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Wednesday, 21 October 2026

India's Heritage : Sindoor Khela

(I) Navratri Ending :

कल नवरात्रि पर्व का समापन विजयादशमी पर्व के हर्षोल्लास के साथ हो गया। पर क्या सब जगह हो गया?

नहीं। पर कहाँ रह गया था? पश्चिमी बंगाल और बंगाली समाज में आज विजयादशमी पर्व था।

उनका विजयादशमी पर्व को लेकर अलग cultural recognition है।

विजयादशमी पर्व पर विशेष रूप से सिंदूर खेला किया जाता है।

क्या होता है सिंदूर खेला?

दुर्गा माता के आगमन का बंगाली समाज में क्या पर्याय है? आज इसी को India's Heritage segment में share कर रहे हैं…

सिंदूर खेला


(II) The Ritual :

सिंदूर खेला West Bengal और Bengali community में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन (विजयादशमी) को मूर्ति विसर्जन से ठीक पहले मनाई जाने वाली एक प्रमुख और पारंपरिक रस्म है।

इसका शाब्दिक अर्थ है ‘सिंदूर का खेल’।

इस रस्म से जुड़ी कुछ मुख्य बातें और परम्पराएँ हैं, आइए जानते हैं कि वो क्या हैं?


(III) Major Details :

  • Farewell of Maa Durga- ऐसा माना जाता है कि दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा अपने मायके (पृथ्वी) आती हैं, उनके भव्य स्वागत के लिए जगह-जगह पूजा-पंडाल तैयार किए जाते हैं। षष्ठी से लेकर विजयादशमी पर्व तक रोज पंडाल में माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है, खिचड़ी, पूड़ी-सब्जी इत्यादि का दोपहर में भोग प्रसाद खाया जाता है। शाम से रात तक विभिन्न भव्य और cultural programmes होते हैं। रात में खाना मुख्यतः विभिन्न पंडालों में दुर्गा माता के दर्शन के दौरान बाहर ही खाया जाता है। और विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा को मायके से ससुराल (कैलाश) लौटने से पहले विदा किया जाता है।
  • Debi Boron- Immersion से पहले महिलाएँ माँ दुर्गा की आरती करती हैं, पान के पत्ते से माँ के मुखमंडल को स्पर्श करती हैं तथा उनके माथे व चरणों में सिंदूर व मिठाई अर्पित करती हैं। इस अनुष्ठान को ‘देबी बोरोन’ कहा जाता है।
  • Applying Sindoor- माँ को सिंदूर चढ़ाने के बाद महिलाएँ आपस में एक-दूसरे के माथे, गालों और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं। जो ऐसा प्रतीत होता है, मानो सिंदूर से “होली” के समान खेला जा रहा है।
  • Traditional Outfits- बंगाली समाज में red border वाली सफेद saree को विशेष मान्यता प्राप्त है। और हर शुभ अवसर जैसे दुर्गा पूजा, विवाह, पूजा-पाठ इत्यादि में इसे पहना जाता है। दुर्गा पूजा वहाँ का सबसे बड़ा त्यौहार व उत्सव है।
  • इस उत्सव में महिलाएँ आमतौर पर लाल border वाली सफेद साड़ी (‘लाल पाड़ साड़ी’) और हाथों में शंख और लाल चूड़ियाँ (‘शंखा-पोला’) पहनती हैं।
  • Dhol & Dance- जैसे Punjab में ढोल, वैसे ही Bengal में ढाकी को विशेष स्थान दिया गया है। और हर शुभ अवसर पर ढाकी वाले को बुलाया जाता है। अतः षष्ठी में मातारानी की मूर्ति की स्थापना के साथ ही ढाकी वाले आ जाते हैं और विजयादशमी पर्व पर मूर्ति विसर्जन तक रहते हैं। इस रस्म के दौरान पारंपरिक ढाकी (ढोल) की थाप, शंखनाद और उल्लास का माहौल होता है।
  • Importance- यह रस्म महिलाओं द्वारा एक-दूसरे के सुहाग की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख और समृद्धि की कामना के लिए मनाई जाती है।

बोलो दुग्गा माई के जोय!

Saturday, 17 October 2026

India's Heritage : सप्तमी, अष्टमी‌ व नवमी अति-विशेष क्यों?

(I) The Major Dates :

सनातन धर्म में नवरात्रि पर्व का बहुत महत्व है। फिर शारदीय नवरात्रि पर्व का महत्व और अधिक माना जाता है।

और उसमें भी सप्तमी, अष्टमी‌ व नवमी को बहुत अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है। पर क्यों?

आज के India's Heritage segment में इसे ही share कर रहे हैं…

सप्तमी, अष्टमी‌ व नवमी अति-विशेष क्यों?


(II) Goddess Durga's Avatars :

सप्तमी, अष्टमी और नवमी नवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण तिथियां हैं, क्योंकि ये देवी दुर्गा के उग्र और शांत रूपों (कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री) की पूजा और उनकी शक्ति को समर्पित हैं।

इस समय विशेष हवन, कन्या पूजन, और माँ दुर्गा की विजय का उत्सव मनाया जाता है। यहाँ माता की असीम कृपा से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।


(III) Major Reasons :

  • Supreme Forms- सप्तमी को माँ कालरात्रि, अष्टमी को माँ महागौरी और नवमी को माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है, जो शक्ति के सर्वोच्च स्वरूप हैं। 
  • Key Role of Kanya Pujan- अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन (कन्याओं को देवी का रूप मानकर भोजन कराना) किया जाता है। यह नवरात्रि पर्व का मुख्य भाग माना जाता है। जिससे माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। 
  • Receiving Asht Siddhis- इन दिनों की साधना से साधक को अणिमा, गरिमा, लधिमा, ईशित्व एवं वशित्व जैसी आठों सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
  • Symbol of Victory and Peace- नवमी तिथि को माता ने असुरों (महिषासुर) का संहार किया था, इसलिए यह विजय, सुख-समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। 
  • Completion of Yajna and Havan- इन दिनों किए गए हवन और उपवास से mental peace, energy में वृद्धि और आध्यात्मिक लाभ मिलता है, जो पिछले दिनों के व्रत को पूर्णता देते हैं। 
  • Yogini Worship- अष्टमी को महालक्ष्मी (ईशान कोण) और नवमी को ब्रह्माणी (पूर्व दिशा) योगिनियों की पूजा का भी विधान है।

संक्षेप में, ये दिन आध्यात्मिक ऊर्जा, आत्म-शुद्धि और माँ दुर्गा के दिव्य आशीर्वाद को प्राप्त करने के सबसे उत्तम समय माने जाते हैं।

यही कारण है नवरात्रि पर्व में सप्तमी, अष्टमी व नवमी को अति-विशेष कहते हैं। यही कारण है, इन्हें महासप्तमी, महाअष्टमी व महानवमी कहते हैं।

दुर्गा माता की जय!

Friday, 16 October 2026

India's Heritage : षष्ठी क्यों विशेष?

आज शारदीय नवरात्रि पर्व की षष्ठी है, जो कि बहुत विशेष है। पर आखिर किस तरह से विशेष?

आइए, बताते हैं आपको। 

सनातन धर्म में दोनों नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) पर्व के प्रथम दिवस से ही विशेष मानते हैं।

लेकिन बंगाली समाज में, जिसमें दुर्गा माता को मुख्य विशेषता प्रदान की जाती है, उसकी मान्यता सनातन धर्म से कुछ अलग है।

वहाँ शारदीय नवरात्रि पर्व को अधिक महत्व दिया जाता है, तथा वहाँ नवरात्रि पर्व नवरात्र से एक दिन पहले, यानी महालया से प्रारंभ मानी जाती है।

महालया की क्या विशेषता है, यह हम आपको अगले साल महालया के दिन ही बताएंगे। आज षष्ठी है, तो विशेषता भी षष्ठी पर्व की ही बताते हैं…

षष्ठी क्यों विशेष?


आप कहेंगे कि हम तो बंगाली नहीं हैं, फिर कैसे बताएँगे?

तो ऐसे, कि हमारे पति की पहली posting Durgapur (West Bengal) में ही थी।

साथ ही अभी भी, हम जब दिल्ली में रहते हैं, तो यहाँ भी शारदीय नवरात्रि पर्व Bengali culture से ही मनाते हैं।

पंडाल अपनी पूर्ण सजावट से सुसज्जित हो चुका है, माता रानी का आगमन हो चुका है और इस विशेष आयोजन ने ही हमें आज की post India's Heritage segment में लिखने को प्रेरित किया है‌।

हाँ तो आप को बता दें, महालया से प्रारंभ तो होता है, लेकिन वो rituals केवल मातारानी की मूर्ति के लिए होता है।

लेकिन माता रानी के पंडाल की सम्पूर्ण सजावट और माता रानी का आगमन नवरात्रि पर्व की षष्ठी में ही होता है।

बंगाली पूजा-पंडालों में माँ दुर्गा का आगमन और उनका आह्वान मुख्य रूप से महाषष्ठी की शाम को ‘Bodhan’ नामक अनुष्ठान के साथ होता है।

महाषष्ठी की शाम को देवी का बोधन और आह्वान किया जाता है, जिससे उनकी आंखें खोली जाती हैं और प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया होती है।

एक विशेष परंपरा के अंतर्गत इससे पहले पंचमी के दिन ‘कल्पारंभ’ और बेल के पेड़ के नीचे मां को निमंत्रण देने की रस्म होती है, और षष्ठी की संध्या बेला में माँ का पंडाल में वास्तविक आगमन माना जाता है।

जिसमें माँ दुर्गा की विशाल मूर्ति महिषासुर का मर्दन करते हुए, और माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, गणेश जी और कार्तिकेय जी की मूर्तियां होती है।

दुर्गा माता की मूर्ति से थोड़ी छोटी बाकी मूर्तियां होती हैं। सभी भगवान जी की मूर्तियाँ अपने-अपने वाहन‌ पर आसीन होती है।

इस तरह से बंगाल में शारदीय नवरात्रि पर्व का मुख्य आरंभ षष्ठी से आरंभ होकर विजयादशमी पर्व तक सिंदूर खेला के पश्चात् मूर्ति विसर्जन तक होता है।

नवरात्रि पर्व के षष्ठी के साथ ही वो पूर्णतः माँ को समर्पित हो जाते हैं। इन दिनों पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, सब माँ को समर्पित रहता है।

घर में विभिन्न कार्य जैसे भोजन इत्यादि बनाना सब पंडाल में ही रहता है। अर्थात् सब को छोड़कर, सिर्फ और सिर्फ माँ की भक्ति।

विभिन्न तरह के cultural programmes भी पंडाल में आयोजित किए जाते हैं।

इसलिए ही बंगाल को आज भी culturally rich कहा जाता है।

यही कारण है कि षष्ठी को शारदीय नवरात्र में विशेष महत्त्व दिया जाता है।

वैसे हमारे लिए यह एक और कारण से भी विशेष है, क्योंकि शारदीय नवरात्रि पर्व की षष्ठी को ही मातारानी ने हमें कन्या रूपी बहुमूल्य रत्न प्रदान कर माँ बनने का विशेष सौभाग्य प्रदान किया था।

बोलो दुग्गा माई की जोय!

Thursday, 15 October 2026

India's Heritage : The Rise of Navadurga

(I) Her Emergence :

नवरात्रि पर्व चल रहा है, जिसमें जग-जननी माँ जगदम्बा की पूजा-अर्चना करते हैं। पर माँ दुर्गा का प्रकटीकरण किस प्रकार हुआ?

किस कारण हुआ? और वो शक्ति स्वरूपा क्यों कहलाती हैं। वो इतनी विशेष क्यों है? महिषासुर कौन था, उसे किस से और वरदान प्राप्त था। माँ दुर्गा क्यों उन्हें महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है?

ऐसे बहुत से प्रश्न दिमाग में घूमते हैं। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर share कर रहे हैं आज के India's Heritage segment में…

The Rise of Navadurga


(II) Traditional Stories :

पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ दुर्गा का जन्म देवताओं के सामूहिक तेज (ऊर्जा) से हुआ था। इसकी मुख्य कहानी कुछ इस प्रकार है।

महिषासुर नाम का एक अत्याचारी दुराचारी राक्षस था, लेकिन उसमें बहुत अधिक बल तब आया, जब उसने भगवान ब्रह्मा की कठिन तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया था कि किसी भी पुरुष या देवता के हाथों उसकी मृत्यु नहीं होगी।

ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर वही हुआ, जो होना था। महिषासुर के अत्यंत अहंकारी और बलशाली हो गया।

उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवराज इंद्र को हरा दिया और देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया।

महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव (शिव) के पास सहायता मांगने पहुँचे।

देवताओं की बात सुनकर त्रिमूर्ति ने विचार-विमर्श किया कि अब कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे महिषासुर का अत्याचार समाप्त हो जाए।

लेकिन रुकावट ब्रह्मा जी का वरदान बन रहा था। उनके अनुसार कोई भी पुरुष या देवता महिषासुर का अंत नहीं कर सकता था।

सोचा किसी देवी से महिषासुर का अंत करने को कहा जाए। लेकिन वरदान के पश्चात् महिषासुर अत्यंत बलशाली हो चुका था।

साथ ही त्रिदेव यह भी चाहते थे कि उसे अधिक मौके न दिए जाएँ और एक भी बार के युद्ध के साथ महिषासुर के अत्याचार को समाप्त कर दिया जाए।


(III) Shakti's Rise :

इस सोच के साथ ही माँ दुर्गा का प्रकटीकरण इस प्रकार हुआ।

  • त्रिदेवों और सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य और तेजस्वी ऊर्जा (तेज) प्रकट हुई।
  • भगवान शिव के तेज से माँ का मुख बना।
  • भगवान विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं।
  • ब्रह्मा जी के तेज से चरण बने।
  • अन्य सभी देवी-देवताओं के तेज से शरीर के विभिन्न अंग और दिव्य शक्तियाँ प्रकट हुईं।
  • इस प्रकार समस्त शक्तियों के पुंज से एक अद्युत और त्रिलोकी शक्ति माँ दुर्गा (आदिशक्ति) का प्रकटीकरण हुआ।

(IV) Her Accessories :

जब शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बा का प्रकटीकरण हो गया, तो निर्धारित किया गया कि माँ दुर्गा को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित किया जाए।

अतः त्रिदेवों व देवताओं द्वारा माँ दुर्गा को अस्त्र-शस्त्र और सवारी प्रदान किए गए।

प्रकटीकरण के बाद सभी देवताओं ने माँ दुर्गा को अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।

  • भगवान शिव ने त्रिशूल दिया।
  • भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र दिया।
  • इंद्र देव ने वज्र प्रदान किया।
  • वरुण देव ने शंख और पाश दिया।
  • हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह (शेर) भेंट किया।

इस तरह से शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बा का प्रकटीकरण हुआ। इसके पश्चात् माँ दुर्गा ने महिषासुर के साथ भीषण युद्ध किया और उसका वध किया।


इस प्रकार माँ जगदम्बा का प्रकटीकरण हुआ, महिषासुर के मर्दन के लिए, उसके बाद ही उनका नाम महिषासुरमर्दिनी पड़ा।

उनके अंदर त्रिदेवों व देवताओं की शक्ति समाहित थी, इसलिए ही उन्हें शक्ति-स्वरूपा कहा जाता है, और इसलिए वह विशेष भी हैं।

बोलो दुर्गा माता की जय!

माँ, आपके सभी भक्तों पर आपकी अनुकम्पा बनी रहे।

कल आपको बताएंगे कि सप्तमी, अष्टमी, और नवमी को अधिक महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं? उन्हें महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी क्यों कहते हैं?

Stay tuned…

Monday, 12 October 2026

India's Heritage : The Navrang of Navratri

शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो चुका है (11 October से 19 October 2026) जो नौ दिनों का है।

शरद ऋतु में जग-जननी माँ जगदम्बा ने महिषासुर मर्दन करने में नौ रूप धारण किए थे, इसलिए ही इन्हें शारदीय नवरात्रि पर्व कहा जाता है। 

नौ रूप, नौ दिनों, और हर एक दिन के लिए नौ रंग निर्धारित रहते हैं। वो नौ रंग कौन से हैं और किस कारण से विशेष दिन के लिए विशेष रंग निर्धारित रहते हैं?

आइए, आज इसे ही share कर देते हैं, जिससे कि आप इन नौ दिनों में उसके अनुसार ही वस्त्र धारण करें और माता रानी को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त करें।

नवरात्रि के नवरंग


नौ दिनों के शुभ रंग और देवी के स्वरूपों की सूची इस प्रकार है।

  • Day 1 (11) {प्रतिपदा}- माँ शैलपुत्री की पूजा:- नारंगी (orange) [उत्साह और positivity का प्रतीक] धारण करें 
  • Day 2 (12) {द्वितीया}- माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा:- सफेद (white) [शांति और पवित्रता का प्रतीक]
  • Day 3 (13) {तृतीया}- माँ चंद्र घंटा की पूजा:- लाल (red) [साहस और शक्ति का प्रतीक]
  • Day 4 (14) {चतुर्थी}- माँ कूष्मांडा की पूजा:- Royal Blue [भव्यता और स्थिरता का प्रतीक]
  • Day 5 (15) {पंचमी}- माँ स्कंदमाता की पूजा:- पीला (yellow) [खुशी और बुद्धिमत्ता का प्रतीक]
  • Day 6 (16) {षष्ठी}- माँ कात्यायनी की पूजा:- हरा (green) [प्रकृति और नए जीवन का प्रतीक]
  • Day 7 (17) {सप्तमी}- माँ कालरात्रि की पूजा:- धूसर (grey) [संतुलित सोच का प्रतीक]
  • Day 8 (18) {अष्टमी}- माँ महागौरी की पूजा:- बैंगनी (purple) [महत्वाकांक्षा और आध्यात्मिकता का प्रतीक]
  • Day 9 (19) {नवमी}- माँ सिद्धिदात्री की पूजा:- मोर हरा (peacock green) [समृद्धि और विशिष्टता का प्रतीक]

माँ का हर रूप निराला है, और उनके हर दिन का हर रंग अनोखा है। वैसे तो हर रंग माँ की विशेषता के अनुरूप ही निर्धारित किए गए हैं।

लेकिन पूजा-पंडाल kitty party इत्यादि के लिए रंगों का महत्व है। अन्यथा, माँ को जिन रंगों से सबसे अधिक प्रसन्न कर सकते हैं वो नौ रंग हैं:-

  • भक्ति का रंग
  • समर्पण का रंग
  • आस्था का रंग
  • अटूट विश्वास का रंग
  • अटूट श्रद्धा का रंग
  • सत्यनिष्ठा का रंग
  • दया का रंग
  • कर्तव्यनिष्ठता का रंग
  • प्रेम का रंग

जो इन नौ रंगों में रंगा हुआ है, माँ उससे सदैव प्रसन्न रहती हैं, अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं।

बाकी वस्त्रों का रंग तो बाह्य आवरण है, उनसे ज़्यादा आंतरिक रंगों का महत्व है, उन रंगों में खुद को रंग कर भक्ति में लीन हो जाएँ।

जयकारा शेरावाली दा!

Saturday, 10 October 2026

India's Heritage : दानवीर कर्ण के पितृ

पितृपक्ष चल रहे थे, जिनका समापन आज, सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। सर्वपितृ अमावस्या को सनातन धर्म में बहुत बड़ा दिन माना जाता है।

कहा जाता है कि अगर आप को अपने पितरों की तिथि नहीं याद है, या किसी वजह से आप पूजा-अर्चना नहीं कर सकें हैं, तो आज के दिन पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

जैसा कि नाम से ही विदित है, सर्वपितृ अर्थात सभी पितरों के लिए, तो इस एक दिन पूजा-अर्चना, दान-पुण्य, हवन इत्यादि करने से आप अपने सभी पितरों को प्रसन्न कर सकते हैं, तृप्त कर सकते हैं।

अब कुछ प्रश्न मन में आते हैं, कि “पितृपक्ष का आरंभ कब से हुआ? क्या पितृपक्ष का औचित्य सनातन धर्म में समझाया गया है? क्या किसी पौराणिक कथा में इसका वर्णन है?”

दानवीर कर्ण के पितृ


जी हाँ, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस कथन की पुष्टि करने के लिए एक कहानी का वर्णन है।

और इस कहानी का मुख्य पात्र कोई और नहीं, बल्कि जगत में दानवीर के नाम से सुप्रसिद्ध कर्ण है।

आइए, उसी कथा से समझते हैं कि क्यों आवश्यक है, पितृपक्ष में अन्नदान का महत्व।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, पितृपक्ष और श्राद्ध की शुरुआत महाभारत काल और दानवीर कर्ण की इस प्रसिद्ध कथा से जुड़ी मानी जाती है-

कहा जाता है, महाभारत के युद्ध में मृत्यु के बाद जब दानवीर कर्ण की आत्मा स्वर्ग पहुंची, तो उन्हें भोजन के रूप में सोना और रत्न परोसे गए।

  • Gold Cuisines- वहाँ भूख लगने पर कर्ण को भोजन की थाली परोसी गई। कर्ण ने जब भोजन ग्रहण करना चाहा, तो सारा भोजन सोने के टुकड़े और आभूषण में बदल जाता था। कर्ण यह देखकर हैरान हो गया, तब कर्ण ने देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा।
  • Indra Dev's Reply- इंद्रदेव ने कर्ण को बताया कि उन्होंने जीवनभर सोना और धन तो दिल खोलकर दान किया था, लेकिन अपने पूर्वजों (पितरों) के निमित्त कभी अन्न, जल या तर्पण नहीं किया था।
  • Lack of Knowledge and Penance- कर्ण ने विनम्रता से कहा कि वे तो जीवनभर यह जानते ही नहीं थे कि उनके असली माता-पिता और पूर्वज कौन हैं, क्योंकि उनका पालन-पोषण राधा और अधिरथ ने किया था। इसलिए उन्होंने कभी उनके नाम से श्राद्ध या अन्नदान नहीं किया।
  • An Opportunity- कर्ण की यह समस्या और उनकी उदारता को देखकर उन्हें अपनी भूल सुधारने के लिए 15 से 16 दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर लौटने की अनुमति दी गई।
  • Donation and Food- धरती पर आकर कर्ण ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए 16 दिनों तक विधि-विधान से श्राद्ध किया, पिंडदान किया, तर्पण किया और जरूरतमंदों को भरपेट अन्न, जल व वस्त्रों का दान किया।
  • Beginning of Pitri-Paksha- जब कर्ण के ये 16 दिन पूरे हुए और वे वापस स्वर्ग लौटे, तब उनकी भोजन की थाली सोने के बजाय असली अन्न से भरी हुई थी। मान्यता है कि कर्ण द्वारा किए गए इन्हीं 16 दिनों के अनुष्ठान के बाद से ही पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) की शुरुआत हुई, ताकि लोग अपने-अपने पितरों को याद कर उनका तर्पण कर सकें।

सनातन धर्म में पौराणिक कथाओं के माध्यम से हमें सरल व सटीक उपाय बताए जाते हैं, जिससे हम सहजता से उसे अपना सकें। 

सभी पितरों को सादर प्रणाम, आप सब की कृपादृष्टि सदैव हम सभी पर बनी रहे...

Monday, 28 September 2026

India's Heritage : Bharatiya Math-Magicians (Virahanka)

Maths Storytelling Day था, तो India's Heritage segment में महान महर्षि बौधायन के विषय में जानकारी share की थी- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math.html?m=1

फिर उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए भारत के एक और महान गणितज्ञ, जिन्हें Madhava of Sangamagrama कहते हैं, के विषय से जुड़ी कुछ बातें share की- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math_0152809532.html?m=1

इनके बाद महान गणितज्ञ और संस्कृत भाषा के ज्ञाता श्रीधराचार्य के विषय में जानकारी share की- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math_0980722856.html?m=1

आज भारत के एक और महान गणितज्ञ और संस्कृत के प्रकांड विद्वान, विरहांक के विषय में जानकारी share कर रहे हैं।

Bharatiya Math-Magicians (Virahanka)


(I) Who Was He :

इन्होंने संस्कृत भाषा की ऐसी विद्या में maths के formulae दिए हैं, जो कि अपने आप में सर्वोच्च है और सिद्ध करती है कि क्यों भारतीय संस्कृति सर्वोपरि है।

Virahanka 6th से 8th c. CE के बीच के एक प्राचीन भारतीय गणितज्ञ और छंदशास्त्री थे, जिन्होंने संस्कृत छंदों का अध्ययन करते हुए Fibonacci Sequence को सबसे पहले खोजा था।

संस्कृत भाषा में अत्यंत समृद्ध और व्यवस्थित छंद शास्त्र (जिसे पिंगल शास्त्र भी कहते हैं) पाया जाता है, जिसके आधार पर वैदिक और लौकिक संस्कृत के श्लोक रचे जाते हैं।

इनके विषय में पढ़कर आपको एहसास होगा कि भारत सदैव से महान और विकसित रहा है।


(II) Major Information :

  • Time Period- इनका अनुमानित समय 6th to 8th c. CE माना जाता है।
  • Treatises- इन्होंने Pingala (4th c. BCE) के ‘छंदसूत्र’ पर आधारित 'वृत्तजातिसमुच्चय' नामक ग्रंथ की रचना की थी।


(III) Main Contributions :

  • Expansion Process- इस ग्रंथ में इन्होंने मात्रा-छंदों के pattern और उनकी गिनती के लिए ‘expansion’ process की विस्तृत व्याख्या की है।
  • Virahanka-Fibonacci Sequence (Arithmetic Progression + Recursive Rule)- उनका सबसे बड़ा योगदान उस number sequence की खोज है, जिसे आज western world में गलती से ‘Fibonacci Numbers’ कहा जाता है। उन्होंने Italian mathematician Fibonacci (1202 CE) से लगभग 500 वर्ष पहले ही इस सूत्र की खोज संस्कृत कविता के छंदों (मात्राओं) को गिनने के लिए कर ली थी। विरहंक संख्या अनुक्रम का Recursive Formula विरहंक ने दिया था, कि यदि किसी sequence का अगला पद निकालना हो, तो वह पिछले दो पदों के sum के बराबर होता है। इसे गणितीय रूप में इस प्रकार लिखा जाता है- [V(n) = V(n-1) + V(n-2)] Initial conditions यह हैं कि उसके शुरुआती terms कुछ इस प्रकार हैं- [V₀ = 0, V₁ = 1] [At some places, V₀ = 1] इस सूत्र के आधार पर बनने वाली विरहंक संख्या श्रृंखला निम्नलिखित है- [0, 1, 1, 2, 3, 5, 8, 13, 21, 34, 55]
  • Combinatorial Rules for Prosody- विरहंक ने संस्कृत कविता में लघु (short syllable = 1 मात्रा) और गुरु (long syllable = 2 मात्रा) के संयोजन से बनने वाले कुल छंदों (rhythms) की संख्या ज्ञात करने के लिए इस सूत्र का आविष्कार किया था।यदि हमें n मात्राओं (beats) वाले कुल संभावित छंदों की संख्या निकालनी है, तो उसका सूत्र है- [n = V(n+1)] E.g.- यदि कुल मात्राएँ n = 3 हैं, तो कुल संयोजन V₄ = 3 होंगे (जैसे; लघु-लघु-लघु [1+1+1], गुरु-लघु [2+1], लघु-गुरु [1+2])।
  • Connection to Golden Ratio- हालांकि विरहंक ने सीधे तौर पर decimal मान नहीं दिया था, लेकिन उनके इसी सूत्र के दो लगातार नंबरों को विभाजित करने पर Golden Ratio प्राप्त होता है- [Lim (n→∞) V(n)/V(n-1) = φ ≈ 1.6180339887...] यह ratio प्रकृति की बनावट (फूलों की पंखुड़ियाँ, शंख आदि) में हर जगह दिखाई देता है।


ऐसे ही अनेकानेक Math-Magicians, Scientists, वीर‌ योद्धा, भाषाओं के ज्ञाता, दार्शनिकों, आदि भारत के कण-कण में व्याप्त हैं, जिनकी जानकारी हम समय-समय पर अपने India's Heritage segment में share करते रहेंगे।

तो इससे जुड़े रहिए और विशेष रूप से अपने बच्चों को बताएँ, जिससे वो भारत का सच्चा और समृद्ध इतिहास जान सकें और गर्व कर सकें अपने भारत पर।

मेरा भारत महान!

Stay tuned…

Sunday, 27 September 2026

India's Heritage : Bharatiya Math-Magicians (Sridharacharya)

Maths Storytelling Day से India's Heritage segment में भारत के गणितज्ञों के विषय में जानकारी share कर रहे हैं।

सबसे पहले महान महर्षि बौधायन के विषय में जानकारी share की थी- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math.html?m=1

फिर उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए भारत के एक और महान गणितज्ञ, जिन्हें Madhava of Sangamagrama कहते हैं, के विषय से जुड़ी कुछ बातें share की थीं- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math_0152809532.html?m=1

आज भारत के एक और महान गणितज्ञ श्रीधराचार्य के विषय में जानकारी share कर रहे हैं। इसे पढ़कर आपको एहसास होगा कि भारत सदैव से महान और विकसित रहा है।

और साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि संस्कृत भाषा के ज्ञाता किस तरह से गणित से जुड़कर यह सिद्ध कर रहे हैं कि संस्कृत भाषा और विज्ञान एक ही मंच पर आसीन हैं…

Bharatiya Math-Magicians (Sridharacharya)


अर्थात् संस्कृत भाषा केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि अपने आप में सम्पूर्ण है, जिसमें कला, विज्ञान, दर्शन सब निहित हैं।

बात करते हैं श्रीधराचार्य जी के विषय में, और उनसे जुड़ी खोजों व सिद्धान्तों के विषय में।


(I) Main Overview :

श्रीधराचार्य 8वीं से 9वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ, संस्कृत पंडित और दार्शनिक थे।

  • Time- इनका अनुमानित समय 750 से 930 CE के बीच माना जाता है।
  • Birthplace- इनका जन्म बंगाल के हुगली क्षेत्र (दक्षिण राधा) के भूरिश्रेष्टि गाँव में हुआ था।


(II) Major Contributions :

  • Quadratic Formula [x=(-b±√{b²-4ac})/2a]- श्रीधराचार्य का सबसे प्रसिद्ध योगदान Quadratic Formula है, जिसका उपयोग किसी quadratic equation (ax²+bx+c=0) के roots या हल निकालने के लिए किया जाता है। यदि कोई Quadratic Equation इस रूप में है; [ax²+bx+c=0] तो इसे हल करने का श्रीधराचार्य सूत्र है; [x=(-b±√{b²-4ac})/2a]
  • Rules of Zero [x±0=x, 0(x)=0]- उन्होंने 0 को add करने [x+0=x], subtract करने [x-0=x], और multiply करने (x×0=0) के नियम समझाए।
  • Main Treatises- उन्होंने ‘पाटीगणित’ और ‘त्रिशतिका’ (पाटीगणितसार) नामक प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं, जिनमें अंकगणित और बीजगणित के नियम बताए गए।
  • Area of Circle- उन्होंने circle के area को निकालने के लिए भी शुरुआती सूत्र दिए।

मेरा भारत महान!

Saturday, 26 September 2026

India's Heritage : Bharatiya Math-Magicians (Madhava)

(I) Main Introduction :

कल Maths Storytelling Day था, तो India's Heritage segment में महान महर्षि बौधायन के विषय में जानकारी share की थी- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math.html?m=1

आज उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए भारत के एक और महान गणितज्ञ, जिन्हें Madhava of Sangamagrama कहते हैं, के विषय से जुड़ी कुछ बातें share करेंगें।

इन्हें पढ़कर आपको एहसास होगा कि भारत सदैव से महान और विकसित रहा है।

इनके द्वारा की गई खोजें गणित के विषय में विशेष महत्त्व रखती हैं। और हमें हमेशा से यही बताया गया कि उन खोजों को विदेशी गणितज्ञों ने खोजा है। पर आप जब इसे पढ़ेंगे, तो आप को यह ज्ञात होगा कि हमें कितनी बातों से अनभिज्ञ रखा गया या false information (myth) दी गई हैं।

आइए जानते हैं माधव जी और उनके द्वारा की गई खोजों और उन खोजों के सिद्धांत (theorems/principles) के विषय में…

Bharatiya Math-Magicians (Madhava)


(II) Overview :

Madhava of Sangamagrama ने 14th-15th c. CE में maths और astronomy के क्षेत्र में कई revolutionary discoveries की थीं।

इन्होंने ‘Kerala School of Astronomy and Mathematics’ की नींव रखी थी।


(III) Major Contributions :

  • Infinite Series [S∞=a/(r-1), r<|1|]- माधव ने sine (sin), cosine (cos) और arctangent (tan) जैसे trigonometric functions के लिए Infinite Series की खोज की थी। इन्हें “Madhava Series” भी कहा जाता है।
  • Accurate Pi Approximation [π≈3.14159265359]- उन्होंने अपनी Infinite Series का उपयोग करके π (Pi) का मान 13 decimal places तक बिल्कुल accurate ज्ञात किया था। इसे Madhava-Leibniz series के रूप में भी जाना जाता है।
  • Calculus Foundations [(d/dx),∂]- Europe में Isaac Newton और Gottfried Leibniz द्वारा calculus के विकास से लगभग 200–250 वर्ष पहले ही माधव ने differentiation और integration से जुड़ी कई अनन्त processes और approximations का उपयोग कर लिया था।
  • Error Term Evaluation [F1n=(1/4n)]- Infinite Series के योग में सटीकता लाने और errors को सुधारने के लिए उन्होंने correction terms की अवधारणा का विकास किया था।

मेरा भारत महान! 

Friday, 25 September 2026

India's Heritage : Bharatiya Math-Magicians (Baudhayana)

(I) Today's Occasion :

आज Maths Storytelling Day है, तो सोचा एक अच्छा मौका है। India's Heritage segment में बच्चों को भारत के इतिहास से, नहीं बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि भारत के विकास की, कहानी सुनाई जाए।

नहीं, अभी के विकास की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि बात कर रहे हैं भारत के उस विकास की, जो यह सिद्ध करता है कि भारत आज नहीं बल्कि शताब्दियों पहले से विकसित है।

आज Maths Storytelling Day है, तो बात भी भारत के mathematicians की करेंगे, जिसे पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा कि भारत सदैव से महान और विकसित था।

इस श्रृंखला में आज महर्षि बौधायन के विषय में बात करते हैं…

Bharatiya Math-Magicians (Baudhayana)


(II) Overview :

महर्षि बौधायन प्राचीन भारत के एक महान गणितज्ञ, व दार्शनिक और वैदिक ऋषि थे।

हमें हमेशा से यह पढ़ाया गया है कि Pythagorean Theorem Greece के great mathematician Pythagoras ने दी है, जबकि उनसे बहुत पहले ही 7th-8th c. BCE में ही महान महर्षि बौधायन ने यह theorem दे दी थी।

आइए जानते हैं और किस-किस का ज्ञान वो पहले ही दे चुके थे। उन्होंने Pythagorean Theorem और Geometry से जुड़े कई महत्वपूर्ण principle Greeks से सदियों पहले दिए थे।


(III) Main Introduction :

  • Time- इनका समय लगभग 8th से 7th c. BCE (लगभग 800 ईसा पूर्व) माना जाता है।
  • Relation- ये कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से संबंधित थे और वैदिक संस्कृति के ज्ञाता थे।
  • Main Treatises- इन्होंने 'बौधायन सूत्र' की रचना की, जिसके अंतर्गत श्रौतसूत्र, धर्मसूत्र, गृह्यसूत्र और बौधायन शुल्बसूत्र जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ आते हैं।


(IV) Major Contributions :

  • Baudhayana-Pythagoras Theorem [h=√(l²+b²) in ∆90°]- Pythagoras से सैकड़ों साल पहले बौधायन ने ही right-angled triangle के संबंध में यह theorem (rectangle का diagonal) दिया था, जिसके अनुसार किसी rectangle के diagonal का square उसके दोनों legs (base और height) के square के sum के बराबर होता है।
  • Square Root of 2 [√2≈1.414216]- इन्होंने √2 का मान बहुत ही accuracy के साथ (approximately 1.414216) निकाला था, जो पांच decimal places तक सही है।
  • Value of Pi [π≈(900/289)≈3.114]- यज्ञ altars के निर्माण और circular figures को बनाने के लिए इन्होंने Pi (π) के अनुमानित मान का उपयोग किया था।
  • Shulbasutras [e.g. s=√(a•b)]- यह geometry और mathematical principles का सबसे प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें altars के accurate mesaurement और area को बराबर करने के नियम दिए गए हैं।

मेरा भारत महान!

Madhava-https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-bharatiya-math_0152809532.html?m=1

Tuesday, 8 September 2026

India's Heritage : Varahamihira - A Legend (Part-2)

कल आपको India's Heritage segment में आचार्य वराहमिहिर के विषय में जानकारी दी थी, जिससे आप समझ सकें कि क्यों है भारत महान और सबसे अधिक प्रतिष्ठा सनातन धर्म को क्यों दी जाती है।

इस link पर click करके आप उस post को पढ़ सकते हैं- https://shadesoflife18.blogspot.com/2026/09/indias-heritage-varahamihira-legend.html?m=1

आइए, उसके आगे जानते हैं आज के अंक में…

Varahamihira - A Legend (Part-2)


(I) Symbol Reason :

उज्जयिनी और गुप्त साम्राज्य का ‘वराह चिन्ह’ ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से सम्राट विक्रमादित्य (जिन्हें गुप्त वंश के चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ से भी जोड़ा जाता है), भगवान विष्णु के परम भक्त थे।

  • धर्म की रक्षा का प्रतीक- सनातन परंपरा में भगवान विष्णु ने पृथ्वी को हिरण्याक्ष नामक राक्षस से बचाने और समुद्र के तल से बाहर निकालने के लिए वराह अवतार लिया था।
  • राजचिन्ह का चयन- विक्रमादित्य ने जब शकों और विदेशी आक्रांताओं को पराजित कर धर्म और राष्ट्र की रक्षा की, तो उन्होंने भगवान वराह को अपना आदर्श माना। जिस तरह वराह देव ने पृथ्वी को संकट से उबारा था, उसी तरह विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को संकट से बचाया था।
  • सिक्कों और ध्वज पर स्थान- इसी के प्रतीक स्वरूप सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयिनी के राजचिन्ह, शाही मुहरों और सिक्कों पर ‘वराह’ (सूअर) की आकृति को अंकित करवाया। यह चिन्ह वीरता, भूमि की रक्षा और अन्याय के खिलाफ विजय का प्रतीक माना गया।
  • वराह उपाधि से सम्मान- भविष्यवाणी के सत्य साबित होने पर राजा विक्रमादित्य ने उनकी विद्वता से प्रसन्न होकर उन्हें राज्य के सर्वोच्च सम्मान ‘वराह’ चिह्न से अलंकृत किया। 


(II) Varahamihira :

वराहमिहिर प्राचीन भारत के एक महान खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और ज्योतिषी थे, जो अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पंचसिद्धांतिका’ और ‘बृहत् संहिता’ के लिए जाने जाते हैं। उनके मुख्य योगदान और उनकी प्रसिद्धि का अवलोकन भी कर लेते हैं।

  • Astronomy- उन्होंने अपनी पुस्तक पंचसिद्धांतिका में पांच खगोलीय सिद्धांतों का संकलन किया। उन्होंने यह भी बताया कि चंद्रमा और ग्रह स्वयं के प्रकाश से नहीं, बल्कि सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं।
  • Mathematics- उन्होंने गणित और त्रिकोणमिति में महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने pascal's triangle का प्रारंभिक रूप और magic squares का निर्माण किया। 
  • Brihat Samhita- यह उनका एक विश्वकोश जैसा ग्रंथ है, जिसमें architecture, ग्रहों की गति, ग्रहण, वर्षा, कृषि, और रत्न शास्त्र जैसी विभिन्न विषयों की जानकारी दी गई है। 
  • Astrology- उन्होंने होराशास्त्र पर 'बृहज्जातक' और 'लघुजातक' जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे, जो भारतीय ज्योतिष में आज भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। 

शायद अब आपको भी एहसास हुआ होगा कि मेरा भारत महान और सबसे ऊपर है सनातन की पहचान...

Monday, 7 September 2026

India's Heritage : Varahamihira - A Legend (Part-1)

आज India's Heritage segment में एक ऐसी कहानी share कर रहे हैं, जिस को पढ़कर आप कह उठेंगे कि “मेरा भारत महान”।

आज की कहानी से आप को समझ आएगा कि (Isaac) Newton और अकबर को महान कहने से पहले कोई ऐसा सम्राट आया था, जो सच में महान था और महान थे उनके नवरत्न।

हम बात कर रहे हैं राजाओं के राजा, सम्राट विक्रमादित्य की और उनके नवरत्नों में एक रत्न आचार्य वराहमिहिर की।

सम्राट विक्रमादित्य पहले महाराज थे जिनके राज में नवरत्न थे, जो सभी एक से बढ़कर एक थे, बहुत प्रसिद्ध थे।

अकबर ने महाराजा विक्रमादित्य की देखा-देखी अपने मंत्रीमंडल का नाम नवरत्न रखा था। तो जो किसी की नकल करे, वो कैसे महान? महान तो वो हुआ न, जिसकी हर कोई नकल करना चाहे।

अब बात करते हैं विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक आचार्य वराहमिहिर की…

Varahamihira - A Legend (Part-1)


विज्ञान के क्षेत्र में Isaac Newton को विशेष स्थान दिया गया है, उन्हें sir की उपाधि से सम्मानित किया गया है। 

तो आपको बता दें कि वराहमिहिर 6th c. CE (प्राचीन काल) में और आइजैक न्यूटन 17वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी (आधुनिक काल) में आए थे।

और विज्ञान का जो ज्ञान Newton ने 17-18 शताब्दी में दिया था, वो Varahamihira 6वीं शताब्दी में दे दिया था।

तो चलिए जानते हैं, कौन थे आचार्य वराहमिहिर और हम क्यों कह रहे हैं उन्हें महान?


आचार्य वराहमिहिर का बचपन :

वराहमिहिर का मूल नाम केवल ‘मिहिर’ था, जिसका अर्थ ‘सूर्य’ होता है। उनके पिता आदित्यदास सूर्य देव के उपासक थे, इसलिए उन्होंने उनका नाम मिहिर रखा था। ‘मिहिर’ के साथ ‘वराह’ उपाधि जुड़ने के पीछे एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और ज्योतिषीय कहानी है।


राजकुमार की भविष्यवाणी :

जब सम्राट विक्रमादित्य के यहाँ पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने मिहिर को अपने पुत्र की कुंडली बनाने और भविष्य बताने को कहा।


कठोर भविष्यवाणी :

मिहिर ने गणना की और अत्यंत दुखी होकर कहा कि राजकुमार की आयु बहुत कम है। ठीक 18वें वर्ष में एक निश्चित दिन और समय पर एक जंगली सूअर (वराह) के हमले से राजकुमार की मृत्यु हो जाएगी।


राजा के प्रयास :

विक्रमादित्य ने अपने पुत्र को बचाने के लिए कड़े इंतजाम किए। महल के चारों तरफ ऊंचे पहरे लगा दिए गए और उस क्षेत्र के सभी जंगली सूअरों को दूर खदेड़ दिया गया।


भविष्यवाणी का दिन :

जब वह निश्चित दिन आया, तो राजकुमार को महल की सबसे ऊपरी मंजिल पर पूरी सुरक्षा में रखा गया। राजा को लगा कि आज का दिन बीत जाने पर ज्योतिष झूठा साबित हो जाएगा।


अचानक हुई दुर्घटना :

महल की छत पर लोहे का एक बड़ा विजय-स्तंभ लगा था, जिसके शीर्ष पर राजचिन्ह के रूप में लोहे का एक सूअर (वराह) बना हुआ था। अचानक एक भयंकर आंधी आई और वह भारी लोहे का वराह स्तंभ से टूटकर सीधे नीचे खेल रहे राजकुमार के ऊपर गिर गया। लोहे के वराह के नुकीले हिस्से से चोट लगने के कारण राजकुमार की मौके पर ही मृत्यु हो गई।


‘वराह’ की उपाधि :

राजा अपनी नियति पर बहुत रोए, लेकिन उन्हें ज्योतिष विज्ञान की सटीकता पर अचंभा हुआ। उन्होंने मिहिर को दरबार में बुलाया और कहा, “विज्ञान की जीत हुई, मैं हार गया।” विक्रमादित्य ने मिहिर के अचूक ज्ञान का सम्मान करते हुए उन्हें अपने राज्य का सर्वोच्च पुरस्कार दिया और उनके नाम के आगे ‘वराह’ जोड़ दिया। तब से उन्हें वराहमिहिर कहा जाने लगा।


अब एक सवाल और उठता है कि किसी का राज्य चिन्ह वराह कैसे हो सकता है, तो आइए इसके पीछे की कहानी को जान लेते हैं। साथ ही, आचार्य वराहमिहिर के मुख्य योगदान और उनकी प्रसिद्धि का अवलोकन भी कर लेते हैं।

यह सब जानेंगे, Varahamihira - A Legend (Part-2) में…

Saturday, 22 August 2026

India's Heritage : पार्वती जी को भी भाए सावन

सावन का पावन माह चल रहा है, शिव जी को प्रसन्न करने वाला, उनकी भक्ति में लीन होने का।

पर क्या आपको पता है, न केवल शिव जी को, बल्कि शक्ति स्वरूपा पार्वती जी को भी सावन माह में पूजा-अर्चना करते हुए प्रसन्न किया जा सकता है?

पर जैसे सावन के सोमवार में पूजा-अर्चना करने से महादेव प्रसन्न होते हैं, वैसे ही पार्वती माता की सावन माह के मंगलवार को पूजा-अर्चना की जाती है, जिसे मंगलागौरी व्रत भी कहते हैं?

पार्वती जी को भी भाए सावन


सावन (श्रावण) मास के प्रत्येक मंगलवार को माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है और मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।

  • व्रत का महत्व और नियमसमर्पण- यह दिन भगवान शिव की शक्ति और माता पार्वती को समर्पित होता है।
  • सौभाग्य प्राप्ति- विवाहित महिलाएं सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
  • शीघ्र विवाह- अविवाहित युवतियां मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं।
  • सोलह की संख्या- पूजा में सभी सामग्री (जैसे दीपक, चूड़ियां और प्रसाद) सोलह (16) की मात्रा या संख्या में अर्पित की जाती है।

हर-हर महादेव, माता पार्वती की जय।

Tuesday, 18 August 2026

India's Heritage : Vande Mataram after 80 Years

15 August 2026 एक ऐसा ऐतिहासिक दिन बनकर आया, जिसमें हम सब भारतवासियों के साथ आजादी के मतवाले शहीद भी शामिल हो गए।

ऐसा हम क्यों कह रहे हैं? तो उसका कारण है, स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर पर वंदे मातरम् के सम्पूर्ण गीत का गायन।

क्या आप जानते हैं, लाल किले की जान रहा यह राष्ट्रगीत 80 साल बाद मंच पर गाया गया?

“वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां मातरम्, वन्दे मातरम्!”

आइए, इस राष्ट्रगीत का निर्माण और इसके महत्व को समझते हैं…

Vande Mataram after 80 Years


यह हमारे देश भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 150 साल पहले 1875 में बनाया था।

1882 में अपनी किताब आनंदमठ में यह गीत प्रकाशित किया, उसके बाद यह घर-घर की आवाज बन गया और 1896 को इसे मंच पर रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाया।

आजादी के पूर्व आज़ादी के मतवालों के लिए यह आजादी का गीत बन गया।

जिसने अंग्रेज़ो को हिलाकर रख दिया था, उस समय इस गीत को गाना जुर्म माना जाता था, उन पर लाठीचार्ज होती थी, जेल हो जाती थी, जो यह गीत गाते थे। 

पर इसे जितना रोका गया, आजादी के मतवालों ने उतना ही अधिक गाया।

सभाओं में, गली-गली में, जुलूसों में, भीड़ में, जेल में, यहां तक कि फांसी लगते समय भी, हर पल, हर क्षण, इस एक गीत ने अंग्रेजों की नाम पर दम कर दिया था।

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल के दो टुकड़े कर दिए, इससे पूरा देश हिल गया। तब यही गीत, गीत के साथ-साथ नारा और देश को आजादी दिलाने का हथियार भी बन गया। 

हर ओर से, हर छोर से, जोर-जोर से पूरे देश में दो नारे सर्वत्र गूंज रहे थे। वंदे मातरम् और इंकलाब जिंदाबाद। इन दो नारों से ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हो गए। 

और तब मिली हमारे देश को आजादी, अविस्मर्णीय दिन आया, अथक प्रयासों, व अनेकानेक बलिदानों के बाद। वंदे मातरम् गीत को पूरा गाने पर पहले अंग्रजों को फिर मुस्लिम league को परेशानी थी। 

क्योंकि गीत के आखिरी stanza में भारत माता की तुलना दुर्गा माता से की, तो कुछ विशेष लोगों ने कहा कि उनके धर्म में ऐसे देवी अर्चना नहीं की जाती है। अतः यह निर्धारित किया गया कि वंदे मातरम् गीत के आखिरी stanza न गाएँ जाएँ। 

24 January 1950 में पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी ने यह ऐलान कर दिया था कि “जन-गण-मन अधिनायक जय हे” राष्ट्र गान है, जबकि “वन्दे मातरम्” राष्ट्रगीत निर्धारित होगा।

और जितने भी सरकारी कार्यालय, विद्यालय आदि हैं, उनमें देश से जुड़े पर्व में और किसी भी ऐसी जगह जाने में देश को represent किया जा रहा है, तो पहले वहाँ राष्ट्रगान गाया जाएगा, राष्ट्रगान के पश्चात राष्ट्रीय गीत गाया जाएगा।

पर यह बहुत अफसोस की बात है कि हममें से बहुत कम ही भारतीय हैं, जिन्हें यह राष्ट्रीय गीत आता हो, कितनों को तो यह भी पता नहीं होगा कि भारत का राष्ट्रीय गीत कौन सा है।

लेकिन इस वर्ष लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय गीत गाया और पूरा गाया गया, जिसकी यह सोच थी उसे शत-शत नमन।

क्योंकि यह गीत गाए जाने से देश ने सभी आजादी के मतवालों को उनके बलिदान को शत-शत नमन किया है, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है, उन्हें हृदय से आभार व्यक्त किया है।

आशा है आने वाले समय में वंदे मातरम् गीत को हर राष्ट्रीय पर्व पर विशेष रूप से गाया जाएगा, जिससे बच्चों-बच्चों को यह कंठस्थ हो जाए। और हम हर वर्ष आजादी दिलाने वाले वीर सपूतों को आभार प्रकट कर सकें, सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें।

वंदे मातरम्! जय हिन्द, जय भारत!

Monday, 17 August 2026

India's Heritage : नागपंचमी व सावन का सोमवार

हिन्दू धर्म में सभी को सर्वश्रेष्ठ और पूजनीय स्थान दिया गया है, फिर वो चाहे देवी-देवता, प्रकृति, सूर्य, चन्द्र, शनिदेव, आकाश, पृथ्वी, गाय, या नागदेवता हों, सबकी पूजा-अर्चना के दिन निर्धारित हैं। 

इन दिनों में से नागपंचमी नागदेवता के लिए निर्धारित किया गया है।

नाग पंचमी का पावन पर्व इस साल 17 अगस्त 2026 (सोमवार) को है। 

इस दिन सावन का तीसरा सोमवार होने के कारण एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, क्योंकि भगवान शिव और नाग देवता की पूजा एक साथ की जाएगी।

महादेव को नाग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए ही उन्होंने नाग को अपनी ग्रीवा में स्थान दिया हुआ है। 

महादेव की गर्दन में नाग इस तरह से लिपटे हुए रहता है, मानो वह उनके श्रृंगार का अभिन्न अंग हो, उनके गले का हार हो।

पर क्यों है ऐसा और क्यों मनाते हैं नागपंचमी? आज India's Heritage segment में यही देखेंगे…

नागपंचमी व सावन का सोमवार


महादेव के गले में नाग क्यों :

भगवान शिव के गले में जो सांप लिपटा रहता है, उसका नाम वासुकी नाग है, जो नागों के राजा हैं। 

शिव जी ने उन्हें समुद्र मंथन के दौरान उनकी सेवा, समर्पण और कष्ट सहन करने के भाव से प्रसन्न होकर अपने गले का आभूषण बनाया था।


पौराणिक व आध्यात्मिक कारण :

इसके पीछे कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण हैं।

  • समुद्र मंथन- समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने मंदराचल पर्वत को मथने के लिए रस्सी की भूमिका निभाई थी। घर्षण से घायल होने और विष का प्रभाव सहने के उनके समर्पण को देखकर शिव जी ने उन्हें अपने गले में स्थान दिया।
  • भक्त की इच्छा- नागराज वासुकी भगवान शिव के परम भक्त थे और हमेशा उनके समीप रहना चाहते थे, इसलिए शिव ने उनकी मनोकामना पूरी की।
  • मृत्यु पर विजय- सांप को मृत्यु और काल का प्रतीक माना जाता है। गले में नाग धारण कर शिव यह दर्शाते हैं कि वे महाकाल हैं और मृत्यु तथा भय से परे हैं।
  • कुंडलिनी शक्ति- योग और तंत्र साधना में सांप को कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो मनुष्य के भीतर जागृत होने वाली चेतना का संकेत है।
  • संतुलन और शांति- एक अत्यंत विषैला और हिंसक जीव होने के बावजूद सांप शिव के गले में शांत रहता है, जो यह सिखाता है कि भयंकर ऊर्जा या क्रोध पर भी संयम रखा जा सकता है।

नागपंचमी का कारण :

अब जान लेते हैं कि क्यों मनाते हैं नागपंचमी।

नाग पंचमी का त्योहार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग देवता के प्रति सम्मान और उनकी रक्षा के लिए मनाया जाता है। इस दिन सांपों को दूध व फूल चढ़ाकर सर्पदंश से रक्षा, पारिवारिक समृद्धि और कालसर्प दोष की शांति के लिए पूजा की जाती है।


पौराणिक कथाएं और मान्यताएं :

  • आस्तिक मुनि की कथा- राजा जन्मेजय ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए विशाल सर्प यज्ञ किया था। आस्तिक मुनि ने श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन उस यज्ञ को रोककर नागों के प्राण बचाए थे, तभी से यह पर्व मनाया जाता है।
  • कालिया नाग का वध- भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन कालिया नाग को हराकर यमुना नदी को जहर से मुक्त किया था।
  • शिव व विष्णु का संबंध- भगवान शिव अपने गले में नाग रखते हैं और विष्णु जी शेषनाग पर सोते हैं, इसलिए नागों की पूजा का विशेष महत्व है।


तिथि व शुभ मुहूर्त :

  • पंचमी तिथि प्रारम्भ- 16 अगस्त 2026 को शाम 04:52 बजे।
  • पंचमी तिथि समाप्त- 17 अगस्त 2026 को शाम 05:00 बजे।
  • पूजा का शुभ मुहूर्त- सुबह 05:51 बजे से सुबह 08:29 बजे तक (कुल अवधि= 2 घंटे 37 मिनट)।
  • पूजा विधि और महत्व- सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। घर के मंदिर या पूजास्थल पर शिव परिवार के साथ नाग देवता का ध्यान करें। शिवलिंग पर जल, दूध, और बेलपत्र अर्पित करें तथा नाग देवता को दूध, खीर, चंदन व पुष्प चढ़ाएं।

इस दिन नाग देवता की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है और कालसर्प दोष का निवारण होता है। 

देवाधिदेव भगवान महादेव और उनके परम भक्त नागदेवता की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे, जिससे हम सभी दुःख-कष्ट से मुक्त होकर उनकी भक्ति में लीन रहें।

हर हर महादेव!

Monday, 10 August 2026

India's Heritage : सावन शिव को क्यों मनभावन?

एक प्रश्न मन में उठता है कि आखिर सावन माह ही इतना विशेष क्यों? और यह माह ही शिव जी इतना प्रिय क्यों है, क्या है इसका कारण?

शिव जी का प्रिय माह और समर्पित दिन है आज, सावन का दूसरा सोमवार। तो इससे अच्छा कौन-सा दिन हो सकता है, इस जानकारी के लिए। फिर आज आपके समक्ष इसे ही प्रस्तुत कर रहे हैं…

सावन शिव को क्यों मनभावन?


धार्मिक व पौराणिक कारण :

इस के कुछ धार्मिक व पौराणिक कारण हैं, तो चलिए उन्हें जान लेते हैं।


(1) समुद्र मंथन -

हिन्दू धर्म का एक बहुत बड़ा प्रसंग है, समुद्र मंथन, जिसमें बहुत से देवताओं व राक्षसों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।समुद्र मंथन के दौरान कुल 14 दिव्य रत्न (मूल्यवान वस्तुएं) निकले थे। इनमें कालकूट (हलाहल) विष, कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा अप्सरा, माता लक्ष्मी, वारुणी (मदिरा), चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धन्वंतरि और अमृत कलश शामिल हैं।

इसमें सबसे पहले निकला था कालकूट (हलाहल) विष, जिसे कोई धारना नहीं करना चाहता था। उस प्रसंग का विस्तार इस प्रकार है।

  • विष पान- सावन मास में ही समुद्र मंथन हुआ था। संसार की रक्षा के लिए शिव जी ने हलाहल विष पिया और नीलकंठ कहलाए। विष की गर्मी शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल चढ़ाया। तभी से शिवलिंग पर जल अभिषेक की परंपरा शुरू हुई। 
  • माता पार्वती का तप- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए सावन (श्रावण) महीने में सोमवार का व्रत और निराहार रहकर कठोर नियमित तपस्या की थी। उन्होंने बालू (रेत) का शिवलिंग बनाकर उसकी विधिवत पूजा की और अपना यह व्रत पूरा किया था, जिससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था।

एक और पौराणिक कथा इस प्रकार है, जिसके कारण शिव जी सावन माह पसंद है।


(2) ससुराल आगमन -

  • शिव का ससुराल आगमन- मान्यता है कि सावन में शिव जी अपने ससुराल आते हैं, जहां उनका स्वागत जलाभिषेक से होता है।


यह सब कारण हैं, कि क्यों शिव जी को सावन का महीना सर्वप्रिय है।

भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे!

हर हर महादेव!

Sunday, 9 August 2026

India's Heritage : Kanwar Yatra

सावन का पावन माह और कांवड़ यात्रा एक-दूसरे के पूरक हैं। पर क्या महत्व है सावन माह में कांवड़ यात्रा का, उसके क्या नियम हैं, किसने आरंभ की थी और भक्त को क्या लाभ मिलता है इस कठिन यात्रा को कर के?

आज India's Heritage segment में इसी पर चर्चा करते हैं। कांवड़ यात्रा महादेव के अनन्य भक्त निकालते हैं। यह बहुत ही कठिन यात्रा या कहें बेहद कठोर तप है।

कांवड़ यात्रा के दौरान यात्री कांवड़ (लकड़ी का पलड़ा) में कलश रखकर घर से निकलता है, फिर हरिद्वार या बैद्यनाथ धाम पहुंच कर गंगा मैय्या का जल कलश में भरकर महादेव पर जल अर्पित करता है, तत्पश्चात गंगा मैय्या से पुनः जल भरकर अपने घर की ओर आ जाते हैं और जिस शहर में रहते हैं, वहां के शिव मंदिर में जाकर लाया हुआ कुछ जल अर्पित कर देते हैं, शेष अपने घर पर रख लेते हैं। जब अपने शहर के मंदिर में जलाभिषेक करते हैं, उस समय उनके परिवार के सदस्य व बन्धु बांधव भी जुड़कर इस यात्रा का कुछ हिस्सा पुन्य अर्जित कर लेते हैं।

इस यात्रा को वह पैदल चलकर पूर्ण करता है, बहुत से कांवड़ यात्री चप्पल-जूते इत्यादि भी नहीं पहनते हैं, वहीं कुछ कांवड़िए लोग गाड़ियों में भरकर नाचते-गाते हुए भी जाते हैं…

कांवड़ यात्रा


I. कांवड़ यात्रा का कारण :

कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति, तपस्या और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है। इसमें भक्त पवित्र नदियों (विशेषकर गंगा) से जल लाकर सावन मास में शिवजी का जलाभिषेक करते हैं, जिससे शिव जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्ट दूर होते हैं।


II. धार्मिक व पौराणिक मान्यताएं :

  • समुद्र मंथन- कथा है कि समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिवजी ने पिया था। उस विष की उष्णता/गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने उनपर गंगाजल अर्पित किया था।
  • भगवान परशुराम- मान्यता है कि उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत (पुरा महादेव) में शिवजी का जलाभिषेक किया था।
  • लंकापति रावण- शिव भक्त रावण को भी पहला कांवड़िया माना जाता है, जो कावड़ में गंगाजल भरकर ले गया था। 
  • श्रवण कुमार- इन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। 


III. यात्रा के मुख्य नियम :

इस यात्रा के कुछ मुख्य नियम भी हैं, जो इस प्रकार हैं।

  • शुचिता- यात्रा के दौरान पूरी तरह शाकाहारी भोजन, संयम और पवित्रता का पालन किया जाता है।
  • कठिन तप- अधिकांश भक्त नंगे पांव यात्रा करते हैं और कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते।
  • शिव आराधना- पूरे मार्ग में 'बोल बम' के जयकारे गूंजते रहते हैं और भक्त शिवमय हो जाते हैं। 


IV. आध्यात्मिक व धार्मिक लाभ :

अंत मे यह भी जान लेते हैं कि इसका क्या लाभ है? जब इतना कठोर तप है तो इसके धार्मिक लाभ का भी विशेष महत्व है।

  • पापों से मुक्ति- ऐसा विश्वास है कि कांवड़ यात्रा के दौरान उठाए गए हर एक कदम से व्यक्ति के पिछले और वर्तमान जन्म के पाप कट जाते हैं। 
  • मनोकामना पूर्ति- भक्त अपनी किसी विशेष मन्नत या संकल्प के पूरा होने पर यह यात्रा करते हैं और जलाभिषेक के बाद उनकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। 
  • वंश-कुल का कल्याण- इस कठिन तपस्या से न केवल कांवड़िया बल्कि उसके पूरे परिवार और कुल की उन्नति व सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।


V. मानसिक व शारीरिक लाभ :

  • संयम और अनुशासन- लंबी पदयात्रा करने से शरीर में सहनशक्ति, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन की भावना विकसित होती है।
  • नकारात्मकता का अंत- यात्रा के दौरान निरंतर शिव मंत्रों (ॐ नमः शिवाय, बोल बम) के जाप से मन एकाग्र और शांत रहता है।
तो बोलो, हर हर महादेव!

Tuesday, 30 June 2026

India's Heritage : चरण स्पर्श का औचित्य

आज हम India's Heritage segment में भारतीय संस्कृति से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा को discuss करेंगे। 

भारतीय परंपरा में बड़ों से मिलने के लिए विशेष भंगिमाएं हैं, जिन्हें शिष्टाचार का प्रतीक मानते हैं।

पर कभी सोचा है कि यह विशेष भंगिमाएं क्यों? क्या इसके पीछे कोई वजह है? क्या वो वजहें scientific भी हैं?

तो सबसे पहले आप को बता दें कि भारतीय संस्कृति सनातन है, और इसमें किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के पीछे जितना आध्यात्मिक कारण है, उतना ही scientific भी।

आज बात करेंगे चरण स्पर्श की...

चरण स्पर्श का औचित्य


हमारी संस्कृति में बड़े-छोटों सभी को Hi-Hello कहकर नहीं मिला जाता है।

भारतीय संस्कृति में अपने से बड़े (उम्र में या पद में) या शिक्षक हों, उनसे मिलकर अभिवादन का तरीका यह है कि उनके चरणों को स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया जाए। 

आशीर्वाद, किस लिए? उससे क्या हो जाएगा? क्या आशीर्वाद कुछ होता भी है? और क्यों जरूरी है आशीर्वाद लेना?

देखिए, हर बात विश्वास पर टिकी है, मानों तो भगवान, न मानो तो पत्थर। पर सच यह है कि ईश्वर हैं, उनका अस्तित्व है, उनकी supreme power है। संसार को वही चला रहे हैं।

उसी तरह आशीर्वाद है, उसमें असीम divine power है, और जिनके पास अपने बड़ों का आशीर्वाद रहता है, वह अधिक सुखी और संतुष्ट रहते हैं।

भारतीय संस्कृति में सृष्टि में व्याप्त हर एक को एक विशेष स्थान दिया गया है।

फिर हमसे जुड़े रिश्ते तो सर्वोपरि हैं, फिर वो चाहे मां-पापा का हो, गुरु का हो, या हमसे जुड़ें किसी भी बड़े का, उन सबका स्थान ईश्वर के बाद, सर्वाधिक वंदनीय माना गया है।

अब जान लेते हैं कि चरण स्पर्श करने का scientific effect क्या होता है।

भारतीय संस्कृति में बड़ों के ‘चरण स्पर्श’ (पैर छूने) की परंपरा केवल संस्कार या शिष्टाचार नहीं है, बल्कि इसके पीछे deep physical, mental और scientific importance भी है। यह प्रक्रिया energy level को balance करने और विनम्रता विकसित करने में मदद करती है।


Scientific Effects :

  • Energy Flow and Circuits- Scientifically, human body में neuro-electric energy का flow लगातार होता रहता है। इसमें brain को North Pole और पैरों को South Pole माना जाता है। जब कोई व्यक्ति बड़ों के चरण छूता है, तो उसके हाथ और सामने वाले के पैर मिलकर एक Energy Circuit complete करते हैं, जिससे positive energy का flow होता है। Positive energy मतलब सब कुछ अच्छा।
  • Blood Circulation- जब चरण स्पर्श किया जाता है, तो जिस posture में झुककर आशीर्वाद लेते हैं, उससे (जैसे घुटनों के बल बैठकर या झुककर) blood flow सिर और चेहरे की ओर तेजी से बढ़ता है। इससे brain function बेहतर होता है और आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
  • Mental Peace and Balance- जब चरण स्पर्श किया जाता है, तो जिस posture में झुककर आशीर्वाद लेते हैं, उससे झुकने की मुद्रा हमारे अहंकार को कम करती है। Psychological perspective से, यह अभ्यास, हमें mental peace और emotional balance प्रदान करता है, जो overall mental health के लिए लाभदायक है।
  • Pressing of Accupressure Points- पैरों के अंगूठे और तलवों में ऊर्जा केंद्र होते हैं। हाथों से पैर छूने पर ये accupressure points active हो जाते हैं, जो nervous system को आराम देने में सहायक होते हैं। अर्थात् आप के चरण स्पर्श से आपके बड़े को शारीरिक रूप से आराम मिलता है। 

और इन सबसे प्रसन्न होकर उनके मन के भीतर से आपको आशीर्वाद मिलता है, जिसमें आपके शुभ की, आपकी सफलता की, आपकी सुख, समृद्धि, शांति और सुकून की कामना होती है, और जब कामना मन के प्रसन्न होने से की जाती है, तो वो शत-प्रतिशत पूर्ण होती है।

पर यह परंपरा कुछ-कुछ भारतीय घरों से विलुप्त होने लगी है, जो कि नहीं होनी चाहिए। 

जो उचित न हो, अत्यंत कष्टकारी हो, और जिससे कोई लाभ न हो, उसे discard किया जाए, समझ आता है। पर जो सरलतापूर्वक हो जाए, उससे scientifically, psychologically, emotionally और spiritually लाभ मिलता हो, उस परंपरा को कायम रखने का औचित्य है।

चरण स्पर्श का औचित्य है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहे, इसकी जिम्मेदारी हमारी है, कि जो सुख और संतोष हमें मिला, वो हमारे बच्चों को भी मिले।

जय सनातन संस्कृति!

Saturday, 20 June 2026

India's Heritage : जामुन की बहार, वर्षा कम इस बार

आज India's Heritage segment में एक ऐसी बात share कर रहे हैं, जिसे पढ़कर शायद आप को लगे कि यह India's Heritage कैसे है।

तो पहले उसे ही clear करते हैं, कि पहले जमाने में लोग पढ़े-लिखे उतने नहीं होते थे जैसे आज हैं।

पर उनके अनुभव का ज्ञान इतना अधिक था, जिससे वो बिना पढ़े-लिखे ही आज से अधिक सक्षम थे, अपने सभी कार्यों को सुचारू रूप से करने में।

वैसे यह ज्ञान आज भी बड़े-बूढ़े और ग्रामीण इलाकों में लोगों के पास मौजूद है।

तो उसी अनुभव का सार है, आज की यह India's Heritage segment की post…

जामुन की बहार, वर्षा कम इस बार


“जामुन ज़्यादा तो बारिश कम”, यह एक लोकप्रिय पारंपरिक कहावत है जो बताती है कि यदि जामुन का bumper उत्पादन हो, तो यह उस क्षेत्र में सूखे या कम बारिश का संकेत हो सकता है।

दरअसल प्रकृति में कुछ जीव ऐसे हैं, जिन्हें मौसम का पूर्वानुमान हो जाता है, जैसे चातक, पपीहा और मोर।

ऐसे ही वनस्पतियों में जामुन के वृक्ष को भी मौसम का पूर्वानुमान हो जाता है।

बारिश से पहले ही जामुन की भरमार, जानकार लोगों में इस बात से मौसम को लेकर बेचैनी बढ़ गई है।

इस पारंपरिक मान्यता और इसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बारे में आइए अधिक जानते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से इस मान्यता को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है।

  • Stress Fruiting- Botany में इसे कभी-कभी “Masting” या तनाव फलना कहा जाता है। 
  • Survival Instinct- जब पेड़ों को जमीन के नीचे नमी या पानी की कमी महसूस होती है, तो वे खतरे को भांप लेते है। अपनी species को बचाए रखने के लिए पेड़ अपनी सारी energy अधिक से अधिक फल (जैसे जामुन) पैदा करने में लगा देते है।
  • Direct Connection- इसलिए, बहुत ज्यादा जामुन का आना वास्तव में आने वाले मौसम में पानी की कमी या सूखे की ओर इशारा कर सकता है।

जामुन के वृक्ष का ऐसा इशारा चिन्ता का विषय है…

Saturday, 16 May 2026

India's Heritage : महायोग दुःख-कष्ट निवारण का

16 मई का यह दिन बहुत ही शुभ योग लेकर आया।

जैसा कि आप जानते होंगे, कि अमावस्या में बरगद अमावस्या (वट सावित्री अमावस्या) को सबसे शुभ और सबसे बड़ी मानी गई है।

फिर इस अमावस्या के साथ सुहाग का इतना बड़ा पर्व भी जुड़ा हुआ है, अतः यह सबसे फलदाई भी मानी‌ जाती है। इस बार संयोग यह है कि साथ में शनि जयंती भी है।

महायोग दुःख-कष्ट निवारण का


शनि जयंती :

हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को पड़ता है। इस साल शनि जयंती 16 मई को मनाई जा रही है।

  • दुर्लभ संयोग- शनि जयंती शनिवार के दिन ही पड़ने के कारण इसे बेहद शक्तिशाली और शुभ माना गया।
  • ज्योतिषीय महत्व- कर्म और न्याय के देवता शनि देव को समर्पित इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और दान से साढ़े साती और ढैय्या के कष्टों से मुक्ति मिलती है।
  • पूजा और उपाय- इस दिन शनि मंदिरों में तेल चढ़ाने, व्रत रखने, हनुमान चालीसा का पाठ करने और गरीबों को दान देने का विधान है।


पूजा की विधि :

सबसे पहले घर पर पोछा कराते समय पानी में नमक डाल कर पोछा लगवाएँ। अगर आप की maid जा चुकी है, तो आप एक mug में पानी लेकर उसमें नमक डालकर मिलाएं। इस पानी को दहरी (जहां-जहां घर में दरवाजे हैं) पर छिड़क कर पोंछ दीजिए।

नमक वाले पानी का पोछा आप प्रत्येक शनिवार को भी लगवा सकते हैं, इससे negativity घर में नहीं आती है और सब शुभ होता है। उसके पश्चात व्रत रखकर वटवृक्ष के नीचे जाकर या वटवृक्ष की डाल को घर में लाकर विधिवत पूजा कीजिए।

 पूरी पूजा विधि के लिए link पर click करें- वट सावित्री या बरगद अमावस्या व्रत

अगर आप के घर पर वटसावित्री व्रत नहीं किया जाता है, तब भी आप वटवृक्ष को जल अवश्य चढ़ाएं, इससे भी शुभ फल मिल जाएगा।

इस व्रत के प्रभाव से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है, साथ ही पति-पत्नी का सुख-समृद्धि के साथ जीवन-यापन होता है और दोनों को एक-दूसरे का प्यार से परिपूर्ण साथ मिलता है।

शनिवार हनुमानजी का भी दिन माना जाता है, फिर ज्येष्ठ मास, हनुमान जी की पूजा का विशेष माह माना गया है। अतः सुन्दरकाण्ड पाठ, हनुमान चालीसा पाठ और हनुमान जी की आरती, इनमें से आप कुछ भी अवश्य कीजिए, यदि आप तीनों कर लें तो आप पर विशेष कृपा होगी।

हनुमान जी संकटमोचन हैं, हर तरह के दुःख-कष्ट निवारण के देवता। अतः जिसने इन्हें अपना इष्ट देव बना लिया, उसके तो सभी दुःखों का हरण करने के लिए वो खुद तत्पर रहते हैं।

शाम के समय में मंदिर जाकर हनुमान जी और शनिदेव के दर्शन करें, सरसों का तेल चढ़ाएं, दीया जलाएं व सुहाग के सामान, पांच फल (खरबूजा, तरबूज, खीरा, आम व केला), मेवा, मिठाई, पंखों आदि का दान कीजिए।

अगर आप के घर में शनि के तेल का दान मांगने या नींबू मिर्ची लगाने के लिए लोग आएं तो विशेष रूप से करें। रात्रि में 8 बजे पीपल के वृक्ष पर जल व तेल चढ़ाएं और दीया जलाएं। 

सभी विधि दुःख-कष्ट निवारण हेतु किए गए प्रयास मात्र हैं, इन्हें करने से सुख समृद्धि के योग बनते हैं। 

पूरा करना, आधा करना या नहीं करना आपकी इच्छा है। ईश्वरीय आराधना, ईश्वर तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया होता है, पर पूर्ण फल हमारे कर्म और ईश्वर की कृपा पर निर्धारित होता है।

जय हनुमान जी, जय शनिदेव जी, जय वटवृक्ष! आप सभी हम सब के सभी दुःखों का निवारण कर सुख प्रदान करें।