Monday, 24 March 2025

Poem : भागते-भागते

यह रचना, आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी पर आधारित है, आप भी इसे पढ़ें और सुनें।

शायद आपको भी वही अनुभव हो, जो हमें हुआ है...

भागते-भागते


भागते-भागते 

कब यह शाम हो गई 

ज़िन्दगी सारी यूं ही 

तमाम हो गई 

भागते-भागते 


कब कहां, जाने कैसे  

रह गए सब ही पीछे 

अपनों से ही दूरियां 

बेनाम हो गई 

भागते-भागते 


आ के मंज़िल पर 

है पता यह चला 

खुशियां सारी ही अपनी 

बेदाम हो गई  

भागते-भागते 


मिली थी जो खुशी 

तलाश उसकी थी नहीं 

सच्चे सुख की तलाश 

नाकाम हो गई 

भागते-भागते




अपना अनुभव हमें comment box में जरूर बताइएगा, पढ़कर हमें खुशी होगी और प्रेरणा भी मिलेगी 🙏🏻😊