Wednesday, 4 February 2026

Poem : शोर

शोर 


जब से इन कानों ने,

सुनना बंद किया। 

शोर बहुत धड़कनों

का सुनाई दिया,

सपनों का सुनाई दिया, 

अपनों का सुनाई दिया,

बेइंतहा तन्हाई का

सुनाई दिया।

और बस एक ही 

बात समझ आई,

न किसी से उम्मीद करो,

न किसी को उम्मीद दो,

क्योंकि अपने हिस्से की

लड़ाई खुद लड़नी होती है।

कोई दावे कर ले जितने, 

साथ कोई चला नहीं करता।