थि-पिंजर शरीर देखकर उसे बड़ी करुणा आई, खीर का पात्र सिद्धार्थ के सामने रखते हुए अनायास उसके मुख से शुभकामना निकल पड़ी, “जैसे मेरी कामना पूरी हुई है, वैसे ही तुम्हारी भी हो।”

खीर का सेवन करने के बाद सिद्धार्थ के तन-मन में तृप्ति का आभास हुआ। कमजोर शरीर को ऊर्जा प्राप्त हुई, तब उन्होंने संकल्प किया- “अब जीऊँ या मरूँ, जब तक ज्ञान कि प्राप्ति न होगी इस जगह से उठूंगा नही।” और निग्रह के साथ समाधि लगाई।

सिद्धार्थ इस अवस्था मे छह-दिन छह-रात रहे। छठवें दिन  एक निमिष (पलक झपकने में जितना समय लगता है) से भी कम समय में सिद्धार्थ को ज्ञान कि प्राप्ति हुई, और वे बुद्ध बन गए।

मगर जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई तब उनकी भगवान की अवधारणा तटस्थ थी, उन्होंने कभी ज्यादा भगवान के अस्तित्व के बारे में खुल कर बात नहीं की।

उनका ज्ञान था “जीवन में दुःख है। उस दुःख का कारण है औऱ उसका उपाय है कर्म और योग-साधना।”

Friday, 24 April 2026

India's Heritage : माँ बगलामुखी

(I) प्राकट्य दिवस :

आजकल हिन्दू देवी-देवताओं की मान्यता, पूजा-अर्चना को विशेष बल दिया जा रहा है, जो कि हिन्दू संस्कृति को सुदृढ़ करने के लिए अत्यावश्यक भी है।

माँ बगलामुखी देवी, एक ऐसा नाम, जो आज के दिन के लिए सर्वोच्च स्थान पर विराजमान हैं। कारण यह है, कि आज उनका प्राकट्य दिवस है।

पर माँ बगलामुखी कौन हैं और क्या है उनके प्राकट्य की कथा? आज India's Heritage segment में उनकी आराधना के साथ ही यह article लिख रहे हैं…

माँ बगलामुखी


(II) तिथि :

यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है, जिस दिन मां बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था। वर्ष 2026 में बगलामुखी जन्मोत्सव 24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा।

  • आरंभ- 23 अप्रैल 2026 को रात 8:50 बजे से।
  • समापन- 24 अप्रैल 2026 को शाम 7:22 बजे तक।


(III) माँ बगलामुखी :

दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या बगलामुखी, माँ पार्वती का उग्र स्वरूप हैं। इन्हें युद्ध और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली देवी माना जाता है। वशीकरण और कीलन की शक्ति देने वाली बगलामुखी के पीतांबरा, ब्रह्मास्त्र, रूपिणी आदि नाम भी प्रमुख हैं। इनका वाहन बगुला पक्षी है।

माँ बगलामुखी के प्राकट्य की दो पौराणिक कथाएं हैं, जो इस प्रकार हैं।


(IV) पहली पौराणिक कथा :

सतयुग में भीषण तूफान के कारण पृथ्वी नष्ट होने वाली थी। भगवान विष्णु चिंतित होकर भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने विष्णुजी से कहा, “इस संकट को सिर्फ आदिशक्ति ही दूर कर सकती हैं।” 

प्रभु विष्णुजी ने आदिशक्ति मां जगदम्बा (पार्वती माता) की कठोर तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर देवी जगदंबा सौराष्ट्र में हरिद्रा झील में बगलामुखी के रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने पृथ्वी को नष्ट होने से बचाया।


(V) दूसरी पौराणिक कथा :

एक राक्षस ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के ग्रंथ चुरा लिए और पाताल लोक में जाकर छिप गया। उस राक्षस से मुक्ति दिलाने के लिए बगलामुखी की उत्पत्ति हुई। उन्होंने बगुले का रूप धर कर अपनी शक्ति से उस राक्षस का वध किया और ग्रंथ ब्रह्मा को वापस सौंप दिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार सबसे पहले ब्रह्मा ने बगलामुखी साधना का उपदेश सनकादि ऋषियों को दिया था। सनकादि ऋषियों से प्रेरित होकर देवर्षि नारद ने भी देवी की साधना की। देवी के दूसरे उपासक भगवान विष्णु जी ने परशुराम को यह विद्या प्रदान की और उन्होंने इस विद्या को द्रोणाचार्य को प्रदान किया।


(VI) माँ बगलामुखी का स्वरूप :

वैदिक काल में सप्तऋषियों ने देवी बगलामुखी की साधना की। भगवान कृष्ण ने भी महाभारत के युद्ध से पूर्व पांडवों से बगलामुखी की साधना करवाई थी।

इनकी साधना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव महाकाल हैं। बगलामुखी की दो भुजाएं हैं। इनके दाहिने हाथ में गदा है तथा बायें हाथ से एक दानव की जीभ पकड़कर उसे मारते हुए दर्शाया जाता है। देवी की यह छवि उनके स्तंभन स्वरूप को प्रदर्शित करती है।


(VII) माँ बगलामुखी की सोलह शक्तियां :

कहा जाता है कि माँ बगलामुखी सोलह शक्तियों से परिपूर्ण थीं, उनकी सोलह शक्तियां इस प्रकार हैं-

  • मंगला (मंगलकारी और शुभ करने वाली)
  • वश्या (शत्रुओं और प्रतिकूल परिस्थितियों को वश में करने वाली)
  • अचलाय (स्थिर रहने वाली)
  • मुंधरा (शत्रु के मुख को बंद करने वाली)
  • स्तंभिनी (शत्रु की क्रिया, वाणी और बुद्धि को स्तंभित करने वाली)
  • बलाय (शारीरिक व मानसिक बल प्रदान करने वाली)
  • जृम्भिणि (शत्रु के ज्ञान और चेतना को जड़ करने वाली)
  • मोहिनी (मोहने वाली)
  • भाविका (भावनाओं को समझने वाली और भावातीत)
  • धात्री (संसार के धारण करने वाली)
  • कलना (समय को नियंत्रित करने वाली)
  • भ्रामिका (शत्रुओं में भ्रम पैदा करने वाली)
  • कल्पमसा (दुष्टों का नाश करने वाली)
  • कालकर्षिणि (काल को आकर्षित करने वाली)
  • भोगस्था (भोग-विलास और सुख प्रदान करने वाली)
  • मंदगमना (शांत और स्थिर गति वाली)


(VIII) माँ बगलामुखी का महत्व :

इस दिन को शत्रुओं पर विजय, वाद-विवाद, और मुकदमों में सफलता के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। माँ बगलामुखी को 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है, जो 'स्तंभन' (रोकने) की शक्ति हैं।


(IX) बगलामुखी माता का मंदिर : 

बगलामुखी देवी मंदिर, विशेषकर नलखेड़ा (मध्यप्रदेश) (उज्जैन से ~100 किमी) और कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में स्थित, अत्यंत सिद्ध और प्राचीन शक्तिपीठ हैं। पांडव कालीन यह मंदिर शत्रुओं पर विजय, कोर्ट-कचहरी बाधाओं, और तांत्रिक अनुष्ठान के लिए प्रसिद्ध हैं।

नलखेड़ा, आगर मालवा (मध्यप्रदेश) मंदिर की मुख्य बातें:

स्थान: आगर-मालवा जिले में लखुंदर नदी के किनारे, नलखेड़ा।

महत्व: यह स्वयंभू सिद्धपीठ है, जहां पांडवों ने महाभारत युद्ध से पहले विजय प्राप्ति के लिए पूजा की थी।

विशेषता: यहाँ मां बगलामुखी की तीन मुख वाली त्रिशक्ति के रूप में पूजा होती है।

पूजा: शत्रु नाशक और करियर में सफलता के लिए यहाँ विशेष तांत्रिक हवन और पूजन किया जाता है। 

दतिया (मध्य प्रदेश) स्थित श्री पीतांबरा पीठ देश का अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली शक्तिपीठ है, जो मां बगलामुखी (पीतांबरा देवी) और धूमावती देवी को समर्पित है। 1935 में स्थापित, यह मंदिर शत्रुओं के नाश, मुकदमों में जीत और तांत्रिक साधना के लिए जाना जाता है। यहाँ स्थित वनखंडेश्वर शिव मंदिर महाभारतकालीन माना जाता है।

इस वर्ष दतिया के इस मंदिर में भव्य आयोजन किया जा रहा है। अनेकानेक श्रृद्धालुओं का जमावड़ा भोर की प्रथम बेला से लग गया है।


(X) दतिया बगलामुखी मंदिर :

  • स्थान- मध्य प्रदेश के दतिया जिले में, झांसी से लगभग 30 किमी की दूरी पर।
  • स्थापना- स्वामीजी महाराज (गोलोकवासी) द्वारा 1935 के आसपास।
  • प्रमुख देवता- मां बगलामुखी (पीतांबरा देवी), धूमावती देवी (जो भारत में एकमात्र स्थान पर हैं), और वनखंडेश्वर महादेव।
  • विशेषता- बगलामुखी देवी का रंग पीला है, इसलिए उन्हें पीतांबरा भी कहते हैं और यहाँ पीत (पीले) रंग की वस्तुएं ही चढ़ाई जाती हैं। यहाँ तंत्र साधना और विशेष हवन (जैसे हल्दी हवन) कराए जाते हैं, जो कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • समय- सुबह 6:00 बजे से रात 9:30 बजे तक (मंगल आरती सुबह 6 बजे और संध्या आरती 7:30 बजे)।
  • कैसे पहुँचें- दतिया railway station (झांसी-ग्वालियर मार्ग) निकटतम है।
  • पौराणिक महत्व- मान्यता है कि पांडवों ने महाभारत युद्ध से पहले माता की पूजा की थी, और यह मंदिर स्वयंभू (स्वयं प्रकट) है।
  • पूजा विधि- माँ बगलामुखी को पीला रंग प्रिय है, इसलिए भक्त पीले वस्त्र पहनकर, पीली वस्तुओं (पीले फूल, हल्दी, पीले भोग) के साथ माता की पूजा करते हैं। 

माँ बगलामुखी की जय!

माँ सबके रुके हुए कार्य को पूरा करें, सभी को सुख प्रदान करें।


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Thursday, 26 March 2026

India's Heritage : मंत्रों से बढ़कर तेरा नाम

आज आप सब के साथ मुझे उत्तराखंड के भुवन चंद्र अवस्थी जी के विचार को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

भुवन जी बहुत ही ज्ञानी, जीवन्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक भाव के प्राणी है। 

उनके साथ विचार-विमर्श के पश्चात्, बहुत से प्रश्न उठे, जिनका सिलसिलेवार तरीके से अध्ययन किया।

जो पता चला, वो बहुत ही रोचक व अंतरात्मा को शांति प्रदान करने वाला था, तो सोचा उसे ही साझा करें।

आज के India's Heritage segment में वही, जिस सत्य के बिना हम नहीं।

हम हिन्दुओं में राम नाम का बहुत महत्व है, पर क्यों? क्यों भारत में लोग एक-दूसरे से मिलने पर good morning, सुप्रभात इत्यादि न कह कर राम-राम कहा करते थे? और क्यों एक बार राम न कह कर दो बार राम नाम दोहराते थे, अर्थात् राम न कहकर राम-राम कहा करते थे।

आज इसी को बताने जा रहे हैं, उनके शब्दों में...

मंत्रों से बढ़कर तेरा नाम


राम-राम का महत्व :

सबसे पहले तो good morning या सुप्रभात कहने से आप एक-दूसरे के उस सुबह के शुभ होने की कामना करते हैं। पर पता है, जब आप राम-राम कहते हैं तो क्या होता है?

राम नाम की अगर मात्रा का जोड़ करते हैं तो: 

र्+अ+म् = 54 आता है।

दो बार अगर राम बोलते हैं तो:

54+54 = 108 

मतलब आप दो बार राम नाम बोलते हैं तो उसका प्रभाव 108 बार जाप करने के बराबर हो जाता है।

जब आप राम-राम कहते हैं तो प्रतिउत्तर में अगला भी राम-राम कहता है, अर्थात् उसने भी 108 बार राम नाम का जाप कर लिया।


108 बार मंत्र-जाप की परंपरा :

मंत्र जाप जब भी किया जाता है तो 108 बार जाप करने की परंपरा है, पर क्यों? यह भी देख लेते हैं।

जप (मंत्रों का जाप) 108 बार करने की परंपरा के पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं। माना जाता है कि 108 बार जाप करने से ब्रह्मांड के कंपन के साथ सामंजस्य स्थापित करने में मदद मिलती है, और यह संख्या पवित्र मानी जाती है।


इसके प्रमुख कारण :

  • वैदिक संस्कृति में महत्व- 108 को वैदिक संस्कृति में पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। 
  • सूर्य, चंद्रमा व पृथ्वी का संबंध- सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी से औसत दूरी उनके व्यास का 108 गुना है। 
  • ऊर्जा रेखाएँ- 108 ऊर्जा रेखाएँ हृदय चक्र में मिलती हैं, जो जीवन का केंद्र है।
  • माला में मोती- हिंदू मालाओं में 108 मनके होते हैं, जो 108 बार जाप करने का प्रतीक हैं। 
  • श्वासों की संख्या- कुछ लोगों का मानना है कि 108 संख्या 24 घंटे में मनुष्य द्वारा ली जाने वाली 21,600 सांसों से संबंधित है। 
  • नक्षत्र और चरण- 27 नक्षत्रों और प्रत्येक के 4 चरणों को मिलाकर 108 बनता है। 
  • ज्योतिषीय महत्व- 12 राशियाँ और 9 ग्रहों का गुणनफल 108 होता है। 
  • ब्रह्मांड का प्रतीक- 108 संख्या ब्रह्मांड की संपूर्णता और गति का प्रतिनिधित्व करती है।

संक्षेप में, 108 बार जाप करने से आध्यात्मिक लाभ, ऊर्जा का प्रवाह, और ब्रह्मांड के साथ संबंध स्थापित करने में मदद मिलती है।


अर्थात् आपके good morning या सुप्रभात कहने से आप एक-दूसरे के लिए केवल उस सुबह को शुभ बनाते हैं, लेकिन राम-राम कहकर, आप केवल एक सुबह, एक दिन को नहीं बल्कि उसके सम्पूर्ण जीवन को संपूर्णता देकर शुभ बनाते हैं और यदि सब प्रत्येक दिन राम-राम कहते हैं, तो उनका मानव जन्म लेना सार्थक हो जाता है। 

सोचिए कितना सहज और सरल है, इस विधि से प्रभू की आराधना करना, जिसमें एक निमिष मात्र पल में आपने 108 बार का जाप कर लिया और बाकी जितनों ने उसका उत्तर दिया, उन सभी ने भी 108 बार का मंत्र जाप कर लिया।

बस यही है राम नाम की महिमा, और इसलिए कहा भी गया है:

“मंत्रों से बढ़कर तेरा नाम, 

जय श्री राम, जय श्री राम, 

जय श्री राम, राजा राम!”

इतनी सहज, सुलभ, सरल और प्रभावशाली संस्कृति है, भारतीय संस्कृति और सभ्यता, और बस यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को सर्वोपरि माना जाता है।

आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय श्री राम!

भुवन जी, आपका विशेष धन्यवाद।


Monday, 23 March 2026

India's Heritage‌‌ : सनातन कितना आधुनिक?

आज के अपने विरासत के इस अंक के लिए, ऐसी विशिष्ट विशेषता पता चली है कि उसे आप सबसे साझा किए बिना नहीं रहा जा सकता है।

हम किस विषय में बात कर रहे हैं, वो तो बाद में बताते हैं, पहले इस विषय में बात कर लेते हैं कि त्रेतायुग सत्य है और कितना आधुनिक है, क्यों हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, सनातन है, सत्य है... 

सनातन कितना आधुनिक?


(I) त्रेतायुग व पुष्पक विमान :

त्रेतायुग में पुष्पक-विमान हिन्दू पौराणिक महाकाव्य रामायण में वर्णित वायु-वाहन था। इसमें लंका का राजा रावण आवागमन किया करता था।

युद्ध के लिए अग्नि, जल व वायु के तीर उपयोग में लिए जाते थे, जो वैसे ही हैं, जैसे आजकल missiles को छोड़ा जाता था।


(II) सनातन की अत्याधुनिकता :

यह सिद्ध करता है कि वायु-वाहन missiles का अविष्कार तो त्रेतायुग में ही हो गया था, अर्थात् भारत सदियों से ही अत्याधुनिक था।

यह ही है भारत का सत्य, भारत का इतिहास, पर इन्हें पौराणिक कथा का नाम देकर भारतीय संस्कृति को संकीर्ण कर दिया गया।

आगे हम जिस विषय में बताने जा रहे है, उसे हम सब में से ना जाने कितने लोगों ने पढ़ा होगा, पर ऐसा लिखा क्यों है, इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया होगा।


(III) रामचरितमानस :

बात कर रहे हैं तुलसीदास की रामचरितमानस की, हिन्दूओं के पवित्र ग्रंथ की।

तुलसीदास जी ने सुन्दरकांड में लंका में हनुमानजी के पहुंचने की बड़ी सुंदर व्याख्या की है, उसके 25वें दोहे में जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

“हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।”

अर्थ- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो भगवान की प्रेरणा से उन्चास तरह की पवन चलने लगी। हनुमान जी अट्टहास करके गरजे और उन्होंने अपना आकार इतना अधिक बढ़ा लिया कि वे आकाश तक पहुंच गए।

पर इन उन्चास मारुत का क्या अर्थ है? हवाएं तो इतनी नहीं होती हैं, फिर इस दोहे का क्या अर्थ है?

क्या तुलसीदास जी ने मारुति के लिए अतिशयोक्ति का प्रयोग किया? नहीं! 


(IV) वायु की शाखाएं :

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्कंद पुराण और वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।

अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।  

तो कैसा है? आइए जान लेते हैं।


(V) वायु के प्रकार :

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है, उसका वेद-पुराणों में अलग नाम है और आकाश में स्थित वायु का अलग नाम है, अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग।

नाम अलग होने का कारण यह है कि सबका गुण और व्यवहार अलग-अलग हैं। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।


(VI) मारुत सप्तप्रकार :

मारुति के 7 प्रकार हैं-

  • प्रवह
  • आवह
  • उद्वह
  • संवह
  • विवह
  • परिवह
  • परावह


(VII) विस्तृत जानकारी :

अब इन हवाओं के विषय में भी विस्तार से जान लेते हैं।

  1. प्रवह- पृथ्वी को लांघकर मेघ मंडल पर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और यही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं। 
  2. आवह- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
  3. उद्वह- तीसरी प्रकार की वायु का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है। 
  4. संवह- चौथी वायु का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
  5. विवह- पांचवीं वायु का नाम विवह है और यह ग्रहमंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है। 
  6. परिवह- छठी वायु है परिवह, जो सप्तऋषि मंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तऋषि आकाश में भ्रमण करते हैं।
  7. परावह- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।


(VIII) वायु के सप्तगण :

इन 7 वायु के सात-सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक की दक्षिण दिशा। इस तरह 7×7=49। कुल 49 मारुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं। 

जो सालों पहले तुलसी दास जी लिख गए, उसका ज्ञान आज भी ना जाने कितने विकसित देशों को नहीं होगा?

इस दोहे को हमने भी बहुत बार पढ़ा था, पर हमारा भी ध्यान नहीं गया था, पर आज जब पता चला, तो लगा कि, आह! कितना आधुनिक, कितना सत्य है सनातन, इसलिए चिरकालिक भी है।

गर्व कीजिए कि हम भारतीय हैं, सबसे पुरातन, सबसे आधुनिक।

आप इसे पढ़ें, साझा करके अपने अपनों को पढ़वाएं, जिससे सबको पता चल सके कि क्यों है हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ, सनातन, जितना प्राचीन उतना ही नवीन।

जय भारत, जय सनातन!

Friday, 20 March 2026

India's Heritage : क्यों पड़ा नाम दुर्गा?

माँ भगवती नें दुर्गम के साथ जब अंतिम युद्ध किया, तब उन्होंने भुवनेश्वरी, काली, तारा, छीन्नमस्ता, भैरवी, बगला तथा दूसरी अन्य महा शक्तियों का आह्वान कर के उनकी सहायता से दुर्गम को पराजित किया था।

इस भीषण युद्ध में विकट दैत्य दुर्गम को पराजित करके उसका वध करने पर माँ भगवती दुर्गा नाम से प्रख्यात हुईं।

क्यों पड़ा नाम दुर्गा?


दुर्गा नाम इस कारण पड़ा, क्योंकि माता ने प्राचीनकाल में दुर्गम नामक एक भयानक असुर का वध किया था, और इसी ‘दुर्ग’ (अर्थात् ‘असुर’) का वध करने के कारण उन्हें देवी दुर्गा कहा जाने लगा।

देवी भागवत जैसे पौराणिक ग्रंथों में इस घटना का विस्तार से वर्णन है, जिसमें बताया गया है कि दुर्गम असुर ने वेदों को छिपाकर संसार में असंतुलन पैदा कर दिया था, जिसे देवी ने अपने वध से समाप्त किया।

आइए, इस घटनाक्रम व पौराणिक कथा को विस्तार से समझते हैं।


असुर दुर्गम का अत्याचार :

एक प्राचीन असुर था जिसका नाम दुर्गम था। उसने ब्रह्माजी से वरदान पाकर वेदों को छिपा दिया था, जिससे दुनिया में अज्ञानता और पाप फैल गया था।


देवताओं की रक्षा :

देवताओं ने देवी उमा से इस संकट को दूर करने के लिए प्रार्थना की।


देवी दुर्गा का प्राकट्य :

देवताओं की रक्षा के लिए, देवी उमा ने दुर्गा का रूप धारण किया और दुर्गम असुर से युद्ध किया।


दुर्गम का वध :

भयंकर युद्ध के बाद, देवी दुर्गा ने दुर्गम असुर का वध किया और देवताओं को देवलोक वापस दिलवाया।


नाम की उत्पत्ति :

दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण ही देवी उमा को दुर्गा नाम से भी जाना जाने लगा।


जयकारा शेरावाली दा, बोलो सांचे दरबार दी जय!

Tuesday, 7 October 2025

India's Heritage : महर्षि वाल्मीकि की सफल कहानी

भारत वर्ष की अनमोल धरोहर में अनगिनत उत्कृष्ट कोटि के रत्न हैं, जिनसे हमारी सनातन संस्कृति सर्वश्रेष्ठ कहलाती है।

आज महर्षि वाल्मीकि जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में India's Heritage segment की ये post उन्हीं को समर्पित है।

महर्षि वाल्मीकि जी की कहानी अत्यधिक उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण अति-प्रेरणादायक कहानी है।

हम सभी उनके जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं को जानते हैं, किन्तु सब नहीं।

उसके कारण उनसे जुड़े हुए कुछ विवाद भी हैं, जैसे कि वो बाह्मण हैं या निम्न जाति के?

तो चलिए, उन सभी पहलुओं पर विचार करते हैं।

महर्षि वाल्मीकि की सफल कहानी


(I) हिन्दू संस्कृति में महत्व :

भगवान राम का जीवन चरित्र हमारे देश की “संस्कृति का प्राण” है। और जहांँ प्रभू श्रीराम का उल्लेख सर्वोपरि है, वहाँ महर्षि वाल्मीकि जी का नाम तो अपने आप ही महत्वपूर्ण हो जाता है।

महर्षि वाल्मीकि, प्रभू श्रीराम के लोक कल्याणकारी चरित्र को काव्य रूप में लिखने वाले संस्कृत भाषा के पहले कवि थे। अतः उन्हें आदि-कवि भी कहा गया है।

“त्रिकालदर्शी” भगवान वाल्मीकि ज्योतिष-विद्या और खगोल-विद्या के प्रकांड विद्वान थे। साथ ही केवल वह ही हैं जिनका सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग - तीनों कालों में उल्लेख मिलता है।


(II) विवरण :

नागा-प्रजाति में जन्मे वाल्मीकि ‘प्रचेता’ (वरुण देव) के पुत्र माने जाते हैं। इनके बचपन का नाम “रत्नाकर” था। मनुस्मृति (manuscript) के अनुसार वे प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलत्स्य आदि के भाई थे। एक महान ऋषि बनने से पहले वाल्मीकि को एक विख्यात डाकू के रूप में जाना जाता था।

अब विगत-वार सब समझ लेते हैं।


(III) जन्म व बाल्यकाल :

महर्षि वाल्मीकि का जन्म अश्विन माह की पूर्णिमा के दिन हुआ था। स्कंद पुराण और अध्यात्म रामायण के अनुसार  वाल्मीकि ब्राह्मण जाति के थे और इनका नाम “अग्निशर्मा” था।

माना जाता है कि वाल्मीकि महर्षि कश्यप और अदिति के दसवें पुत्र ‘प्रचेता’ की संतान हैं। इनकी माता का नाम ‘चतुर्ष्णि’ और भाई का नाम ‘भृगु’ था।


(IV) अपहरण :

एक किवंदती के अनुसार, जब वाल्मीकि जी का जन्म हुआ, उसी समय वहाँ से विचरण करती हुई एक निःसंतान भीलनी निकली।

वाल्मीकि को देखते ही उसके अंदर वात्सल्य-भाव जागृत हो गए, और वो उनका अपहरण करने से अपने को रोक नहीं पाई।

वह वाल्मीकि को अपने साथ वन‌ में ले गई। उनको पाकर, उस पर से निःसंतान होने का अभिशाप हट गया, अतः उसके लिए, वो किसी रत्न से कम न थे। यही कारण था कि उसने उनका नाम प्यार से “रत्नाकर” रखा। भीलनी ने बड़े प्रेम से रत्नाकर का लालन-पालन किया। रत्नाकर के लालन-पालन के लिए भीलनी बुरे काम (दस्यु कर्म) किया करती थी जिसका प्रभाव व्यापक रूप से रत्नाकर के जीवन पर पड़ा।


(V) युवावस्था :

जब रत्नाकर बड़े हुए तो उनका विवाह भी भील समुदाय की एक भीलनी से कर दिया गया। अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए रत्नाकर भी दस्यु कर्म ही किया करते थे। वह लोगों का धन लूटा करते थे। वन के मध्य में पथिकों का धन लूटना उनकी जीविका का साधन था। यदि धन लूटने के काम में संदेह हो तो वे हत्या करने में भी संकोच नहीं करते थे। इस तरह से अग्निशर्मा जो कि आगे चलकर वाल्मिकी कहलाए, अपनी युवावस्था में डाकू रत्नाकर के नाम से प्रसिद्ध हो गए। 


(VI) व्यक्तित्व में परिवर्तन :

इस समय का घटनाक्रम ध्यानपूर्वक पढ़िएगा, क्योंकि जो अनुभूति रत्नाकर को इस समय हुई थी, वो ही थी, जिसने क्रूर और दुष्कर्म में लिप्त डाकू रत्नाकर को प्रभू श्रीराम का परमभक्त और महर्षि वाल्मीकि बना दिया।

कहा जाता है कि एक बार वे वन में बैठे राहगीर का बेचैनी से इंतजार कर रहे थे और उन्होंने एक मुनिवर को आते हुए देखा, देखते ही वे फूले न समाये।

अपने लाल-लाल नेत्रों को घुमाते हुए रत्नाकर ने भयंकर स्वर में कहा - “तुम्हारे पास जो कुछ भी है, सब मुझे दे दो। नहीं तो तुम्हारे प्राणों का संकट होगा।”

मुनिवर ने उत्तर दिया - “लुटेरे, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। लेकिन तुम इस लूटे हुए धन का क्या करते हो? दूसरों को लूटना पाप कर्म है। क्या तुम यह नहीं जानते?”

रत्नाकर ने जवाब दिया - “लूटे हुए धन से मैं अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूँ जो एक महान कार्य है।”

मुनिवर ने कहा - “पाप द्वारा कमाए गए धन से पाले हुए तुम्हारे परिवार के सदस्य क्या तुम्हारे इस पाप के भागीदार होंगे?”

रत्नाकर बोले - “नहीं जानता, लेकिन उनसे पूछ कर बताऊँगा।”

रत्नाकर ऋषि को पेड़ पर रस्सी से बांधकर कुटुंबियों से पूछने चले गये। 

जब उसने यह प्रश्न अपने कुटुंबियों से किया, तो वे क्रुद्ध होकर बोले - “तुम्हारे पाप का भागीदार हम क्यों बनेगें? 

हमें क्या पता तुम यह धन कैसे कमाते हो? हमने तो नहीं कहा था कि तुम दुष्कर्म करो।”

यह सुनकर रत्नाकर अत्यंत दुखी हुआ। शीघ्र जाकर उसने मुनिवर को खोलकर सारी बात बताई।


(VII) भक्ति की ओर अग्रसर :

अपने कुटुंबियों की बात सुनकर रत्नाकर को बेहद दुख हुआ। मुनिवर ने उसके शोक को शांत करने के लिए “राम” नाम जपने का उपदेश दिया। यह मुनिवर कोई और नहीं, स्वयं नारद मुनि जी ही थे।

अब रत्नाकर ठहरे डाकू, तो राम शब्द के उच्चारण में उन्हें बहुत कठिनाई हो रही थी। अतः असमर्थ रत्नाकर ने राम शब्द को उल्टा “मरा-मरा” जपना प्रारंभ किया। 

बहुत वर्षों तक साधना में लीन होकर उन्होंने कठोर तप किया और “मरा-मरा” जपते-जपते वे इतने लीन हो गए, कि वह शब्द “राम-राम” में परिवर्तित हो गया।

रत्नाकर राम नाम के तप में इतने लीन हो गए कि उन्हें अपनी सुध-बुध ही नहीं रही, उनके पूरे शरीर में दीमकों ने अपना घर बना लिया और वो मिट्टी से पूरी तरह ढक गए।

लंबे समय बाद वरुण देव के लगातार जल की धारा से उनके शरीर से दीमकों की मिट्टी धुल गयी। उनका शरीर पुनः प्रकट हुआ, तब मुनियों ने उनकी स्तुति और पूजा की।

वे आंखें खोलकर उठ बैठे। दीमकों की मिट्टी से निकलने के कारण वाल्मीकि "प्रचेता" (वरुण) के द्वारा मिट्टी के धुल जाने के कारण "प्रचेतस" कहलाए। इसका वर्णन रामायण के उत्तरकांड में वाल्मीकि द्वारा किया गया है, जिसमें लिखा गया है - “हे राघव पुत्र! मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूँ।”


(VIII) रामायण की रचना :

वाल्मीकि ने मुनि नारद से भगवान राम का लोक कल्याणकारी चरित्र सुना।

जब उन्होंने रामचरित्र को सुना, तब से उनके मन में राम के चरित्र को काव्यबद्ध करने की इच्छा जाग उठी। 

पर उनके मन में यह इच्छा रामचरित्र सुनकर जाग्रत हुई, या इसलिए जाग्रत हुई, क्योंकि नियति ने आगे चलकर उन्हें ही यह यश प्रदान करना था, आइए देखते हैं। 

एक बार की बात है कि वाल्मीकि दोपहर के स्नान के लिए प्रयाग मंडल के अंतर्गत तमसा नदी पर गए हुए थे। वन की शोभा को देखते हुए महामुनि ने स्वच्छंद घूमते हुए एक क्रौंच पक्षी के युगल को देखा। वह रतिक्रीड़ा कर रही थी।

अचानक किसी शिकारी ने उस युगल पक्षी के जोड़े पर बाण मार दिया। भूमि पर गिरे हुए खून से लथपथ नर क्रोंच को देखकर क्रोंची करुण-विलाप करने लगी। इस करुण विलाप को सुनकर मुनि के हृदय में छिपी शोकाग्नि से पिघला हुआ करुण रस श्लोक के बहाने इस प्रकार निकल पड़ा :

    “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वगमः शाश्वती समः।

    यत्क्रोंचमिथुना देवकम अवधिः काम मोहितम्।।”

इसका अर्थ है कि “हे शिकारी! तू चिरकाल तक रहने वाले सुख को कभी प्राप्त नहीं कर पाएगा, क्योंकि तूने काम में मुग्ध अर्थात् काम-क्रीडा में रत क्रोंच के जोड़े में से नर क्रौंच को मार डाला।

यह श्लोक वेद से पृथक लोक में छंद का नया जन्म था।

शिकारी को श्राप देने के बाद वाल्मीकि के हृदय में महान चिंता जाग गई। उन्होंने महसूस किया कि पक्षी के शोक से पीड़ित मैंने यह क्या कर दिया।

इसी बीच ब्रह्मा ने वाल्मीकि के पास जाकर मुस्कुराते हुए कहा - “हे मुनि! पीड़ित पर दया करना महापुरुषों का स्वाभाविक धर्म है। श्लोक बोलते हुए तुमने उसी धर्म का पालन किया है। तुम्हें इस विषय में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।”

ब्रह्मा जी ने कहा - “सरस्वती मेरी इच्छा से ही तुम्हारी जिह्वा में विराजती हुई थी। अब तुम्हें वह काम करना है जो तुमने नारद मुनि से सुना है। तुम भगवान रामचंद्र जी के संपूर्ण चरित्र का ऐसा वर्णन करो कि जब तक पृथ्वी, पर्वत, नदी और समुद्र रहेंगे, तब तक संसार में रामकथा चलती रहेगी। मेरी कृपा से तुम्हें संपूर्ण राम चरित्र ज्ञात हो जाएगा।”

ऐसा आदेश देकर ब्रह्मा जी अंतर्ध्यान हो गए।

इसके बाद वाल्मीकि ने योगबल से नारद जी के द्वारा बताये गए संपूर्ण रामचरित को जानकर गंगा और तमसा के मध्य स्थित तट पर “सात कांडों” वाले “रामायण” नाम के इस महाकाव्य की रचना की। इस प्रकार महामुनि महर्षि वाल्मीकि संसार में “आदिकवि” के यश से प्रसिद्ध हो गए।


(IX) संक्षिप्त में जानकारी :

तो यह थी बाह्मण परिवार मे जन्म लेने वाले एक छोटे से बच्चे की कहानी, जिसका बचपन में ही अपहरण हो गया, और वो भील के रूप में बड़ा होकर डाकू बना, मतलब जन्म से ब्राह्मण और कर्म से दुष्कर्म करने वाला डाकू। आगे पुनः एक और मोड़, जो ले गया सर्वश्रेष्ठ महर्षि और परम भक्त बनाने की ओर, जिससे अग्नि शर्मा, रत्नाकर और अंत में महर्षि वाल्मीकि कहलाए।

जब तक पूरी सृष्टि में प्रभू श्रीराम का नाम है, रामायण का शुभ काम है, तब तक महर्षि वाल्मीकि जी भी अपने काव्य के रूप में इस संसार में विद्यमान हैं।

वैसे एक और interesting fact है, कि महर्षि वाल्मीकि जी ही अगले जन्म में तुलसीदास के रूप में धरती पर आए थे, और उन्होंने रामचरितमानस की रचना अवधी भाषा में की। इससे जन-जन तक प्रभू श्रीराम का लोक कल्याणकारी चरित्र पहुंच गया और सबको मौका दिया कि वो प्रभू श्रीराम से जुड़ सकें और उनकी कृपा को पा सकें। 

मतलब महर्षि वाल्मीकि जी एक जन्म में ही नहीं, अपितु दोनों जन्म में भगवान श्री राम के भक्त रहे और उनके दोनों जन्म में ही उन पर प्रभू श्रीराम की कृपा रही कि उन्होंने दो बार प्रभू श्रीराम के जीवन का चित्रण किया।


जय श्रीराम 🚩🙏🏻


Disclaimer:

The information mentioned above (about Maharishi Valmiki & his life) has been gathered from reliable websites and/or open source.