This is the first time Advay has expressed a story in the form of a poem (written a ballad). Please motivate him if you do like it.
Happy Janmashtami 🎉
The Story of Giridhar
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दर्शन कान्हा जी का
रितिका, दादी मां की बड़ी लाडली थी, वो माँ से ज्यादा, अपनी दादी मां के साथ ही रहती थी। दादी माँ, आठों पहर लड्डू गोपाल की सेवा में लगी रहती थीं। अतः रितिका भी बचपन से कान्हा जी की बड़ी भक्त हो गई थी।
जब रितिका ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो, दादी मां, अपने लड्डू गोपाल को रितिका को सौंप कर बोली, रितु, आज से मेरे लड्डू गोपाल तेरे, अब तुम इन्हें जिस रूप में चाहे, उस रूप में पूजना।
क्या मतलब दादी माँ?
बिटिया, भगवान श्रीकृष्ण को तू जिस रूप में चाहे पूजना, चाहें सखा भाव में, चाहे पति रुप में, चाहें भाई रुप में या पुत्र रुप में... बस याद रखना, उनकी पूजा रोज़ करना। यह कहकर दादी मां, श्री हरि में विलीन हो गयीं।
इधर दादी मां नहीं रहीं, उधर रितिका का रिश्ता तय हो गया।
रितिका ने माँ से पूछा - मैं किस रुप में कान्हा जी की पूजा करुं?
माँ बोली- मैं क्या बताऊं, तुम्हें कान्हा खुद बताएंगे कि किस रुप में पूजा करो।
रितिका अपनी शादी से बहुत खुश थी, क्योंकि उसका ससुराल वृन्दावन में था और सभी कृष्ण भक्त थे।
जब वो ससुराल जा रही थी तो, वो लोग वृंदावन से कुछ दूर पहले एक जगह, विश्राम के लिए रुके थे।
वहां रितिका के मन में ख्याल आया कि जब शादी हो गई है तो कान्हा जी को पति और सखा भाव में तो पूज नहीं सकती, तो क्या अब पुत्र रुप में पूजा करूं?
फिर उसने अपने लड्डू गोपाल निकाले और उन्हें आदेश देते हुए कहा कि आज से मैं, आप की माँ हो गई हूँ, आप मुझे माँ कहकर बुलाएंगे।
तभी रितिका के कक्ष में एक छोटा सा बालक आया और उसे मैया, मैया कहकर बुलाने लगा और उसका पल्लू खिंचने लगा।
रितिका ने अपना घूंघट और लंबा खिंच लिया और अपने पति के पास पहुंच गयी और कहने लगी, हमारे कक्ष में एक नन्हा बालक आया है और मुझे मैया मैया कहकर बुला रहा है।
मैं तो यहां किसी को जानती नहीं हूं, ना जाने वो किसका बालक है?
अच्छा! चलो मैं चल के देखता हूं, पर तब तक वो बालक चला गया था।
कोई बात नहीं, यहीं पास का होगा, जब फिर मिलेगा, तब देख लूंगा।
जब वो लोग वृंदावन पहुंचे तो रितिका का ससुराल में बहुत स्वागत हुआ।
अगले दिन रितिका की सास ने अपने बेटे मोहन से कहा कि बहू को आज बांके बिहारी जी के मंदिर ले जा।
रितिका बहुत खुश थी, लंबा सा घूंघट कर के वो मंदिर को चल दी।
मंदिर में भी घूंघट करके खड़ी थी। मोहन बोला- अरे रितिका, बांके बिहारी के दरबार में कौन घूंघट करता है, हटा लें घूंघट...
रितिका ने जैसे ही घूंघट हटाया, उसे फिर वही नन्हा बालक खड़ा दिखाई देने लगा।
उसने तुरंत अपने पति को बोला, अरे यह वही बालक है, जो मुझे मैया मैया बुला रहा था।
मोहन देखकर दंग रह गया, वो तो साक्षात् बांके बिहारी जी थे।
मोहन ने रितिका से कहा, रितिका तेरी भक्ति धन्य है, हम कब से वृन्दावन में रह रहे हैं पर कभी बिहारी जी ने दर्शन नहीं दिए और तेरे पग रखते ही तुझे मैया मान लिया।
मेरी तो किस्मत खुल गई, जिसे कान्हा जी ने माँ मान लिया, उससे बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं।
हरि बोल, जिसने मुझे जिस भाव से चाहा है, मैं उस रुप में मिला हूँ। भक्ति से तो ईश्वर भी बंध जाते है, पर उसमें सतत् आस्था विश्वास और प्रेम अनिवार्य है...
आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 💐🙏🏻
हे प्रभु, हम सब भक्तों पर भी अपनी कृपा दृष्टि बनाएं रखें 🙏🏻🙏🏻
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धनतेरस पर्व का आरंभ व पावन कथा
हमेशा मन में यही सोचा करते थे कि धनतेरस का यह नाम क्यों पड़ा? आखिर धन और तेरस का आपस में क्या सम्बंध है?
पर आज हमें अपने प्रश्न के उत्तर मिल गये, तो सोचा आज यही साझा करते हैं, जिससे सभी को ज्ञात हो सके कि धनतेरस का नाम करण कैसे हुआ। और साथ ही यह भी ज्ञात हो कि इसमें, धन्वन्तरि देव, कुबेर जी व लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है।
आप सभी को धनतेरस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐
🙏🏻❤️माता लक्ष्मी जी की कृपा हम सब बनी रहे ❤️🙏🏻
कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंथन के समय आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरि जी को आयुर्वेद का पहला वैद्य माना जाता है।
धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इनकी चार भुजाएं होती हैं। दो भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। शंख से सांस की बीमारियां दूर होती है और वातावरण शुद्ध होता है, जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषधि तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं।
भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
धन के देवता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज की इस दिन पूजा करने का विधान है। उत्तर दिशा को कुबेर का स्थान माना जाता है। इस स्थान को जितना हो सके खाली रखें और सुबह पानी से धोकर साफ करें। फिर तांबे के बर्तन में गंगा जल लेकर उत्तर दिशा और तिजोरी में छिड़काव करें, इस उपाय से कुबेर के स्वागत की तैयारी होती है।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी
जैन आगम में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' भी कहते हैं। भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस दिन को मनाने के पीछे धनवंतरी के जन्म लेने की कथा के अलावा, दूसरी कहानी भी प्रचलित है।
कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया।
तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भू-मंडल पर आ गईं।
कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए।
लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं।
उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।
एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया।
पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।
विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है ,यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठ पूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा।
तब लक्ष्मीजी ने कहा कि हे किसान तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं वैसा करो। कल तेरस है। तुम कल घर को लीप-पोत कर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपए भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी।
इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथा अनुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी।
आज नवरात्र के अवसर पर एक short Story and poem के माध्यम से एक devotional story आप सब के समक्ष रखने की कोशिश कर रहे हैं।
आप से अनुरोध है, इसे दिल से पढ़िएगा, और उसे करने का प्रयास कीजिएगा, तो आप का जीवन सुखमय हो जाएगा।
पढ़कर, यह भी बताएं कि आप को यह कहानी कैसी लगी?
क्या करूँ अर्पण
अजय बहुत दिनों बाद अपने दोस्त रचित के घर गया था। उसकी बेटी ने दरवाजा खोला। अजय ने कहा, पापा को बोलो, उनके बचपन का दोस्त आया है। अजय को बैठा कर वो अंदर चली गयी। वो अपने पापा को जो भी बोल रही थी। वो सब बाहर भी सुनाई दे रहा था। पापा आपके बचपन के दोस्त आए हैं। पर वो तो खाली हाथ आए हैं। कुछ भी ले कर नहीं आए हैं।
ये सुन कर अजय को
एहसास हुआ,
वो तो दोस्त से मिलने की खुशी में खाली हाथ ही आ गया था। उसने कमरे में इधर-उधर
देखना शुरू कर दिया। तभी उसे एक पेंटिंग बड़ी पसंद आई। उसने वही उतार ली। और जब
रचित आया,
तो उसे वही दे दी। अपना ही समान पाकर रचित अकबका गया।
क्या रचित को खुश होना चाहिए था?
नहीं ना ?
जी हाँ अपना समान ही
दूसरे द्वारा पा कर कोई खुश नहीं होता है।
तो हम भगवान को
रुपये-पैसा,
हीरे-जवाहरात,
फल फूल चढ़ा कर ये क्यों मान लेते हैं, कि भगवान हम से खुश हो जाएंगे।
जबकि ये सब तो उनका ही दिया हुआ है।
अगर प्रभु को खुश
करना ही है तो,
हम कुछ ऐसा अर्पण करें जिसे हमने बनाया
है।
मैं बैठा सोच
रहा,
प्रभु को क्या चढ़ाऊँ
क्या मैं
उन्हें अर्पण करूँ
किस तरह उन्हें
रिझाऊँ
स्वयं प्रभु प्रकट हो, बोले
अहंकार को छोड़
के
दुनिया में सब है
मेरा
उसको जो तू
अर्पण करे
कल्याण हो जाए
तेरा
हम अपना अहंकार, घमंड जिस पल भी छोड़ देंगे। उसी क्षण हम ईश्वर के इतने करीब हो जाएंगे कि ईश्वर में ही समाहित हो जाएंगे। तब हमारा सिर्फ और सिर्फ कल्याण ही होगा।
प्रसाद
माँ बड़े मन से कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारी कर रही थी, बहुत सारे भोग पकवान बना रही थी।
उसकी खुशबू से पूरा घर महक रहा था।
कार्तिक वहीं, बैठा पढ़ रहा था, उससे रहा नहीं जा रहा था, एक सवाल उसके मन में बहुत दिनों से घूम रहा था।
उसने सोचा, आज तो माँ से पूछ कर ही रहूंगा।
वो, माँ के कंधे पर झूल गया, और पूछने लगा - माँ, आप कितना सारा भोग प्रसाद बना रहीं हैं, पर कान्हा जी कुछ खाएंगे क्या?
आप एक बात बताएं, जब भगवान कुछ खाते नहीं है तो हम भोग प्रसाद क्यों बनाते हैं?
और अगर वो खाते हैं तो कुछ कम क्यों नहीं होता है?
माँ बोलीं- कार्तिक तुम्हारी इस बात का जवाब मैं बाद में दूंगी। पहले यह बताओ, आज तुम्हारी टीचर ने, जो कविता तुम्हें याद करने को कहा था, तुमने याद कर ली?
हाँ माँ, बहुत देर पहले ही याद कर ली थी। आप सुनेंगी?
हाँ, तुम वो किताब लेकर मेरे पास आओ।
माँ ने किताब से कविता सुनना शुरू कर दिया, कार्तिक को पूरी कविता बहुत अच्छे से याद थी, उसने एक सांस में पूरी कविता सुना दी।
फिर माँ बोलीं, नहीं तुम्हें कविता ठीक से याद नहीं है।
नहीं माँ, याद है मुझे, आप ठीक से देखिए।
पर अगर तुम्हें पूरी कविता याद है, तो यहाँ से कविता कम क्यों नहीं हुई? पूरी कैसे लिखी हुई है।
जिस तरह से तुम्हारे कविता याद करने के बाद भी पूरी कविता, किताब में अभी भी लिखी हुई है, क्योंकि तुमने उसे सूक्ष्म रूप से धारण किया।
अब वो किताब में भी है और तुम्हारे मन मस्तिष्क में भी।
उसी तरह ईश्वर भी प्रसाद सूक्ष्म रूप से ग्रहण करते हैं, जिससे वो उनके पास भी रहता है और उस पात्र(plate) में भी यथावत ही रहता है।
जब भी किसी चीज़ को सूक्ष्म रूप से ग्रहण किया जाता है तो उसके बाह्य रूप में कोई अंतर नहीं आता है।
हमें पूरे भक्तिभाव से प्रसाद, ईश्वर को अर्पित करना चाहिए और पूर्ण विश्वास से ग्रहण भी करना चाहिए, कि ईश्वर ने हमारे द्वारा चढ़ाएं भोग प्रसाद को स्वीकार कर हमें आशीर्वाद प्रदान किया है।
आज कार्तिक को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था।
अब कार्तिक माँ के साथ, पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भोग-प्रसाद बनवाने बैठ गया।
उसने छोटे-छोटे हाथों से टेढ़े-मेढ़े लड्डू बना दिए।
वो शाम का इंतजार कर रहा था, जब उसके कान्हा, उसके बनाए लड्डू का प्रसाद स्वीकार करेंगे
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