सफलता का घमंड
रघुवीर, एक सीधा-सीधा रिश्तों को जोड़कर रखने वाला संस्कारी व्यक्ति था। वो हमेशा रिश्तों को बनाए रखने के लिए झुक जाता, वो सही हो या ग़लत, रिश्तों के मान से बढ़कर उसके लिए स्वयं का सम्मान भी नहीं था।
पर उसकी इस खूबी को लोगों ने उसकी कमजोरी समझ ली, और सब उससे अपने मन का करवाते रहते। वो भी सहन करता गया, इस इंतज़ार में कि एक दिन सब समझेंगे, पर वो दिन कभी नहीं आया।
इस बीच उसने अपने आपको सुदृढ़ करने का प्रयास जारी रखा, ईश्वर की कृपा से वो दिन उसकी जिंदगी में जल्द ही आ गया, वो बहुत प्रतिष्ठित व्यापारी बन गया। अब उसका अस्तित्व लोगों के लिए बदल गया था। लोगों का व्यवहार उसके लिए अधिक सम्मानजक हो गया था।
अब तक वो भी रिश्तों को मजबूत बनाए रखने की कवायद से थक चुका था। नतीजतन, अब वो रिश्ते तभी निभाता था, जब अगले उसे मान दें, उसकी सही सोच को समझें, अन्यथा वो लोगों से किनारा कर लेता।
कुछ तो ऐसे थे, जो समझने लगे कि रिश्ते जोड़कर रखना, केवल उसका दायित्व नहीं है और उन्होंने उसे समझा और उसका साथ दिया।
पर वहीं, जो अपनी ही चलाना चाहते थे, वो कहने लगे कि इसे अपनी सफलता पर घमंड हो चला है, पहले तो कैसे रिश्ते निभाने के लिए झुक जाता है। अब तो जैसे इसे कुछ पड़ी ही नहीं है।
पर अब रघुवीर समझ चुका था, अगर रिश्ते निभाए जाते हैं तो दोनों तरफ से, एकतरफा निभाए गए रिश्ते सिर्फ बोझ होते हैं, जो दूसरे आप पर जिंदगी-भर डालना चाहते हैं।
उसे अब इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि एकतरफा न निभाए जाने को लोग उसकी सफलता का घमंड समझते हैं या उसकी अपने मान की रक्षा।
वैसे उसके पास आज भी बहुत से रिश्ते थे, सच्चे रिश्ते, जो दोनों तरफ से निभाए जा रहे थे, जिनको निभाने का बोझ किसी एक पर नहीं था।

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