यह रचना, आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी पर आधारित है, आप भी इसे पढ़ें और सुनें।
शायद आपको भी वही अनुभव हो, जो हमें हुआ है...
भागते-भागते
भागते-भागते
कब यह शाम हो गई
ज़िन्दगी सारी यूं ही
तमाम हो गई
भागते-भागते
कब कहां, जाने कैसे
रह गए सब ही पीछे
अपनों से ही दूरियां
बेनाम हो गई
भागते-भागते
आ के मंज़िल पर
है पता यह चला
खुशियां सारी ही अपनी
बेदाम हो गई
भागते-भागते
मिली थी जो खुशी
तलाश उसकी थी नहीं
सच्चे सुख की तलाश
नाकाम हो गई
भागते-भागते
अपना अनुभव हमें comment box में जरूर बताइएगा, पढ़कर हमें खुशी होगी और प्रेरणा भी मिलेगी 🙏🏻😊