Saturday, 29 November 2025

Poem : धूप आई घर द्वार

हे ईश्वर, आप परम दयालु हैं, अपनी कृपादृष्टि बनाएं और पुनश्च हमारा सुख-संसार बसाएं 🙏🏻

धूप आई घर द्वार


जिसका किया बरसों इंतज़ार,

वो धूप आई मेरे घर द्वार। 

पर इस बात की खुशियां,

मनाऊं तो मनाऊं कैसे? 

अपने बैचेन दिल को रिझाऊं कैसे?

क्योंकि, अब पिया बैठे उस पार,

तो जिया क्यों न हो बेकरार?

तड़प अभी भी बाकी है।

इंतज़ार अभी भी बाकी है।

पहले धूप का था,

अब साथ का है।

हे प्रभु, किया जब इतना,

तो इतना भी कर दो न।

मेरी झोली में साथ पिया का,

फिर से एक बार भर दो न।

साथ निहारें हम मिलकर,

इस गुनगुनी धूप को।

बरसों इंतज़ार किया था जिसका,

ईश्वर के उस सुखद स्वरूप को।