Friday, 20 October 2023

Article: दुर्गा पूजा बंगाल की

दुर्गा पूजा की धूम पूरे भारत वर्ष में है। कहीं गरबा, कहीं दांडिया, कहीं धुनुचि की उमंग है। 

भारत वर्ष के अधिकतर प्रांत में पूरे नौ दिन का महत्व है, फिर वो चाहे पंजाब हो, उत्तर प्रदेश हो, दिल्ली हो, गुजरात हो, महाराष्ट्र हो, सब में नवरात्र के नौ दिनों की विशेषता है। 

लेकिन बंगाल में नवरात्र पर्व का आरंभ षष्ठी से माना जाता है। वहां इसे नवरात्र पर्व नहीं बल्कि दुर्गापूजा कहा जाता है। और यह वहां पर सबसे विशिष्ट माना जाता है।

आज देखते हैं, क्यों है षष्ठी से वहां पूजा का आरंभ, और कब क्या होता है।

दुर्गा पूजा बंगाल की


षष्ठी तिथि को, यानी कि आज के दिन, ढाकी की थाप के साथ माँ के मुख के दर्शन होने प्रारंभ होते हैं। 

षष्ठी तिथि की देवी, कात्यायनी देवी होती हैं। यह देवी ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं, और भगवान कार्तिकेय की पत्नी व भगवान शिव और माता पार्वती की ज्येष्ठ पुत्रवधू हैं। यही छठ मैया भी हैं, जिनकी पूजा छठ पर्व में होती है।


1. षष्ठी देवी कात्यायनी का स्वरूप :

दिव्य रुपा कात्यायनी देवी का शरीर सोने के समान चमकीला है। चार भुजाधारी माँ कात्यायनी सिंह पर सवार हैं। अपने एक हाथ में तलवार और दूसरे में अपना प्रिय पुष्प कमल लिए हुए हैं। अन्य दो हाथ वरमुद्रा और अभयमुद्रा में हैं। इनका वाहन सिंह हैं।

इनकी पूजा करने से संतान प्राप्ति और संतान सुरक्षा का वरदान मिलता है।

बंगाल में दुर्गा पूजा पांच दिन का महापर्व है जो कि षष्ठी से आरंभ होकर दशहरा के दिन सिन्दूर खेला के साथ समाप्त होता है। 

आइए जानते हैं बंगाल में दुर्गा पूजा का क्या महत्व है और वहां के एक-एक दिन की क्या विशेषता है।


2. दुर्गा पूजा का महत्व :

दुर्गा पूजा राक्षसराज महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत को जश्न के रूप में मनाते हैं। दुर्गा पूजा का पहला दिन महालया है, जो देवी के आगमन का प्रतीक है। महालया आश्विन अमावस्या के दिन होता है।

बंगाली समाज शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि से पंचमी तक दुर्गा पूजा की तैयारी शुरू कर देते हैं।

तैयारियों के दौरान माँ की मूर्ति में मिट्टी चढ़ाई जाती है, और पूजा-पंडाल की सजावट अपने चरम पर पहुंच जाती है। दुर्गा माँ की मूर्ति को सजाया जाता है और फिर छठे दिन से शक्ति की पूजा की जाती है। माँ दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी रूप की पूजा बंगाली लोग करते हैं। लोग पंडालों में दुर्गा माँ की मूर्ति के साथ-साथ माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी, पुत्र गणेश और कार्तिकेय की मूर्ति भी स्थापित करते हैं।

 

3. धुनुची नृत्य :

दुर्गा पूजा में सप्तमी से लेकर नवमी तक धुनुची नृत्य किया जाता है। धुनुची नृत्य या धुनुची नाच बंगाल की एक बहुत ही प्राचीन परंपरा है जिसकी झलक हर दुर्गा पूजा पंडाल में देखी जा सकती है।


4. दुर्गा पूजा के पांच दिन :


A. पहला दिन : कल्परम्भ -

दुर्गा पूजा का आरंभ कल्परम्भ से शुरू होता है। इसे अकाल बोधन भी कहा जाता है। इस दिन देवी मां को असमय निद्रा से जगाया जाता है, क्योंकि चातुर्मास के दौरान सभी देवी-देवता दक्षिणायन काल में निंद्रा अवस्था में होते हैं। इस दिन उनकी पूजा करके जगाया जाता है।


B. दूसरा दिन : नवपत्रिका पूजा -

नवपत्रिका पूजा का पर्व नवरात्रि की सप्तमी तिथि को मानते हैं। यह दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि का होता है। नवपत्रिका पूजा में नौ तरह के पत्तों यानी केला, हल्दी, अनार, धान, मनका, बेलपत्र और जौ के पत्तों को बांधकर इसी से माँ को स्नान कराया जाता है। इसके बाद ही माँ को सजाकर प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।


C. तीसरा दिन : संधि पूजा -

तीसरा दिन संधि पूजा का है। संधि पूजा अष्टमी और नवमी तिथि के बीच आती है। इस दिन पारंपरिक परिधान पहनकर देवी मां की पारंपरिक पूजा की जाती है। संधि पूजा अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारंभ होने के 24 मिनट बाद की जाती है।


D. चौथा दिन : महानवमी पूजा -

नवरात्रि का नौवें दिन मां सिद्धिदात्री का है। इस दिन माँ दुर्गा को दही, शहद, दूध आदि का भोग लगाते हैं और माँ दुर्गा को दर्पण दिखाया जाता है। ये दर्पण वही होता है, जो माँ दुर्गा के स्वागत के समय इस्तेमाल किया जाता है।


E. पांचवा दिन : सिंदूर उत्सव -

दुर्गा पूजा का पांचवा और आखिरी दिन के दिन सिंदूर खेला जाता है। इस दिन महिलाएं माँ दुर्गा को सिंदूर चढ़ाने के साथ एक-दूसरे के सिंदूर लगाती और उसे गुलाल की तरह उड़ाती है। इसलिए इसे सिंदूर खेला भी कहा जाता है।

सिंदूर खेला के बाद शुभ मुहूर्त में माँ दुर्गा की मूर्ति का विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाता है।


बंगाल में माँ के आगमन से विसर्जन के पहले तक का समय अनुपम होता है। पूरे शहर की छटा ही बदल जाती है। जगह-जगह छोटे-बड़े पूजा-पंडाल, सब एक से बढ़कर एक... इनकी खूबसूरती का वर्णन ही नहीं किया जा सकता है, जितनी भी करेंगे, कम ही होगी। हर पंडाल में माँ की भक्ति से परिपूर्ण बंगाली गीत... जो आपको चाहे समझ ना आए, पर कर्णप्रिय अवश्य लगेंगे...

इन पांचों दिन वहाँ घर पर नहीं व्यतीत किए जाते हैं। बल्कि पूरा बंगाल इन दिनों आपको पंडाल में ही दिखेगा, माँ की भक्ति में, उनके सौन्दर्य में, उनके रंग में ही रंगे दिखेंगे। 

सब भक्ति, उत्साह और उल्लास में ही दिखेंगे। यह पांच दिन उन्हें कुछ और नहीं सूझता है, पंडाल में ही पूरा दिन गुज़रता है। दुनिया भर के आयोजन होते रहते हैं, खाना-पीना भी वहीं रहता है। 

स्त्री, पुरुष, बच्चे और बड़े-बुजुर्ग सब वहीं रहते हैं। कभी आपको मौका मिले तो आप भी उसी रंग में अपने आपको रंग कर देखिएगा। हम को दुर्गा माँ ने यह सुअवसर दिया था...

सच में अद्भुत अनुभूति होती है।

बाकी जहाँ भी ईश्वरीय वातावरण होगा, उस जगह से अद्भुत और रमणीय दृश्य तो कहीं भी और नहीं होगा...

दुर्गापूजा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🏻

माँ की कृपा सभी पर बनी रहे 🙏🏻😊

Thursday, 19 October 2023

Recipe: Shrikhand

नवरात्र चल रहे हैं, जिसमें हम माँ को रोज़ ही भोग प्रसाद चढ़ाते हैं। 

कल षष्ठी से पूजा अर्चना के विशेष दिन प्रारंभ हो जाएंगे।

तो चलिए आज एक ऐसी ही बहुत tasty and healthy recipe share कर देते हैं। 

ज़्यादातर dishes या तो healthy होती है या tasty। पर इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि जितनी healthy है उतनी ही tasty भी, साथ ही बहुत easily prepare भी हो जाती है।

आज की वो dish है श्रीखंड, इसे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, सभी बहुत पसंद हैं।

तो चलिए झटपट देख लेते हैं कि यह कैसे बनेगा।


Shrikhand 



Ingredients 

  • Fresh, thick and creamy curd - 500 gm.
  • Sugar powder - ½ cup 
  • Milk - 1 tbsp. 
  • Saffron threads - 4 to 5 (optional)
  • Chopped dry fruits (almond and pistachio) - 2 tbsp. (optional) 
  • Nutmeg powder - one pinch (optional) 
  • Green cardamom powder - 2 tsp. (optional)
  • Kevda water  - 4 to 6 drops (optional)


Method -   

  1. Luke warm दूध में केसर के धागे डाल दीजिए।
  2. दही को muslin cloth में डालकर, बांध कर दो घंटे के लिए छोड़ दें।
  3. दो घंटे बाद दही को cloth से निकाल कर एक bowl में डाल लीजिए। 
  4. दूध में केसर को rub कर दीजिए, इससे दूध केसर रंग का हो जाएगा। 
  5. अब दही के bowl में केसरिया दूध, cardamom powder व पीसी हुई चीनी, डालकर अच्छे से मिला लें।
  6. ऊपर से इसे chopped dry fruits से garnish कर दीजिए और ½ hour के लिए set होने के लिए रख दीजिए। 
  7. अगर आपको authentic taste चाहिए तो दही में केसरिया दूध की जगह nutmeg powder और cardamom powder डालकर mix कीजिए।
  8. आप केवड़ा जल डाल रहे हैं तो, सिर्फ यही डलेगा... केसरिया दूध, nutmeg powder and cardamom powder, etc नहीं पड़ेगा।
  9. आपको अगर cinnamon flavour पसंद है तो आप इसमे 1 tsp. cinnamon powder डाल सकते हैं। आजकल यह flavour भी बहुत पसंद किया जा रहा है।

बस यह ध्यान रखिएगा कि एक बार में flavour एक ही रखिएगा, सब चीजों को मत डाल दीजिएगा, वरना taste ख़राब हो जाएगा।

आपको 4 flavour के श्रीखंड बताएं हैं, सभी एक से बढ़कर एक हैं। आप अपनी पसंद का श्रीखंड बनाएं, माँ को भोग प्रसाद चढ़ाएं और सबको वितरित करें...

माता रानी की सदा ही जय 🚩

Monday, 16 October 2023

India's Heritage‌‌ : शारदीय नवरात्र

आजकल नवरात्र चल रहे हैैं। पूरे भारत वर्ष में माता रानी की पूजा अर्चना, भजन कीर्तन चल रहे हैं।

पर क्या आप के मन में कभी आया कि कैसे हुआ दुर्गा माँ का जन्म?, क्यों माँ ने अपनी सवारी के रूप में सिंह को ही चुना? और क्यों नवरात्रि में कन्या पूजन से मां का आशीर्वाद मिलता है? 

आज के विरासत के इस अंक में हम शारदीय नवरात्र पर्व के विषय में ही जानते हैं।  

शारदीय नवरात्र


नवरात्र : नवरात्र यानी महाशक्ति की पूजा के 9 दिन, जिसमें देवी के 9 स्वरूपों की अराधना की जाती है।

हिंदू धर्म में नवरात्रि के पर्व का खास महत्व होता है। नवरात्र पर्व साल में दो बार आते हैं, चैत्र नवरात्र व शारदीय नवरात्र (जो अश्विन मास में पड़ती है)

दोनों ही नवरात्रि में माता रानी की पूजा अर्चना भजन कीर्तन होता है। लेकिन अश्विन माह में पड़ने वाली शारदीय या शरद नवरात्र का आम जनमानस के बीच  प्रचलन अधिक है। 

इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 15 अक्टूबर 2023 से होने जा रही है और 24 अक्टूबर को विजयदशमी के साथ इसका समापन होगा।

नवरात्रि, शक्ति की अराधना का पर्व है. इसमें देवी के 9 स्वरूपों की पूजा होती है। हिंदू शास्त्र में मां दुर्गा के जन्म से लेकर युद्ध में विजय पाने तक उन्हें अनेक रूपों में बताया गया है।

नवरात्रि में नवदुर्गा यानी मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा का विशेष महत्व होता है. मां दुर्गा के इन रूपों को महाशक्ति कहा गया है। हिंदू धर्म शास्त्रों में मां दुर्गा के जन्म से लेकर महिषासुर से युद्ध और युद्ध में विजय पाने तक उनकी शक्ति को अनेक रूपों में परिभाषित किया गया है।

'या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:' 

नवरात्रि की शुरुआत होते ही 9 दिनों तक घर, मंदिर और पूजा पंडालों में दुर्गा सप्तशती के इस मंत्र के जाप किए जाएंगे। देवी के इस मंत्र का अर्थ है- हे माँ! आप सर्वत्र  शक्ति के रूप में विराजमान हैं, हे माँ अम्बे, आपको मेरा बारंबार प्रणाम है।


चलिए अब जान लेते हैं कि माँ दुर्गा का जन्म कैसे हुआ? क्यों इन्हें शक्ति भी कहते हैं? 

कैसे हुआ देवी दुर्गा का जन्म?

हिंदू धर्म में देवी के कई रूप बताए गए हैं, लेकिन मान्यता है कि देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में हुआ था।

राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए माँ दुर्गा का जन्म हुआ था, इसलिए माँ दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षस महिषासुर का अत्याचार देवताओं पर खूब बढ़ गया था। उसने अपनी शक्तियों से देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं महिषासुर ने देवताओं के स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। ऐसे में सभी देवता परेशान हो गए और समस्या के समाधान के लिए त्रिदेव के पास गए। 

महिषासुर, सृष्टिकर्ता ब्रम्हा का महान भक्त था और ब्रम्हा जी ने उन्हें वरदान दिया था कि कोई भी देवता या दानव उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

अब समस्या यह आयी कि जब कोई भी देवता या दानव महिषासुर का वध नहीं कर सकता तो उस पर विजय कैसे पाई जाए?

तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली। देवताओं की शक्तियों से दुर्गा का जन्म हुआ। जिसकी छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ थे। देवताओं की शक्ति से जन्म होने के कारण ही इन्हें शक्ति कहा गया।

दुर्गा में सभी देवताओं की शक्ति थी. इसलिए ये सर्वशक्तिमान हुईं। भगवान शिव से उन्हें त्रिशूल प्राप्त हुआ, विष्णु जी से चक्र, बह्मा जी से कमल, पर्वतों के देव हिमावंत से वस्त्र, और इस प्रकार से एक-एक कर देवताओं से शक्ति प्राप्त देवी दुर्गा बनीं और महिषासुर से युद्ध के लिए तैयार हुईं। 


अब जान लेते हैं कि, ऐसा क्या हुआ कि नवरात्र पर्व में नौ दिन पूजन किया जाता है?

नवरात्रि का पर्व 9 दिनों का ही क्यों?

कहा जाता है कि मां दुर्गा और महिषासुर के बीच 9 दिनों तक युद्ध चला था और दसवें दिन दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसलिए नवरात्रि का पर्व 9 दिनों तक मनाया जाता है और दसवें दिन विजयदशमी होती है।

हालांकि 9 दिनों तक नवरात्रि मनाए जाने को लेकर यह भी मान्यता है कि, महिषासुर से युद्ध के दौरान मां दुर्गा ने नौ रूप धारण किए थे. इसलिए 9 दिनों के नवरात्र में अलग-अलग दिन मां दुर्गा के इन 9 रूपों की पूजा की जाती है।


सभी देवी-देवताओं की अपनी अपनी सवारी है, जिसकी सबकी अपनी-अपनी विशेषता है। माता रानी की सवारी शेर है। पर सिंह ही क्यों है सवारी, आइए यह भी जान लेते हैं?

सिंह की सवारी क्यों करती हैं मां दुर्गा ?

मां दुर्गा का वाहन सिंह या शेर है और मां दुर्गा इसी की सवारी करती हैं। इसका कारण यह है कि सिंह को अतुल्य शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। 

जब माँ शक्ति स्वरूपा हैं तो सवारी भी वैसी ही होनी चाहिए, बस इसलिए ही सिंह उनकी सवारी है।

और मान्यता है कि, सिंह पर सवार होकर मां भक्तों के दुख और संसार की बुराई का संहार करती हैं।


नवरात्रि का व्रत पूजन, तब पूर्ण माना जाता है, जब कन्या पूजन किया जाता है, पर क्यों? आइए नवरात्रि में क्यों जरूरी है कन्या पूजन? यह भी जान लेते हैं।

कन्या पूजन का महत्व

नवरात्र पर्व में दुर्गा माँ ने नौ रुप धारण किए थे, जिसमें कन्या से लेकर दुर्गा माँ तक के रुप धारण किए थे। जो कि इस प्रकार हैं।

पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंध माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री। ये मां दुर्गा के नौ रुप हैं। 

नवरात्र में इन्हीं नौ रुपों की पूजा की जाती है और माँ के हर एक रुप के लिए एक कन्या मानी जाती है। इसलिए ही नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन सभी शुभ कार्यों का फल प्राप्त करने के लिए कन्या पूजन किया जाता है। कुमारी पूजन से सम्मान, लक्ष्मी, विद्या और तेज़ प्राप्त होता है. इससे विघ्न, भय और शत्रुओं का नाश भी होता है। होम, जप और दान से, मां दुर्गा इतनी खुश नही होती जितनी कन्या पूजन से होती हैं।

नवरात्रि में 9 कन्याओं की पूजा की जाती है, जिसकी आयु 2-10 वर्ष की होती है. इसे कन्या पूजन या कुमारी पूजन कहा जाता है. छोटी कन्याओं को देवी का रूप माना गया है।  शास्त्रों में हर आयु की कन्या के महत्व के बारे में भी बताया गया है। 


माता रानी व नवरात्र से जुड़ी और भी बातें हैं, जिन्हें आपको अगली नवरात्र में बताते हैं।

आज के लिए माँ के स्वरूप व नवरात्र की इन्हीं बातों के साथ, विराम लेते हैं... 

माता रानी की सदा ही जय...

जयकारा शेरावाली दा...

माता रानी आप की कृपा सदैव हम सब पर बनी रहे 🙏🏻🙏🏻