Sunday, 8 March 2026

Poem : क्या ऐसा कर पाओगे?

स्त्री और पुरुष के परम पवित्र रूपों को बदल कर एक कवि ने कविता रची, जिसने दिल को छू लिया। उसी कविता के सार को अपने शब्दों में पिरोकर आपके सामने प्रस्तुत किया है, पढ़कर बताएं, आपको कैसी लगी?

क्या ऐसा कर पाओगे?


 चलो कुछ ऐसा करते हैं, 

जो कभी नहीं हुआ है. 

उसकी कल्पना करते हैं, 

स्त्री और पुरुष को 

एक-दूसरे का रूप धरते हैं।


मैं बनूँ राम, और तुम

सीता बन जाना।

मर्यादा चुनुंगी मैं, 

तुम अग्नि परीक्षा दे आना।।

क्या ऐसा कर पाओगे?


जो बनूँ मैं कान्हा,

तुम राधा बन जाना। 

कर्तव्य चुनुगीं मैं,

तुम विरह वेदना सह जाना।।

क्या ऐसा कर पाओगे?

 

शिव का रूप धरूँ जो मैं, 

तुम शक्ति बन जाना। 

योग चुनुगीं मैं,

तुम अग्नि में तप आना।।

क्या ऐसा कर पाओगे?


 ईश्वरीय रूप छोड़ो,

हम इन्सानी रूप में आते हैं। 

उनकी दिव्यता को हम सब,

शत-शत शीश नवाते हैं।।


पुरुष बन जाऊँ गर,

तुम स्त्री बन जाना। 

मैं चुनुगीं खुद को, 

तुम मेरे लिए सबसे लड़ जाना। 

क्या ऐसा कर पाओगे?


क्या एक बार ऐसा करने का, 

तुम अपना मन बनाओगे?

क्या स्त्री की व्यथा, 

कभी तुम समझ पाओगे?

क्या ऐसा कर पाओगे? 


Happy Women's Day!