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Friday, 28 August 2026

Story of Life : राखी का सौदा (अंतिम भाग)

राखी का सौदा (भाग-1) के आगे…

राखी का सौदा (अंतिम भाग)


कृतिका ने हाँ तो कह दिया, पर उसको विश्वास नहीं था कि उसके भैया उससे राखी बंधवाए बिना रह लें। वो राखी में आई तो उसने देखा कि घर पर सचमुच ताला लगा था। 

यह देखकर उसके आंसू छलक आए, भैया ने ऐसा कैसे कर लिया, वो पलटी ही थी कि उसका ध्यान गया कि ताला सिर्फ सामने लगा था, back entry पर नहीं।

वो समझ गई कि भैया-भाभी घर पर ही हैं, क्योंकि कृष security के मामले में बहुत particular था। सब जगह lock लगाकर ही वो घर से निकलता था।

कृतिका ने पीछे के door को ऐसे knock किया, जैसे राधेश्याम दूध वाले भैया करते थे। सुहाना ने दूध वाला समझकर दरवाजा खोल दिया।

पर सामने कृतिका को देखकर सकपका गई। कृतिका भी दनदनाते हुए गुस्से में सीधे कृष के कमरे में पहुंच गई।

“भैया, घर पर रहने के बाद भी ऐसा भी क्या हो गया कि राखी न बंधवाना पड़े, इसके लिए झूठ बोला आपने? अपनी बहन से बस इतना ही प्यार है आपको…” आदि, आदि।

कृतिका बोले जा रही थी और कृष सब कुछ चुपचाप सुन रहा था। तभी सुहाना आ गई और उसने झूठ बोलने का सारा कारण बताया।

सुनकर कृतिका फूट-फूटकर रोने लगी, और कहने लगी, “भैया आपने मुझे पराया कर दिया! आप एक बार अपनी परेशानी बताते, तो क्या मैं मदद न करती?”

“आप ने यह किस तरह से सोच लिया कि मैं यहां आपसे दुनिया भर के सामान लेने आती हूँ, और अगर कम दिया, तो फ़र्क पड़ जाएगा।”

“भैया, राखी का अर्थ यह नहीं है कि हमेशा भाई ही रक्षा करेगा, हमेशा वो ही बहन को देगा। बल्कि ज़रूरत पड़ने पर बहन भी दे सकती है, रक्षा कर सकती है।”

यह कहकर कृतिका ने कृष के account में 50 lakhs रुपये transfer कर दिए।

“अरे कृतिका, यह क्यों? मैं अपनी छोटी बहन से पैसा नहीं ले सकता, क्यों पाप चढ़ा रही है?”

“नहीं भैया, ऐसा कुछ नहीं है और मैंने जो दिया है, सब आपका ही दिया हुआ और अभी भी बहुत है, मेरे पास आपका दिया हुआ, अतः और लगे तो बोल दीजिए मैं transfer कर दूंगी। और हाँ भाभी, भैया तो कुछ बोलने से रहे तो आप ही बता दीजिएगा।”

“और सबसे बड़ी बात भैया, कि बहनें भाई के पास राखी का सौदा करने नहीं आती हैं, दुनिया भर के सामान बटोरने नहीं आती हैं, बल्कि वो आती हैं, अपने भैया-भाभी का प्यार बटोरने, उनके संग बिताए पलों की यादें समेटने, रिश्ते को अटूट करने और उनके सुख-दुख में जिंदगी भर जुड़े रहने के लिए। क्योंकि राखी कोई बंधन नहीं है बल्कि एक डोर है, जो मजबूती से भाई-बहन को जोड़कर रखती है।”

“राखी के धागे में बंधी होती है,

प्यार की सबसे मजबूत गांठ।

दुआ है हमेशा खुश रहो भाई,

तुम्हारी राह हो आसान।।”

इसके साथ ही कृतिका ने घर में लगे सारे locks खोल दिए, फिर अपने साथ लाए राखी व मेवा मिठाई से टीका-रुचना किया। 

पूरा दिन पुरानी यादों को ताज़ा किया गया, फिर कृतिका चली गई, भैया-भाभी के मन में राखी का सही अर्थ बताकर।

लौटते हुए उसने खूब सारे सामान खरीद लिए, जिससे उसके भाई का मान उसके ससुराल में कम न हो।

कृतिका ने इतने पैसे दे दिए थे, कि कृष का business जल्द ही वापस flourish करने लगा।

अगली राखी में फिर से कृतिका का धूम-धड़ाके के साथ स्वागत किया, अब की बार राखी के तोहफे के साथ 50 lakhs भी दिए, यह कहकर कि तुमने अपने भाई का मान बचाने के लिए दिए थे, अब मान बनाए रखने के लिए ले लो।

कृष की इस बात के आगे कृतिका कुछ नहीं बोली और उसने मान के रुपये रख लिए।


आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Thursday, 27 August 2026

Story of Life : राखी का सौदा (भाग-1)

राखी का सही अर्थ बताती हुई, हृदयस्पर्शी कहानी...

राखी का सौदा (भाग-1)


कृष और कृतिका दोनों में बहुत प्यार था। एक-दूसरे के बिना चैन नहीं था। इतना प्यार की उन्हें मां-पापा से पहले एक दूसरे की याद आती थी। 

लतिका दोनों बच्चों का प्यार देख निहाल हो जाती, पर कभी-कभी उसको यह चिंता भी सताती कि क्या यह प्यार इनकी जिंदगी भर रहेगा? इनकी शादी हो जाने से कोई फर्क तो नहीं आएगा?

प्रणव कहता, “तुम नाहक चिंता करती हो, भाई-बहन का रिश्ता सबसे निराला होता है। जब अभी उनको अपने आगे हमारी याद नहीं सताती है, तो कभी भी कोई भी कारण इन लोगों के प्यार में दरार नहीं डाल सकता।”

दिन गुजरते गए और कृष व कृतिका का प्यार गहराता गया।

कृष की शादी सुहाना से हुई। वो भी घर में रच-बस गई।‌ सुहाना और कृतिका की भी खूब पटती थी।

कृतिका की शादी के समय कृष और सुहाना काम में इतने ज्यादा जोश से लगे थे, कि समझ नहीं आ रहा था कि कृतिका लतिका और प्रणव की बेटी है या कृष और सुहाना की।

शादी खूब धूमधाम से हुई। हर ओर शादी के arrangements की वाहवाही हो रही थी।

विदाई के समय कृतिका लतिका और प्रणव से गले मिलकर रोने लगी, पर जब उसके भैय्या-भाभी आए, तो वो उनसे लिपट कर इतना तेज़ रोने लगी कि उसे संभालना मुश्किल हो रहा था।

उसे विह्वल देखकर, कृष और सुहाना कृतिका को उसके ससुराल तक छोड़ कर आए।

पहली राखी पर जब कृतिका मायके में पहुंची तो ढोल-नगाड़े के साथ उसके भैय्या-भाभी ने उसका भव्य स्वागत किया। 

पूरा त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया और विदा के समय कृष ने कृतिका के साथ गहने, रुपये-पैसे, कपड़े, मेवा-मिठाई आदि इतना ज्यादा दिया, जैसे लोग शादी-विवाह में बेटी को देते हैं।

अब तो यह सिलसिला हर राखी में ही होता, कृतिका की ससुराल में भी सब कहते कि तुम्हारा भाई जहां से निराला है, इतने सालों तक कौन इतना मान-मनुहार करता है। तुम दोनों भाई-बहन का प्यार ऐसा ही बना रहे।

पर सब दिन एक से कहां होते हैं। 

कृष का business थोड़ा घाटे में जाने लगा। राखी आने को थी, तो उसकी चिंता और बढ़ गई कि बहन आएगी तो हर बार की तरह उतना नहीं दे पाएगा। 

तो क्या करें, पैसे उधार ले? या इस बार घर पर न रहें? वो इसी उहापोह में था, तो सुहाना ने कहा कि उधार लेकर भी वो उतना अधिक नहीं कर पाएंगे, तो अच्छा रहेगा कि इस साल घर पर न रहें और एक बार सब ठीक-ठाक हो जाने पर वैसा ही मान-मनुहार कर लेंगे।

सुहाना ने कृतिका को फोन करके बता दिया कि वो लोग business के कारण abroad जा रहे हैं, बड़ी deal मिली है, आने से बताएंगे और उसके राखी के तोहफे तभी उसके घर लेकर आएंगे।

कृतिका ने हाँ तो कह दिया, पर उसको विश्वास नहीं था कि उसके भैया उससे राखी बंधवाए बिना रह लें। वो राखी में आई तो उसने देखा कि घर पर सचमुच ताला लगा था। 

यह देखकर उसके आंसू छलक आए, भैया ने ऐसा कैसे कर लिया, वो पलटी ही थी कि उसका ध्यान गया…

आगे पढ़ें, राखी का सौदा (भाग-2) में…

Friday, 21 August 2026

Story of Life : सावन के झूले (अंतिम भाग)

सावन के झूले (भाग-1)

सावन के झूले (भाग-2) के आगे…

सावन के झूले (अंतिम भाग)


आखिर ऐसा भी क्या बिगाड़ा था उन्होंने किसी का, जो ऐसा हुआ, एक-दूसरे की धड़कन और दिल थे दोनों, आखिर एक-दूजे से दूर रहकर कैसे जिएंगे?

कुछ दिनों बाद ही कजरी तीज आ गई। सब ओर सावन के झूले पड़ गये।

सारे apartments में ladies में ग़ज़ब का उत्साह था। उसके apartment में ladies and gents दोनों मिलकर सावन का त्योहार मनाया करते थे। पति अपनी पत्नी को प्यार से झूला झूलाते।

ऐसा करते देख अनिका के मन में सिर्फ एक गाना गूंज रहा था-

“सावन के झूले पड़े 

तुम चले आओ

तुम चले आओ” 

अभी वो सोच में डूबी हुई थी कि doorbell बज उठी। अनिका ने दरवाजा खोला तो सामने सुहास खड़ा था।

“अरे तुम!” कहकर अनिका खुशी से सुहास के गले लग गई। थोड़ी देर बाद, “पर तुम तो आने वाले नहीं थे, फिर!”

“सब दरवाजे पर ही जान लोगी या अंदर भी चलोगी?” सुहास ने कहा, “तुम से बिछड़ कर मैं जी ही नहीं पा रहा था। 

हमेशा उदास और दुखी रहता, एक दिन मेरे boss ने मुझे बुलाया और कारण पूछा। मैंने बता दिया कि हमारी नयी शादी हुई है, अभी तो अपनी पत्नी के साथ चंद पल ही बिताए थे कि work from home खत्म हो गया।

वो बोले- अच्छा एक काम करो, finance का काम सीखना शुरू कर दो, अगर तुम्हारी performance मुझे अच्छी लगी, तो तुम्हारे शहर में तुम्हारी fix job कर दूंगा, लेकिन हाँ, काम में कोई कोताही नहीं चलेगी।

बस मैंने बहुत तेजी से दिन-रात काम सीखना शुरू कर दिया। जब boss ने check किया, तो मैं उसमें खरा उतरा।

बस क्या, अब से तुम्हारे पास हमेशा के लिए”

बाहर गाना बज रहा था-

“मोहब्बत बरसा देना तू

सावन आया है”

और अंदर अनिका सुहास की बाहों में खो गई, अपने सुहाने पलों को समेटते हुए…

Thursday, 20 August 2026

Story of Life : सावन के झूले (भाग-2)

सावन के झूले (भाग-1) के आगे…

सावन के झूले (भाग-2)


सुहास को ऐसा देखकर अनिका सहम गई कि न जाने phone पर ऐसी क्या बात हुई, जिसने चहकते हुए सुहास को यूं खामोश कर दिया।

“क्या हुआ सुहास? तुम इतने उदास क्यों हो गए?”

“मेरा work from home खत्म हो गया है और मुझे दो दिन में ही join करना है।”

“अरे! तो क्या हो गया? कर लो join, उसमें दुःखी होने जैसा क्या है?”

“अब हम साथ में नहीं रह पाएंगे,” कहते-कहते सुहास का गला सूखने लगा।

“साथ नहीं रह पाएंगे, मतलब?” अनिका ने परेशान होते हुए पूछा।

“मुझे हर दूसरे हफ्ते अलग-अलग शहरों में जाना होगा, साथ ही बीच-बीच में abroad भी जाना होगा। तो हर जगह तुम्हें नहीं ले जा सकता हूं।”

सुनकर अनिका की आंखों से अश्रु की अविरल धारा बह निकली। 

“यह क्या हुआ, कैसे हुआ 

कब हुआ, क्यों हुआ 

अरे छोड़ो यह न सोचो”

सुहास थोड़ी देर में उठा और अपना सब सामान pack करने लगा। दो दिन कब निकल गये, packing की आपाधापी में समझ ही नहीं आए।

और सुहास अनिका को छोड़कर, joining के लिए चला गया।

अनिका का एक-एक दिन पहाड़ सा बीतने लगा। बारिश की झड़ी देखकर उसे बस यही लगता-

“हाय-हाय ये मजबूरी 

ये मौसम और ये दूरी 

मुझे पल-पल है तड़पाए 

तेरी दो टकिया की नौकरी में 

मेरा लाखों का सावन जाए”

Join करने के बाद सुहास का phone आया, अनिका ने उठाया भी, दोनों बहुत बातें करते थे, पर आज दोनों तरफ शांति थी, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि बात क्या करें। 

“चुप तुम रहो चुप हम रहें

चुप तुम रहो चुप हम रहें

खामोशी को खामोशी से

ज़िंदगी को ज़िंदगी से बात करने दो”

थोड़ी देर बाद दोनों ने phone रख दिया, और दोनों सोच रहे थे कि आखिर उनकी हंसती-मुस्कुराती जिंदगी को किसकी नज़र लग गई।

आखिर ऐसा भी क्या बिगाड़ा था, उन्होंने किसी का, जो ऐसा हुआ, एक-दूसरे की धड़कन और दिल थे दोनों, आखिर एक-दूजे से दूर रहकर कैसे जिएंगे…

आगे पढ़ें, सावन के झूले (अंतिम भाग) में…

Tuesday, 21 July 2026

Story of Life : वो कौन था (अंतिम भाग)

वो कौन था (भाग-1),

वो कौन था (भाग-2),

वो कौन था (भाग-3)

वो कौन था (भाग-4) के आगे…

वो कौन था (अंतिम भाग)


“सर, यह आपको बहुत प्यार करती थीं, पर आपने इन्हें कभी तवज्जों ही नहीं दी। आपके medical world में डूब जाने के बाद यह धीरे-धीरे depression में चली गईं और एक दिन mental asylum में आ गईं।

“पर तुम्हें कैसे पता यह सब?”

“सर, मेरी बुआ जी यहां पर doctor हैं, तो उन्हीं से मिलने आया था। तभी मुझे तृषा दिखी, उसका पीछा किया तो वो इस कमरे में चली गई। मैंने बुआ जी से पूछा कि उस कमरे में कौन है, और तृषा वहां क्यों गयी है, तब पूरी बात पता चली। पर अब मैं जो आपको बताने जा रहा हूं, वो बात अविश्वसनीय है, और जिसके कारण ही आपके hospital को defame मिला।”

“ऐसा भी क्या बताने जा रहे हो? ज्यादा पहेली न पूछो, सीधा-सीधा बताओ।”

“सर, हमारे hospital में तृषा के साथ जो कुछ भी हुआ था, वो उसके साथ किसी और ने नहीं बल्कि खुद तृषा ने किया था, जिससे उस तमाशे के बाद hospital में resignation letter छोड़कर चली जाए और कुछ दिन बाद आपको और Srijan hospital को defame कर दें।”

यह सुनकर कुशल चौंक गया कि उसको बर्बाद करने के लिए तृषा इस हद तक गिर गयी। उससे रहा नहीं गया और वो सीधे रिया के कमरे में पहुंच गया।

कुशल को वहां आया देखकर तृषा सकपका गई और रिया खुशी से चहक उठी।

कुशल ने गुस्से से तमतमा कर तृषा की ओर देखा और कहा, “मुझे तुमसे इस तरह की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। मैं सोच ही नहीं सकता था कि कोई लड़की अपने को इस तरह से भी प्रताड़ित दिखा सकती है। क्यों, आखिर क्यों? क्या कसूर था मेरा!”

तृषा ने घृणा से कहा, “आप मेरी दीदी के, मेरे बचपन के खोने के दोषी हैं।”

“किस तरह से दोषी हो गया? मैंने तुम्हारी दीदी से कभी प्यार नहीं किया, तुम्हारी दीदी मुझसे प्यार करती थी, उसने कभी इज़हार नहीं किया, कि मैं जान पाता कि तुम्हारी दीदी मुझे चाहती है। तो मैं दोषी कैसे हो गया? मेरे doctor बनने की चाह हमेशा से मानवता की सेवा थी। क्या ऐसी सोच, ऐसी चाह गुनाह है? और तुमने मेरे hospital को defame करके न केवल मुझे नुकसान पहुंचाया है, बल्कि लाखों-करोड़ों उन मरीजों को भी नुकसान पहुंचाया है जिन्हें अच्छे treatment की आवश्यकता है। तुमने बदला लेने के जुनून में न केवल अपने स्त्री होने को, बल्कि अपने doctor होने को भी अपमानित और कलंकित किया है।”

कुशल की ऐसी बातों ने तृषा के साथ-साथ रिया को भी झकझोर दिया।

रिया अपनी छोटी बहन तृषा को बहुत चाहती थी, तृषा की इन हरकतों से क्रोधित होते हुए बोली, “तृषा, तूने मेरे देवता को अपमानित किया है, तूने गलत सोचा है कि मेरी तबीयत इनके कारण ख़राब हुई है। इन्हें तो पता ही नहीं था कि मैं इन्हें चाहती थी। मैं इनसे कभी अपने मन की बात बोल ही नहीं पाई।” कहकर रिया फूट-फूटकर कुशल के पैरों पर गिर गई।

“दीदी, मुझे माफ़ कर दो, आप ही मेरा सब कुछ थीं, आपकी ऐसी हालत देखकर मैं सिहर उठी थी, क्रोध से पागल हो गई थी और उसमें मैंने देवता तुल्य कुशल सर को और न जाने कितने मरीजों को नुक़सान पहुंचा दिया।”

“कुशल सर, मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं आपकी स्त्री जाति की और doctor होने की गरिमा की गुनहगार हूं। मुझ नादान, नासमझ को माफ़ कर दीजिए।”

कुशल ने रिया के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और उसके जल्दी ठीक होने की कामना कर तृषा से बिना कुछ बोले वहां से चला गया।

अगले दिन, बहुत से newspaper के front page पर तृषा का confession था कि सृजन hospital से सुरक्षित कोई जगह नहीं है। उसके साथ जो कुछ भी हुआ था, उसकी जिम्मेदार वो खुद है।

इसके कुछ दिनों बाद से ही वापस से सृजन hospital और doctor कुशल की fame हर जगह जगमगा उठी। जिस-जिस ने उल्टे-सीधे इल्ज़ाम लगाए थे, सबने माफी मांगी। सारे doctors लौट आए, including तृषा।

रिया का इलाज सृजन hospital में ही होने लगा, और वो बहुत तेजी से ठीक होने लगी…

Monday, 20 July 2026

Story of Life : वो कौन था (भाग-4)

वो कौन था (भाग-1),

वो कौन था (भाग-2)

वो कौन था (भाग-3) के आगे…

वो कौन था (भाग-4)


एक दिन राघव ने कुशल को आकर जो बताया, वो अविश्वसनीय था, ऐसा भी हो सकता है, वो सोच ही नहीं सकता था।

वो सीधा राघव के साथ वहाँ पहुंच गया, जहाँ से राघव को यह अविश्वसनीय खबर मिली थी। वो एक mental asylum था।

“राघव, यह मुझे कहाँ लाए हो?”

“Sir, उस जगह, जहाँ आपको अनबुझ पहेली का जवाब मिलेगा। आप बस चुपचाप मेरे पीछे-पीछे आइए।”

राघव के साथ कुशल चुपचाप चलता गया और finally राघव एक कमरे की खिड़की के सामने जाकर रुक गये। कमरे में मद्धम रोशनी थी, जो कि वहाँ एक लेटी हुई पर पड़ रही थी।

जब कुशल ने गौर से देखा तो चौंक गया, “अरे! यह तो रिया है।”

“हाँ Sir, यह रिया जी ही हैं।” राघव ने स्वीकृति में सिर हिला दिया।

“मेरी classmate, मेरी ही तरह बहुत होनहार, पर यह यहां कैसे पहुंच गई?” कुशल पुरानी यादों में खो गया...

“आपके कारण सर।”

“मेरे कारण! यह तुम क्या कह रहे हो? मैंने ऐसा क्या किया? मैंने इसके साथ कुछ बुरा किया था, ऐसा तो मुझे कुछ याद नहीं।”

“सर…

आगे पढ़ें, वो कौन था (अंतिम भाग) में…

Sunday, 19 July 2026

Story of Life : वो कौन था (भाग-3)

वो कौन था (भाग-1)

वो कौन था (भाग-2) के आगे…

वो कौन था (भाग-3)


उसने hospital में CCTV cameras और बढ़ा दिए, जिससे यह काम और मुस्तैदी से किया जा सके।

पर दो दिन बाद ही यह क्या हुआ, जिसे देखकर सब हतप्रभ रह गए।

तृषा का पूरा room गुलाब के फूलों से सजा हुआ था, और उसकी table पर खून से लिखा हुआ था, “तृषा, तुम्हें मेरी होने से कोई नहीं रोक सकता है!”

और वहीं एकदम गुमसुम-सी पीली पड़ चुकी तृषा खड़ी हुई थी, जिसकी आंसूओं से भरी आंखें मानो सबसे कह रही हों, ‘Please मुझे जाने दो, वरना मैं नहीं बचूंगी।’

कुशल ने आगे बढ़कर जब तृषा को थामा, तो तृषा बेहोश होकर उसकी बाहों में झूल गयी।

जब तृषा को होश आया तो वो बस एक ही रट लगाए हुए थी कि अब वो नहीं रुकेगी और चली जाएगी। 

कुशल ने CCTV footage देखी तो हैरान रह गया, तृषा के room के पास के सारे CCTV cameras बर्बाद किए जा चुके थे। अतः कुछ भी नहीं पता चला।

अगले दिन सुबह ही तृषा ने कुशल की table पर अपना resignation letter रख दिया और hospital छोड़कर चली गई।

एक अनबुझ पहेली-सी तृषा आई थी और चली गई।

दो दिन बाद ही हर newspaper की headline थी कि सृजन hospital में ladies staff safe नहीं हैं, इसलिए ही एक होनहार doctor तृषा ने तंग आकर hospital छोड़ दिया।

News का आना था कि हर ओर कुशल की चर्चा होने लगी कि कुशल ने ऐसा hospital खोलकर लोगों की भावनाओं से खेला है।

इस बदनामी के साथ hospital में आने वाले patients की संख्या घटने लगी और कुछ और male and female staff ने resign कर दिया।

अचानक से हुई इस घटना ने कुशल की बरसों की मेहनत तबाह करनी शुरू कर दी।

एक दिन राघव ने कुशल को आकर जो बताया, वो अविश्वसनीय था, ऐसा भी हो सकता है वो सोच ही नहीं सकता था।

वो सीधा राघव के साथ वहां पहुंच गया, जहां से राघव को यह अविश्वसनीय खबर मिली थी…

आगे पढ़ें, वो कौन था (भाग-4) में…

Saturday, 18 July 2026

Story of Life : वो कौन था (भाग-2)

वो कौन था (भाग-1) के आगे…

वो कौन था (भाग-2)


सबने सुना पर कोई सामने नहीं आया, और तृषा को परेशान करने का सिलसिला पुरजोर चलता रहा। एक दिन तृषा ने तंग आकर hospital से resign करने का मन बना लिया और सीधे पहुंच गई कुशल के पास।

कुशल ने एक बार फिर सबको बुला लिया।

ऐसा क्या है जो एक lady हमारे यहां safe नहीं रह सकती है। धिक्कार है कि हम doctors के बीच भी कोई अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहा है।

रोहित, विनय, समीर पहले से ही hospital में appointed थे। तृषा की joining के साथ राघव, दीपक, सुगंधा और निशा ने join किया था।

सारे doctor एक से एक शरीफ़ थे, कि किसी पर भी इल्ज़ाम लगाना उनकी dignity को चोट पहुंचाना था।

फिर ‌‌तृषा के अलावा बाकी भी जो lady doctors थीं, उन्हें कोई problem नहीं थी। ऐसा नहीं था कि वो साधारण नयन नक्श की हों।

सबसे सुंदर तृषा थी, पर बाकी भी लगभग उसकी टक्कर की थीं। पर तृषा के साथ होनी वाली घटनाओं के कारण सब तृषा के लिए चिंतित रहते थे। 

ऐसा इसलिए भी था, क्योंकि hospital का माहौल बहुत friendly और homely था। सब एक-दूसरे को लेकर बहुत concerned रहते थे।

इन सबके बावजूद कोई उस stalker को पकड़ नहीं पा रहा था। वो इतना ज्यादा शातिर था कि सबकी मौजूदगी में भी अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहा था।

“कुशल सर, मैं तंग आ चुकी हूं इन सब हरकतों से, please मेरा resignation स्वीकार करें और मुझे जाने दें।”

तृषा का resignation, सबके लिए यह खबर shocking थी, वैसे भी शहर के सबसे अच्छे hospital से किसी doctor का resign करना अपने आप में बड़ी news थी।सब उससे रुकने को कहने लगे।

कुशल ने हाथ जोड़कर तृषा से request की, कि बस एक हफ्ते का समय और दे, वो जरूर से उस imposter को ढूंढ निकालेगा।

फिर वो सबकी तरफ मुखातिब होते हुए बोला, मुझे आप सबका साथ चाहिए इस काम में....

उसने hospital में CCTV cameras और बढ़ा दिए, जिससे यह काम और मुस्तैदी से किया जा सके।

पर दो दिन बाद ही यह क्या हुआ, जिसे देखकर सब हतप्रभ रह गए...

आगे पढ़ें, वो कौन था (भाग-3) में…

Friday, 17 July 2026

Story of Life : वो कौन था (भाग-1)

वो कौन था (भाग-1)


कुशल अपने नाम-सा हर काम में कुशल था, वो बहुत नामी doctor था। कारण?

उसका diagnostics बहुत कमाल का था, उसे बीमारियां समझने के लिए किसी भी तरह के test की आवश्यकता नहीं होती थी।

बस patient का सामने होना उसके लिए काफी था, patient की condition और symptoms से वो बहुत जल्दी समझ जाता था कि बीमारी क्या है।

उसे genius doctor कहा जाता था और उसके patients ने उसे भगवान का दर्जा दिया हुआ था। 

इन सबके बाद भी वो बेहद सरल और शालीन इंसान था। उसने अपनी fees हद की बढ़ाकर नहीं रखी थी।

उसका genius doctor होना और nominal fees होने के कारण उसके यहां patients का तांता लगा रहता था।

उसने अपने लिए कभी समय ही नहीं निकाला और अपना जीवन medical को समर्पित कर दिया।

अपनी मेहनत और अथक प्रयास से उसने एक बड़ा hospital खोल लिया और उसमें अपने जैसे ही capable और dedicated doctors appoint किए। 

कुशल का hospital दो buildings में बंटा हुआ था, जहां अमीर-गरीब हर तरह के patients का उनकी हैसियत के अनुसार arrangements था।

Hospital बहुत अच्छे से चल रहा था, जब तक वहां तृषा नहीं आई थी। नहीं, तृषा में कोई कमी नहीं थी, बहुत अच्छी और सरल लड़की थी, और साथ में बेहद खूबसूरत।

उसके आने के कुछ दिन बाद से ही अजीब-अजीब सी हरकतें होने लगी। तृषा के locker से कुछ भी सामान गायब होने लगे, उसके सामान दूसरे locker में मिलने लगे।

कभी कोई उसके room में I love you का card रख जाता, तो कभी bathroom में I love you Trisha लिख जाता, यह सब देखकर तृषा पत्ते-सी कांपने लगती।

एक दिन कुशल ने सारे staff को बुलाया और कहा कि जो कुछ हो रहा है, वो कोई staff वाला ही कर रहा है, क्योंकि तृषा के room and locker तक कोई और नहीं पहुंच सकता है।

इसलिए आज से सब शक के घेरे में रहेंगे और जो कोई भी निकला, उसके साथ सख्त कार्रवाई की जाएगी। अच्छा होगा कि कोई सामने से आकर बता दे, या मुझे भी आकर बता सकता है, मैं उसकी पहचान किसी को नहीं बताऊंगा। और तब शायद उसकी सज़ा कम कर दी जाए।

सबने सुना, पर कोई सामने नहीं आया, और तृषा को परेशान करने का सिलसिला पुरजोर चलता रहा। एक दिन तृषा ने तंग आकर…

आगे पढ़ें, वो कौन था (भाग-2) में…

Tuesday, 7 July 2026

Story of Life : खुशी

खुशी


चंदू प्यारा-सा, छोटा-सा, नटखट बच्चा था। वो इतना चंचल था कि दिनभर मस्ती करता, पर किसी के हाथ नहीं आता। उसकी माँ वसुधा उसे संभालते-संभालते थक जाती, पर मजाल है कि चंदू दो पल को भी थककर बैठता।

एक दिन परेशान होकर वसुधा ने अपनी माँ शक्ति देवी को अपने घर बुला लिया। शक्ति देवी अपने नामानुसार बहुत शक्तिशाली थीं, इस उम्र में भी उनमें बहुत दम-खम था।

शक्ति देवी को देखकर वसुधा ने चैन की सांस ली, कि चलो अब कुछ दिन सुकून से निकलेंगे। चंदू को शक्ति देवी ने उसके पैदा होने के समय संभाला था, पर अभी व्यस्तता के चलते शक्ति देवी अपनी बेटी से चार साल से मिलने नहीं आ पाई थीं।

दरअसल शक्ति देवी अपने गांव की बहुत सफल मुखिया थी, साथ ही उनके बहुत बड़े खेत-खलिहान भी थे, जिनके रखरखाव की जिम्मेदारी पूरी उन्होंने ही उठा रखी थी, और पूरा गांव उनको बहुत मानता था। 

अभी खेत-खलिहान में बीज इत्यादि लगाकर उस तरफ से थोड़ी फुर्सत पाकर वो हफ्ते भर के लिए वसुधा और चंदू से मिलने आईं थीं। चंदू एक दिन तक तो शक्ति देवी से दूर-दूर रहा, पर जल्दी ही उनके साथ घुल-मिल गया।

क्योंकि शक्ति देवी ने उसके लिए बेहद स्वादिष्ट पकवान बनाए, उसे रात में बहुत अच्छी कहानियां सुनाईं और दिन में उसके साथ दुनियाभर के खेल खेले।

अब तो चंदू दिनभर अपनी नानी माँ के साथ ही रहता, उनके साथ खेलता, उनके हाथ से ही खाना खाता, उनके साथ ही सोता।

वसुधा, चंदू और शक्ति देवी सभी प्रसन्न थे। वसुधा चैन की सांस लेकर, चंदू अपनी नानी मांँ का साथ पाकर, और शक्ति देवी अपने नाती को लाड लड़ाकर।

एक हफ्ता कब गुजर गए, पता ही नहीं चला और शक्ति देवी के लौटने का दिन आ गया।

जब चंदू को पता चला कि नानी माँ जा रही हैं तो वो बहुत दुखी हो गया और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि कुछ ऐसा हो जाए कि नानी माँ रुक जाएं। पर ऐसा हुआ नहीं, नानी माँ के लिए cab आ गई और वो station के लिए रवाना हो गईं।

चंदू बहुत ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था कि नानी माँ लौट आइए।

वसुधा चंदू का रोना देखकर उसे भीतर ले गयी और चंदू को समझाने लगी, तभी खबर आई कि शक्ति देवी वापस आ रही हैं। सुनकर चंदू खुशी से चिल्ला-चिल्ला कर उछलने लगा, नानी माँ आ रही हैं।

जब शक्ति देवी आईं, तो पता चला कि cab से उतरते समय उनका balance गड़बड़ हुआ, जिससे वो काफी जोर से गिर गई और उनके पैर में बहुत तेज दर्द हो रहा है।

वसुधा माँ को लेकर तुरंत hospital पहुंच गई, वहां पता चला कि उनके पैर में fracture हुआ है और 3 महीने के bed rest की जरूरत है।

अब तो शक्ति देवी दिनभर bed पर रहतीं, वसुधा भी उनकी ही तिमारदारी में लगी रहती, इस तरह से नानी माँ लौट तो आईं पर दर्द से कराहते हुए और माँ से जो थोड़ा बहुत समय चंदू को मिलता था, वो भी अब नहीं मिल रहा था।

एक दिन नानी माँ के पास बैठकर चंदू रो रहा था, उन्होंने कारण पूछा, तो उसने रोते हुए कहा, “मैंने ही भगवान जी को बोला था, कैसे भी आप रुक जाओ और आपका accident हो गया। आप लौट तो आईं पर मेरा कोई फायदा नहीं हुआ, मुझे खुशी मिली ही नहीं।”

नानी माँ ने चंदू को चुप कराया और बोला कि “इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, जो‌ होना था हो गया। पर बेटा, आगे से अगर तुम्हारी खुशी किसी और से भी जुड़ी हुई है तो, अपनी कामना के लिए प्रार्थना करने के साथ यह भी कहो, कि उसमें उसका कोई अनिष्ट न हो, बल्कि उसे भी लाभ हो, और तुम्हारी कामना तब पूर्ण हो, जब उसकी भी वही कामना हो। अपनी खुशी को पाने के लिए अगर दूसरे को दुःख पहुंचता है तो फिर ऐसी ही ग्लानि होती है। इसलिए ऐसा मांगो कि आपका और उसका दोनों का शुभ हो, तभी सच्ची खुशी मिलेगी।”

सुनकर चंदू मंदिर की ओर दौड़ गया और भगवान जी से प्रार्थना करने लगा, और बोला “मेरी नानी माँ को जल्दी ठीक कर दीजिए और वो तब तक रहें, जब तक वो ख़ुशी से रह सकें, क्योंकि जब वो खुश रहेंगी, तभी मैं भी खुश रहूंगा।”

Monday, 6 July 2026

Story of Life : आ जिंदगी जी लें

आज की यह कहानी हर एक की जिंदगी से जुड़ी हुई कहानी है, एक बार पूरी अवश्य पढ़ें, शाय़द आपकी भी सोच बदल जाए और आप भी जिंदगी जीने लगें…

आ जिंदगी जी लें


संजना ने ऋतिक से कहा, “सुनो ना, आटा खत्म हो गया है, लेकर आते हैं।”

“क्या लेकर आते हैं संजना, वो भी online marketing के जमाने में? कौन खड़ा होगा घंटों bill की line में?”

“जाकर लाएं या order करें, आएगा तो एक ही चीज़।”

“अरे order कर दो। साथ में और भी जो कुछ मंगाना हो, उन सबका भी order कर दो।”

“ऋतिक bedroom की ओर बढ़ गया, और संजना याद कर करके सामान के order की list prepare करने लगी।”

शाम के समय संजना फिर बोली, “आज बहुत दिनों बाद Sunday free मिला है, चलो न movie देखकर आते हैं।”

“अरे यार! एक Sunday मिला है, आराम कर लो, फिर रात में Netflix में movie देखेंगे, तुम कुछ चटपटा-सा बना लेना। वहां जाकर 4 गुना दाम का popcorn खाने से अच्छा है घर में ही देख लें।”

“कौन-सी देखें? संजना ने उत्सुकता से पूछा।”

“अरे कोई भी लगा लो, सब एक-सी ही लगती हैं। उसने बेरुखी के साथ जवाब दिया।”

“यह कहकर ऋतिक नींद के आगोश में चला गया और संजना अकेली बैठी ढूंढती रही कि कौन-सी movie देखें।”

कुछ दिनों बाद संजना ने ऋतिक से कहा, “चलो न कहीं घूम कर आते हैं।”

“अरे यार, अभी कुछ दो-तीन साल पहले गये तो थे। इस साल मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है।”

ऋतिक ने बड़ी तल्खी से जवाब दिया और फिर laptop में काम करने लगा और पिछली बार की photo को देखकर संजना मन बहलाने लगी।

दिन महीने साल बदलते रहे, और संजना और ऋतिक की जिंदगी जिम्मेदारियां निभाने और इसी तरह से घर में रहकर ही सब करने में व्यतीत होती गई।

बच्चों की ज़िम्मेदारियों से free होकर job से retire होने के बाद एक दिन ऋतिक ने संजना से कहा, “बहुत दिन हो गए, चलो कहीं घूम कर आते हैं।”

संजना की प्रसन्नता से बाछें खिल गईं, वो तुरंत मान गई।

दोनों घर से निकलकर कुछ दूर ही चले थे और थककर चूर हो गए और घर लौट आए।

कुछ देर बाद, ऋतिक bedroom से बाहर आ गया, संजना अभी भी सामान order करने की list बना रही थी।

“संजना, चलो आटा लेकर आते हैं।”

“अरे क्या हुआ? मैं list बना रही हूं online order करने के लिए।”

“नहीं, चलो लेकर आते हैं। थोड़ा समय मिल जाएगा साथ में, फिर चलेंगे movie देखने, बहुत दिन हो गए हैं।”

संजना चलने को तैयार हुई तो ऋतिक ने उसे गले से लगा लिया और बोला, “वक्त बहुत तेजी से निकल रहा है। पर हम हर पल को जीएंगे, जितना हो सकेगा, उतना अधिक समय एक-दूसरे के साथ बिताएंगे।”

संजना कुछ समझ नहीं पा रही थी, पर ऋतिक जब bedroom में चला गया था, तब सपने में वो retire होने तक के दिन जी आया था और अच्छे से समझ गया था, कि ज़िन्दगी को समय से साथ में बिताने में ही सुख है।

एक बार वक्त गुजर जाता है, तो फिर वो पल नहीं जी पाएंगे, जो जिंदगी है। जिंदगी सिर्फ भागमभाग नहीं है, बल्कि कुछ पल ठहर कर जी लेना ही जिंदगी है, समय से कुछ बेहतरीन और यादगार पल चुरा लेना ही जिंदगी है।

“आ संजना, जिंदगी जी लें, एक साथ हर जगह...”

अगर आप भी जिंदगी में साथ न रहकर ऐसे ही जिंदगी बिता रहे हैं तो मत रहिए ऐसे, अपने जीवनसाथी को खूब समय दें और जी लें जिंदगी। क्योंकि काम तो जिंदगी-भर रहेगा, पर यह वक्त पलट कर नहीं आएगा, जिसमें एक-दूजे को समय दे सकते थे और सही मायने में जिंदगी जी सकते थे…

Thursday, 4 June 2026

Story of Life : दृढ़ संकल्प

दृढ़ संकल्प


आज एक सच्ची कहानी पर लेखनी चला रहे हैं, एक ऐसे लड़के की कहानी, जो बाकियों के लिए प्रेरणा स्रोत है।

तो बात तब की है, जब एक परिवार गांव से दिल्ली आता है, अपनी आंखों में सपने संजोए हुए।

परिवार में मां-पापा, दो बेटे और दो बेटियां। गांव के परिप्रेक्ष्य के अनुसार एक ideal परिवार।

गांव से आए थे, पढ़े-लिखे थे नहीं, अतः पत्नी ने लोगों के घर बर्तन का काम करना शुरू कर दिया। पति गुणीं था, अतः उसने भजन मंडली में वाद्य यंत्र बजाने व चौकीदारी का काम करना शुरू कर दिया।

शहर की महंगाई, इतने में बड़ी मुश्किल से गुजर-बसर हो रही थी। अतः बड़ी बेटी ने पूरे दिन घर में रहकर काम शुरू कर दिया और बड़े बेटे ने office में छोटा-मोटा काम आरंभ कर दिया।

छोटे बेटा-बेटी को छोटे होने के कारण उनसे किसी ने किसी भी तरह के काम करने के लिए नहीं कहा।

हाँ, school में admission ज़रूर करा दिया, जिससे घर में कोई तो पढ़ा-लिखा हो। वैसे भी शहर आने का कुछ लाभ तो होना चाहिए था।

उन लोगों का पढ़ाई-लिखाई कर के कुछ बड़ा हासिल करने का कोई ध्येय नहीं था। पर छोटा बेटा पढ़ने में होशियार था और उनकी पढ़ाई के लिए घर के सब लोगों के त्याग को मान भी देता था।

अतः 6 class तक आते-आते उसने अपना लक्ष्य साधना आरंभ कर दिया। उसने खेलकूद और फालतू की बातों से अपना मन खींचना शुरू कर दिया।

गांव में होने वाले शादी-विवाह आदि आयोजन में शामिल होना लगभग बंद करना आरंभ कर दिया, क्योंकि जब भी वो लोग गांव जाते थे तो उनके लौटने की कोई समय-सीमा नहीं होती थी।

इससे स्कूल की पढ़ाई छूटती थी। घर में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं जो इस नुकसान को भर दे। 

सक्षम की लगन अब स्कूल के teachers को भी दिखने लगी, वो भी चाहते कि सक्षम आगे बढ़े, यथासंभव प्रयास भी करते थे। पर सरकारी स्कूल आठवीं तक ही था तो आगे का सफ़र सक्षम को नये स्कूल से करना था।

नौवीं कक्षा थी और अब तक सक्षम ने एक कठिन संकल्प ले लिया था कि वो engineering करेगा। 

Science subject की पढ़ाई अपने आप में कठिन होती है, फिर engineering में selection बिना coaching के संभव नहीं था।

फिर इसकी preparation से लेकर engineering करने तक का ख़र्चा बहुत अधिक होना था, लोगों ने उससे कहा भी, इतना करना तुम्हारे लिए असंभव है। 

पर लोग जितना कहते, सक्षम का संकल्प और अधिक सशक्त हो जाता।

Coaching center की महंगी फीस के पैसे उसके पास नहीं थे। उसने सोचा कि super 30 में join कर ले। फिल्म आने से हर गरीब बच्चा आनंद सर तक पहुंचना चाह रहा था। Engineer बनने के सपने संजो रहा था।

पर film और serial में आने वाली बातों तक पहुंचना लगभग असंभव होता है, वो भी नहीं पहुंच पाया।

उसने online का सहारा लेना चाहा, पर mobile से आखिर कितना पढ़ता।

उसने सुबह लोगों की गाड़ियां साफ़ करना और school से लौटकर 2 घंटे waiter का काम करना, साथ ही छोटा-मोटा कुछ और काम भी करना शुरू कर दिया।

फिर उसने किश्तों में एक laptop खरीदा, online classes के लिए, और शाम को 2 घंटे के लिए एक library में जाना शुरू किया। जिसकी उसे fees भी देनी होती थी, जो कि मात्र ₹2000 थी, पर इतनी fees भी उसके लिए मात्र नहीं थी...

उसकी लगन देखकर library वाले ने उसे school की छुट्टी होने वाले दिनों में भी आने की permission दे दी।

कुछ अच्छे लोगों ने उसे Aakash and FIITJEE के notes उसे free में दे दिये।

वो अपनी मंजिल पाने तक जूझता रहा, अपनी कठिन परिस्थितियों के कारण बहुत से काम करके पैसों की कमी पूरी करने के लिए और बेइंतहा पढ़ता रहा, अपने सपने को साकार करने के लिए।

आखिरकार सक्षम के दृढ़संकल्प ने उसे उसकी मंजिल तक पहुंचा ही दिया, उसका DTU में selection हो गया।

और इससे ही यह बात सिद्ध हो गई कि जो दृढ़संकल्पित होता है, उसे मंजिल अवश्य मिलती है।

मेहनत तू किए जा, 

तुझको परिणाम मिलेगा...

यह पूरा गीत, link पर click करके आप सुन सकते हैं, आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी- https://shadesoflife18.blogspot.com/2022/07/poem.html?m=1

Monday, 4 May 2026

Story of Life : अंदर की दुनिया

अंदर की दुनिया


रंभा ने ऋषभ से कहा, “सुनिए न, आज office में नींबू पानी मंगाकर पी लीजिएगा, गर्मी बहुत हो रही है।”

“क्यों भला?”

“अरे तरावट रहेगी तो गर्मी असर नहीं करेगी,” रंभा ने ऋषभ को समझाते हुए कहा।

“अरे प्यारी रंभा, काहे की गर्मी? AC car से office आता-जाता हूँ, AC office है, फिर घर आकर मस्त shower लूंगा, उसके बाद तुम लोगों के साथ AC room में बैठकर enjoy करूँगा। मैं बाहर निकला ही कब, जो गर्मी लग जाएगी?”

सोच में पड़ गई रंभा, ‘सच में गर्मी में कब रहा ऋषभ?’

उसके बाद वो अपने बेटे रियान के पास नींबू पानी लेकर पहुंची, “लो बेटा, इसे पी लो। Temperature 42°C तक पहुंच गया है। नींबू पानी पिओगे, तो तुम्हारी तबियत ठीक रहेगी, गर्मी असर नहीं करेगी।

“पर माँ, मैं बाहर गया कब, जो गर्मी लग जाएगी? School आना-जाना AC bus से, School centralized AC, तो class, playground सब कुछ। फिर घर आकर भी पूरे time AC में ही रहता हूँ, पर नींबू पानी पी लूंगा, क्योंकि आप बहुत tasty बनाती हैं।”

रंभा एक फीकी मुस्कान के साथ, रियान के कमरे से निकल जाती है।

उसे अपना बचपन याद आने लगा, घर से school थोड़ी दूरी पर था, अतः रोज़ cycle से स्कूल जाती थी। स्कूल में दिन भर पढ़ती और interval में सहेलियों के साथ दौड़-दौड़ खेलती, फिर घर पहुंचते ही माँ खाना बाद में देती, पहले फलों का कोई न कोई रस या नींबू पानी अवश्य देती कि उनकी लाडो को गर्मी का असर न हो।

और school से आकर खाना खाकर गृहकार्य ख़त्म नहीं कर पाती थी कि सहेलियों के चक्कर लगने शुरू हो जाते, शाम को खेलने जाने के लिए। फिर क्या, पूरी शाम खेलकूद और भागदौड़ में निकल जाती। 

और AC, कहीं भी नहीं, बल्कि यूं कहें कि AC से दूर-दूर तक कोई सरोकार ही नहीं।

कितनी हसीन और सुखद थीं उसकी बचपन की यादें। आजकल के बच्चों जैसी अंदर की दुनिया नहीं थी, बल्कि पूरा खुला आसमान था उड़ने के लिए।

आजकल के बच्चे क्या जानें कि अंदर की दुनिया से बहुत खूबसूरत है बाहर की दुनिया। पर करें भी क्या? आजकल जितना अधिक temperature उसके समय में कहाँ था।

आजकल पूरा youth AC में ही सांस लेना सीख रहा है, घर, school-college, bus, car, train, station, mall, यहाँ तक कि playground में भी AC है।

वैसे playground जाते भी कितने बच्चे हैं, सब अपने घरों पर laptop, mobile and playstation आदि पर ही खेल रहे हैं। 

गर्मी के कारण सब AC में ही रहना चाहते हैं और जितना अधिक AC चलते हैं, उतनी ही अधिक गर्मी बढ़ती जा रही है।

इस तरह से एक cycle-सी बन गई है, AC और गर्मी की।

दूसरे शब्दों में कहें तो अंदर की दुनिया में ही रहे हैं और नुकसान पहुंचा रहे हैं अपनी सेहत को। चलना-फिरना छोड़कर अपनी मांसपेशियों को कमजोर कर रहे हैं, और धूप में न रहकर vitamin D की कमी, जिसकी कीमत सबको एक दिन पता चलेगी…

Sunday, 14 December 2025

Story of Life : बदलती ज़िंदगी (अंतिम भाग)

बदलती ज़िंदगी (भाग-1),

बदलती ज़िंदगी (भाग-2),

बदलती ज़िंदगी (भाग-3), और

बदलती ज़िंदगी (भाग-4) के आगे…

बदलती ज़िंदगी (अंतिम भाग)


रितेश ने बहुत grand party रखी, उसमें सभी परिवारिक जन, और बहुत बड़े-बड़े guests invited थे। बड़ी-बड़ी companies के CEO, नेता, अभिनेता और वो सारे लोग भी जो उस रात की party में शामिल थे, जिन्होंने सुधा का अपमान किया था।

भारतीय संस्कृति के अनुसार ही party plan की गई थी। इस party की बस शर्त इतनी थी कि no alcohol, no non-vegetarian food, & no short/revealing outfits.

सबको party का decorum follow करना था। और सबने किया भी, कौन इतने बड़े invitation को‌ ठुकराता...

आज की रात भी official party थी, पर सुधा के साथ-साथ सभी Indian dresses में थे। किसी के हाथ में जाम नहीं था, बल्कि jaljeera, lemon juice, lassi, chach etc.

और सबसे बड़ी बात, आज सभी सुधा के पहनावे और साज-सज्जा की तारीफ करते हुए नहीं थक रहे थे। आज वो आपस में एक-दूसरे से बोल रहे थे, “सुधा ma'am की पसंद बहुत classy, rich and beautiful है। हमारे रितेश की तो किस्मत ही खुल गई सुधा जी से शादी करके।”

एक बात, रितेश को बहुत अच्छे से समझ आ रही थी कि पैसा, power and post जिसके पास हो, ज़माना उसके आगे झुकता है 

रितेश भी आज बहुत खुश था, कि उसके बाबूजी ने उसके लिए बहुत ही अच्छा जीवनसाथी चुना है, जिसने उसकी जिंदगी संवारीं नहीं बल्कि निखार‌ दी है। उसे जिंदगी के उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

उसकी जिंदगी, जो शादी के चंद महीनों बाद ही बदल गई थी, वो चंद सालों में इतनी अधिक बदल जाएगी, उसका उसने सपने में भी नहीं सोचा था।‌ 

वो अपने बाबू जी से बोला, “मैं आपसे अपने मन की एक बात कहना चाहता हूँ।”

“हाँ, बोल न बेटा।” बाबू जी ने बड़े प्यार से कहा।

“आज से चंद सालों पहले मुझे लगा था कि आपने मेरी जिंदगी तबाह कर दी, मुझे आपके अनुसार विवाह नहीं करना चाहिए था, बल्कि अपने जीवनसाथी को खुद पसंद करके विवाह करना चाहिए था।

पर आपकी पसंद ही सर्वश्रेष्ठ है, इसके लिए अनेकानेक धन्यवाद, कि आपने मेरे लिए सुधा को चुना। आपकी दूरंदेशी नजरों ने वो देखा, जो मैं कभी नहीं देख पाता। सच है, माँ-बाप का अनुभव, सदैव शिरोधार्य है।”

यह कहकर उसने बाबूजी के चरण स्पर्श किए।

बाबू जी ने उसे गले लगते हुए कहा, “जब तुम्हें लगा था कि तुम्हारी जिन्दगी तबाह हुई है, तुम्हें तभी कहना चाहिए था, मैं तुझे तभी बता देता कि मैंने अपने दिल के टुकड़े के लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनसाथी चुना है।

जो जब भी तकलीफ़ आएगी, वो ऐसे डटकर मुकाबला करेगी कि तेरी जिंदगी संवरती जाएगी, सर्वश्रेष्ठता की ओर बढ़ती चली जाएगी।”

“सच है बाबू जी।” रितेश के चेहरे पर प्रेम, आभार और खुशी के मिश्रित भाव थे और आंखें छलछला आई थीं…

Saturday, 13 December 2025

Story of Life : बदलती ज़िंदगी (भाग-4)

बदलती ज़िंदगी (भाग-1),

बदलती ज़िंदगी (भाग-2), और

बदलती ज़िंदगी (भाग-3) के आगे…

बदलती ज़िंदगी (भाग-4)


उसकी cab RS enterprises के एक छोटे से office के सामने रुकी। दरबान ने उसकी cab का दरवाजा खोल कर welcome किया।

Office में भी उसका welcome हुआ। रितेश reception पर बैठ कर अंदर बुलाए जाने का इंतजार करने लगा।

कहां आत्मविश्वास का उदाहरण कहा जाने वाला रितेश, आज सिमटा-सकुचा हुआ बैठा था।

उसे लोगों का welcome किया जाना बहुत अजीब लग रहा था, ऐसे कौन-सी company अपने employee का welcome करती है। जरूर से बिल्कुल भी नहीं चलने वाली company होगी, तभी ऐसा कर रही है, वैसे भी गांव की भोली-भाली सुधा को इनसे बड़ा क्या ही office पता होगा, रितेश के मन में उधेड़बुन चल रही थी।

थोड़ी ही देर में receptionist उसे office के main room में ले गई और उसे boss की chair पर बैठने को बोलकर चली गई।

रितेश खड़ा ही रहा, उसे लगा कि receptionist ने कुछ और बोला और उसने कुछ और समझ लिया है।

थोड़ी ही देर में सुधा अंदर आई और बड़े प्यार से रितेश के गले लगते हुए बोली, “और CEO जी क्या हाल-चाल हैं?”

“CEO!”

“हाँ जी, CEO. देखिए, हम तो ठहरे कलाकार इंसान, तो इतने दिनों में बस इतनी बड़ी company आपको gift कर पाए, अब इसे MNC बनाने की जिम्मेदारी आपकी। अब आप को उन सबको सिद्ध करना है कि हमारा मज़ाक़ उड़ाना, उनकी सबसे बड़ी भूल थी। By the way, Happy anniversary!”

“Happy anniversary, अपनी company gift के रूप में?”

“जी हाँ मेरे सरकार, आपके साथ जिंदगी के एक साल गुजर गए, जिसमें कुछ पल बहुत खूबसूरत थे, कुछ परेशानी के भी, पर हम दोनों मिलकर अब जिंदगी के सारे पल खूबसूरत बनाएंगे।”

“ओ मेरी सुधा! तुम कितनी अच्छी हो, जब मैं जिंदगी से हार गया था, तब तुमने हिम्मत नहीं हारी। Happy anniversary sweetheart. तुम देखना, अब मैं बहुत कड़ी मेहनत करूँगा और बहुत जल्द हमारी यह RS (Ritesh-Sudha) enterprises एक MNC बन जाएगी।”

रितेश का उत्साह देखते ही बनता था, जैसे वो पुराना वाला आत्मविश्वासी, मेहनती और कुशल रितेश बन गया हो।

पहले केवल सुधा ही इस सपने को अंज़ाम दे रही थी, पर अब तो रितेश का साथ भी मिल गया था। Company दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की करने लगी।

सुधा के हाथों की कारीगरी बेजोड़ थी, उसने अपने employees को भी सिखाना शुरू कर दिया था। काम बढ़ता गया और employees भी बढ़ने लगे। चंद ही सालों में company national level तक पहुंच गई।

Internet का ज़माना है, तो business को international level तक पहुंचाने के लिए, रितेश ने सुधा के द्वारा बनाई गईं paintings, embroidered sarees, suits, bedsheets upload कर दिए।

RS enterprises की ख्याति विदेश तक पहुंच गई थी और MNC का status पाने लगी। 


आगे पढ़ें, बदलती ज़िंदगी (भाग-5) में।

Friday, 12 December 2025

Story of Life : बदलती ज़िंदगी (भाग-3)

बदलती ज़िंदगी (भाग-1) और

बदलती ज़िंदगी (भाग-2) के आगे…

बदलती ज़िंदगी (भाग-3)


सब सुधा की दलील के आगे चुप हो गए, पर फिर उन्होंने रितेश से भी मुखातिब होना बंद कर दिया।

रितेश को इससे अच्छा नहीं लगा, पर फिर भी उसने सुधा का साथ देना ही उचित समझा।

आगे से रितेश को party के invitation मिलना लगभग बंद हो गये। लोगों ने उससे मिलना-जुलना कम कर दिया। 

रितेश एक तरह के boycott से tension में रहने लगा।

उसे भी लगने लगा कि उसके पिता ने सुधा से उसकी शादी करके उसका जीवन बर्बाद कर दिया।

दिन-रात की tension और उलझनों के कारण उसका बहुत बड़ा accident हो गया।

नतीजतन रितेश की नौकरी छूट गई और अन्य नौकरी मिलने में काफ़ी दिक्कत होने लगी।

अब तो रितेश depression में जाने लगा। वह इधर-उधर रहकर समय काटने लगा, न कोई ढंग का काम करता, न घर पर ज्यादा रुकता।

हालांकि, सुधा के मितव्ययी और संतोषी होने के कारण, कुछ महीनों के बाद भी savings कुछ ज्यादा खर्च नहीं हुईं।

और इस बीच, सुधा ने अपनी बस्ती में घूम-घूमकर अपने द्वारा बनाई गई paintings, embroidered suits, साड़ी और चादर बेचने शुरू कर दिए।

सुधा के हाथ में बहुत सफाई थी और वो सबको customised काम करके देती थी, जिसके कारण उसने जल्दी ही घर-घर जाकर सामान बेचना बंद कर दिया, बल्कि अपना boutique खोल लिया‌।

कुछ और महीनों बाद उसने रितेश को कहा कि उसे एक company का call आया कि उसे एक manager की आवश्यकता है, क्या वो उसके लिए वहां चला जाएगा।

हालांकि रितेश का बिल्कुल मन नहीं था, पर सुधा का मन होने के कारण वो चल दिया। सुधा ने एक cab book कर दी थी।

रितेश आज बहुत दिनों बाद घर से कहीं दूर निकला था तो सब कुछ अलग और नया-सा लग रहा था…


आगे पढ़ें, बदलती ज़िंदगी (भाग-4) में।

Thursday, 11 December 2025

Story of Life : बदलती ज़िंदगी (भाग-2)

बदलती ज़िंदगी (भाग-1) के आगे…

बदलती ज़िंदगी (भाग-2)



दोनों party के लिए घर से निकल तो गये, पर रितेश इसी उधेड़बुन में रहा कि उसकी सुंदर पत्नी है, फिर भी कोई उसके बनाव-श्रृंगार पर कोई टिप्पणी न कर दे।

और अगर कोई टिप्पणी करेगा, तो सुधा को कैसा लगेगा? वो सबको क्या जवाब देगा? और ऐसे बहुत से सवाल…

वही हुआ, जिसका रितेश को डर था, उन लोगों के office party में पहुंचते ही वहां मौजूद लोगों ने सुधा को देखकर कानाफूसी करना शुरू कर दिया, साथ ही उसे देखकर दबी-दबी हंसी भी शुरू हो गई।

कुछ लोगों ने जब सुधा से “Hello!” बोला, तो उसने सबसे हाथ जोड़कर विन्रम प्रणाम किया।

अब तो मुंहफट राजेश चुप न रहा, कहने लगा- “क्या रितेश, तूने भाभी को बताया नहीं था कि party official है, न कि शादी विवाह की party। फिर प्रणाम कौन करता है आजकल के जमाने में?”

रितेश मौन‌ खड़ा था, क्योंकि राजेश कुछ हद तक ठीक भी था। पर‌ सुधा ने समझ लिया कि अपना stand उसे खुद लेना पड़ेगा।

उसने राजेश से विनम्रता से कहा, “राजेश भैया, यह किस नियमावली में लिखा है कि कपड़े western ही सही होते हैं? साथ ही‌ प्रणाम करना तो सबसे respective gesture है, उसमें क्या problem है?

मुझे अपनी भारतीय संस्कृति पर बहुत गर्व है, जहां वस्त्र इसलिए पहना जाता है, जिससे शरीर को ढककर और अधिक खूबसूरत बनाया जाए। न कि अंग प्रदर्शन करके बेशर्मी की जाए।

और प्रणाम तो ईश्वर को भी किया जाता है, फिर जिस gesture को ईश्वर की स्वीकृति है, उससे बेहतर और क्या है?

वैसे भी विदेशी संस्कृति अपनाकर अपनी भारतीय संस्कृति का अपमान करना, मेरे संस्कारों में शामिल नहीं है।

जो मुझे पसंद है, जब उसके लिए मेरे ससुराल में, और मेरे पति को भी कोई आपत्ति नहीं है, फिर आप सबको क्या पसंद है, उससे मुझे क्या?”

सब सुधा की दलील के आगे चुप हो गए, पर फिर उन्होंने रितेश से भी मुखातिब होना बंद कर दिया।

रितेश को इससे अच्छा नहीं लगा, पर फिर भी उसने सुधा का साथ ही देना उचित समझा…


आगे पढ़ें, बदलती ज़िंदगी (भाग-3) में…

Tuesday, 9 December 2025

Story of Life : बदलती ज़िंदगी (भाग-1)

बदलती ज़िंदगी (भाग-1)


रितेश एक बड़ी MNC में मैनेजर था, ऊंचा लंबे कद-काठी वाला, बहुत ही smart था।

बाबू जी ने उसके विवाह के लिए लड़की देखनी आरंभ कर दी।

एक दिन बाबू जी का गांव से call आया, “अरे रितेश! घर आ जा, तेरे लिए बहुत सुघड़ लड़की देखी है।”

रितेश समय से घर पहुंच गया।

शाम को लड़की वाले सुधा के साथ घर आ गए।

सुधा गोरी, सुंदर और संस्कारी लड़की थी। रितेश को एक ही नज़र में भा गई। दोनों का विवाह संपन्न हो गया।

शहर जाते समय, बाबू जी ने रितेश को सख्त हिदायत दी, “बहू बेटी को जैसा रहने का मन‌ करे, रहने देना, न तो उसे शहराती बनाने की कोशिश करना और न ही अगर वो शहराती बनना चाहे तो उसे रोकना।”

रितेश ने कभी बाबू जी की बात नहीं टाली थी, उसने हामी भर दी।

जब दोनों शहर आ गये, तो रितेश ने देखा, सुधा सुबह-सवेरे जल्दी उठकर घर के साफ-सफाई के सारे काम ख़त्म करके नहाने चली जाती, फिर भगवान की पूजा करती।

उसके बाद ही वो नाश्ता-खाना इत्यादि बनाकर रितेश को नाश्ता कराती, उसका tiffin box pack करके उसे office भेजती, फिर ही खुद नाश्ता करती। 

सुबह-सुबह इतने सारे काम करने के बाद भी रितेश कभी office जाने को late नहीं होता था। जिंदगी बड़ी सुखपूर्वक व्यतीत हो रही थी।

एक दिन office में party थी, रितेश भी invited था, with family।

सुधा साड़ी पहन, खूब सारी चूड़ियों व भर मांग पूर्ण श्रंगार के साथ तैयार थी।

रितेश उसे देख ठिठक गया, मन करा कि कह दे कि कुछ शहरी party के अनुसार तैयार हो जाए, फिर बाबू जी का ख्याल आ गया और मन की बात मन में रखा रहा। 

दोनों party के लिए घर से निकल तो गये, पर रितेश इसी उधेड़बुन में रहा कि उसकी सुंदर पत्नी है, फिर भी कोई उसके बनाव-श्रृंगार पर कोई टिप्पणी न कर दे।और अगर कोई टिप्पणी करेगा, तो सुधा को कैसा लगेगा? वो सबको क्या जवाब देगा, और भी बहुत सारे सवाल…


आगे पढ़ें: बदलती जिंदगी (भाग-2) में।

Friday, 27 June 2025

Story of Life : प्यार पर घात (अंतिम भाग)

श्लोक ने श्वेता को बाहों में भर लिया, आहा! क्या बात है madam, बिजली गिरने के mood में हैं। Coffee पीने चलें?

ओह! क्यूं आज आपकी स्नेहा ने coffee पीने से मना कर दिया था, जो जल्दी चले आए और coffee पीने चलने की बात कर रहे हो... श्वेता ने श्लोक की बाहों से छिटक कर बोला...


प्यार पर घात (भाग-1),

प्यार पर घात (भाग-2),

प्यार पर घात (भाग-3) और 

प्यार पर घात (भाग-4) के आगे…

प्यार पर घात (अंतिम भाग)


स्नेहा... श्लोक बहुत जोर-जोर से हंसने लगा...

स्नेहा नहीं, महेश... हंसते-हंसते श्लोक ने कहा।

महेश!! क्या मतलब? श्वेता ने पूछा 

अरे, मैं तो bore हो गया एक महीने तक रोज़-रोज़ एक घंटा महेश के साथ बैठकर...

तुम क्या बोल रहे हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।

आओ, पहले मेरे नजदीक तो आओ...

नहीं, दूर ही रहकर बताओ, गुस्से से भरी श्वेता बोली...

अरे, तुम्हें याद है वो दिन, जिस दिन मैंने तुम्हारे बेडोल शरीर के विषय में comment किया था? 

कैसे भूलूंगी, तुम्हारा वो दंश...

हाँ, उस दिन मैं आवेश में बोल गया था, उसका मुझे अफसोस भी हुआ, कि मैं यह क्या बोल गया?

अच्छा, अफसोस हुआ था, ऐसा लगा तो नहीं था उस दिन..

हुआ था, मैं तुम्हारे पास तुम से माफी मांगने भी आने वाला था कि तभी एक विचार ने मुझे रोक लिया?

अच्छा वो क्या? श्वेता का ग़ुस्सा, कौतूहल में बदल रहा था। 

वही जो मैंने किया...

और क्या किया तुमने?

मैंने एक गुलाबी खूशबूदार काग़ज़ अपनी जींस में रखा, स्नेहा के नाम प्रेम अनुरोध लिखकर, जो तुम देख सको...

और तुम्हें कैसे पता, मैंने देख लिया है?

क्योंकि अगले दिन जेब में दस का सिक्का नहीं था।

बस उसी दिन से मैंने रोज़ महेश के साथ एक घंटा गुजराना या यूं कहूं, झेलना शुरू कर दिया...

पर क्यों किया, यह सब?

श्लोक, श्वेता का हाथ पकड़कर आईने के सामने ले गया और बोला, देखो, अपनी प्यारी sweetheart श्वेता को वापस पाने के लिए...

पिछले एक महीने अपना पूरा ध्यान रखने के कारण, श्वेता पहली-सी निखर गई थी।

अच्छा, तो तुमने मेरे प्यार पर घात नहीं किया?

सोच भी नहीं सकता, श्लोक की आंखों में प्यार और सच्चाई थी।

तो फिर वो गुलाबी खूशबूदार काग़ज़, आज भी तुम्हारे पास होगा...

बिल्कुल है, कहकर उसने वो कागज श्वेता के हाथ में थमा दिया।

साथ ही कहा, मुझे माफ़ कर देना श्वेता, उस रात के लिए और पूरे महीने के लिए भी... क्योंकि तुम्हें तुम से वापिस मिलाने के लिए, मेरे पास कोई और उपाय नहीं था।

मुझे फ़र्क नहीं पड़ता, तुम जैसी भी हो, मेरी हो, और मुझे बहुत खूबसूरत ही लगती रहोगी।

पर तुम्हारे अंदर की वो कुंठा, जो तुमने शौर्य के होने के बाद कही थी, उसे ठीक करना था।

जिसके लिए तुमने दो-चार बार प्रयास भी किया, पर पूरी लगन से नहीं और अंत में छोड़ भी दिया.. 

मुझे लगा कि अगर तुम्हारे प्यार पर घात लगा, तो शायद तुम अपना ध्यान रखना शुरू कर दो, और वही हुआ...

पुरानी श्वेता वाला, सुडौल, छरहरा शरीर, बहुत नाज़ुक और खूबसूरत, glow करने वाला confident चेहरा वापिस आ गया था।

आईना देखते हुए श्वेता अपने आप को देखकर अपने प्यारे श्लोक पर निहाल हो गई, जिसे वो प्यार पर घात समझ रही थी, वो तो उसे उससे मिलाने की कोशिश थी।

श्वेता, आगे कभी मत समझना कि मैं हमारे प्यार पर घात कर सकता हूं, मेरी श्वेता के आगे, सारे पानी भरते हैं। श्लोक ने श्वेता का मुंह अपने हाथों में लेकर कहा...

नहीं, कभी नहीं‌ मुझे मुझसे मिलाने के लिए, बहुत सारा धन्यवाद...

बस धन्यवाद?

श्वेता प्रेम से अभिभूत श्लोक की बाहों में समा गयी।

Thursday, 26 June 2025

Story of Life : प्यार पर घात (भाग-4)

ओह! श्लोक बाबू, स्नेहा से दिल लगा बैठे थे, तभी मुझे जलीकटी सुना रहे थे...

हाय! अब मेरा और मेरे बच्चों का क्या होगा, निर्मोही श्लोक पर सारी जवानी तबाह कर दी। अब जैसी वो दिखती है, ऐसे में कौन उसे पूछेगा?

उसने भारी मन से फोन करके office से तीन दिन की छुट्टी ले ली। 

वो पूरे दिन अनमनी सी रही... रो-रोकर उसकी आंखें लाल हो गई थीं...


प्यार पर घात (भाग-1),

प्यार पर घात (भाग-2) और

प्यार पर घात (भाग-3) के आगे…

प्यार पर घात (भाग-4)


हे भगवान! लगता है स्नेहा ने श्लोक का प्रेम अनुरोध स्वीकार कर लिया... 

श्वेता को बहुत अफसोस हुआ कि उसने अपने पर पहले ध्यान क्यों नहीं दिया, क्यों अपने प्यार पर घात करा दिया?

रात भी उससे ठीक से खाना नहीं खाया गया।

पर अगले दिन से उसने office join कर लिया, आखिर कितने दिन की छुट्टी लेती और किसके लिए?

Office तो उसने ज़रूर join कर लिया था, पर मन उसका टूट गया था। तो वो गुमसुम-सी अपने काम में लगी रहती। 

खाना उससे खाया नहीं जा रहा था तो शरीर में ताकत बनाए रखने के लिए वो नींबू पानी, सूप, सलाद, फल और हल्का-फुल्का खाना, आदि ही ज्यादा खा रही थी। 

हाँ, एक काम उसने ज़रूर start कर दिया था कि उसने अपना ख्याल रखना शुरू कर दिया था, जैसे एक बार beauty parlour में जाकर facial, hair colouring, padicure, manicure करा लिया था।

अब beauty products के साथ homemade product use कर रही थी। हल्की-फुल्की exercise भी कर रही थी, अपना रूप निखारने के लिए...

उधर श्लोक का office से देर से आना और अपने में ही खोए रहना और उसे ignore करना जारी था।

दिन, हफ्ता, महीना बीत गया...

अब तो office में श्वेता के दीवानों ने भी उसके इर्द-गिर्द मंडराना शुरू कर दिया था।

एक दिन श्लोक office से एक घंटा पहले ही घर आ गया, उस दिन श्वेता ने श्लोक की पसंद की red colour की साड़ी पहनी थी और उसके बाल खुले हुए थे, क्योंकि वो उन्हें बांध नहीं पाई थी।

श्लोक, श्वेता को एकटक देखते हुए बोला, बच्चे कहां हैं?

बच्चे तो खेलने गए हैं, कि‌ पापा तो एक घंटा देरी से ही आएंगे।

श्लोक ने श्वेता को बाहों में भर लिया, आहा! क्या बात है madam, बिजली गिरने के mood में हैं। Coffee पीने चलें?

ओह! क्यूं आज आपकी स्नेहा ने coffee पीने से मना कर दिया था, जो जल्दी चले आए और coffee पीने चलने की बात कर रहे हो... श्वेता ने श्लोक की बाहों से छिटक कर बोला...


आगे पढ़ें, प्यार पर घात (अंतिम भाग) में…