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Tuesday, 22 September 2026

Satire : महान हर एक इंसान

आज बैठे-बैठे यूँ ही ख़्याल आया कि कौन होते हैं महान, कौन हैं सबसे सफल इंसान। 

फिर बस लगा दिमाग अपने घोड़े दौड़ाने।

देश के प्रधानमंत्री- श्री नरेन्द्र मोदी महान... पर आखिर क्यों?

उन्होंने देश के विकास के लिए विभिन्न कार्य किए इसलिए?

नहीं, क्योंकि वो एक चाय बेचने वाले से देश के प्रधानमंत्री बन गए। वैसे कुछ उन्हें चाय बेचने वाले से देश बेचने वाले भी कहते हैं, हालांकि मोदी जी को इससे क्षणिक फ़र्क नहीं पड़ता।

वो देश के विकास के लिए अथक प्रयास करने में अपने दिन-रात न्यौछावर किए हुए हैं। 

जबकि कोई व्यक्ति अपने परिवार के प्रभाव से राजनीति में बड़ा कद पाता है, तो वो महान नहीं।

तो क्या गरीब होने से महान बना जा सकता है?

महान हर एक इंसान


सचिन तेंदुलकर एक महान cricketer माना जाता है। उसको देखेंगे तो वो भी दसवीं तक pass नहीं कर पाया था।

तो क्या महान खिलाड़ी बनने के लिए पढ़ाई-लिखाई में लद्दड़ होना चाहिए?

अमिताभ बच्चन, सदी के महानायक हैं।

बहुत सारी जगहों से reject होने के बाद सफलता के शिखर पर पहुंचे थे। 

तो क्या असफलता ही सफलता की कुंजी है?

ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं, जहां असफल समझे जाने व्यक्तियों ने महानता के झंडे गाड़े हैं। तो क्या प्रार्थना की जाए ईश्वर से? 

“हे प्रभो, हमें गरीब, पढ़ाई-लिखाई में लद्दड़ और असफल बनना, क्योंकि यही वो विशेषताएँ होती हैं, जो आगे चलकर मनुष्य को महान बनाती हैं।”

पर हाय-हाय! वैसे ही रह गए तो मोदी जी, सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन आदि के जैसे न बन पाए तो!.. 

कहीं महान बनने की ख्वाहिश पूरी न हो पाई तो इंसान की श्रेणी में भी नहीं आएंगे।

वैसे एक theory में यह भी निकल कर आया है कि अविष्कार आलस्य के कारण ही संभव हो पाता है।

Isaac Newton आलसी था, तभी भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे बैठा था, और वहीं बैठकर उसने गुरुत्वाकर्षण बल (gravity) का अविष्कार कर दिया, पर कसम से बाकी सब के आलस की वाट लगवा दी।

तो क्या आलसी होने से महान बना जा सकता है? 

भाई साहब! बहुत गड़बड़झाला है। यह ही नहीं समझ आ रहा है कि कामना किस की करें?

एक ही बात समझ में आती है, महान हर इंसान, जिसका जब भाग्य चमक जाए। 

इसलिए गरीब हो, असहाय हो, कमजोर हो, लद्दड़ हो, कोई वांधा नहीं।

भाग्य चमकना होगा, तो कभी भी चमक जाएगा और हो सकता है ऐसा चमके कि सब चकाचौंध हो जाएँ कि यह भी इतना महान बन गया। 

बाकी जिसकी डोर राम के हाथ, उसके सब बनते काम…

जय श्री राम!

Friday, 24 October 2025

Poem : काला मच्छर मोटा

जब भी मौसम बदलता है, ठंड से गर्मी या गर्मी से ठंड, ऐसे समय के आते ही मच्छरों की भरमार हो जाती है, साथ ही उनका काटना और हमारा उन्हें मारना, रोज का काम हो जाता है।

ऐसे ही माहौल में, हमारे छुटकू महाराज, मतलब अद्वय ने एक कटाक्ष( हास्य व्यंग) लिखा है ,आज उसे ही share कर रहे हैं। 

पसंद आने पर उसकी प्रशंसा तो बनती है...

काला मच्छर मोटा


छत पर बैठा,

ताक रहा था,

काला मच्छर मोटा!

खून पीकर, 

हो गया तगड़ा,

पहले था, जो छोटा।


पहले था, जो छोटा,

उसने मुझको,

खूब भगाया!

थक कर जब मैं,

बैठ गया तो, 

उसने काट खाया।


उसने काट खाया,

तब मैं चिल्लाया,

"मम्मी!"

वो मोटा ताक कर मुझको

बोल रहा था

"Your blood is so yummy…"


"Your blood is so yummy…"

यह सुनकर आया,

मस्त विचार!

Mosquito bat को,

पकड़ा मैंने,

कर दिया प्रहार। 


कर दिया प्रहार,

पर मच्छर,

निकला ज़्यादा फुर्तीला!

यह देखकर,

गुस्से से मैं,

हो गया लाल-पीला।


हो गया लाल-पीला,

पर हाथ में, 

कुछ न आया! 

फिर सोचा, है तो अब

वो भी अपना ही,

उसमें मेरा ही खून समाया।


उसमें मेरा ही खून समाया,

आज बन गई है,

 लोगों की यही पहचान!

खून चूसकर आपका,

वो दिखलाते हैं,

कुटिल मुस्कान।।

Monday, 23 September 2024

Satire : Fitting in Society

आज का यह satire, हमारा नहीं है, Facebook पर पढ़ा था, पर पढ़कर, सच में मज़ा आ गया। 

हमारा यह उसूल है कि, जो किसी दूसरे का है, उसे कभी अपना कहकर नहीं डालते हैं।

पर आज का यह satire, इतना सटीक लगा कि डाले बिना रह भी नहीं पा रहे हैं। 

Writer को salute, उसमें comment box enable है, वरना वहीं उनकी तारीफ करते, तो सोचा अपने blog में डाल दें।

दुनिया गोल है, क्या पता वो भी अपना writeup पढ़ लें और खुश‌ हो लें। 

ऐसा हमारे भी कुछ write-ups को पढ़कर लोगों को लगा और उन्होंने, उसे अपने channel में डाल दिया।

आशा है कि writer को अच्छा लगेगा, देखकर ... अगर वहां पर comment box enable न होता, तो हम उनकी permission से उनके नाम के साथ डालते। अभी भी उनका write-up, उनको ही समर्पित।

आज कल classy दिखने का बहुत trend है, और यह satire उसी पर आधारित है, तो चलिए आगे का write-up उन्हीं के style में...

Fitting in Society

Apple mobile phone जब market में launch किया गया तो उसने एक strategy चलाई। 

उसने नारा दिया कि apple 'masses' (भीड़) के लिए नही, 'classes' (standard) के लिए बनाया गया है।

बस, ऐसा कहना था कि भारतीय 'भीड़' लग गयी, धड़ाधड़ mobile खरीदने, क्योंकि सबको 'classy' ही बनना है।


ऐसा ही पैंतरा शायद महंगी शराब वालों ने भी चला था। कौन सा glass होना चाहिए, कितना peg होना चाहिए, peg अपने हाथ में कैसे पकड़ना है,

कैसे toast करना है, कैसे स्वाद लेना है, neat पीना है, आदि…

ऐसा ही बड़े-बड़े hotel और restaurant वाले करते हैं कि कौन सी dish किस plate में होगी, चम्मच किस angle में रखनी है?

Plate के ऊपर चम्मच किस angle में रखने से क्या समझना है, starter, main course, dessert, tip आदि के चोंचले।


और फिर महंगी शराब बेचने वाले हों या महंगा खाना बेचने वाले, इनके यहां भी कुछ प्रजाति ऐसी है, कि लग गई खुद को classy दिखाने की होड़ में।


इन्ही के जैसे चमन लोग तो होते हैं जो हल्दी के दूध को भी 'Golden Latte' बोल, ₹300 का खरीदकर पीते हैं और खुद को cool समझते हैं।

इसलिए ऐसी चमन प्रजातियां यदि आपको certificate दें कि आपको glass पकड़ना नही आता, आपको चम्मच पकड़नी नही आती तो वही glass और चम्मच दोनों इनके certificate के साथ इनको ही दे मारिए।

आप जैसे अपने खाने पीने में सहज हैं, वैसा ही रहा कीजिये।

क्योंकि ज़िंदगी को  सहज जीने में ही सुकून है, classy दिखने में नहीं ...

Thursday, 30 May 2024

Satire : हाय हाय गर्मी

कुछ दिनों पहले ठंड पड़ रही थी, नहीं-नहीं हद की ठंड पड़ रही थी। इतनी की दांतों के साथ-साथ हड्डियां भी कीर्तन कर रही थी, और हवन भी चल रहा था शरीर में।‌ 

हवन! पर वो कैसे?

बताते हैं, हर बार मुंह खोलने के साथ ही धुआं जो निकलता था। 

सोचा चलो, किसी बाबा जी या किसी ओझा से बात की जाए तो शायद कुछ अच्छा हो जाए।

बारी बारी से दोनों के पास गए...

दोनों ने आश्वासन दिया, "बच्चा! परेशान मत हो, चंद दिनों की बात है, फिर सब अच्छा ही अच्छा..."

अपन भी लौट आए, पर अपने को कंपकंपाने से ना बचा पाए।

पर बात सही थी, ठंडक गुज़री, गर्मी आई...

हाय हाय गर्मी


पर यह क्या, अपने संग मच्छरों की बारात ले आई।

जहां देखो, मच्छरों की गुनगुनाहट, उनके ही प्रेम की गर्माहट...

चाहे जितने भी मार लो, उनकी बढ़ती जनसंख्या रोक ना पाएँ।

कछुआ छाप, mortein, all-out, fast card सब के सब fail... मच्छर हद के, कि जीवन हो जाए अझेल...

फिर अपन दोबारा भागे, अब कुछ करो उपाय, मच्छर से कैसे जान बचाएं...

दोनों ने आश्वासन दिया, "बच्चा! परेशान मत हो, चंद दिनों की बात है, फिर सब अच्छा ही अच्छा..."

सचमुच ऐसा ही हुआ, चंद दिनों के बाद, मच्छर रहे ना छिपकली, जाने कहां नदारद हो गए, पर हमें सुख चैन दे गए...

आह हा हा! पर यह क्या अपन भी अंडे की तरह उबलने लगे, सिर से लेकर पांव तक जलने लगे।

हर जगह, अब तवा-सी नज़र आती है, बैठते ही तशरीफ़ जल जाती है...

टस-टस पसीने की धार, गर्मी अपरम्पार!

इधर-उधर सब जगह हर कोई चिल्लाए, गर्मी-गर्मी, हाय-हाय, चैन कहीं मिल ना पाए।

ना पंखा ना कूलर भाए, दिन रात AC चलाए, फिर बिजली का बिल सरपट दौड़ लगाए...

घड़े, सुराही का पानी रास ना आए, उससे अब कहाँ प्यास बुझ पाए...

हाय-हाय गर्मी, तू जल्द चली जा, फिर लौट के ना आ, कुछ दिन तो सुख के बिताएँ, कोई तो हो ऐसा मौसम, कि चैन आ जाए।

इस पर बाबा जी और ओझा एक स्वर में बोले, "चैन इंसान को कहीं नहीं आता है, चंद दिनों का सुख, फिर दुःख ही दुःख नजर आता‌ है..."

Wednesday, 4 October 2023

Satire : नर से नारायण

आजकल लोग इतने स्वार्थी, इतने self-centred होते जा रहे हैं कि उन्हें ना अपने माँ-बाप से मतलब है, ना भाई-बहन से और यहाँ तक कि ना ही पत्नी या पति और बच्चों से। 

वहीं कोई एक ऐसा भी है, जिसके लिए सब बराबर हैं। वह सभी को ईश्वर तुल्य समझता है जबकि वह दिन-पर-दिन बहुत बलवान होता जा रहा है। जानते हैं कौन है वो?

नर से नारायण


मच्छर...

और वो रिश्ता क्या है?

आपका और मच्छर का... 

अब आप कहेंगे क्या मतलब? 

मतलब है, कि आप मच्छरों कि शक्ति से तो रूबरू हैं ही। 

आजकल मच्छर सिर्फ़ malaria तक सीमित नहीं रह गए हैं बल्कि chikungunya और dengue तक भी पहुँच चुके हैं। 

जहाँ chikungunya इंसान के शरीर से पूरी ताकत खत्म करके उसे बहुत कमजोर बना देता है वहीं dengue के तो क्या कहने, वो तो जान ही ले लेता है, अस्तित्व ही खत्म कर देता है।

अच्छा आपकी information के लिए बता दें कि dengue और chikungunya के और खतरनाक variant भी आ चुके हैं।

ऐसा शक्तिशाली जीव जब आपकी शरण में आ कर आप से मुक्ति की कामना करे तो फिर यही कहेंगे ना की “अहम ब्रह्मास्मि”। 

सच यही feeling आती है ना, जब मच्छर आपके चारों तरफ तब तक मँडराता रहे जब तक आप उसे मार ना दें। तो आप बन गए ना ईश्वर? जो उसे मच्छर-रूपी योनि से मुक्त करेगा।

सच में गज़ब के निडर हो गए हैं मच्छर आजकल। मतलब पहले तो आपके चारों तरफ मँडराकर, गुनगुनाते हुए अपना गीत ही सुनाते रहते थे। तब इन्हें मारना थोड़ा कठिन भी था, शायद यह भी मरने से डरते थे। शायद ही... हाँ पक्का नहीं कह सकते, पर इनका दूर-दूर रहना कुछ ऐसा ही दर्शाता है....

पर अब ये भी बड़े वाले हो गए हैं। इन्हें अपनी शक्ति का बड़ा गुमान हो चला है। कभी मुँह पर, कभी हाथ पर, कभी पैर पर चिपके ही रहेंगे, अगर आप उड़ा देते हैं तो फिर आ कर चिपक जाएंगे।

मानो कह रहें हों कि “तुम हमें मार कर मुक्ति दे दो, वरना हम तुम्हें काट कर मार देंगे और तुम्हारा अस्तित्व खत्म कर देंगे”। 

सच में ये मच्छर ही हैं, जिन्होंने कलयुग के समय में हम इन्सानों का status बढ़ा दिया है और हमें नर से नारायण बना दिया है। 

तो फिर चलिए जब बना ही दिया है, तो संकोच किस बात का... हाथ से, मच्छर वाले racquet से या आपको जिस तरह से सूझे, इन का खात्मा करें, इनको मुक्ति प्रदान कर, नर से नारायण बनें वरना ये chikungunya और dengue फैला कर के पूरी पृथ्वी पर तबाही ले आएंगे। 

अब कुछ जरूरी बातें...

Dengue और chikungunya का season चल रहा है।

  • ऐसे कपड़े पहनें जिनसे आप पूरे ढकें रहें, fashion के लिए बाकी कि पूरी ज़िंदगी है।
  • कहीं भी पानी इकट्ठा ना होने दें। यही बीमारियों की जड़ होती है।
  • समय-समय पर कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करते और करवाते रहें।

अपनी सुरक्षा, अपने हाथ। अपने और अपने परिवार को मच्छरों से सुरक्षित रखिए। स्वस्थ रहिए, सुरक्षित रहिए।

Monday, 17 January 2022

Satire : गृहणी के लिए, quarantine के 14 दिन

 House wife के लिए, quarantine के 14 दिन

लोगों के careless approach के कारण आज कल फिर से corona अपना ज़ोर पकड़ रहा है। ऐसे में quarantine होना पड़े, यह कोई बड़ी बात नहीं है। पर हमारी रचना रानी के लिए बड़ी बात ही हो गई। 

कैसे? 

चलिए उनकी आपबीती उनसे ही जानते हैं...

हाँ तो रचना जी बताइए, कैसा रहा आपका अनुभव?

रचना जी नहीं, हमार नाम रचना रानी है। 

हाँ हाँ, बताइए रचना रानी क्या कहना चाहेंगी आप?

हमारे यहाँ बच्चा लोग सकूल, पति और देवर-देवरानी सब ही दफतर जाते हैं। बस हम ही घर चौका-बर्तन, खाना- कपड़ा के लाने घर पर इक्कली रह जाती थीं। 

पर जब से मुआ कोरोना चला है ना, तब ही से सब घर से ही काम-काज करें हैं। इन लोगन का तो काम आधा और हमार दुगना भै गओ है।

का बताएं जिज्जी, जई काम को भार लाने कोरोना, हम से ही चपेट गयो।

फिर...

बस फिर का... वही का कहत हैं, जिस में इक्कले कमरे में रहन होता है।

Quarantine...

हओ जिज्जी, एकदम ही ठीक समझी।

हम कहे, हम ना रहेंगे, ऐसे इक्कले में, हमार तो प्राण सूख जावेंगें बहाँ इक्कले में..

फिर...?

फिर का? कोई ने हमार ना सुनी, ससुरा भेज दओ, मुआ मोबाइल के साथ।

अरे तब तो तुम बहुत परेशान हो गयी होगी, अकेले 14 दिन कैसे काटे? कितना कठिन होता है ना ऐसे रहना?

अरे जिज्जी, जई तो बात है, हम मेहरारू लोग की, दिन भर काम के साथ इक्कले ही तो रहत हैं, कौनों नहीं होता, साथ देने लाने, सारे काम इक्कले ही करन पड़त है, फिर भी कोई इज़्ज़त नही, कोई नाम नहीं।

सब बस छोटिहे की तारीफें करत हैं, देखो कितना काम करे रही, रुपया-पैसा हाथ में रहे, सो अलग...

तो जिज्जी, का भओ, हम जब कमरा में थीं, तो ई ससुरा मोबाइलवा भी साथ था। तो बस कहे बात के अकेले?

बिटिया अपना फ़ेसबुकआ समझा दीहिं, वटसअप में दोई तीन गूरप बना दीन।

बस दिन भर उसमें ही निकल गई, उसमें करना ही का है, 

बस टिपर- टिपर उंगलियन चलत रहो बस।

और कुछ मन करे तो ऊटूब, इंटरनेट भी चला लें। 

काय जिज्जी, ऐसे ही आज कल के लोग, बिज़ी रहत हैं ना, सोई हम हो गए।

का? 

नहीं समझी?

अरे, बिज़ी...

किसी से बात नहीं करती थीं?

काहे नहीं करते थे, बहुते ही बात करते थे। दिन भर फ़ोन पर बतियावत थे। सारे रिश्तेदार, बिरादरी वाले, एकदम बीआईपी बनाएं हुए थे।

सुबह शाम फोन आते थे, ऐसे लग रहो था कि हिरोइन बन गए हों।

दिन भर आराम, खूब सारे फोन, फिर मोबाइल में सारे दिन मज़े, उस पर घर वालों का बहुत ज्यादा ध्यान रखना, मजा ही आ गओ।

सच्ची, ऐसो लग रहा था जिज्जी, मायके पहुंच गए हों

क्यों?

काहे कि जब से ब्याह के आए ना, बिल्कुले आराम नहीं मिला, ना ही कोई ध्यान रखता था, इही बात के लाने और का?...

और बताएं जिज्जी, देवरानी की तो बात ही ना पूछो, बिचारी काम करत करत...

आज बाको और बाकियन को भी समझ आए रहा था कि, सबसे ज्यादा काम हमहीं करते थे।

सो कठिन दिन, हमारे लाने ना थे, उनके लाने थे, जो बाहर कामकाज कर रहे थे...

आज 14 दिन बाद, जब कमरा से बाहर आए ना तो, सबहिं के तेवर बदल गये हैं, सब बहुत मान देने लगे, सबहिं अच्छे से जान जो गये हैं कि हम बहुत काम करत हैं।

तो हम से पूछोगी जिज्जी कि कैसे रहे बे दिन, तो हम तो जेई बोलेंगे कि बहुते ही अच्छे... 

तो रचना रानी की बातें तो यही बताती हैं कि गृहणियों के लिए, जो दिन भर अकेले काम करती रहतीं हैं, फिर भी ना ध्यान मिलता है, ना मान मिलता है, ना नाम...

तो गृहणी के लिए, quarantine के 14 दिन... 

दाग अच्छे हैं....

Thursday, 3 June 2021

Satire : चौकीदार बन गये हम🤪

चौकीदार बन गये हम🤪



जब हम हुए तो सब हमको घेर कर खड़े हो गए। हम हुए ही थे एकदम गोरे चिट्टे, बहुत ही खूबसूरत।

कोई हमें लाल परी कहें, तो कोई दुर्गा माता। अप्रैल के महीने में नवरात्र में जो हुए थे।

पर कभी घमंड नहीं किया।

बचपन बीता, जवानी आयी। 

सबकी तरह हमारे शादी की भी बात चलने लगी।

अरे भईया, इतने रिश्ते आए कि पूछो नहीं।

एकदम स्वयंवर वाली feeling आ रही थी।

हमने भी एकदम संस्कारी रुख़ अपना लिया कि मम्मी, आप जिससे कहेंगी, उसी से शादी करेंगे।

उससे दो फायदे होने थे, एक तो माता जी प्रसन्न हमारी आज्ञाकारिता पर, दूसरा पति जी की कुछ भी कमी होने से जिम्मेदारी उनकी और हमें जिंदगी भर यह बोलने का अधिकार कि कैसे के पल्ले बांध दिया है...

खैर मम्मी भी बड़ी होशियार हैं। देख-परख कर एक सांवला सलोना बांका जवान ऑफीसर ढूंढ ही लिया।  

शादी हो गई। 

और जब आयी रातें....

तो देखते क्या हैं कि, पति जी मच्छरदानी लगा रहे हैं। हम तो पंखे की direct हवा लेने वाले, यह जाल-वाल हमें रास ना आए, ससुरी पंखे की हवा कम हो जाए सो अलग...

खैर, पंखे की समस्या को तो उन्होंने A.C. लाकर खत्म कर दी।

पर मच्छरों के प्रकोप के मारे, मच्छरदानी नहीं छूटी। करते भी क्या, मच्छर थे ही बहुत, सो मच्छरदानी तन जाती,  पर एक-दो मच्छर घुस भी जाता तो, पति जी तो आराम से सोते रहते, और सारे मच्छर हम से ही चिपटे रहते, काय कि हम गोरे चिट्टे और चिकने जो ठहरे। 

ऐसा नहीं था कि एक भी छिपकली ना हों। 

थीं, पर वो भी निरी निकम्मी, खाली शो-पीस बनी रहती, हमें डराने के लिए।

जैसे तैसे दिन रात गुज़रे, और हमारे लाल गोपाल हो गये। हमारे ही तरह गोरे चिट्टे बहुत ही सुन्दर।

इधर वो हुए और उधर सारी नर्सें, और supporting staff लगे भकाभक उसकी फ़ोटो खींचने।

हम बेहद गर्व से भर गये। तभी मन के आकाश में भविष्यवाणी हुई, जिस बालक को देखकर तुम इतनी खुश हो रही हो, वो एक दिन तुम्हें चौकीदार बना देगा.....

चंद दिनों में ही वो भविष्यवाणी सत्य साबित हो गई।

काहे कि अब मच्छरदानी में मच्छर घुसते तो, हमसे नहीं उससे ही चिपटे रहते, मस्त गोरे चिट्टे, soft soft बच्चे के आगे, अब हमारी पूछ खत्म हो गई थी। और हम मच्छर का रेकेट लेकर चौकीदारी करते। सारी रात चौकन्ने रहते कि बाल गोपाल को मच्छर ना काट लें। 

तब लगता, अभी तो मच्छर हैं, रेकेट से मर जाते हैं, पर आगे....

सच्ची, चौकीदार ही तो बन गये थे हम....🤪😛😄😄

Friday, 5 March 2021

Satire : हमाय पूर्वज

 हमाय पूर्वज 




हाय दईया छिपकली की अपार सफलता के बाद से छिपकली देवी तो बन गई celebrity. 

अब Celebrity लोगों के तो दुश्मन भी हुआ करते हैं, तो आइए, आप को उनके दुश्मन से मिलवाते हैं। 

नाम था लल्लन सिंह, बड़े ही खुंखार हुआ करते थे, खास तौर से अपने कट्टर दुश्मन छिपकली देवी के लिए।

जहांँ कहीं उन्हें छिपकली दिख जाती, फिर तो उनको पास में जो भी अस्त्र दिखता, जैसे जूता-चप्पल , डंडा, झाड़ू या और कुछ भी......

लल्लन सिंह तैनात हो जाते, उसे लेकर, और शामत ही आ जाती, छिपकली देवी की।

आलम तो यह था कि छिपकली देवी को देखते ही वो ठान लेते थे कि आज घर में यह रहेगी या हम रहेंगे।

बस फिर क्या था,  बेचारी हमारी छिपकली देवी आगे आगे, और लल्लन सिंह पीछे पीछे होते। ये सर्र दौड़ती, वो सर्र दौड़ती.....

पर आखिरकार छिपकली देवी को ही घर से बाहर होना पड़ता था, क्योंकि घर तो ragister था लल्लन जी के नाम, और देवी जी थीं, बिन बुलाई मेहमान।

एक बार की बात थी। गांव से लल्लन सिंह की अम्मा आय रहीं। 

उन्हीं दिनों में लल्लन सिंह के घर पुताई भी हो रही थी।

पुताई के कारण, घर में अच्छे से साफ़ सफाई भी हो गई।

सारे मच्छर, कीड़े- मकोड़े सब भाग गए। 

पर नहीं भागी, तो एक छिपकली देवी ।  

एक कमरे में पुताई होती, तो दूसरे में छिप जाती और दूसरे में होती तो तीसरे में छिप जाती। क्योंकि हर कमरे में tube light जो थी ही उसके छिपने के लिए।

Location बदलती रहीं, पर घर छोड़ कर नहीं गयी।

एक दिन वो लल्लन सिंह को दिख ही गयीं।

बस फिर क्या था, लल्लन सिंह तैनात हो गये, उसको भगाने को।

पर वो भगा पाते, उससे पहले ही अम्मा आ गयीं।

जे का कर रय हो लल्ला?

कुछ नहीं अम्मा छिपकली को भगाय रये, खींसे निपौरते हुए लल्लन सिंह बोले।

अम्मा कुछ ज्यादा ही पुराने ख्यालात की थीं और अम्मा के सामने, लल्लन सिंह की कुछ चलती नहीं थी।

अम्मा, पूरा घर साफ़ हो गया। सारे कीड़े-मकोड़े भाज गए, पर एक यह है जो घर ना छोड़ रयी।

अरे, जाय दो बेटा, हमाय घर की पूर्वज होंगी, तबही नहीं गईं।

पूर्वज!!!!! ...गई भैंस पानी में.....

लल्लन सिंह, खिसिया के अम्मा को देख रहे थे और छिपकली देवी, लल्लन सिंह को देख देख मुस्काए रहीं, मानो कह रही हो, जै बात.....

तभी श्रीमती जी ने रेडियो चला दिया, जिसमें गाना आ रहा था

'यह तेरा घर, यह मेरा घर...'

बस अब क्या था, छिपकली देवी की चांदी हो गई। अब तो लल्लन सिंह को देख कर भी चौड़े में रहती छिपकली देवी। 

वो पूर्वज जो ठहरीं, तो अब लल्लन सिंह भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। तब तक तो कतई भी नहीं, जब तक अम्मा थीं।

एक दिन लल्लन सिंह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो कर घर से निकले ही थे, कि लौट कर सीधे फिर बाथरूम में घुस गये।

का हुआ, लल्ला? अबहिं तो स्नान किए थे, फिर क्या भया? जो फिर नहाय रय।

का कहें अम्मा? तुम्हारे पूर्वज हमाय ऊपर ही गिर गये। जाय मारे ‌फिर से नहाय रय।

अब तो आए दिन यही होता, कभी पूर्वज, चौखट पर बैठ जाती और डराकर लोगों को घर के अन्दर आने नहीं देती। और कभी पूर्वज गिर जाती, तो नहाने धोने के कारण घर से बाहर निकलने नहीं देती। 

इस बात से लल्लन सिंह के हाथ तो बहुत सुरसुराते, पर कुछ ना कर पाते, बस मन मसोस के रह जाते।

पर अम्मा के गांव जाते ही लल्लन सिंह ने सबसे पहले छिपकली देवी को घर से निकाल बाहर किया।

लल्लन सिंह का लड़का चिल्लाया भी, पापा जी हमाय पूर्वज!!!

Thursday, 5 November 2020

Satire : कोरोना की आत्म कथा

आज आप सब के साथ मुझे इंदौर से श्रीमती उर्मिला मेहता जी के आलेख को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।

इस लेख में उन्होंने बड़ी खूबसूरती से बयान किया है कि जिस कोरोना से सब इतना डरें हुए हैं, उसकी खुद की क्या अवस्था है।

आइए हम सब इसका आनन्द लें।


कोरोना की आत्म कथा

                 


मैंने सोचा था कि  विकसित देशों की भाँति  विकास शील देशों में ,मैं और भी अधिक  कोहराम मचा दूँगा ।

सब मुझसे थर थर काँपेंगे, और मेरी जन्म भूमि से बचाव की भीख मागेंगे।

        पर मेरे अनुमान के विपरीत मैंने यहाँ पर लोगों को मेरे आने का जश्न मनाते देखा।हर घर में नाना प्रकार के व्यंजन बनना शुरु हो गये। 

    दादी नानी के घरेलू नुस्खों की बाढ़ आ गई।बड़ों एवं बच्चों को घर से काम करने का मौका मिला तो उनकी चाँदी हो गई।आने जाने का समय और पेट्रोल ,डीज़ल की बचत होने लगी।

     मैंने सोचा था कि मेरे आने से यहाँ की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ

    लोग होटल जाने के बदले घर पर भी ज़ोमेटो और स्वीगी के द्वारा खाने का पार्सल मँगवा कर  व्यंजनों का भरपूर आनंद लेने लगे।

     घर घर कपड़े के  मास्क बनने लगे जिससे 

महँगे मास्क की खपत ही कम हो गई! 

    धार्मिक स्थान चाहे बंद कर दिये गए पर चिकित्सक  बनकर  ईश्वर  मुझसे ग्रसित रोगियों का इलाज करने लगे।

     यहाँ तक कि मेरे ही नाम से कोरोनेश्वर  मंदिर  तथा कोरोना नाशी तांत्रिक भी मार्केट में आ गए ! 'बाय गॉड ' ऐसा तो कभी मैंने सोचा भी नहीं था।

    फुरसत के समय में मैंने भी टी . वी  .धारावाहिक देखना शुरु कर दिया।  बुराई के ऊपर अच्छाई की विजय को लेकर कई धारावाहिक  आने लगे।पूरा घर एक जुट होकर ईश्वर की शरण में होकर अपने आपको सुरक्षित समझने लगा।

       जो गृहिणियॉं पहले काम वाली  बाई के न आने पर दूसरी बाई की व्यवस्था में लग जाती थीं वे खुद ही काम करने लगीं !

     सास बहू का नाता मेरी सोच के विपरीत नज़र आया।दोनों को हँसते -हँसते मिल-जुल कर काम करते देखा।पति लोग भी यू -ट्यूब में सुनकर नयी नयी डिश बनाने लगे।

         घर  के सब लोग एक साथ, खाने का लुत्फ उठाने लगे।

    हे  भगवान मैं कहाँ आ कर फँस गया!

   राम, कृष्ण, दुर्गा और  चंडिका देवी के देश में आकर मुझे पता लगा कि परमाणु बम जो विकसित याने बड़े देशों के नाम से प्रसिद्ध थे,यहाँ ब्रह्मास्त्र के रूप में पहले से ही मौजूद थे! 

      तीरों में मंत्र शक्ति डालकर शत्रु को हराना भी  मैंने  फुरसत में बैठे बैठे  टी . वी . में देखा।

   धृतराष्ट्र को संजय नामक पात्र ने टी . वी . जैसे देखकर आँखों देखा हाल सुना दिया।

    मुझे लगता है अब तो मुझे भी श्री कृष्ण की शरण में चले जाना चाहिये ताकि जो पाप मैंने किये हैं  वे क्षमा कर दिये जाएँ !

      वास्तव में मेरी जन्म भूमि चीन के आविष्कारकों ने मुझ जैसे वाइरस को बनाकर बहुत खराब काम किया है।

       यद्यपि मेरे देश को सबसे पहले इसकी सज़ा  भी मिल चुकी है,पर अब जाने का सोच रहा हूँ और समझाऊँगा कि अति शीघ्र वेक्सीन बनाकर पाप से मुक्त हो जाए वरना भारत वाले तो धन्वन्तरि जैसे चिकित्सक वाले देश के हैं।

     एक देश ने तो पहले से ही कब्रें खोद कर रख दी हैं कि मरने वाले को दिक्कत न हो! 

    तोअब मैं जाता हूँ भारतीयों !तुम्हारी जिजीविषा और सकारात्मक जीवन शैली को मेरा सलाम।कोरोना पॉज़ीटिव को भी तुमने नकार दिया 👍👍

Disclaimer:
इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Monday, 5 October 2020

Satire : हाय दईया छिपकली

आज कल रुका रुका सा कठिन समय गुजर रहा है, जिससे लोगों के जीवन में नीरसता आ गई है। तो सोचा कुछ ऐसा लिखा जाए, जो सबको थोड़ा गुदगुदा जाए।

हम सभी के घर में कभी न कभी पाई जाने वाली प्राणी, जिससे अधिकांश लोग डरते भी हैं, आज उसी पर लिखा जाए।

तो प्रस्तुत है, आज की रचना द्वारा एक प्रयास, जो आपको कुछ पलों के लिए गुदगुदा देगा। कैसा लगा आपको, अवश्य बताएँ🙏🏻


हाय दईया छिपकली


 

हमारे रहे, एक शूरवीर भइया, बहुते ही निडर, किसी से भी नहीं डरने वाले।

किसी को भी कोई भी परेशानी हो, सब को वही याद आते।

एक दिन की बात, हमारे शूरवीर भइया को कब्ज हो गया था, बहुत दिनों से पेट साफ नहीं हो रहा था, तो भइया रहे परेशान, बहुत सारे घरेलू नुस्खे अपनाए, फिर एक दिन लगा, आज मुक्ति मिल जाएगी कब्ज से।

भइया गए बाथरूम, और कुछ होता, उसके पहले, दिख गई, हाय दईया छिपकली ।

यही ससुरी छिपकली ही तो है, जो भइया की वीरता के सारे सुर बिगाड़ देती है।

भइया डर डरकर के छिपकली को देखें और छिपकली घूर घूर कर उन्हें देखे। 

बस फिर क्या था, सारे नुस्खे धरे के धरे रह गए, और बस, कुछ भी नहीं हो रहा था।

जैसे तैसे राम-राम करते इस सेवा से निवृत हुए, पर तब तक छिपकली दरवाजे के एकदम पास आ गई। अब बाहर कैसे निकलें?

आज कल तो attached bathroom का जमाना है तो सोचा चलो नहा भी लिया जाए। श्रीमती जी से नहाकर कपड़े मांग लेंगे।

शायद तब तक छिपकली देवी को कुछ दया आ जाए और वो प्रस्थान कर जाएँ।

बस झटपट भइया बैठ गये, बाल्टी लोटा लेकर।

पर डर इस कदर विद्यमान था, कि पूरी बाल्टी का पानी खत्म हो गया, पर भइया रहे सूखे के सूखे। काहे कि, एक लोटा पानी भी सही से ना डाल पाए कि स्नान हो पाता, सारा पानी, इधर उधर ही डालते रह गये।

इस बीच मजाल कि, छिपकली देवी एक इंच भी हिलीं हो।

सोचा चलो साबुन भी लगा लिया जाए, पर सूखे बदन पर साबुन भी घिसने से क्या होगा? 

तभी उन्हें, एक उपाय सूझा, शरीर तो नहीं भिगा पाए, चलो साबुन ही भिगा लेते हैं। बस फिर क्या था, साबुन को लोटे में जल निमग्न कर दिया।

अब इस भीगे साबुन को रगड़ा, तो कुछ झाग कन्धों पर, कुछ झाग माथे पर और कुछ बड़ी सी तोंद पर लग गया।

इधर श्रीमती जी, घबरा रहीं कि शूरवीर जी बाहर क्यों नहीं आ रहे हैं?  तो वो जोर जोर से आवाजें देने लगीं और दरवाजा भड़भड़ाने लगीं।

इससे हुआ यह कि छिपकली देवी, गिर कर जमीन में विराजमान हो गई।

अब तो भइया की घिग्घी बंध गई, वो पूरे जोर से चिल्लाए, कि हमें बचाय लो, पर आवाज़ बाहर ना जाए।

छिपकली देवी भी नहाने वाली जगह की तरफ़ बढ़ने लगीं।

बस फिर क्या था, भईया ने आव देखा न ताव, लटक गये नल और शावर  की पाइप लाइन पर।

श्रीमती जी ने दरवाज़ा, भड़भड़ा भड़भड़ा कर खोल दिया। शूरवीर जी को ऐसा देखकर वो हक्की-बक्की रह गईं और शूरवीर जी लपक कर श्रीमती जी से चिपक गये, हाय दईया, हमें इस छिपकली से बचाय लो। श्रीमती जी बोलीं, कहाँ है, छिपकली?

क्योंकि, इस आपाधापी में छिपकली देवी सरक गईं थीं।

छिपकली देवी को नदारद देखकर शूरवीर जी की वीरता वापस आ गई, वस्त्र आदि धारण कर, वो बहुत प्यार से श्रीमती जी को देखने लगे, आखिर, आज उन्हीं के कारण वो, पुनः शूरवीर बन सके थे।

Friday, 7 August 2020

Satire : एक वार्तालाप यमराज जी से

आज आप सब के साथ मुझे इंदौर से श्रीमती उर्मिला मेहता जी की हास्य-व्यंग्य रचना को share करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। 
            एक वार्तालाप यमराज जी से


     दुनियादारी के झमेले  और देश विदेश में फैली विभिन्न बीमारियों , प्राकृतिक  आपदाओं, आतंकवाद, दुर्घटनाओं ,भ्रष्टाचार, अनाचार ,दुराचार आदि के चलते मेरा मन आक्रोशित होते होते अंत में त्रस्त हो गया  यह दुनिया यह महफिल मेरे काम की नहीं.....  की तर्ज पर हमें भी दुनिया से वैराग्य  हो गया। हमारी इच्छा होने लगी कि हम भी गौतम बुद्ध  और अन्य ऋषि मुनियों की तरह इस असार संसार को त्याग कर किसी वृक्ष के नीचे अथवा गुफा कंदरा
                  या हिमालय पर जाकर धूनी रमा लें। और दुनिया को अलविदा कह दें ,कि खुश रहो हर खुशी है तुम्हारे लिए ।अब हम किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते वैसे भी हमारी उम्र अब वानप्रस्थ आश्रम की हो चली है पर जब हमने अपने इस फैसले पर गौर किया तो समझ में आया कि  यह सब करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है क्योंकि यदि पेड़ के नीचे आसन जमाते हैं तो महिला होने के नाते सर्वप्रथम सुरक्षा का प्रश्न खड़ा होता है दूसरा  मच्छरों के प्रकोप से मलेरिया फ्लू आदि का भय मुँह बाए खड़ा हो जाता है ।गुफा कंदरा आदि में भी वही स्थिति है अकेली महिला को सौ  डर !सोचा अपनी उन सखियों को  साथ ले लूँ जो जो बात बात में जीवन को कोसती थीं तो उनका जवाब भी इस संसार रूपी रणभूमि में में डटे रहने का मिला ।अब एक ही तरीका बचा था कि  हिमालय पर्वत पर जाकर साधना करके परमात्मा में लीन हो जाएँ तो उसमें भी समस्या दिखाई दी हिमालय की ठंडक की कल्पना मात्र से हम सिहर उठे पिछले साल ही बड़ी मुश्किल से खाँसी सर्दी ठीक हुई थी इसके अलावा एक विचार और आया के हमारे इस प्रकार घर से कूच करने के बाद परिवारजनों के चिंता युक्त, रुआँसे ,भयभीत और गमगीन चेहरे क्या हम सहन कर पाएँगे? सच में माया महा ठगिनी हौं  जानी ।हमें प्रत्यक्ष रूप से अनुभव हो रहा था कि  यदि हम झाँसी की रानी ,ऋतंभरा या उमा भारती होते तो अपने बलबूते सब सेट कर लेते पर अब क्या करें अभिमन्यु की तरह इस मायाजाल के चक्रव्यूह में हम फँस चुके हैं जिससे सुरक्षित बाहर आना असंभव है ,फिर करें तो क्या करें मैंने सोचा हाँ यह ठीक रहेगा यह सोच कर मैंने ईश्वर को करुण स्वर में पुकारा हे ईश्वर !इस संसार रूपी मृग मरीचिका से मुझे मुक्ति दिलाओ ,कहने भर की देर थी कि  एक अलग ही प्रकार के व्यक्ति (दूसरे ग्रह के होने के नाते  )मेरे सामने उपस्थित हो गए और  बोले बालिके !तुम्हारी प्रार्थना मैंने सुन ली है और मैं तुम्हें लेने आया हूँ।मैं अचकचा गई आप कौन हैं? और मुझे कहाँ ले जाना  चाहते हैं? उपस्थित महाशय ने कहा कि मैं यमराज हूँ और तुम्हारी प्रार्थना सुनकर तुम्हें लेने आया हूँ चलो जल्दी करो मैं भयभीत हो गई कि  हाय यह कैसे और किस रूप में गाना सार्थक हुआ कि तुमने पुकारा और हम चले आए, जान तुम्हारी लेने आए रे...

 अब मैंने हिम्मत से काम लिया ओखली में सिर दिया तो मूसले से डरना क्या! मैंने वार्तालाप जारी रखते हुए पूछा कि यदि आप यमराज जी हैं तो आपका भैंसा कहाँ है? और आपके वे दो सींग कहाँ हैं ?मैं कैसे विश्वास करूँ! मेरी इस बात पर उन्होंने जोर का अट्टहास किया  और बोले नादान बालिके किस जमाने की बात कर रही हो जब तुम्हारी दुनिया में जेट कंप्यूटर सैटेलाइट सब हैं तो हमारे पास तो इनसे भी ज्यादा आधुनिक तकनीकी वस्तुएँ हैं, वह देखो मेरा वाहन जिसे समझने के लिए तुम इसे हेलीकॉप्टर कह सकती हो। यह वाहन  -अर्थ व्हाया  स्वर्ग या  नरक चलता है। इसको यात्रियों के अर्थात् आत्माओं  के अनुसार बड़ा या छोटा भी किया जा सकता है। वैसे भी आत्मा अति सूक्ष्म होती है अतः बहुत कम जगह घेरती है इसके अलावा उसके साथ कोई लगेज भी नहीं होता ।अरे मैं भी  कहाँ तुम से बहस करने लगा सीधे तरीके से मेरे साथ चलो ,मेरा टाइम वेस्ट मत करो ।मैंने सोचा अब तो  मामला गंभीर हो चला है जल्दी से जल्दी से कोई जुगत भिड़ानी होगी। मैंने कहा वाह महाराज आपने मेरी इस प्रार्थना को इतनी तत्परता से सुन लिया जबकि करोड़पति होने ,महादेवी वर्मा जैसी लेखिका होने और  ऐश्वर्या राय जैसी सुंदरता प्राप्ति के लिए भी कई प्रार्थनाएँ की थी तब तो उन  पर कोई कार्यवाही नहीं हुई? यमराज बोले वह सब अलग अलग डिपार्टमेंट  से संबंधित हैं जहाँ पर असंख्य अर्जियाँ लगी हुई हैं ।मुझे बहुत कम प्रार्थना पत्र मिलते हैं इसलिए मेरे विभाग में सुनवाई जल्दी होती है ,अच्छा तो यह बात है मैंने कहा तो अब यह बताइए कि मुझे कहाँ जाना होगा  स्वर्ग में या नर्क में ?यमराज हँसे और  बोले  तुम ही बताओ कि तुम किस योग्य हो ?मैंने कहा कि मैंने तो अपने तईं सारे अच्छे कर्म किए हैं ।श्रीमद्भागवत गीता एवं महाकवि वर्ड्सवर्थ के अनुसार कर्म को ही पूजा माना है -वर्क इस वर्शिप।शेक्सपियर के अनुसार संसार को स्टेज और अपने आप को एक कलाकार की भाँति समझ कर सदा अपना कर्तव्य ही निभाया है ।ऐसा क्या! तो ठीक है ,असलियत तो ऊपर जाने पर चित्रगुप्त के रजिस्टर को देख कर ही पता लगेगी यमराज जी बोले।मैं कुछ नहीं बोली  चुप हो गई असहाय सी ,फिर हिम्मत बटोरकर बोली महाराज  अभी तो मैंने कुछ खास सुख उठाये ही नहीं हैं ,मेरे छोटे-छोटे पोते-पोती हैं और तो और मेरा एक बेटा भी कुँवारा है उसकी शादी भी करना है, पोते-पोती को भी खिलाना है  वे सब परदेस में रहते हैं इसलिए यहां तो बहुत सारा काम बाकी है, मेरे लिए ।एक बार मैं अपना घर व्यवस्थित कर लूँ बैंक आदि के कागजात घर वालों को सौंप दूँ, आखरी बार सबको इकट्ठा कर उनके साथ रह लूँ  और उनको समझा दूँ कि  मुझे खुशी खुशी विदा करें फिर मैं स्वयं समाधि में बैठ जाऊँगी और श्री कृष्णम् शरणम् मम बोलूँगी तो स्वयं श्री कृष्ण भगवान मुझे लेने आ जाएँगे और आपको आने का कष्ट भी नहीं करना पड़ेगा यमराज फिर हँसे  बोले  यह तो वही बात हो गई की कद्दू में बैठी नानी ने शेर से कहा कि बेटी घर जाने दे ताजी मोटी होने दे फिर मुझे खाना और शेर ने विश्वास करके नानी को उसकी बेटी के घर जाने दिया और एक बार जो बुढ़िया अपनी बेटी के घर गई तो फिर उस रास्ते से लौटकर नहीं आई शेर बेचारा उसका रास्ता ही देखता रह गया। इतना ही नहीं हमारे कामकाज में डॉक्टर लोग भी अड़ंगा लगाते हैं किडनी ,लीवर ,हार्ट ,कैंसर जैसी बीमारियों को तो वे यूं दूर कर देते हैं कि हमारे धन्वंतरि भी दांतो तले अँगुली दबाते हैं ।ना बाबा ना तुम कलयुगी मनुष्य अब विश्वास के लायक नहीं  हो तुम वाक्चातुर्य में प्रवीण हो तो यह बताओ कि जब मरना ही है तो इतना सोच विचार किस लिए ?तुमने श्रीमद्भागवत गीता का जिक्र किया है तो तुम्हें मालूम होगाकि  जीर्ण वस्त्र  की तरह देह को त्यागना  ही मृत्यु है उस पर इतना मोह क्यों ?इस पर मैंने कहा कि महाराज अभी मेरा वस्त्र इतना जीर्ण भी तो नहीं हुआ है ।यमराज बोले बेेेेफालतू की बातें मत करो जन्म मरण और परण में मनुष्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है और पारिवारिक व्यवस्था आदि  की दलील में भी कोई दम नहीं है। दूसरों को मरता देखकर भी तुमको समझ नहीं आई। बातें तो तुम बड़ी-बड़ी करती हो खैर तुम्हारी इन्हीं बातों से मैं फ्रेश महसूस कर रहा हूँ वरना जहाँ जाता हूँ वहाँ रोना-धोना कलपना आदि सुनकर मेरा ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है ।आज पहली बार तुमसे मिलकर अच्छा लगा इसलिए तुम्हें मैं कुछ समय के लिये मोहलत देता हूँ पर मेरा यहाँ आना अकारथ नहीं जाता है अतः किसी अन्य व्यक्ति का नाम तुम  बताओ जिसे मैं ले जा सकूँ। मैंने कहा महाराज मैं ऐसा काम कैसे कर सकती हूँ वैसे ,मैं आपको याद दिला दूँ कि एक बार सावित्री ने सत्यवान के प्राण आपसे वापस लिए थे और उसके बदले में आपने किसी अन्य व्यक्ति को ले जाने की बात भी नहीं कही थी। यमराज बोले वह तो एक अपवाद था पर यहाँ तो ऐसा कोई कारण नहीं है अतः जल्दी से किसी व्यक्ति का नाम बताओ वरना तुम्हीं चलो। मैंने सोचा कि किसी असहाय वृद्ध अत्यंत बीमार अपंग मानसिक रोगी का नाम ले दूँ पर मुझे मेरे ज़मीर ने बोलने नहीं दिया अचानक एक नाम कौंधा  आतंकवादी! हाँ महाराज आप किसी आतंकवादी को ले जाइए जिस को सजा देने में कोर्ट को भी काफी समय लगता है और उसकी सुरक्षा में गरीब जनता के करोड़ों रुपए खर्च होते हैं । यमराज को यह सुझाव पसंद आया! उन्होंने कहा ठीक है पर अगली बार कोई बातचीत नहीं होगी सीधे तरीके से मेरे साथ चलना होगा। मैंने  चहक कर कहा शत प्रतिशत वचन देती हूँ। संतुष्ट होकर यमराज महोदय अपने अन्य ग्राहक की खोज में रवाना हो गए ।समय की कीमत समझते हुए मैंने शीघ्र ही उत्साह से महाप्रयाण की तैयारियाँ आरंभ कर दी कि जैसे मैं अभी दर्शनीय  स्थल स्विट्ज़रलैंड जा रही हूँ।  पर शीघ्र ही वास्तविकता का कटु सत्य मेरे सामने  आ गया वार्डरोब में सजी अपनी  साड़ियाँ ,घर का फर्नीचर डबल बेड एक-एक करके जमा किए बर्तन भाँडे आदि को देख देख  कर मेरी आँखों से गंगा जमुना बहने लगी। फिर मेरे निधन के पश्चात्  बच्चों पति और रिश्तेदारों आदि के ऑंसू रुलाई और उदासी तथा दुख से भरे चेहरों का विचार कर मैं फफक पड़ी। सच में मनुष्य जन्म को इतना सामान्य समझना  और देह को जीर्ण  वस्त्र कहना तथा  अध्यात्म की बड़ी बड़ी बातें करना और बात है ।और उस पर अमल करना तो बिल्कुल ही अलग ।मैं सिसकियां भरने लगी अचानक दूध वाले की आवाज ने मुझे जगा दिया अब मैं पुनः जागृत अवस्था में थी सपने ने मुझे आगे की राह दिखा दी थी उस दिन से मैंने अंतिम यात्रा की तैयारी आरंभ कर दी है और भरसक पुण्य के कार्य करने लगी हूँ ।गीता जी की यह पंक्ति सुख दुखे समे कृत्वा लाभालाभौ  जया जयौ
       अब मैं  इस दुर्लभ मानव जीवन को वर्तमान में स्थित रह कर अनासक्ति के साथ बिना किसी अपेक्षा और उपेक्षा पर ध्यान दिये भरपूर आनन्द और उल्लास के साथ जी रही हूँ।
     'न जाने किस घड़ी में तेरा(यमराज जी से )मेरा  सामना होवे ,नज़र पड़ जाए मुझ पर तेरी ,मेरा राम नाम सत्य हो जाए ।

Disclaimer:
इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Tuesday, 16 June 2020

Satire: करोना वारिस

आज आप सब के साथ मुझे इंदौर से श्रीमती उर्मिला मेहता जी की हास्य-व्यंग्य रचना को share करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। 

एक कठिन परिस्थिति को बहुत ही खूबसूरती से हास्य-व्यंग्य में ढाला है, यह हास्य व्यंग बुन्देलखण्ड भाषा में पिरोया गया है, आप इसका आनन्द अवश्य लें। 


करोना वारिस
 
Image Courtesy: Freepik

हाय दैया जे 

मोदी भैया ने जो कछु कओ हतो, टी. वी. में तुम्हरी सौं, हमरे तो पिराण हलक में आ गए। नागासाकी ओर हिरोसिमा को झगड़ो याद आ गओ। हमने अपने मोड़ा से जा बात कई तो बाने कई कि "मतारी बो झगड़ो तो जापान देस के दो गाँवन के बीच में हुओ हतो। जे तो पूरी दुनिया में पसरो है।"

   एक बात तो हमें बहुतई बुरी लगी कि सठियाये लोग जादा धियान रखें। अब भैया, भौजी और बिन्नो, गुंइयां तुम से का लुकावें (अपने जान के हम उमर बता रए हेंगे, हम तो ७० के भी ऊपर हो गए हेंगे !) हमरो तो बाहर जानो मुस्किल हो गओ। भाटसेप और जो बुद्धू बक्सो कब तक देखें, गुइयां तुमई बताओ।

      जाड़ो चलो गओ सो हमने सोची कि दुलाई बिस्तर धरिबे को बक्सा में धर के डामर की गोरी डार दें।तो का भओ कि हमरे नाती ने बा गोली देख लई और पूछन लगो कि जे गोरी काय लाने बिस्तरे में डार रई हो अम्मा तो हमने बाय समझाओ कि जे गोरी डालवे से कीड़े-मीड़े नई परतहैं।जा बात सुनके बाने ऐसी बात कई कि सब घरवारे खूब हँसन लागे।हमरो छोटो सो नाती  कहन लगो कि जे गोरी करोना वारिस के सामने काय नई डार देती हो अम्मा  ,सब कीटाणु मर जे हैं😆😆

     आज तो  हमरी दुलेन के रई हती की जो करोना वारिस वर्ड टूर पे निकर गओ है ,सो  अम्मा तुम तो घर पे रे के माला ही जपियो सो सबके लाने अच्छो रेगो।मोय तो चूल्हो चक्की ओर मोड़ा, मोड़ी को देखिबो  परेगो ।

    मोय तो बड़ो डर लग रओ है,भगवान जा  बीमारी से सबई लोगन की रच्छा करे।

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Monday, 18 November 2019

Stories of Life : इसमें मेरा क्या कसूर 2


इसमें मेरा क्या कसूर 2

“इसमें मेरा क्या कसूर” में आप सब ने भैया की बातें इतने 
अच्छे से सुनी कि अपनी आपबीती बताए बिना, मुझ से भी नहीं रहा गया, और हाँ आप सब मेरी कहानी भी पूरे ध्यान से सुनिएगा।

हाँ तो हुआ यूँ, जब मैं पैदा हुआ, तब तक सब का जोश ठंडा हो चुका था, क्योंकि आप सब जानते ही हैं, बड़े भैया के समय क्या हुआ था। अब जब माँ को प्रसव पीड़ा हुई, तो कोई साथ चलने को तैयार नहीं था।

सबसे गज़ब बात तो यह थी, कि पिता जी भी आने में आना-कानी कर रहे थे। तभी माँ ने घूर के देखा, और कहा- अगर आप भी नहीं चलेंगे, तो मैं भी hospital नहीं जा रही। माँ के ऐसा बोलने से पिता जी घबरा गए, घर में बच्चा कैसा पैदा होगा? तो साथ चल दिये।

मेरे पैदा होने पर nurse पिता जी को मुझे सौंपने आई, पिता जी मुझे देखकर दुखी हो गए। nurse ने पूछा, क्या हुआ आप दुखी क्यों हैं? गोरा चिट्टा, सुंदर सा बेटा भी आपको खुश नहीं कर पाया?

बेटा!.....  मेरे बेटा हुआ है? जी, nurse 
कहकर चली गयी। पर पिता जी को यक़ीन ही नहीं हुआ, कि कोई लड़का भी इतना गोरा, सुंदर हो सकता है? उन्होंने तुरन्त check किया। तब जा कर वो यक़ीन कर पाये। 

हद तो तब हो गयी, जब पिता जी मुझे, माँ के पास ले गए, क्योंकि, जनाब! माँ भी बिना check करे, यक़ीन ना कर सकीं। अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर। 

पूरे घर को बता दिया गया, गोरा सुंदर सा बेटा हुआ है, लोग तो कई आए, पर जितनों ने मुँह देखा, उतने ही लोगों की check करने की भी इच्छा थी।

हालात यहीं नहीं थमे, पहले जन्मदिवस पर ना जाने कितनी ही frock मिल गईं। उसमें से कुछ तो बहुत ही खूबसूरत भी थीं, जिसने माँ का मन मोह लिया।

बस फिर क्या था, मुझे उनमें से एक सुन्दर सी frock पहना दी। साथ ही मेरे घुँघराले काले बालों में सुन्दर band लगाकर चोटी भी बना दी। पर इतने से ही मन भर लेती माँ, मत कर ऐसा माँ......।  
पर नहीं जी, माँ तो, माँ होती है। अपने लाडले को इतनी खूबसूरती से तैयार किया था, और facebook पर फोटो upload ना करें। ऐसा कैसे हो सकता था? 

भाई सच! जितने किसी cute लड़की को comments ना मिलें होंगे, उससे बहुत अधिक मुझे मिले थे। सबने लिखा था, इतनी cute baby आज तक नहीं देखी, अब माँ सबको कहती रह रही, बेटी नहीं बेटा है......

दादी अलग गुस्सा हो गयी, अच्छे खासे लड़के को लड़की बना कर रख दिया। अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर।

कुछ बड़ा हुआ, तो अलग ही मुसीबत का सामना करने लगा, जब भी बीमार पड़ता, और डॉ. को दिखाया जाता, तो सब बोलते, कैसा सफेद रखा है, आपका बच्चा, कुछ खाता नहीं है क्या? इसका तो hemoglobin बहुत कम है, पहले वही check करना होगा। मेरा hemoglobin हमेशा 12 के ऊपर ही रहा, पर  हर बार मेरा hemoglobin check करा दिया जाए। 

सही hemoglobin देखकर भी किसी का मन ना भरे, मुझे दुनिया भर की दवाई और ना जाने क्या क्या खाने की हिदायत मिल जाए। 
checking हमेशा चलती रही ..... अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर।

भगवान जी भी ज्यादा ही मेहरबान थे, रूप के साथ बुद्धि भी भरपूर दी थी, तो बस क्या था School से लेकर college तक ना जाने कितनी लड़कियाँ दीवानी हो गयी थीं। 

आप सोच रहे होंगे, मज़े थे भाई तुम्हारे तो..... अरे! नहीं थे, जितनी थीं, सब चाहतीं, उन्हें ही भाव मिले, एक को दो, तो दूसरी खफ़ा। homework तक नहीं बताती थीं, अब एक अकेला मैं किस किस को खुश करूँ। अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर।

जब जवानी आई तो माँ की सख्त हिदायत थी, खबरदार जो किसी को घर ले आया, मेरी पसंद की लड़की से ही शादी करनी होगी।

पर वो बात अलग है, कि माँ भी अपनी ज्यादा चला नहीं पायीं, क्योंकि सारे रिश्तेदार अपनी-अपनी पसंद की लड़की के साथ पहले ही booking करके रखे थे। 

अब तो माँ भी परेशान, बुआ की पसंद वाली से करें, तो चाची खफा, चाची की पसंद देखें तो मामी बोलें, दीदी हमेशा ससुराल वालों की तरफ ही झुकेंगी, मौसी भी कहाँ पीछे रहती, खूब बढ़-चढ़ कर मामी का साथ देतीं, आखिर उन्हें अपनी वाली की setting जो करनी थी। और माँ का रुख जरा मायके पक्ष की ओर हुआ, कि बुआ-चाची की त्योरियाँ चढ़ जाती, खबरदार, भाभी जो उधर की लड़कियाँ देखी तो! 

माँ भी अपना सर पकड़ कर बैठ जाती, एक के लिए कोई बताता नहीं है, दूसरे के लिए कोई छोड़ता नहीं है। अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर।

और जनाब, शादी क्या हुई, मेरे भी घोड़े के मानिंद पट्टी बांध दी गयी, जिससे मैं सदा सीधे ही देखूँ (मतलब हमेशा बीवी को) , कहीं इधर-उधर नहीं देख सकता था।  तब भी बीवी का शक कम नहीं होता, हर रोज़ तगड़ी checking होती है, ऐसा कैसे हो सकता है, कि कोई पास ना मँडराई हो? 

Checking still continues.....  अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर।

काले और लाल कपड़े तो मेरे लिए हमेशा ही ban रहे, बचपन में माँ ने पहनने नहीं दिये, कि हाय! मेरे लाल को नज़र ना लग जाए, वैसे ही इतना गोरा है, काले-लाल में और ही खिलेगा। बीवी भी पहनने नहीं देती है, कहती है, वैसे ही गोरे रंग ने आफत मचा रखी है, काला-लाल पहनने दूँगी, तो सारे समय घर के आगे कर्फ़्यू लगा रहेगा, अब मैं ऐसा हूँ, तो हूँ, इसमें मेरा क्या कसूर।

Disclaimer : यह कहानी एक कल्पना मात्र है, आप सबको हास्य  व्यंग्यात्मक कहानी के जरिए हँसाने की कोशिश की है। किसी को किसी भी तरह की चोट पहुँचाने का इरादा नहीं है। 

 Complexion से कोई फर्क नहीं पड़ता है, गम सब के हीं हैं, अलग-अलग। पूरी तरह से जहान में खुश तो कोई भी नहीं।   

Monday, 4 November 2019

Article : क्यों कम हो गए chocolaty hero

क्यों कम हो गए Chocolaty Hero


आज कल पुरुषों में moustache and beard का fashion इस कदर बढ़ गया है, कि chocolaty heroes का तो जैसे अभाव ही हो गया है। जिस ओर देखो, पुरुष मूछे - दाढ़ी बढ़ाए हुए ही दिखेंगे।
फिर चाहे आप फिल्मों में देखें या serials में, cricket में या अपने आसपास, दाढ़ी - मुंछों वालों की ही अधिकता बढ़ती जा रही है।

अब हम ठहरे लेखिका, तो हमारा ध्यान तो समाज में होने वाली हर छोटी बड़ी बात खींचती है।

तो सोचा, इसका कारण क्या है? बहुत सोचा तो इसी नतीजे पर पहुँचे, कि इसका कारण भी नारी ही है।

अब आप बोलेंगे, वो भला कैसे? पुरुषों की हर बात नारी पर ही ख़त्म नहीं होती है।

नहीं होती होगी जनाब, नाराज़ ना होइए।

पर ये तो है ही, जानना चाहेंगे कैसे?

तो देखिये,

नारियां, पुरुषों से कंधा मिलाते - मिलाते अब इतना आगे निकल गयी हैं, कि उन्होंने पुरुषों से अपनी पहचान और अस्तित्व ही मिला लिया है।

अब ना वो सिन्दूर लगाती हैं, ना चूड़ियाँ पहनती हैं, अब ना करती हैं सोलह - श्रृंगार, ना अब वो पहले सी जुल्फें लहराती हैं, ना आंचल संभालती है।

वो तो अब पुरुषों की मानिंद ही jeans - shirt पहनती हैं, shorts पहनती हैं, या यूँ कहें, वो सब पहनती हैं, जो पुरुष पहनते हैं। बाल भी उनके छोटे होने लगे हैं।

पुरुषों कों जब अपनी पहचान और अस्तित्व पर खतरा मँडराता नज़र आने लगा। तब वो विचार करने लगे, कि ऐसा क्या किया जाए? जिसकी समानता करने पर स्त्री दो बार सोचे जरूर।

फिर उन्हें सूझा, कि अगर दाढ़ी - मूछ रखी जाए, तो उसमें स्त्री समानता नहीं करना चाहेगी, और एक बार फिर वो अलग दिखने लगेंगे।

बस फिर क्या था, आ गया दाढ़ी - मूछों वालों का दौर। जिससे chocolaty hero का दौर हमेशा के लिए जाता जा रहा है।
पुरुषों का सोचना सत्य साबित हुआ, अब वे अलग दिखने लगे हैं।

पर कितने दिन के लिए! भगवान ही जाने?

क्योंकि नारी शक्ति को कम मत आंकिएगा, कब आपकी ये पहचान भी छिन जाए।

मेरी मानिए, तो अभी से इस बारे में भी सोचना शुरू कर दीजिये।

किस बारे में?

अरे अगली पहचान के बारे में!

तब तक के लिए राधे राधे...

Disclaimer : यह सिर्फ एक व्यंग है, किसी को चोट पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है।