Showing posts with label Memories. Show all posts
Showing posts with label Memories. Show all posts

Tuesday, 9 January 2024

Memories : अंगीठी - एक मीठी याद

इस बार ठंडक कुछ ज्यादा ही पड़ रही है या यूं कहें कि हर साल ही ऐसा लगता है, जैसे इस साल सबसे ज़्यादा ठंड पड़ रही है।

खैर बरहाल, सोचने वाली बात यह रहती है कि ठंड दूर कैसे की जाए। 

वैसे आज कल तो घर-घर में heater, room blower है... वही हमारे यहां भी...

आज ऐसे ही कुछ देखने के लिए Google बाबा की याद आई, और बस उस देखा-देखी में एक के बाद एक चीजों की लड़ी सी बनती गई।

और देखते-देखते, नज़र पड़ गई अंगीठी पर...

अंगीठी बिक रही हैं और वो भी online???

सच ऐसे ही विस्मित हो गये थे हम भी, पर खैर क्या नहीं है, जो आपको online में नहीं मिल रहा।

पर उन अंगीठियों को देखकर मन पंख लगाकर बचपन की ओर उड़ चला। एक मीठी सी याद बन कर...

अंगीठी - एक मीठी याद

हमारे बचपन में तो कोई घर ऐसा नहीं होगा, जिनके पास अंगीठी ना हो। 

बहुत से लोगों के घर में तो अंगीठी पर खाना भी बनता होगा शायद, पर हमारे यहां तो हमने अपनी मम्मी, दादी, चाची, नानी, मौसी, मामी... किसी को भी चूल्हे, स्टोव, अंगीठी, heater, किसी पर खाना बनाते नहीं देखा, सभी gas use कर के ही खाना बनाते थे।

पर एक अंगीठी थी, हमारे यहां, जो पूरे साल बड़े एतिहाद से रखी जाती थी और उसका उपयोग ठंड की शामों में ठिठुरन मिटाने के लिए किया जाता है।

एक सच बात बताएं, आप लोगों को, जब वो जलती थी तो feeling बिल्कुल bonfire वाली ही आती थी।

आज कल जैसे हम अपने मां-पापा की एकलौती या दो संतानों जैसे नहीं थे। हम चार भाई-बहन थे। दो भाई और दो बहन... और एक बात, हम चार से, हम लोगों को जितना आंनद आता था, और लोगों को हमें देखकर उतनी ही ईर्ष्या होती थी। 

कारण पता है क्या था? हम दोनों भाई-बहन जोड़े से थे, इसलिए हम लोगों घर पर हों या बाहर हमें किसी और की कभी आवश्यकता ही नहीं महसूस होती है। ऐसा लगता था, ईश्वर ने हमें complete बना कर भेजा है। 

उस पर सोने पर सुहागा यह कि शौक-पसंद भी हम लोगों के मिलते-जुलते थे...

खैर फिलहाल अभी अंगीठी पर ही लौटते हैं। हां तो बस शाम होती और कोई ना कोई भाई-बहन बैठ जाता, शाम की गर्माहट बढ़ाने की तैयारी में...

पापा जी ने तो खूब सारे, लकड़ी के, पत्थर के कोयले खरीद कर रख दिए थे। 

घर में एक बड़ा सा खुला आंगन था, बस वहीं बैठ कर अंगीठी जलाया करते थे।

और हम लोगों में से जो कोई उसे जलाने बैठता था तो बड़ी तेजी से उसे जलाने के जतन करता था और जब वो अपनी आंच पर आ जाती थी तो ऐसी अनुभूति होती थी, मानों किसी अड़ियल घोड़े को काबू में कर लिया हो। अंगीठी जलाना कोई हंसी-खेल नहीं होता है...

पर हम सब भाई-बहन में सबसे अच्छी अंगीठी, छोटा भाई जलाता था। जब वो अंगीठी सुलगा कर कमरे में लाता था, बहुत तेज आंच और धुआं एक रत्ती का नहीं। बहुत ज्यादा आनंद आ जाता था। उसके छोटे-छोटे हाथ कमाल का काम करते थे। 

बहुत ही सुहाने दिन थे, उस ज़माने में लोगों के पास व्यस्तता उतनी ही थी, जितनी होनी चाहिए थी और अपनों के लिए समय भी उतना ही जितना आवश्यक होता है।

पूरा परिवार उस अंगीठी के ताप से जगमगा उठता था, और, उसी दौरान, गर दौर मूंगफली का चल जाता था तो कहना ही क्या, मूंगफली के छिलके कमाल ही कर देते थे।

रिश्तेदारों का भी आना-जाना लगा ही रहता था, जो सुख में चार-चांद लगा दिया करता था..

उस ज़माने में जिंदगी, जिंदगी थी, आज जैसी नहीं जिसमें सिर्फ भाग-दौड़ और झूठा छलावा है, busy रहने और busy दिखाने का... 

बहुत याद आता है, अंगीठी का ताप और अपनों का साथ... पापा जी के चले जाने से, वो साथ, अब वैसे भी कभी संभव नहीं है!...

और ना संभव है अंगीठी का ताप...

अब आप कहेंगे कि वो क्यों? पूरा लेख लिख डाला अंगीठी पर, और ताप संभव नहीं...

वो क्या है ना हमारे घर में राज्य पति-महाराज का ही है, और पतिदेव एक धूपबत्ती, अगरबत्ती तक तो जलाने नहीं देते हैं, वो अंगीठी तो क्या ही जलाने देंगे.... 

हम नहीं अंगीठी का मज़ा ले सकते हैं तो क्या? उसकी याद और उसके सुख का उल्लेख तो कर ही सकते हैं और उसकी स्वतंत्रता उनकी तरफ से भी है... तो क्यों ना खुशी ले लें...

जो नहीं मिला रहा, उसके लिए दुःखी होने से अच्छा है जो मिल रहा है, उसके लिए प्रसन्न रहें, खुश रहें, जिंदगी जीना आसान होता है...

वरना ग़म तो ज़माने में ग़ालिब किस को नहीं है?....

खैर छोड़िए वो सब, वापस अंगीठी पर आते हैं..

आज जब अंगीठी देखी, और उसके भाव देखे तो लगा कि ऐसा भी क्या है, जो अंगीठी के भाव इतने बढ़े हुए है?.. तो देखा कि एक से एक ख़ूबसूरत design थी, कल की जरूरत आज के antique items में से एक है। बहुत से घरों में उसे antique and elegant का मान भी मिला हुआ था, लोगों के drawing room की शोभा है, अंगीठी। आज उसे बेहद उम्दा ashtray के रूप में present किया जा रहा है।

वैसे आज भी किसी को अगर अंगीठी में interest हो तो एक से एक अंगीठी हैं, multipurpose हैं, आपकी आंखों को धुआं ना लगे, ऐसी भी हैं। हां उनके दाम जरूर ज्यादा हैं। पर शौक तो शौक है, वो दाम कब देखता है... 

हम तो कहेंगे कि आज भी जिनके घर में अंगीठी है, वो सौगात है, खुशियों के दिनों की... आनंद ले, उसके साथ बस ठंड का, अंगीठी के ताप का और उसके multipurpose use का...

पर हां, एक बात का ध्यान हमेशा रखिएगा कि जली हुई अंगीठी, या जिस किसी भी चीज़ में आप आग जला रहे हैं, वो जितना सुख गर्माहट देकर देती है, जब वो बुझने लगती है तो उतनी ही खतरनाक हो जाती है, क्योंकि तब वो carbon monoxide, produce करने लगती है, जो कि जानलेवा होती है इसलिए अंगीठी बुझने लगे तो उसे खुली जगह में रख देना चाहिए। 

सुखी रहिए, पर सावधानी के साथ...

Friday, 3 November 2023

Memories : Sanchita - संचय जीवन का

21 October को हमारी प्यारी दोस्त संचिता हम से इतनी दूर चली गई, जहां ना चिट्ठी भेजी जा सकती है ना कोई संदेश.... 

आज उसकी याद में, उसकी श्रद्धांजलि में यह लिख रहे हैं। पर यह इसलिए नहीं लिख रहे हैं, क्योंकि वो हमारी दोस्त थी या उसने इतनी जल्दी अलविदा कह दिया...

नहीं बिल्कुल नहीं... 

क्योंकि जाना तो सब को ही है, आगे-पीछे... पर जो अपने पीछे, अपनी पहचान छोड़ जाएं, जिंदगी बस उसी की है, बाकी सब तो बस नम्बर हैं...

हम आज इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि वो एक मिसाल थी, एक प्रेरणा थी, उसने अपने नाम को सार्थक किया था, संचिता.. जिसने जिंदगी के इतने सालों में ही जीवन संचय कर लिया था। 

Sanchita - संचय जीवन का 

कैसे बताते हैं आपको... 

आप सभी को super hit movie सफ़र तो याद ही होगी, उसमें राजेश खन्ना ने एक ऐसे पात्र को निभाया था, जिसे blood cancer  था, पर वो बहुत जीवन्त था और ज़िन्दगी के हर लम्हों को जीभर कर जी लेना चाहता था।

उसका एक बहुत hit dialogue था, बाबू मोशाय, जिंदगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिए.... 

पर पर्दे पर यह किरदार निभाना और बड़े बड़े dialogue बोलना बहुत आसान होता है, लेकिन अगर वो आपकी जिंदगी की वास्तविक हो तो, शायद....

पर इसी वास्तविकता को जिया था, संचिता ने...

उसे जब पहली बार blood cancer के बारे में पता चला था तो वो पूरी तरह हिल गई थी, इतनी बड़ी बात सुनकर कौन स्थिर रह सकता है?  पर बहुत जल्दी वो संयत हो गई थी।

उसे अपने आप पर, अपने पति, अपने परिवार और doctors पर पूर्ण विश्वास था। 

Cancer का treatment easy नहीं होता है, उसकी पूरी process बहुत painful होती है, trauma में ले जाने वाली होती है। फिर उसका cancer कोई organ specific नहीं था कि उस organ को निकाल देने से easily cure हो जाता... उसे blood cancer था, जो cure के point of view से सबसे difficult होता है।

First stage पर cancer था, treatment शुरू हो गया। और साथ ही सारी problems and intolerable  pain भी...

पर वो उन सबसे लड़ी और हमारी वीरांगना ने जीत हासिल ली। 

उन पलों में उससे जिसने भी बात की, सब यही कहते थे कि हम से ज्यादा तो वो healthy and lively sound करती है। 

हम सब 12th तक एक साथ थे, उसके बाद कौन कहां, किसी को नहीं पता.... क्योंकि जब हमने school छोड़ा था, तब ना Facebook था ना ही कोई WhatsApp और insta, etc...

वो हम लोगों के लिए वो डोर साबित हुई, जिसने हम सब बिखरे मोतियों को समेट कर दोस्ती के अटूट बंधन में फिर से जोड़ दिया... हम सब सहेलियों का दिल एक बार फिर से एक दूसरे के लिए धड़कने लगा...

उसके ठीक होने के चंद सालों बाद ही कोरोना का कठिन समय शुरू हो गया था। इस समय अच्छे अच्छे लोग की हिम्मत पस्त हो गई थी। घर में ही कैद होकर रहना और सारे काम खुद करना लोगों को बेचैन कर रहा था। लोग रोज खाना भी नहीं बनाना चाह रहे थे। 

पर ऐसे में हमारी प्रिय सखी, 56 भोग और पूरे उत्साह के साथ इस कठिन समय के साथ भरपूर जी रही थी। कचौड़ी, चाट, घेवर, जलेबी, इमरती, बालूशाही जैसी ना जाने और कितनी, dishes बना कर वो अपने परिवार को खिला रही थी, अपने परिवार के हर दिन को खुशनुमा बना रही थी। उसकी कुछ dishes मेरे blog पर भी है, उसकी अमिट छाप और मीठी याद बनकर... 

Instant Jalebi 

Instant Imarti

साथ ही इन दिनों उसने हम सब दोस्तों से भी खूब बातें की और हम सब को भी उत्साहित और प्रेरित किया...

चांद सालों बाद कोरोना का खौफ नगण्य हो गया और सब अपनी अपनी जिंदगी में व्यस्त और खुशहाल हो गये... 

किस को खबर थी कि आने वाला वक्त अपने संग अनहोनी लेकर आया है.. 

यह समय उसके लिए, एक बार फिर से काल बनकर आया....

उसे फिर से blood cancer detect हो गया। इस बार situation और गम्भीर रूप लेकर आयी। अबकी बार bone marrow transplant की जरूरत थी।

पर डर उसके चेहरे पर लेश मात्र भी नहीं था। उसने सबके साथ बहुत किया था, तो सब उसके लिए खड़े थे।

उसकी बहन से उसका bone marrow match कर गया और transplant की सब तैयारी भी हो गई। 

एक बार संचिता को फिर भयंकर दर्द का सामना करना था और सब कुछ हाथ से छूटने का अहसास भी, साथ ही hospital में isolated रहना भी....

पर उसने हिम्मत नहीं हारी और एक बार फिर केंसर को हरा दिया। 100% bone marrow transplant हुआ। 

वो वापस घर लौट आई, पूरी जिंदादिली के साथ, full confidence के साथ...

उसे दवाइयों के साथ तीन महीने गुजारने थे, जिनके बाद वो पूरी तरह से ठीक हो जाती... सब सही भी चल रहा था....

पर इस जिंदगी की लड़ाई के बस एक हफ्ते पहले वो फिर से बीमारी के चक्रव्यूह में फंस गई और इस बार वो उस चक्रव्यूह को भेद नहीं पाई और उस लोक में चली गई, जहां से वापस लौटना असंभव था।

और पीछे छोड़ गई, अपने प्यारे परिवार और हम सब को, यह कहते हुए...

रहे ना रहे हम, महका करेंगे.... 

उसने जिंदगी के कम सालों में भी, जीवन को कैसे जिया जाता है, सबको सीखा दिया... 

कि ज़िन्दगी के हर पल को भरपूर जीएं, दुःखी होकर, डरकर नहीं, बल्कि डटकर, पूरे confidence के साथ, एक एक लम्हे को खुशी की वजह बनाकर... यही है जो मौत को भी हरा सकता है...  उसके आने से पहले बहुत कुछ कर गुजरने का नाम जीवन है। 

उसने जीवन को संचय करना सीखा दिया। सच में वो अपना नाम सार्थक कर गई, संचिता- संचय जीवन का..

हे ईश्वर आप से प्रार्थना है कि उसे आप अपने साथ स्वर्ग में स्थान देना, वो उसके लिए ही बनी है...

और साथ ही आपसे से यह करबद्ध निवेदन है कि आप सभी को जिंदगी इतनी लम्बी अवश्य दीजिए कि वो अपने सब कर्तव्य पूर्ण कर के जाए और इतनी सामर्थ्य भी कि हम अपनी जिंदगी को बड़ी भी बना सके... 

संचिता तुम हमेशा हम लोगों के साथ रहोगी, एक प्रेरणा बनकर, मीठी सी याद बनकर...

Friday, 15 September 2023

Memories : वो वक्त कुछ और था

वो वक्त कुछ और था

आज सुबह News देखने के लिए TV on किया तो सीधे news channel ना लगाकर channels बदल-बदल कर news channel तक जा रहे थे।

Channel बदलते-बदलते DD National channel आ गया। हम उसे भी बदलते उससे पहले ही उसमें आया कि आज दूरदर्शन स्थापना दिवस है। 

यह देख कर मन उन दिनों में पहुंच गया, जब सबके घरों में सिर्फ और सिर्फ एक ही channel आता था। DD National.

दूरदर्शन की स्थापना आज के ही दिन (15 September) सन् 1959 में दिल्ली में हुई थी। और 25 April 1982 में coloured TV channel आया था, जिसकी स्थापना मद्रास में की गई थी। आज दूरदर्शन को स्थापित हुए 64 साल पूरे हो गए हैं।

दूरदर्शन एक अकेला ऐसा channel है‌ जो government द्वारा संचालित किया जाता है। 

यही वो सबसे पहला channel है, जिसने black and white से coloured होने तक का सफर तय किया है।

उस समय हर घर में धीरे-धीरे रेडियो से टेलीविजन आने का दौर था।  या कहिए audio के साथ video भी देखे जाने का दौर.. हम लोगों को, घर में रहकर मनोरंजन का मजा कैसे लिया जाए, उसको सिखाने का सारा श्रेय, दूरदर्शन का ही है। 

पर फिर भी सबके घरों में TV नहीं था, इसलिए TV देखने जाना भी अलग ही खुशी देता था। और जिस दिन TV अपने घर आया था, उस दिन की खुशी तो पूछिए ही मत, वैसी खुशी तो आजकल का LED TV आने पर भी नहीं देता है। 

दूरदर्शन एक अकेला channel था, जिसका उस समय एक छत्र राज था। पर क्या नहीं था, जो उसमें ना आता हो, news, हिन्दी व English दोनों भाषाओं में, मूक-बधिर लोगों के लिए भी, कृषि दर्शन, संस्कृतिक कार्यक्रम स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम, फिल्म, हिन्दी, English, प्रादेशिक भाषाओं में, फिल्मी गाने, बहुत सारे zoner के serials, बच्चों से बुजुर्ग तक, पुरुषों से महिलाओं तक सबके लिए ही, वो भी एक से एक बेहतरीन, TV पर आने वाले सभी कार्यक्रम ऐसे होते थे, जिन्हें पूरा परिवार तो क्या पूरा मौहल्ला एक साथ देखता था। 

एक TV, एक channel और remote... Remote तो था ही नहीं, TV का remote तो हम में से ही कोई एक हो जाता था, जिसे TV बंद करना और खोलना होता था, क्योंकि channel बदलने का तो कोई स्यापा ही नहीं था ना... 

उस समय के सभी कार्यक्रमों की दो विशेषता थी, एक तो fix time और दूसरा बहुत ही सुकून के साथ बनाए जाते थे तो उन्हें देखने के लिए time की punctuality and discipline रहना जरूरी होता था, क्योंकि जो program छूट जाता था तो वो फिर एक हफ्ते बाद ही देखने को मिलता था। सुकून से बना था तो उन्हें देखकर  सुकून भी मिलता था। 

उस समय TV देखना मात्र, entertainment or time pass नहीं था, बल्कि pleasure time or family time होता था।

उस समय के एक-एक program classic थे, फिर वो चाहे news हो या serials, रंगोली, चित्रहार, फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, show theme, star trek, कच्ची धूप, रामायण, महाभारत, शक्तिमान, हम लोग, बुनियाद, विक्रम-बेताल, सिंहासन बत्तीसी, नुक्कड़, सुरभि, पोटली बाबा की, ब्योमकेश बख्शी, करमचंद, मालगुडी डेज, चंद्रकांता, सर्कस, फौजी, दादा-दादी की कहानियां, इन जैसे और भी बहुत सारे अच्छे-अच्छे programs.... जिन्हें देखकर हमारा स्वर्णिम बचपन बीता, वो वक्त कुछ और था...

पर जब हम लोग छोटे ही थे, तभी बहुत से private channels जैसे Zee TV, Star Plus, Sony, etc... भी आने शुरू हो गये थे। अब हम किसी भी दिन और किसी भी समय कोई सा भी program देख सकते थे। 

पर इतनी variety और no time boundation के कारण धीरे-धीरे entertainment का वो charm कहीं धूमिल हो गया।

अब घरों में number of Televisions , number of  TV channels थे। सब remote पर अपना control चाहते हैं। नतीजा मोहल्ला तो छोड़ दीजिए, अब परिवार के सभी सदस्य भी एक साथ TV नहीं देखते हैं।

एक पते की बात बताएं, सच्चा सुख साधनों की कमी में ही ज़्यादा होता है क्योंकि कुछ थोड़ी सी कमी, आपसी रिश्तों में नजदीकी ला देती है। क्योंकि जब कम होता है तो सबका ध्यान रखना ज़्यादा होता है कि कहीं कोई वंचित ना रह जाए।

In short साधन कम था, channel एक ही था, पर उसमें सबको सबकी पसंद का और बहुत अच्छा content कैसे दे दिया जाए, रिश्तों को कैसे आपस में समेट लिया जाए, जिसे आता था बस वही था दूरदर्शन... हमारा खूबसूरत बचपन...

दूरदर्शन दिवस पर उसके 64th birthday की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 

आज भी आता है दूरदर्शन, पर अब हम सिर्फ 15 August, 26 January और किसी राष्ट्रीय उपलब्धि में ही उसे देखते हैं, यह जानते हुए भी कि आज भी कहीं-ना-कहीं दूरदर्शन ही है जो संस्कार और संस्कृति देने में सक्षम है, सर्वश्रेष्ठ है.. 

पर क्या कभी हम लौट चलेंगे, अपने देश के पहले channel की तरफ, अपने बचपन की तरफ़... उस वक्त की तरफ जो कुछ और ही था... सुकून, प्रेम और अनुशासन से भरा, साधनों को पाने की अंधी दौड़ में जो शामिल नहीं था..😊

Wednesday, 10 May 2023

Memories : वो दिन

वो दिन  


कल गाज़ियाबाद में निकाय का election होना है, इसलिए अलग अलग पार्टी के नेता अपने चुनाव का प्रचार प्रसार कर रहे हैं।

सभी नेताओं के आदमी, लाउडस्पीकर ले, जीप में बैठ कर उनके नाम व उनके चुनाव चिह्न के विषय में सबको बताते हुए जा रहे थे।

उनके प्रचार प्रसार को देखकर, हम पहुंच गए अपने बचपन में...

तो इस बात का किस्सा कुछ यूं है कि..

हमारे पापा जी,  Allahabad (Prayagraj)  University से PhD करने आए थे।

इलाहाबाद में ही हमारा ननिहाल है, तो हम लोग वहीं रह रहे थे।

नाना जी का घर, allahabad university के science department के एकदम पास है। 

और जैसा कि आप सब जानते हैं कि Allahabad University, नेताओं की जन्मस्थली या गण है। दूसरे शब्दों में कहें तो allahabad university की सरजमीं से बहुत से नेताओं का उद्भव हुआ है।

तो बस आए दिन चुनाव के प्रचार प्रसार होते ही रहते थे। पर उन दिनों के प्रचार-प्रसार ही अलग थे।

निकलते तो वो लोग भी जीप में या ट्रक में होते थे, पर उनमें एक खासियत थी। 

वो लोग जब सड़क से गुजरते थे तो वो 5 or 10 रुपए के नोट के जैसे बहुत सारे रंगीन कागज़ उड़ाया करते थे।

वो कागज़, पीले, गुलाबी, हरे, नीले बहुत से रंगों के light shade के होते थे। 

जिसमें बहुत भीनी-भीनी, और तेज खुशबू होती थी। यह खुशबू, हर कागज़ में अलग तरह की होती थी। 

उस कागज़ में नेता का नाम और उसका चिन्ह अंकित रहता था, फिर भी कागज़ के रंग और खुशबू से‌ भी यह निर्धारित रहता था कि फलां कागज़, फलां नेता का है। 

पर हम बच्चे, हमें क्या कि कौन से नेता का कौन सा कागज़ है। 

अब आप कहेंगे कि, तो इस याद का जिक्र क्यों? 

क्योंकि हमें इससे बात से तो कोई मतलब नहीं रहता था, कि किस नेता का कौन से रंग का कागज़ का टुकड़ा है। पर कागज़ के टुकड़े!..

उन कागज़ के टुकड़ों के तो हम सब दीवाने थे। जैसे ही प्रचार प्रसार की आवाज़ आती, हम सब बच्चे दौड़कर घर से बाहर होते थे।

क्योंकि हमें वो कागज़ के टुकड़े चाहिए होते थे, वो भी ज़मीन में गिरने से पहले...

तो बस, वो लोग उड़ाते थे और हम लोग लपकते थे। वो एक बार में ही 50-60 के करीब कागज़ के टुकड़े उड़ा दिया करते थे और उनमें से 5- 10 हमारे हाथ लग जाया करते थे। बाकी जमीन पर गिर जाया करते थे, जिन्हें कुछ और लोग उठा लिया करते थे।

पुष्पा में तो यह dailog बहुत बाद में आया, पर हमारा तो बचपन से ही यही उसूल था " झुकेगा नहीं...

अब आप को बताते हैं कि आखिर क्यों था, इतना craze, उन रंगीन कागज़ के टुकड़ों का? 

जब हम छोटे थे तब, हम सभी बच्चों को अपनी कापियों में बहुत कुछ रखने का बड़ा शौक हुआ करता था। शायद आप को भी याद होगा, अपने बचपन का वो शौक...

उन दिनों चिड़ियों के रंगीन पंख अगर मिल जाते थे, तो उनका तो कहना ही क्या... उनको हम विद्या कहते थे और बहुत जतन से रखते थे, याद आया?..

हाँ तो, उन रंगीन कागज़ के खुशबूदार टुकड़े, हम लोग अपनी कापियों में ही रखते थे। इस बात का विशेष ध्यान रखकर कि, एक काॅपी में, एक ही तरह के खुशबू के कागज़ रखें।

उससे होता यह था कि हमारी सारी कापियां अलग-अलग खुशबू से महकती थीं। 

जब हम स्कूल जाते थे तो जिन बच्चों के घर की तरफ यह कागज़ नहीं उड़ाए जाते थे, वो हमारी खुशबूदार कापियों की बहुत तारीफ करते, तो हमें उससे बहुत गर्वानुभूति होती थी।

आज भी बहुत याद आते हैं, वो दिन... रंगीन और खुशबूदार, खुबसूरत बचपन के वो दिन...

आपको भी याद आ गए होंगे, अपने बचपन के रंगीन और खुबसूरत वो दिन...

याद आ गये ना?

Thursday, 9 March 2023

Memories: त्यौहार सिमट गये

त्यौहार सिमट गये 

आज सुबह जब खिड़की खोली, तो आसमान का रंग कुछ ऐसा था, जो बरबस ही यादों के झरोखे में ले गया।

यूं तो हर त्यौहार की अपनी अलग ही विशेषता होती है, पर हम हिन्दुओं में होली और दीवाली की अधिक महत्ता होती है।

बात बचपन की है। तब हम चारों भाई-बहनों को होली कुछ ज्यादा ही आकर्षित होती थी। आप कहेंगे कि बच्चों में रंग खेलने की इच्छा बलवती ही होती है।

जी, बिल्कुल सही कहा आपने, पर इसके साथ इससे भी बड़ा कारण था, हम लोगों के बड़े चाचा-चाची और छोटी बहन का आना होता है।

उन लोगों के आने से त्यौहार में चार चांद लग जाते थे। और हम सब बच्चे चले जाते थे, अपने dreamland में...

उसका भी एक कारण था, चाचा की बेटी की सारी इच्छा पापा-मम्मी पूरी करते थे। और हम लोग की चाचा-चाची.. तो अगर देखें तो हम पांचों भाई बहन के वो दिन स्वप्निल हो जाते थे। 

मतलब अपने-तुम्हारे की भावना से ऊपर हमारे के भाव में रहा करते थे हम लोग...

होलिका दहन के दो दिन पहले से लेकर, होली खेलने और उसके बाद दूज के और दो दिन बाद तक बस मस्ती मज़ा और धमाल..

मम्मी और चाची का मिलकर होली के पकवान बनाना, चाचा का कलात्मक तरीके से गुजिया गोंठना... कभी भूलेगा ही नहीं..

फिर दूज के दिन, रूचना-टीका के बाद चाचा-चाची का हम लोगों का फिल्म दिखाने ले जाना, वो तो जैसे सोने पर सुहागा ही हो जाता था...

उन लोगों ने हम लोगों को खूब फिल्में दिखाईं, सब बहुत अच्छी थी, लेकिन जो सबसे अच्छी लगी थी, वो थी मैंने प्यार किया

Undoubtedly वो फिल्म बहुत अच्छी थी, पर उसमें भी एक खास कारण था, जो वो विशेष पसंद थी।

हुआ यह था कि जब हम लोग पहुंचे थे तो, फिल्म शुरू हो चुकी थी। जैसे ही हम लोग picture hall  में पहुंचे, उसमें आलोकनाथ कहता है सुमन, और भाग्यश्री पलटती है, सुमन नाम सुनकर, हम सब चाची की तरफ देखने लगे और चाची ने मीठी सी मुस्कान दे दी।

दरअसल हमारी सुंदर सी चाची का नाम भी सुमन है, तो समझे आप क्यों वो फिल्म special थी?

नहीं समझे? अरे भाई heroine के साथ फिल्म देखने वाली feeling आ रही थी।

ऐसी ही बहुत सी मीठी यादों के साथ होती थी, हमारी होलिका दहन के दो दिन पहले से दूज के दो दिन बाद तक की होली

तो यह तो रहा, बचपन का हमारा होली का त्यौहार

फिर शादी हो गई, बंगाल में पहुंच गए, सबसे दूर, किसी का आना-जाना नहीं, सारे त्यौहार सूने से ही जाने लगे, क्योंकि पतिदेव की कभी भी छुट्टी नहीं होती थी ..

बहुत प्रयास के बाद, ईश्वर की कृपा, बड़ों के आशीर्वाद, मामा और बड़े भाई के सहयोग से दिल्ली आ गए।

यहां छोटा भाई भी था। एक बार फिर से त्यौहारों का अस्तित्व में आना शुरू हो गया। फिर से होली का त्यौहार, सिर्फ रंगोत्सव के रूप में सिमट कर नहीं रह गया था, बल्कि फिर से दूज का इंतज़ार रहने लगा था। 

भाई-भाभी और बिटिया रानी के आने से दूज में फिर से रौनक लौट आई थी। जैसे चाचा-चाची के आने से हम भाई-बहन स्वप्निल संसार में होते थे, वैसे ही भाई-भाभी और बिटिया के आने से बच्चे dreamland में होते, वो सबके लिए बहुत कुछ लेकर आते, हम भी खूब सारे पकवानों के साथ तैयार रहते...

बहुत ही सुखद अनुभव रहता था, त्यौहार, त्यौहार लगता था। 

पर अभी कुछ साल पहले ही वो लोग Bombay चले गए।त्यौहार की रौनक धूमिल लगने लगी। अब ना दूज में इंतज़ार रहता, ना उस दिन किसी पकवान को बनाने की इच्छा।

पर रही सही कसर, इस बार की होली में निकल गई, बच्चों के exam का schedule ऐसा था कि होली के कुछ दिन पहले से शुरू होकर होली के कुछ दिन बाद तक exams हैं और हद तो यह है कि होली के एक दिन पहले भी और एक दिन बाद भी..

जब बच्चों को हर समय पढ़ते ही रहना होगा तो क्या होली?

फिर किस तरह से बच्चों में उमंग और उत्साह रहेगा?..

क्या इस तरह से बच्चों के जीवन से उत्साह, उल्लास, उमंग और जोश या यूं कहें कि बचपन ही ख़त्म नहीं हो जाएगा?

अब तो होली की छुट्टी, school हो, college हो या office हो, मात्र एक दिन की ही होती है। इतना बड़ा त्यौहार और छुट्टी बस एक दिन..

Board के exam तो जब हमारा बचपन था और आज जब हमारे बच्चों के board हैं, होली के त्यौहार की रौनक तो हमेशा से ही तहस-नहस कर दी जाती है।

पर अब जब सरकार हिन्दुत्व की ओर बढ़ावा दे रही है तो उनसे अपील है कि अगर हिन्दुत्व को महत्व देना है, तो यह सम्भव तो तभी होगा ना, जब त्यौहार, संस्कृति और संस्कार को बढ़ावा मिलेगा।

ऐसे में बड़े त्यौहार में दो या तीन दिन की छुट्टियां रहे, atleast बच्चों की तो रहे ही, साथ ही उनके final exam की date ऐसे हों कि या तो होली आने के पहले ख़त्म हो जाए या होली के 4 से 6 दिन बाद start ह़ो... 

आप कहेंगे कि आज कल schools and colleges तो, ज्यादातर private ही होते हैं तो उसमें सरकार से appeal से क्या होगा? 

तो उसका जवाब यह है कि अगर government order रहेगा तो private हो या government, rules तो सबको follow करने ही होंगे।

अगर यह बात, सरकार तक पहुंच जाए और त्यौहारों पर ज्यादा दिनों की छुट्टी मिल जाए, तो त्यौहार जो सिमट कर रह गये हैं, वो अपना अस्तित्व वापस पा लेंगे और कुछ हद तक बच्चों को भी अपना बचपन वापस मिल जाएगा...

तो बच्चों और धर्म के लिए इतना तो बनता है।


भाई-दूज पर्व पर सभी भाइयों व बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं 💐 🙏🏻

Friday, 27 January 2023

Memories : किसी के जाने के बाद


किसी के जाने के बाद



उठ खड़ा हो, तू पुनः 

कर जिंदगी का आगाज़

कब रुकी है जिन्दगी,

किसी के जाने के बाद।।


स्वप्न को फिर, तू सजा,

आसमां तक पहुंचने का।

हौसलों की उड़ान को,

पुनः अपने अंदर जगा।।


था मुख़्तलिफ़ अंदाज तेरा,

आ, फिर उसी स्वर में तू गा।

तुझ सा नहीं कोई जहां में,

आकर यह सबको बता।।


जाने वाला गया है,

ना जाने किस जहां?

बैठकर, आंसू बहाकर,

हासिल ना होगा कुछ यहाँ‌।


ग़म के अंधेरे गर्त में,

रहकर, ना वक्त बर्बाद कर।

तू ही सवेरा है जिंदगी का,

ना तिमिर को स्वीकार कर।।


उठ खड़ा हो तू पुनः ,

कर जिंदगी का आगाज़।

कब रुकी है जिन्दगी,

किसी के जाने के बाद।।

Monday, 19 July 2021

Memoirs : अंजाना

आज एक और विधा के साथ आप सबके समक्ष प्रस्तुत हुई हूँ ... संस्मरण (Memoirs)

यह संस्मरण हमारी जिंदगी का सबसे ‌खूबसूरत, सबसे डरावना, ईश्वर की कृपा और उपस्थिति को बताने वाला संस्मरण है। आज आप के साथ वही share कर रहे हैं।


अंजाना




बात उन दिनों की है, जब हमारी शादी हो चुकी थी, और बेटी भी। बेटी के होने पर पति ने कार ली थी।

बेटी साल भर की हो चुकी थी, वो बहुत ही शान्त बच्ची थी, कभी तंग नहीं करती थी।

शादी के बाद की, मेरे husband की दूसरी birthday थी।

नयी नयी शादी हुई थी, नयी ही कार थी, तो सोचा, पति को surprise देते हैं।

उन दिनों हम, दुर्गापुर (West Bengal का एक शहर) में रहते थे। सारे अपने बहुत दूर थे, तो जल्दी कोई आता जाता नहीं था।

सोचा, आस-पास कहीं का, कार से घूमने का program बनाया जाए।

तो Mukutmanipur जो कि वहाँ से निकट का scenic spot था। वहाँ का एक resort book कर लिया था।

दुर्गापुर ही छोटी जगह थी, Mukutmanipur उससे भी छोटी जगह थी।

वहाँ पहुंचने के लिए एक छोटा सा गांव पार करना था।

पति को बताया, तो वो चलने को तैयार हो गए, अपनों से दूर थे, तो अकेले रहते-रहते मन उकता जाता था। ऐसे में एक Nature walk program तरो-ताजा करने वाला था।

बस हम सुबह 5 बजे ही निकल लिए, कार में पानी और खाने-पीने के सामानों के साथ।

तीन दिन का हमारा program था।

पूरा रास्ता, हरियाली और सुंदरता से भरपूर था, बस एक कमी थी, वो एक गांव था, वो भी बंगाल का, तो हमारे स्वाद के अनुसार खाने- पीने की ज्यादा चीजें नहीं मिल रहीं थीं। पर हमने साथ में बहुत कुछ रखा था, तो problem भी नहीं हो रही थी।

हम लोग वहाँ पहुंच गए, resort बहुत ही खूबसूरत था।

उसी शाम से घूमने का प्रोग्राम था।

हम Dam, मंदिर, और पास के बाजार घूमने गए, टेराकोटा के बेहद बेहतरीन बहुत सस्ते सामान थे, वो लिए और लौट आए।

अगले दिन, हमें अयोध्या hills जाना था।

तब तक कोई hills नहीं देखे थे, तो अलग ही उत्साह था।

हम resort से नाश्ता कर के निकले।

जब निकले तो, पता चला, कुछ दूर पर ही hills है। 

हम चल दिए और बस फिर चलते रहे और चलते ही रहे, पर कोई hills नजर नहीं आ रहा था।

जिससे पूछते, hills कहाँ हैं?

बस थोड़ी दूर और, कहकर वो आगे चले जाते।

पर दूरी थी, कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी।

सुबह से दोपहर हो चली, पर hills नहीं आया। अब तो एक-दो, लोग ही दिख रहे थे, और हमारा resort भी हमसे बहुत दूर हो गया था।

उस समय Google भी वहाँ काम नहीं कर रहा था।

अब बस हम आगे बढ़ते जा रहे थे। Hills को देखने की चाह में....

तभी कुछ लोग मिले, बोले, यहाँ कोई hills नहीं है, अयोध्या hills बस जगह का नाम भर है, और वो भी अब खण्डर हो चुकी है। सुनकर बड़ी हताशा हुई। 

Hills देखने की इच्छा पर वज्रपात हो चुका था। साथ ही इतना समय और मेहनत बर्बाद हो चुका था। उस समय क्रोध और दुःख के मिश्रित भाव से शरीर थकान से चूर होने लगा।

वो लोग बोले, आप लौट जाओ।

पर आपको लौटने के लिए बनते हुए पुल को cross करना होगा

पुल में बहुत बड़े-बड़े पत्थर पड़े थे। जिन पर car चलाना नामुमकिन लग रहा था।

लौटना था, पर लौटें कैसे? यह समझ नहीं आ रहा था। क्योंकि हमारी छोटी कार थी, और बस first gear पर चलना था, कार बंद होती और हम फंस जाते।

ईश्वर का नाम लेकर हम चल पड़े, जैसे-तैसे पुल पार किया।

उसके बाद तो लोग दिखना ही बन्द हो गये। दूर-दूर तक केवल रेतिला मैदान था। कहाँ जाना है, कैसे जाना है। कुछ पता नहीं था, बस एक अंदाजे से, हम बस बढ़ते जा रहे थे।

हम और आगे बढ़े, तो गाड़ी अचानक से रुक गई, उतर कर देखा तो पाया एक पत्थर से रुक गई थी।

पर अगर वहाँ, ना रुकती तो सामने इतनी बड़ी खाई थी, कि हम कार सहित उसमें समा जाते और किसी को हम कभी ना मिलते।

यह देखकर दिल दहल गया, शाम हो चुकी थी, खाने-पीने का सामान भी खत्म हो रहा था। रास्ता, लौटने-का दिख नहीं रहा था। हम पूरी तरह से भटक चुके थे।

सोच ही रहे थे कि क्या करें, तभी एक आदमी, Motorcycle के साथ सामने खड़ा था। वो लम्बा-चौड़ा, घनी मूंछों वाला, below middle class का पढ़ा-लिखा लग रहा था।

हमें देखकर बोला, मुसाफिर लगते हो, रास्ता भटक गए हो?

मेरे पीछे आओ, मंजिल पर पहुंचा दूंगा। 

रात हो गई, तो गांव पार करना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि यहाँ रात में बिजली नहीं रहती है, और गांव वालों का कोई भी जानवर गाड़ी के नीचे आ गया, तो यह लोग अनजानों को छोड़ते नहीं हैं, और आप बाहर के हो तो ना वो आपकी भाषा समझेंगे ना आप उनकी।

अनजान जगह, अंजाना इंसान! बहुत डर लग रहा था, ना जाने आगे क्या होगा?

पर हमारे पास, उसके पीछे जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

वो आगे-आगे, हम पीछे-पीछे। हम जिस रास्ते से पहले आगे बढ़ रहे थे, यह रास्ता उसके बिल्कुल opposite था।

वो हमें main road तक ले आया, फिर वो बोला, मेरी बेटी बीमार है, इसलिए मुझे जल्दी घर जाना है, क्या अब आप अपने ठिकाने पहुंच जाएंगे? 

हमने उसे अपनी मदद करने के लिए, money offer किया, उसकी बेटी के treatment के लिए...

पर उसने इंकार कर दिया, वो बोला मैं आपको चाय पिलाने लें चलता, अगर मुझे जल्दी ना होती...

हमने उस देवदूत को बहुत सारा धन्यवाद दिया और अपने resort को चल दिए।

रात होने से पहले हम अपने resort में थे।

अगले दिन, हमने सारे घूमने के program cancel कर दिए और घर लौट आए।

वो adventurous सफ़र और वो देवदूत हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया। अगर वो अंजाना इंसान, उस दिन ना आता, तो शायद हम जीवित भी ना होते!!

पर जब ईश्वर आपके साथ हों तो वो ऐसे रूप में ही हमारे समक्ष प्रकट होते हैं, और हमारी रक्षा करते हैं।

बस यही सत्य है...

कितनी हो कठिन डगर

मुझको लगता नहीं है डर

है उनका आशीर्वाद तो

किस बात की फ़िक्र...


जय श्री चच्चा जी महाराज 🙏🏻🙏🏻


अगर आप के जीवन में भी ऐसी कोई घटना घटित हुई है, जिसने आप के मन में ईश्वर के प्रति अटूट आस्था बढ़ा दी हो तो, हम से share कीजिए... हम उसे blog में post करेंगे।