Showing posts with label Stories - Devotional. Show all posts
Showing posts with label Stories - Devotional. Show all posts

Saturday, 16 August 2025

Poem : The Story of Giridhar

This is the first time Advay has expressed a story in the form of a poem (written a ballad). Please motivate him if you do like it.

Happy Janmashtami 🎉

The Story of Giridhar


After scorching heat, comes pleasant rain,
When nature itself, waters the grain.
This monsoon season, has many folklores,
Full of lessons, worth several crores.


They are one of the earliest creations,
Passed along many several generations.
Let me narrate, one of the folktales,
Where arrogance, fury and anger fails.


The auspicious and holy place of Mathura,
Acted as the residence of Lord Krishna.
The villagers were farmers by occupation,
And revered Lord Indra, for apt irrigation.


One fine day, with a question in his head,
In an innocent voice, Lord Krishna said,
“Why worship Indra? What does he do,”
As if attempting, to get a small clue.


Maa Yashoda replied, “There’s a reason,
He is the god of the monsoon season.”
Krishna understood, but was dissatisfied.
To share his view, he moved a bit aside.


“Why not worship Mount Govardhan?
For our cattle, it is the grass garden.”
Everyone agreed, and did the same.
For Indra, it became a matter of shame.


As a result, he started raining exceedingly.
For seven days, it rained increasingly.
Nothing was harmed, he was surprised,
The savior’s God himself, he had realized.


He came down, in order to apologize,
But he couldn’t simply believe his eyes.
A boy held a mountain on his li’l finger,
None other than Shri Krishna, or Giridhar.

Thursday, 18 August 2022

Stories - Devotional : दर्शन कान्हा जी का

दर्शन कान्हा जी का 



रितिका, दादी मां की बड़ी लाडली थी, वो माँ से ज्यादा, अपनी दादी मां के साथ ही रहती थी। दादी माँ, आठों पहर लड्डू गोपाल की सेवा में लगी रहती थीं। अतः रितिका भी बचपन से कान्हा जी की बड़ी भक्त हो गई थी।

जब रितिका ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो, दादी मां, अपने लड्डू गोपाल को रितिका को सौंप कर बोली, रितु, आज से मेरे लड्डू गोपाल तेरे, अब तुम इन्हें जिस रूप में चाहे, उस रूप में पूजना। 

क्या मतलब दादी माँ?

बिटिया, भगवान श्रीकृष्ण को तू जिस रूप में चाहे पूजना, चाहें सखा भाव में, चाहे पति रुप में, चाहें भाई रुप में या पुत्र रुप में... बस याद रखना, उनकी पूजा रोज़ करना। यह कहकर दादी मां, श्री हरि में विलीन हो गयीं। 

इधर दादी मां नहीं रहीं, उधर रितिका का रिश्ता तय हो गया।

रितिका ने माँ से पूछा - मैं किस रुप में कान्हा जी की पूजा करुं?

माँ बोली- मैं क्या बताऊं, तुम्हें कान्हा खुद बताएंगे कि किस रुप में पूजा करो।

रितिका अपनी शादी से बहुत खुश थी, क्योंकि उसका ससुराल वृन्दावन में था और सभी कृष्ण भक्त थे।

जब वो ससुराल जा रही थी तो, वो लोग वृंदावन से कुछ दूर पहले एक जगह, विश्राम के लिए रुके थे।

वहां रितिका के मन में ख्याल आया कि जब शादी हो गई है तो कान्हा जी को पति और सखा भाव में तो पूज नहीं सकती, तो क्या अब पुत्र रुप में पूजा करूं?

फिर उसने अपने लड्डू गोपाल निकाले और उन्हें आदेश देते हुए कहा कि आज से मैं, आप की माँ हो गई हूँ, आप मुझे माँ कहकर बुलाएंगे।

तभी रितिका के कक्ष में एक छोटा सा बालक आया और उसे मैया, मैया कहकर बुलाने लगा और उसका पल्लू खिंचने लगा।

रितिका ने अपना घूंघट और लंबा खिंच लिया और अपने पति के पास पहुंच गयी और कहने लगी, हमारे कक्ष में एक नन्हा बालक आया है और मुझे मैया मैया कहकर बुला रहा है। 

मैं तो यहां किसी को जानती नहीं हूं, ना जाने वो किसका बालक है?

अच्छा! चलो मैं चल के देखता हूं, पर तब तक वो बालक चला गया था।

कोई बात नहीं, यहीं पास का होगा, जब फिर मिलेगा, तब देख लूंगा।

जब वो लोग वृंदावन पहुंचे तो रितिका का ससुराल में बहुत स्वागत हुआ।

अगले दिन रितिका की सास ने अपने बेटे मोहन से कहा कि बहू को आज बांके बिहारी जी के मंदिर ले जा।

रितिका बहुत खुश थी, लंबा सा घूंघट कर के वो मंदिर को चल दी।

मंदिर में भी घूंघट करके खड़ी थी। मोहन बोला- अरे रितिका, बांके बिहारी के दरबार में कौन घूंघट करता है, हटा लें घूंघट...

रितिका ने जैसे ही घूंघट हटाया, उसे फिर वही नन्हा बालक खड़ा दिखाई देने लगा।

उसने तुरंत अपने पति को बोला, अरे यह वही बालक है, जो मुझे मैया मैया बुला रहा था। 

मोहन देखकर दंग रह गया, वो तो साक्षात् बांके बिहारी जी थे।

मोहन ने रितिका से कहा, रितिका तेरी भक्ति धन्य है, हम कब से वृन्दावन में रह रहे हैं पर कभी बिहारी जी ने दर्शन नहीं दिए और तेरे पग रखते ही तुझे मैया मान लिया।

मेरी तो किस्मत खुल गई, जिसे कान्हा जी ने माँ मान लिया, उससे बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं।

हरि बोल, जिसने मुझे जिस भाव से चाहा है, मैं उस रुप में मिला हूँ। भक्ति से तो ईश्वर भी बंध जाते है, पर उसमें सतत् आस्था विश्वास और प्रेम अनिवार्य है...


आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 💐🙏🏻

हे प्रभु, हम सब भक्तों पर भी अपनी कृपा दृष्टि बनाएं रखें 🙏🏻🙏🏻 

कृष्णा जी से जुड़ी अन्य post का आनन्द लेने के लिए click करें...

Bhajan (Devotional Song): आए आए हमारे कान्हा जी  

Kids Story : विश्वास. (Devotional)  

Bhajan (Devotional Song): दर्शन देंगे कान्हा 

Bhajan (Devotional Song) : रिझाते सबको..... 

Poem : माँ को कान्हा नज़र आता है 

Short Story : प्रसाद 

Bhajan : आया आया है नंदलाला

Tuesday, 2 November 2021

Stories - Devotional : धनतेरस पर्व का आरंभ व पावन कथा

धनतेरस पर्व का आरंभ व पावन कथा

हमेशा मन में यही सोचा करते थे कि धनतेरस का यह नाम क्यों पड़ा? आखिर धन और तेरस का आपस में क्या सम्बंध है? 

पर आज हमें अपने प्रश्न के उत्तर मिल गये, तो सोचा आज यही साझा करते हैं, जिससे सभी को ज्ञात हो सके कि धनतेरस का नाम करण कैसे हुआ। और साथ ही यह भी ज्ञात हो कि इसमें, धन्वन्तरि देव, कुबेर जी व लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है।

आप सभी को धनतेरस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐 

🙏🏻❤️माता लक्ष्मी जी की कृपा हम सब बनी रहे ❤️🙏🏻


कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंथन के समय आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरि जी को आयुर्वेद का पहला वैद्य माना जाता है।

‌‍ धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इनकी चार भुजाएं होती हैं। दो भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। शंख से सांस की बीमारियां दूर होती है और वातावरण शुद्ध होता है, जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषधि तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं।

भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

धन के देवता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज की इस दिन पूजा करने का विधान है। उत्तर दिशा को कुबेर का स्थान माना जाता है। इस स्थान को जितना हो सके खाली रखें और सुबह पानी से धोकर साफ करें। फिर तांबे के बर्तन में गंगा जल लेकर उत्तर दिशा और तिजोरी में छिड़काव करें, इस उपाय से कुबेर के स्वागत की तैयारी होती है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी

जैन आगम में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' भी कहते हैं। भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस दिन को मनाने के पीछे धनवंतरी के जन्म लेने की कथा के अलावा, दूसरी कहानी भी प्रचलित है। 

कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया।

तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भू-मंडल पर आ गईं।

कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए।

लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं।

उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।

एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया।

पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।

विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है ,यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठ पूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा।

तब लक्ष्मीजी ने कहा कि हे किसान तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं वैसा करो। कल तेरस है। तुम कल घर को लीप-पोत कर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपए भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी।

इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथा अनुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी।

Wednesday, 21 October 2020

Stories - Devotional : क्या करूँ अर्पण

 आज नवरात्र के अवसर पर एक short Story and poem के माध्यम से एक devotional story आप सब के समक्ष रखने की कोशिश कर रहे हैं।

आप से अनुरोध है, इसे दिल से पढ़िएगा, और उसे करने का प्रयास कीजिएगा, तो आप का जीवन सुखमय हो जाएगा। 

पढ़कर, यह भी बताएं कि आप को यह कहानी कैसी लगी?

क्या करूँ अर्पण



अजय बहुत दिनों बाद अपने दोस्त रचित के घर गया था। उसकी बेटी ने दरवाजा खोला। अजय ने कहा, पापा को बोलो, उनके बचपन का दोस्त आया है। अजय को बैठा कर वो अंदर चली गयी। वो अपने पापा को जो भी बोल रही थी। वो सब बाहर भी सुनाई दे रहा था। पापा आपके बचपन के दोस्त आए हैं। पर वो तो खाली हाथ आए हैं। कुछ भी ले कर नहीं आए हैं।

ये सुन कर अजय को एहसास हुआ, वो तो दोस्त से मिलने की खुशी में खाली हाथ ही आ गया था। उसने कमरे में इधर-उधर देखना शुरू कर दिया। तभी उसे एक पेंटिंग बड़ी पसंद आई। उसने वही उतार ली। और जब रचित आया, तो उसे वही दे दी। अपना ही समान पाकर रचित अकबका गया।

क्या रचित को खुश होना चाहिए था? 

नहीं ना ?

जी हाँ अपना समान ही दूसरे द्वारा पा कर कोई खुश नहीं होता है।

तो हम भगवान को रुपये-पैसा, हीरे-जवाहरात, फल फूल चढ़ा कर ये क्यों मान लेते हैं, कि भगवान हम से खुश हो जाएंगे। जबकि ये सब तो उनका ही दिया हुआ है।

अगर प्रभु को खुश करना ही है तो, हम कुछ ऐसा अर्पण करें जिसे हमने बनाया है।


मैं बैठा सोच रहा,

प्रभु को क्या चढ़ाऊँ

क्या मैं उन्हें अर्पण करूँ 

किस तरह उन्हें रिझाऊँ

स्वयं प्रभु प्रकट हो, बोले  

अहंकार को छोड़ के

दुनिया में सब है मेरा

उसको जो तू अर्पण करे

कल्याण हो जाए तेरा


हम अपना अहंकार, घमंड जिस पल भी छोड़ देंगे। उसी क्षण हम ईश्वर के इतने करीब हो जाएंगे कि ईश्वर में ही समाहित हो जाएंगे। तब हमारा सिर्फ और सिर्फ कल्याण ही होगा।     

Monday, 10 August 2020

Short Story : प्रसाद

 प्रसाद 


माँ बड़े मन से कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारी कर रही थी, बहुत सारे भोग पकवान बना रही थी।

उसकी खुशबू से पूरा घर महक रहा था।

कार्तिक वहीं, बैठा पढ़ रहा था, उससे रहा नहीं जा रहा था, एक सवाल उसके मन में बहुत दिनों से घूम रहा था।

उसने सोचा, आज तो माँ से पूछ कर ही रहूंगा।

वो, माँ के कंधे पर झूल गया, और पूछने लगा - माँ, आप कितना सारा भोग प्रसाद बना रहीं हैं, पर कान्हा जी कुछ खाएंगे क्या?

आप एक बात बताएं, जब भगवान कुछ खाते नहीं है तो हम भोग प्रसाद क्यों बनाते हैं?

और अगर वो खाते हैं तो कुछ कम क्यों नहीं होता है?

माँ बोलीं- कार्तिक  तुम्हारी इस बात का जवाब मैं बाद में दूंगी। पहले यह बताओ, आज तुम्हारी टीचर ने, जो कविता तुम्हें याद करने को कहा था, तुमने याद कर ली?

हाँ माँ, बहुत देर पहले ही याद कर ली थी। आप सुनेंगी?

हाँ, तुम वो किताब लेकर मेरे पास आओ।

माँ ने किताब से कविता सुनना शुरू कर दिया, कार्तिक को पूरी कविता बहुत अच्छे से याद थी, उसने एक सांस में पूरी कविता सुना दी।

फिर माँ बोलीं, नहीं तुम्हें कविता ठीक से याद नहीं है।

नहीं माँ, याद है मुझे, आप ठीक से देखिए।

पर अगर तुम्हें पूरी कविता याद है, तो यहाँ से कविता कम क्यों नहीं हुई? पूरी कैसे लिखी हुई है।

जिस तरह से तुम्हारे कविता याद करने के बाद भी पूरी कविता, किताब में अभी भी लिखी हुई है, क्योंकि तुमने उसे सूक्ष्म रूप से धारण किया।

अब वो किताब में भी है और तुम्हारे मन मस्तिष्क में भी।

उसी तरह ईश्वर भी प्रसाद सूक्ष्म रूप से ग्रहण करते हैं, जिससे वो उनके पास भी रहता है और उस पात्र(plate) में भी यथावत ही रहता है।

जब भी किसी चीज़ को सूक्ष्म रूप से ग्रहण किया जाता है तो उसके बाह्य रूप में कोई अंतर नहीं आता है। 

हमें पूरे भक्तिभाव से प्रसाद, ईश्वर को अर्पित करना चाहिए और पूर्ण विश्वास से ग्रहण भी करना चाहिए, कि ईश्वर ने हमारे द्वारा चढ़ाएं भोग प्रसाद को स्वीकार कर हमें आशीर्वाद प्रदान किया है।

आज कार्तिक को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था।

अब कार्तिक माँ के साथ, पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भोग-प्रसाद बनवाने बैठ गया।

उसने छोटे-छोटे हाथों से टेढ़े-मेढ़े लड्डू बना दिए। 

वो शाम का इंतजार कर रहा था, जब उसके कान्हा, उसके बनाए लड्डू का प्रसाद स्वीकार करेंगे 


कृष्णा जी से जुड़ी अन्य post का आनन्द लेने के लिए click करें...

Kids Story : विश्वास. (Devotional)  

Bhajan (Devotional Song): दर्शन देंगे कान्हा 

Bhajan (Devotional Song) : रिझाते सबको..... 

Poem : माँ को कान्हा नज़र आता है 

Stories - Devotional : दर्शन कान्हा जी का

Bhajan : आया आया है नंदलाला

Bhajan (Devotional Song): आए आए हमारे कान्हा जी  


Monday, 27 July 2020

Short story : 🌹🌹सावन 🌹🌹

आप सभी को सावन के चौथे सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻🔱🕉️

आप सब के साथ मुझे बीकानेर ( राजस्थान) के श्री अशोक रंगा जी की लघुकथा को share करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।


🌹🌹सावन 🌹🌹




शिव भक्त बालक प्रेम गहरी नींद में था . नींद में अचानक उसकी मुलाक़ात नारद मुनि जी से हो गई थी . अब प्रेम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा.

बालक प्रेम ने नारद मुनि के सामने एक के बाद एक सवालों की झड़ी सी लगा डाली ताकि वे नजरों से कहीं  ओझिल ना हो जाए .
 
प्रेम ने उनसे यह भी सवाल पूछा कि सावन के महीने में महादेव को विशेष रूप से क्यों पूजा जाता है? 

इस महीने में चारों तरफ बादल -बरसात, हरियाली, ठण्डी-ठण्डी हवाएँ  व खुशनुमा सा माहौल क्यों हो जाया करता है? 

नारद जी ने भी बालक को प्रसन्नता पूर्वक बताना शुरू किया, कि सावन के महीने में महादेव स्वयं पार्वती से मिलने धरती पर आया करते  है. 

महादेव के धरती पर आने व पार्वती जी से मिलन की खुशी में प्रकृति उनके स्वागत  में चारों तरफ शीतल हवाएँ, हरियाली, बादल व बरसात के रूप में अपनी खुशियों को प्रकट करती हुई  उनका दिल से स्वागत करती है व दूसरे शिव भक्त भी उनके दर्शन व उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए मचल उठते है. 

इतने में बाहर तेज़ बारिश व बिजली की आवाज़ से बालक प्रेम की आँख खुल चुकी थी.

प्रेम हर-हर-महादेव का उच्चारण करते हुवे जल्दी से नहा-धो कर सीधे महादेव के मंदिर में गया . 

मंदिर के दर्शन के बाद प्रेम ने सभी दिशाओं में प्रकृति को शिव समर्पित होते हुवे देख महादेव का जयकारा लगाया. हर हर महादेव, हर हर महादेव. 

Disclaimer:
इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Monday, 8 April 2019

Story of life : क्या सही है. (Devotional)


क्या सही है




एक बार माता रानी, अपने भक्तों से मिलने आयीं। उनके साथ उनका शेर भी था। 

अभी वो कुछ दूर ही चलीं थी। कि उन्होंने देखा एक भक्त नदी किनारे बैठ कर माता रानी के नाम की माला जप रहा था। माता रानी मुस्कुरा के चल दीं

वो और आगे चलीं, तो उन्होंने देखा एक जगह, जगराते की बहुत भव्य रूप में तैयारी चल रही थी। तैयारी वाले के पास एक व्यक्ति आ कर बोला, सर जी हमारे यहाँ का जगराता ही सबसे विशाल है। और खाना बनाने वाला भी अपने यहाँ का ही सबसे अच्छा है। अबकी बार तो सबसे ज्यादा हमारे यहाँ ही भीड़ होगी। माता रानी मुस्कुरा के आगे चल दीं।

थोड़ी दूर पर माँ का एक विशाल मंदिर था। पर उसका रास्ता बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा था। वहाँ बाहर से आए व्यक्ति अक्सर रास्ता भूल जाया करते थे। अतः वहाँ से लौटते समय वो बहुत थके हुए लौटते थे। 

एक आदमी ने वहाँ, अपनी छोटी सी दुकान खोल रखी थी। जहाँ उसने मात्र 5 रुपये में खाना-पानी, दवा, आराम करने की व्यवस्था कर रखी थी, और हर आने वालों से वो बड़े प्यार और आदर से बात कर रहा था। माता रानी वहाँ खड़ी बड़े प्यार से उसे देखती रहीं। फिर आगे चल दीं।

जब वो वापस अपने धाम आ गईं। तो उनका शेर बोला माँ, आप ने सिर्फ आखरी वाले व्यक्ति पर ही स्नेह दिखाया। जब कि वो तो केवल अपना व्यापार ही कर रहा था। पहले वाले दोनों आप के कितने बड़े भक्त थे।

वो बोलीं, पहला वाला, मेरे नाम का जप करने का सिर्फ दिखावा कर रहा था। जबकि उसके मन में यही चल रहा था कि नवरात्रि आ रही है, जब महिलाएं जल भरने आएंगी, तो उनसे माता रानी के नाम पर दान मांग लूँगा। नदी किनारे बहुत सी महिला एक साथ 
मिल जाती थीं। इसलिए वो हमेशा कोई भी त्योहार आने से नदी के किनारे ही अपना जप किया करता था। उसको यूँ, माला जपता देखकर सभी उसे बहुत ही धर्मात्मा मानते थे। वो मेरा सच्चा भक्त नहीं है।

दूसरा व्यक्ति, अपने धन के प्रभाव से मेरा विशाल जगराता रख कर, केवल वैभव का प्रदर्शन कर रहा था। वो मेरा सच्चा भक्त नहीं है।

जो तीसरा व्यक्ति था, वही मेरा सच्चा भक्त है। जिस जगह उसकी दुकान है। वहाँ वो अतिशय धन एकत्र कर सकता है। क्योंकि उस समय वहाँ आने वाले सभी भक्तों को वो सुविधाएं चाहिए होती हैं। पर वो, मात्र उतना ही धन ले रहा है, जिससे अपनी दुकान सुचारु रूप से चला सके। और हर आने वाले चाहे वो निर्धन हो या धनवान, सबकी समभाव से सेवा कर रहा है। ना तो उसे धन का लोभ है, ना वो झूठा दिखावा कर रहा है। वो बहुत अच्छा है, वहाँ आने वाले सबको यही लगता है। और ये पूर्णत: सत्य भी है, क्योंकि उसने धर्मात्मा होने का कोई झूठा आडंबर भी नहीं रचा रखा है।

मुझे पाने के लिए कठिन तप, बाह्य आडंबर या बहुत अधिक धन व्यय करने की आवश्यकता नहीं है। उसके बदले में आप सच्चाई, ईमानदारी और श्रम से अपना कर्म करें। निस्वार्थ भावना से लोगों की भलाई करें। अपने माता- पिता, बड़े बुजुर्गों की सेवा व सम्मान करें। छोटों से प्यार करें। तो मुझे तो स्वतः ही पा जाओगे। क्योंकि मैंने आपको मनुष्य रूप में यही कार्य करने हेतु भेजा है। और यही सही है, इसी तरह ही मैं प्रसन्न भी रहूँगी।

ज़ोर से बोलो, जय माता दी
सारे बोलो, जय माता दी   

Monday, 15 October 2018

Devotional Story : भक्ति और विश्वास. (Devotional)


भक्ति और विश्वास


नरेश जी की सर्राफा बाज़ार में सोने चाँदी की ऊंची दुकान थी। उनकी जितनी ऊंची दुकान थी। स्वभाव भी उतना ही अच्छा था। वो देवी माँ के परम भक्त थे। दिन में दो बार माँ की आरती आराधना किया करते। दुकान में काम करने वालों को कभी नौकर नहीं मानते थे। उन्हें भी घर के सदस्य के समान ही मानते थे। सबके अच्छे बुरे सब में हमेशा शामिल रहा करते थे।
उनकी पत्नी रूपा भी उनके ही समान थीं। इतने अच्छे सेठ-सेठानी को पाकर उनके यहाँ काम करने वाले भी उन पर अपनी जान छिड़कते थे। सब अच्छा चल रहा था। कमी थी तो बस एक बात की। कि नरेश जी के कोई बच्चा नहीं था।
किसी ने उनसे कहा, अगर वो वैष्णो देवी के दरबार में जाएँ, तो माँ प्रसन्न होकर पुत्र प्रदान कर सकती हैं।
जब ये बात नरेश जी को पता चली, तो दोनों ने तुरंत ही माँ के दरबार जाने का फैसला कर लिया। माँ के दरबार की चढ़ाई के लिए सब बोले, घोड़ा या गाड़ी कर लेते हैं। पर वे पैदल ही गए। वहाँ उन्होंने कई दिन तक, आने वालों के लिए निशुल्क भोजन व जल की व्यवस्था करवा दी।
माँ अपने भक्त से प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने नरेश जी को सपने में दर्शन दिया। वे बोली बताओ तुम्हें क्या चाहिए। वे बोले माँ आपकी कृपा से मेरे पास सब कुछ बहुत अच्छा है। पर मेरे बाद सब कुछ संभालने वाला भी कोई नहीं होगा। क्या आप मुझे पुत्र का वरदान दे सकती हैं?
माँ ने कहा, तुम्हारे नसीब में पुत्र नहीं है। मैं दे भी दूँ तो वो 21 वर्ष में मर जाएगा। माँ आप मुझे दे दीजिये। ये जानते हुए भी कि वो 21 साल बाद नहीं रहेगा। हाँ माँ आप मुझे दे दीजिये। मुझे अपनी भक्ति और आप पर इतना विश्वास है, कि आप मेरे पुत्र को जीवन दान दे ही देंगी।
कुछ दिनों बाद ही उनके पुत्र पैदा हुआ। माँ के आशीर्वाद से वो हुआ था, अतः उसका नाम दुर्गाशीष ही रखा।
नरेश जी ने माँ की पूजा आराधना और बढ़ा दी। माँ का एक भव्य मंदिर बनवा दिया। जहाँ कोई चढ़ावा चढ़ाना माना था। पर वहाँ आने वाले गरीब व असहाय भक्तों को भोजन भी प्रदान किया जाता था। जिसके बदले में उनसे पैसे नहीं लिए जाते थे, बल्कि श्रम दान लिया जाता था। जैसे कोई मंदिर साफ करता, तो कोई भोग बनाता; जो जिस योग्य होता उसे वैसा ही काम दिया जाता।  
इस तरह से लोगों को भोजन की तलाश में ना तो भटकना पड़ता था, ना ही गलत काम करना पड़ता। साथ ही माँ के भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगी।
जब दुर्गाशीष 16 साल का हुआ तो, नरेश जी ने मंदिर की सारी ज़िम्मेदारी दुर्गाशीष को सौंप दी। वो भी माँ का बड़ा भक्त था। बड़ी जतन से माँ और उनके भक्तों की सेवा में जुट गया। नरेश जी ने मेहुल को इन सब काम में दुर्गाशीष का हाथ बंटाने के लिए रख दिया
जब दुर्गाशीष 21 साल का होने को आया, तो नरेश जी ने मेहुल से कहा, कि अब वो दिन रात दुर्गाशीष के साथ रहे। आखिर वो दिन भी आ गया। जब दुर्गाशीष 21 साल का हुआ। उस दिन सुबह से ही उसकी तबीयत खराब होने लगी। फिर भी वो मंदिर गया। वहाँ जब उसकी हालत और खराब हो गयी। तो मेहुल बोला, भैया जी, आप अंदर आराम कर लीजिये। भोग बन जाने पर मैं आपको बुला लूँगा। भोग बनने पर जब वो दुर्गाशीष को उठाने गया। तो वो मर चुका था। उसने तुरंत नरेश जी को फोन किया। सेठ जी भैया जी नहीं रहे।
नरेश जी व उनकी पत्नी तुरंत मंदिर पहुँच गए। वहाँ जा कर उन्होंने पहले माँ की आरती की, फिर सबको भोग बांटा गया। उसके बाद, उन्होंने सब को बता दिया कि दुर्गाशीष अब इस दुनिया में नहीं रहा। अतः मैं व मेरी पत्नी भी अपना जीवन समाप्त करने वाले हैं। अतः ये मंदिर भी अब बंद हो जाएगा।
ऐसा सुन कर सभी समवेत स्वर में माँ की आराधना करने लगे। उस समय सभी एक ही प्रार्थना कर रहे थे, कि माँ दुर्गाशीष के प्राण लौटा दें।
इतने भक्तों की प्रार्थना माँ ठुकरा नहीं सकीं, उन्होंने दुर्गाशीष को जीवन दान दे दिया। और उसी रात माँ नरेश जी के स्वप्न में आयीं। और बोलीं, तू मेरा सच्चा भक्त है। तेरी भक्ति और विश्वास से मैं अति प्रसन्न हुई हूँ। तूने ना केवल मेरी भक्ति की है, बल्कि मेरे अन्य भक्तों को भी सही मार्ग प्रदान किया है, इसलिए मैंने तेरे पुत्र को जीवन-दान दिया है।
नरेश जी व उनके पुत्र ने माँ की सेवा में ही अपना जीवन व्यतीत कर दिया।

Monday, 3 September 2018

Kids Story : विश्वास. (Devotional)


विश्वास


नन्हा सोनू अपनी माँ का लाला एकलौता बेटा था। पिता के नहीं रहने से उसकी माँ, उसका व अपना गुजर-बसर लोगों के घर बर्तन धोकर किया करती थी। सोनू बड़ा ही होनहार व अपनी माँ का आज्ञाकारी बेटा था।
पिता के नहीं रहने के बाद से सोनू ने अपनी माँ से कभी किसी चीज़ की demand नहीं की। पर उसकी माँ जानती थी, कि उसके बेटे को पढ़ने का बहुत शौक है। अतः जैसे-तैसे पैसे जोड़ के वो अपने बेटे को पढ़ने भेजा करती थी। सोनू भी बहुत मन लगा के पढ़ाई करता था।
वहाँ साहूकार का बेटा रजत भी पढ़ता था। वो पढ़ने में एकदम zero था। सोनू पढ़ने में होनहार था, इसलिए वो सोनू से बहुत चिढ़ता था। आए दिन वो ऐसी हरकतें करता, जिससे सोनू को नीचा देखना पड़े। सोनू भी क्रोध का घूंट पी के रह जाता, क्योंकि उसकी माँ रजत के घर भी काम करती थी। और रजत की माँ बड़ी भली स्त्री थी, वो आए दिन सोनू की माँ की मदद किया करती थी। अतः सोनू अपनी माँ को भी स्कूल की बात नहीं बताता था। पर वो अंदर ही अंदर बहुत ही दुखी था। सोनू की माँ भाँप गयीं कि सोनू को कुछ बात सता रही है, जो वो उसे नहीं बता रहा है।
सोनू की माँ ने उससे कहा, बेटा जो तू मुझे नहीं बता पा रहा है, तू वहाँ कान्हा जी का जो मंदिर है ना। वहाँ जा कर अपनी बात कान्हा से बोल देना, वो तेरी सारी बातें सुनेगें भी, और तेरी सारी परेशानी दूर भी कर देंगे।
सोनू ने अब से बड़े विश्वास से कान्हा जी से सारी बातें बतानी शुरू कर दी। एक दिन सोनू स्कूल जा रहा था, तो उसे एक लड़का मिला, वो बड़ी मीठी धुन में बांसुरी बजा रहा था। सोनू उसके पास गया, और वहीं बैठ गया। जब उसने बांसुरी बजाना बंद किया तो, सोनू ने पूछा, तुम्हारा नाम क्या है?
वो लड़का बोला, कान्हा! सोनू सुन के हँसने लगा, बोला कान्हा! वो मंदिर वाले? हाँ!
वाह जी वाह, तब तो अब मंदिर जाने की जरूरत ही नहीं है तुम मेरे दोस्त बनोगे? कान्हा बोले, हाँ बिलकुल, मैं तो तुम्हारा बहुत दिन पहले से दोस्त हूँ, जब से तुम अपनी माँ के कहने से मुझे सब बात बताते थे तबसे
अब तुम किसी बात की चिंता मत करो, अब कोई तुम्हें कभी परेशान नहीं करेगा। बस तुम्हें एक बात का ध्यान रखना, चाहे जो भी हो, मुझ पर हमेशा विश्वास रखना।
सोनू अब बहुत खुश रहने लगा था, कि उसके पास एक ऐसा दोस्त है, जिसे वो अपने मन की सारी बात बता सकता था।
सोनू को खुश देखकर, रजत को बड़ी चिढ़न होती, उसने principal जी से कहा, जन्माष्टमी आ रही है। स्कूल में खीर बननी चाहिए। तो क्यों ना सब के घर से दूध मँगवा कर स्कूल में उत्सव मनाया जाए। principal जी को बात जँच गयी।
स्कूल में घोषणा कर दी गयी, सबको जन्माष्टमी में दूध लाना है, जो जितना ज्यादा दूध लाएगा, उसे उतनी ज्यादा खीर मिलेगी, और जो नहीं लाएगा, उसे खीर नहीं मिलेगी।
सोनू बहुत परेशान था, माँ के पास तो पैसा है नहीं, दूध कैसे लाएगी। उसे खीर बहुत पसंद थी। तभी उसे ख़्याल आया, क्यों ना कान्हा से मांगा जाए। बहुत संकोच करके उसने स्कूल जाने से पहले कान्हा से दूध मांगा, तो वो बोला, सोनू बड़ी देर कर दी आने में, अब तो सिर्फ इतना ही बचा है, कहकर एक बहुत ही छोटा दूध से भरा हुआ लोटा दे दिया।
सोनू पहले तो मायूस हुआ, फिर बोला मेरे लिए इतना भी काफी है। और बड़े विश्वास के साथ लोटा ले कर चल दिया। जब स्कूल पहुंचा, वहाँ सारे बच्चे बहुत बड़े बड़े बर्तन में दूध लाये थे। उसका छोटा सा लोटा देखकर रजत बहुत ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। उसे हँसता देखकर सारे बच्चे भी हंसने लगे। पर वो पूरे विश्वास से खड़ा रहा कि, कान्हा ने दिया है दूध, तो कम नहीं है। सबका दूध बहुत बड़े से बर्तन में डाला जा रहा था, अभी तक बर्तन आधा भी नहीं भरा था। जब सोनू की बारी आई, तो टीचर जी भी चिल्ला दिये, क्या सोनू मज़ाक कर रहा है क्या? इतना सा दूध देकर खीर खाना चाहता है, चल भाग यहाँ से। सोनू ने जाते जाते, अपने लोटे का दूध बर्तन में डाल दिया। उसके दूध डालते ही ना केवल बर्तन भर गया, बल्कि दूध बहुत तेज़ी से बहने भी लगा।
आपाधापी में और बर्तन लाये गए, स्कूल में जितने भी बर्तन थे, सब भर गए, पर दूध अभी भी बह रहा था।
सब हैरान थे। टीचर जी सोनू से पूछने लगे, कहाँ से दूध लाये हो, जो बढ़ता ही जा रहा है, उसने कहा, अपने दोस्त   कान्हा से।
सब बोले हमें भी कान्हा से मिलना है, सोनू सब को ले गया, पर वहाँ कान्हा नहीं मिले। जब सब चले गए, तब कान्हा आये। सोनू गुस्सा हो गया, तब क्यों नहीं आए थे? कान्हा बोले- क्योंकि मैं विश्वास करने वालों को ही दिखता हूँ, परीक्षा लेने वालों को नहीं।
सोनू भी स्कूल चला गया, बहुत ज्यादा खीर बनी थी, पूरे गाँव में बाँट दी गयी। अब सोनू को कोई परेशान नहीं करता था, सब जान चुके थे, सोनू के साथ कान्हा रहते हैं। पर ये केवल सोनू जानता था, कि जिस-जिस को भी कान्हा पर विश्वास है, कान्हा उन सब के साथ रहते हैं। उन्हें अपने साथ रखना है, तो ये विश्वास रखना होगा, कि जब वो साथ में हैं, तब कुछ कम नहीं पड़ेगा, कभी कुछ बुरा नहीं होगा।

क्या आपको है, इतना विश्वास !

बोलो बाँके बिहारी लाल की जय,  बोलो गिरिधर गोपाल की जय

नन्द के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की

हाथी- घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की