Thursday, 5 February 2026

Poem : उम्मीद

उम्मीद

हर रोज़ उम्मीदों को,
जुड़ते टूटते देखा है।
हम जो थे अब तक
आशाओं से भरे हुए,
उन आशाओं को 
क्षण-क्षण 
बिखरते देखा है।
जीने की जो इच्छा है,
उसको तिल-तिल 
छूटते देखा है। 
हमने बहुत पास से 
खुद को बदलते देखा है। 
ज़िंदगी गुजार दी 
जिन रिश्तों को संवारने में,
उन्हीं रिश्तों को हर पल 
बदलते हुए देखा है।।