Friday, 20 September 2024

India's Heritage : क्यों कहते हैं पितृपक्ष?

आज कल श्राद्ध के दिन चल रहे हैं, जिसे पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं।

पर क्यों कहते हैं पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष? मातृपक्ष क्यों नहीं कहते हैं? 

  क्यों कहते हैं पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष? 



यह हमारी generation में अधिकांश लोग जानते होंगे पर हमसे पहले वाली generation में तो सभी लोग जानते होंगे।

पर हमारे बच्चे और आने वाली पीढ़ियां जानेंगी, इसकी बहुत remote chance है।

कारण... आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी भारतीय संस्कृति को किस कदर पीछे छोड़ते जा रहे हैं, इसका हमें एहसास भी नहीं है।

जबकि भारतीय संस्कृति, हिन्दू समाज, केवल यही है जो कि सत्य है सनातन है और सर्वश्रेष्ठ है।

सिर्फ और सिर्फ इसमें हर एक को उचित सम्मान दिया गया है, फिर चाहे वो देवता हों, देवियां हों या हमारे पूर्वज... सबको ही विशेष, पवित्र, पूजनीय और शक्तिशाली समझा गया है। 

यही कारण है कि हिन्दू धर्म में पूर्वजों की भी पूजा अर्चना के लिए, साल में 16 दिन निर्धारित किए गए हैं।

पूर्वजों के लिए दिन निर्धारित किए गए हैं, वो तो ठीक है, पर उसे पितृपक्ष क्यों कहते हैं?

आप को बता दें कि जिस हिंदी को हम निम्न समझकर, तिरस्कृत किए रहते हैं, उससे सटीक, स्पष्ट और सार्थक भाषा, केवल उसकी जननी संस्कृत भाषा ही है। संस्कृत भाषा तो सम्पूर्ण विश्व में सबसे सर्वश्रेष्ठ है, अन्यथा हिन्दी से बेहतर कोई भाषा नहीं है। 

हम क्यों कह रहे हैं, हिंदी को विशेष, उसके बहुत से कारण हैं, जिनमें से एक है कि, इसमें सब कुछ बहुत स्पष्ट है।

अब आते हैं पितृपक्ष क्यों?

तो आपको बताएं कि साल में, महीने 12 होते हैं...

जानते हैं, जानते हैं, आप सबको पता है कि 12 महीने होते हैं। पर हम जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल... की बात नहीं कर रहे हैं, वो तो सभी को कंठस्थ हैं।

हम बात कर रहे हैं, पौष, माघ, फागुन, चैत्र, बैशाख... आदि की...

आय हाय! यह क्या है?

यह हैं, महीनों के हिन्दू कैलेंडर के अनुसार नाम..

शायद हम में से किसी को भी नहीं याद होंगे, महीनों के हिन्दू कैलेंडर के अनुसार नाम..., 

हां-हां, आप सबके साथ हम भी इसी में शामिल हैं। हम भी कोई इतर थोड़ी ना हैं, आप सब से...

वैसे कुछ महीनों के नाम शायद पता भी हों, जैसे ज्येष्ठ, सावन, भादो.. क्योंकि इनका नाम हम तीज-त्योहारों और व्रतों में सुन लेते हैं।

हां तो हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भी, एक साल 12 महीनों में  विभाजित होता है। साथ ही हर महीने को 15-15 दिनों में पुनः बंटा हुआ है। जिन्हें शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष कहा जाता है।

प्रत्येक 15 दिन को एक साथ बोलें तो, उसे पक्ष कहते हैं, इसलिए पक्ष...

और शुक्ल और कृष्ण क्यों? 

क्या किसी ईश्वर से सम्बन्धित है?

नहीं, बिल्कुल नहीं...

बल्कि चंद्रमा के पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने के कारण...

मतलब?

मतलब चंद्रमा, हर 15 तक बढ़ता और घटता है। चंद्रमा, जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, रोशनी बढ़ती जाती है। जिससे चंद्रमा उज्जवल या श्वेत होता जाता है। और शुक्ल का अर्थ है - श्वेत, सफेद, शुभ 

अतः अमावस्या से पूर्णिमा तक के 15 दिन, शुक्ल पक्ष कहलाते हैं।

पूर्णिमा के पश्चात् चंद्रमा, धीरे-धीरे घटता जाता है, मतलब रोशनी घटती जाती है, और अमावस्या के दिन चंद्रमा, विलुप्त हो जाता है, क्योंकि वो पूर्ण रूप से काला हो जाता है और पूर्ण काला दिखता नहीं है, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि चंद्रमा विलुप्त हो गया। और कृष्ण का अर्थ है - काला

अतः पूर्णिमा से अमावस्या तक के 15 दिन, कृष्ण पक्ष कहलाते हैं।

तो बस वहीं से आया है पक्ष, क्योंकि श्राद्ध पक्ष या पितृपक्ष के यही 16 दिन होते हैं। 

16?... जब पक्ष 15 दिन का होता है तो, दिन 16 कैसे हुए?

16 ऐसे, क्योंकि पहला और पंद्रहवां ( अर्थात सर्वपितृ अमावस्या) दोनों दिनों को गिना जाता है ...

पितृपक्ष, आरंभ से चतुर्दशी और अंत में सर्वपितृ अमावस्या पर पूर्ण होता है...

पक्ष समझने के बाद, अब समझते हैं पितृ क्यों?

संस्कृत में पिता को पितृ कहते हैं। संस्कृत भाषा, हिन्दी भाषा की जननी है अतः हिंदी भाषा में कुछ शब्द, शुद्ध रूप में ही ले लिए गए हैं, जैसा उन्हें संस्कृत भाषा में बोलते हैं।

हमारा देश भारत, पितृ प्रधान देश है। जहां परिवार में, वंश में,  सत्ता पिता की समझी जाती है।

इसलिए लड़का, बारात लेकर आता है, विदाई लड़की की होती है। ससुराल को ही लड़की का असली घर कहा जाता है। और surname भी लड़की का ही बदलता‌ है, हालांकि आज कल लड़कियां अपना surname नहीं बदल रही हैं और उसकी आवश्यकता भी नहीं है।

होनी वाली संतानों का surname पिता के surname से ही मिलता है, जो कि अब तक यही है।

हमारे पूर्वज, मतलब हमारे पिता(यहां पिता से तात्पर्य है कि, हमारे वो सभी वंशज, जो हमारे परिवार के थे। फिर वो चाहे दादाजी हों या दादी जी, या उनके माता-पिता, या उनके माता-पिता, अर्थात पूरी वंशावली या अगर किसी के अपने माता-पिता ने रहे हों तो वो भी)... सभी शामिल हैं और वे सब पिता रुप में समझे जाते हैं...

तो आपको पूरी तरह समझ आ गया होगा कि क्यों कहते हैं पितृपक्ष... 

और श्राद्ध पक्ष, क्योंकि पक्ष तो वही, 15 दिन... और श्राद्ध इसलिए क्योंकि, इसमें हम अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण विधि करते हैं।

अब आप पूरी तरह, clear हो‌ गये होंगे, कि क्यों पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं... 

और यह सब संभव हुआ, क्योंकि हिंदी भाषा बहुत ही सटीक और स्पष्ट है। 

और अगर ऐसा है तो, हिंदी भाषा निम्न (कमतर) कैसे हुई?

हिन्दी भाषा को सम्मान दीजिए, उसे अधिक से अधिक उपयोग कीजिये और भारत को गौरवान्वित कीजिए। पर केवल हिन्दी दिवस के इन 15 दिन ही नहीं बल्कि हमेशा...

साथ ही श्राद्ध पक्ष या पितृपक्ष चल रहे हैं, इन विशेष दिनों में अपने पूर्वजों की पूजा अर्चना करें। 

साथ ही उनका सम्मान भी करें, उनके बताए सदमार्ग पर चलें और नाम रोशन करें लेकिन केवल इन 15 दिन ही नहीं बल्कि हमेशा...

पर पूर्वजों के साथ साथ अपने माता-पिता, सास-ससुर का भी विशेष ध्यान रखें, मान-सम्मान और प्यार दें 🙏🏻 

हम सब पर हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद सदैव बना रहे 🙏🏻 😊

Tuesday, 17 September 2024

Article : Popularity Ganpati Bappa ki

Popularity गणपति बप्पा की..

यूं तो भारत अनेकानेक देवी-देवताओं की पवित्र पावन भूमि है, पर फिर भी अलग-अलग states में अलग-अलग देवी-देवताओं की मान्यता है।

जैसे बंगाल व पंजाब में मातारानी की, महाराष्ट्र में गणपति बप्पा की, south में, भगवान विष्णुजी, लक्ष्मी माता व मुरुगन जी की, और north में भगवान शिव, भगवान श्री कृष्ण, भगवान श्री राम और हनुमान जी को अधिक मानते हैं।

हालांकि, अब तो सभी जगह, सभी states के लोग रहते हैं, इसलिए लगभग पूरे भारत में सभी देवी-देवताओं के आगमन और उनके विसर्जन की धूम रहती है।

लेकिन जब आज अनंत चतुर्दशी है तो गणेश जी पर ही पूरा article अर्पित हो, इतना तो बनता है। 

वैसे भी महादेव व माता पार्वती जी के लाडले पुत्र हैं, तो सभी देवी-देवताओं के लाडेश्वर भी ठहरे।

तो गणेश जी को दंडवत प्रणाम के साथ आगे का article बढ़ाते हैं...

हाँ तो, हुआ ऐसा कि हमारी लाडली बिटिया रानी, ज़रा बड़ी हुई तो, उन्हें दो देवताओं ने बड़ा आकर्षित किया। 

पहले तो कृष्ण जी और दूसरे गणेश जी...

तो बस madam जी तो थीं छोटी, तो खुद तो कुछ कर नहीं सकतीं थीं, पर हुक्म पूरा चला लेती थीं।

तो बस जन्माष्टमी पर्व पर मम्मी के द्वारा सिखाई दुनिया भर की चीज़ का भोग लगाते थे पर बिट्टो रानी ने मक्खन भी जुड़वा दिया, कि बिन मक्खन के कान्हा जी का कैसा भोग? तो बस अब तो हर जन्माष्टमी पर्व पर मक्खन भी जरुर बनता है।

और दूसरे, हमारे गणपति महाराज..

अब हम लोग तो ठहरे North Indian, तो north के भगवान श्री राम, श्री कृष्ण, बम-बम भोले और हनुमान जी वाले... 

तो गणेश जी का आगमन तो बस दिपावली पूजन में माता लक्ष्मी जी के साथ ही करते थे। 

पर हमारी छोटी madam, फैल गई, कि नहीं भाई, हम तो हर गणेश चतुर्थी में गणपति बप्पा को बैठाएंगे और मोदक का भोग भी लगाएंगे।

बस तब से नियम बन गया, गणेश चतुर्थी में गणपति बप्पा को बैठाने और मोदक का भोग लगाने का... 

हमारे पतिदेव की प्यारी दीदी, मुंबई में रहती हैं, एक बार जब मुंबई जाना हुआ, तो बिटिया रानी को उनकी बुआ जी ने, मोदक बनाने का सांचा दे दिया।

बस उसके बाद से बप्पा के लिए, बनने वाले टेढ़े-मेढ़े मोदक, सांचे में ढल कर सुडौल और सटीक बनने लगे। 

उससे लगा कि, बप्पा को भी, हमारा उनका आगमन कराना बहुत अच्छा लगा, तभी तो मोदक के सांचे को हमारे पास पहुंचा दिया।

सिलसिला यूं ही चलता रहा, गणपति बप्पा के आगमन पर हम हर साल कुछ अलग तरह के मोदक बनाते और चतुर्दशी को जिसमें बप्पा का विसर्जन होता है, अर्थात वो फिर से अपनी माँ की गोद में पहुंच कर अठखेलियां करने लगते हैं।

उस दिन भी हम पूजा अर्चना करते।

पर इस बार, आंखों का treatment चल रहा है तो हमें लगा, मोदक बनाना शायद संभव न‌ हो पाए। एक दिन पहले, वैसे ही हरतालिका तीज़ के व्रत पूजन पाठ के लिए गुझिया बना चुके थे, हर बार की तरह..

पतिदेव बोले, इस साल मोदक वो लेते आएंगे...

हमने भी, बड़े अकड़ कर कहा, यह दिल्ली है, मुम्बई नहीं...

यहां दुनिया भर की मिठाई मिल सकती है, मोदक नहीं... अगर एक भी मोदक आप ले आएं तो उसे हम समझ लेंगे कि लोग बप्पा को यहां भी आमंत्रित करते हैं। 

शाम को office से घर लौटते समय, पतिदेव का phone आ गया, यहां 25 varieties के Modak मिल रहें हैं, कौन से वाले लाने हैं?

25....आय हाय! इतनी variety तो सिद्धी विनायक मंदिर में नहीं मिलते हैं, जितने कि यहां मिल रहें हैं... 

हमारे तो स्वर ही बदल गये, बड़े मधुर स्वर में हम ने पूछा, क्या varieties हैं, और भइया, पतिदेव तो शुरू हो गये, एक के बाद एक, मोदक की variety का नाम बताने में...

ओहो, ऐसा लग रहा था कि, किसी restaurant या hotel का menu बता रहे हैं। सच बता रहे हैं, किसी variety की मिठाई नहीं बची थी, जो मोदक न बन चुकी हो। वो भी बताते-बताते, हंसने लगे, कि यहां सारी मिठाइयां, मोदक बन चुकी हैं। तुम तो बस यह बताओ कि तुम्हें अपने गणपति बप्पा को किस taste की मिठाई के मोदक से प्रसन्न करना है?

आहा! गणपति बप्पा ने तो हमें ही पशोपेश में डाल दिया था, खैर variety थी, तो बप्पा जी को एक तरह के मोदक से क्यों प्रसन्न किया जाए...हमने चार varieties के मोदक मंगवा लिए।

गणपति बप्पा की popularity ने हमारी सारी अकड़ निकाल दी, उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मुम्बई हो या दिल्ली या कोई और शहर, गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक हर जगह, सिर्फ और सिर्फ गणपति बप्पा की ही धूम रहती है।

और popularity कि तो क्या ही कहें, super popularity है भाई...

बस इतना ही कह सकते हैं कि गणपति बप्पा, आप तो छा गए हैं ...

अपनी कृपा सदैव हम सब पर बनाए रखियेगा 🙏🏻🙏🏻


    गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या 🙏🏻😊

Saturday, 14 September 2024

Article : हिंदी के लिए महापुरुषों के कथन

आज हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में हिंदी के विषय मे कुछ महापुरुषों के द्वारा कहे हुए कथन साझा कर रहे हैं। 

देश‌ की आजादी के साथ ही, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाए, यह प्रस्ताव भी पारित किया गया था।

परन्तु इस प्रस्ताव के साथ ही यह भी हुआ कि कुछ राज्य, जो कि हिंदी भाषी नहीं थे, वो इसके लिए, किसी भी तरह से तैयार नहीं थे।

तो यह निर्धारित किया गया कि, हिंदी को फिलहाल राजभाषा में ही रखा जाए और कालान्तर में उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान कर दिया जाएगा। पर यह अंतहीन इंतज़ार ख़त्म ही नहीं हो रहा है, जिसके कारण आज तक भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। ऊपर से हमारे आधुनिक बनने की होड़, एक विदेशी भाषा, अंग्रेजी को वो दर्जा देती जा रही है।

बस हिंदी दिवस के अलावा और कोई दिन नहीं होता है, जब हिंदी को विशेष समझा जाए। 

जबकि हिंदी के लिए महापुरुषों के कथन, सिर-माथे वाले हैं, आइए उन्हें जाने, शायद उसके बाद आप के मन में भी हिंदी के लिए वो सम्मान जग जाए और हिंदी को न्याय मिल जाए और राष्ट्रभाषा होने का सम्मान भी...

हिंदी के लिए महापुरुष के कथन


हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।

~चन्द्रबली पाण्डेय


है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी॥

~मैथिलीशरण गुप्त


जिस भाषा में तुलसीदास जैसे कवि ने कविता की हो, वह अवश्य ही पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती।

~महात्मा गाँधी


हिंदी भारतवर्ष के हृदय-देश स्थित करोड़ों नर-नारियों के हृदय और मस्तिष्क को खुराक देने वाली भाषा है।

~हज़ारीप्रसाद द्विवेदी


हिंदी को गंगा नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा।

~विनोबा भावे


हिंदी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।

~सुभाष चन्द्र बोस


हिन्दी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है।

~सुमित्रानंदन पंत


आज पूरा विश्व हिंदी भाषा की शक्ति को पहचान रहा है।

~नरेंद्र मोदी


आप लोगों को लग रहा होगा कि भारत के इन महापुरुषों में मोदीजी का नाम कैसे आ गया। तो उस के लिए बस इतना ही कहना चाहेंगे, कि मोदीजी हमारे भारत देश के सफल और आदरणीय प्रधानमंत्री हैं, और वे हिन्दी और संस्कृत के विकास और उत्थान के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने NEP syllabus के माध्यम से हिंदी और संस्कृत को CBSE board के विद्यालयों में compulsory language कर दिया है, जिससे सिर्फ इन भाषाओं का ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सम्पूर्ण देश का भी विकास हो रहा है।

क्योंकि जिस कूटनीति से अंग्रेजों ने education system के द्वारा हिन्दी, संस्कृत व भारतीय संस्कृति को destroy करना चाहा था, यह उसी का मुँहतोड़ जवाब है, और ऐसा करना अतिआवश्यक भी था।

धन्य हैं, यह सब महापुरुष और इनकी सोच....

आप भी इनकी तरह सोच रखें और हिंदी को विशेष सम्मान दें, उसका अधिकाधिक उपयोग करें, जिससे हिंदी को उसका सही स्थान मिल सके। और भारत को उसकी राष्ट्रभाषा...


जय हिन्दी, जय हिन्द 🇮🇳