Wednesday, 14 April 2021

Article: अंबेडकर जी को श्रद्धांजलि

अंबेडकर जी को श्रद्धांजलि




आज बाबा साहेब अंबेडकर जी का जन्मदिवस है, उनको कोटि कोटि नमन!

भारत की आज़ादी के बाद नवभारत का निर्माण किया जा रहा था।

उस समय भीमराव अम्बेडकर जी ने भारत का constitution बनाने में बहुत बड़ा सहयोग दिया था।

समाज के विकास के लिए छुआछूत व भेदभाव को खत्म करने के लिए, कुछ पिछड़ी व मजबूर जातियों के लिए संविधान में दस साल के लिए आरक्षण का प्रावधान भी रखा गया था। । जिससे उन्हे भी समाज में समान स्थान प्राप्त हो सकें।

उनका यह प्रावधान सही सिद्ध हुआ, देश में पिछड़ी जातियों का पूर्णतया विकास हो गया।

अब आरक्षण केवल राजनैतिक मुद्दा बन कर रह गया है; क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए यह प्रावधान बनाया गया था, वह तो कब का पूर्ण हो चुका है।

इस प्रावधान को लगभग 70 साल व्यतीत हो गये हैं। तब से कितना कुछ बदल गया है।

ना वैसी बोली रह गई है ना पहनावा, ना आचार वैसे हैं ना विचार, ना वैसी आवश्यकता रह गई है।

जब सब बदल गया है, तो आरक्षण क्यों नहीं?

दशकों से कुछ जाति विशेष को सतत् आरक्षण मिलता आ रहा है, जिससे अब वे जातियाँ ना पिछड़ी हुई रह गईं हैं ना ही मजबूर।

वहीं आरक्षण के कारण अन्य जातियाँ, योग्य होने के बावजूद धीरे धीरे पिछड़ती जा रही हैं, मजबूर होती जा रही हैं।

आज अगर बाबा अंबेडकर जी जीवित होते तो, वह अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए आरक्षण का स्वरूप बदल देते।

वो अब आरक्षण को जाति विशेष के लिए नहीं रखते, अपितु जिन्हें आवश्यकता होती, वो उन्हें संसाधन मुहैय्या कराते।

जिससे जो योग्य हैं, वे संसाधनों के अभाव में न पिछड़े और न ही मजबूर हों।

क्योंकि योग्यता पर घात, देश पर प्रतिघात है।
 
अम्बेडकर जी, सदैव भारत के विकास के लिए, अग्रसित रहते थे, वो अच्छे से जानते थे कि योग्यता ही किसी देश के विकास का द्योतक है।

क्या आज कोई भी बाबा साहेब अंबेडकर जी के देश के विकास के सपने को आगे नहीं बढ़ाएगा?

क्या आज कोई उनकी तरह दूरदर्शी नहीं है, जो आरक्षण को समाप्त कर के योग्यता पर घात करना समाप्त करा सके?

योग्यता, देश के विकास के लिए अति आवश्यक है। योग्य व्यक्ति को यदि भारत में उचित स्थान नहीं मिलता है, तो वह पलायन को मजबूर हो जाता है; जो कि किसी भी तरह से देश के लिए हितकर नहीं है।

आज उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि देश से आरक्षण सदा सदा के लिए समाप्त कर दिया जाए। 

सभी को कार्य योग्यता के आधार पर मिले; जिससे देश का सम्पूर्ण विकास हो सके व भारत सर्वश्रेष्ठ देश कहलाए।

Tuesday, 13 April 2021

Poem : हिन्दू नववर्ष

🕉️🙏🏻माता रानी हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें 🙏🏻🕉️

🕉️🙏🏻💐आप सभी को हिन्दू नववर्ष व चैत्र नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐🙏🏻🕉️


हिन्दू नववर्ष



हिन्दू नववर्ष,

भारत का हर्ष।

इसके अस्तित्व,

के लिए करो संघर्ष।।


रंगोली से,

घर हो सज्जित।

घी के दीप,

हो प्रज्वलित।।


गृह हो पुष्पों से,

आच्छादित।

मन हो सबका,

प्रसन्नचित।।


देवताओं का,

हो आगमन।

घर घर में हो,

पूजा हवन।।


प्रसाद में, 

मिष्ठान चढ़ाओ।

ईश्वर कृपा,

सब ही पाओ।।


भारतीय हो तो,

भारत का मान बढ़ाओ।

हर वर्ष अब से, 

हिन्दू नववर्ष मनाओ।।


सदियों से अंग्रेजी नववर्ष  मनाते आए हैं, चलिए अब से हिन्दू नववर्ष हर्षोल्लास से मनाएं, भारत के सम्मान को बढ़ाएं।

Monday, 12 April 2021

Article: काशी-विश्वनाथ मंदिर

काशी-विश्वनाथ मंदिर



राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखने की अपार सफलता के पश्चात भारत में हिन्दुत्व विजयी रथ काशी की ओर अग्रसित हो चुका है।

Civil court द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर के परिसर में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद के लिए पुरातात्विक सर्वेक्षण का फैसले दे दिया गया है।

यह फैसला इंगित कर रहा है कि हिन्दू सशक्तीकरण का युग चल रहा है। आने वाले समय में देखने को मिलेगा कि भारत हिंदू राष्ट्र बन गया है।

Civil court द्वारा दिए गए फैसले का क्या परिणाम होगा, वो तो भविष्य में ही ज्ञात होगा।

पर हम यह समझ लेते हैं, इस सारे विवाद का कारण क्या है? या दूसरे शब्दों में कहें तो यह जान लेते हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर इतिहास क्या है? उसका अस्तित्व क्या है?

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित भगवान शिव का यह मंदिर, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख, काशी विश्वनाथ मंदिर, अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है, इसीलिए आदि लिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। यह गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। 

11वीं सदी में राजा हरिश्चन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। तदोपरांत, उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था।

जिसे एक बार फिर बनाया गया लेकिन वर्ष 1447 में पुनः इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया।

बादशाह अकबर के ज़माने में एक बार वाराणसी और उसके आस पास बहुत भयंकर सूखा पड़ा था. बादशाह ने सभी धर्म गुरुओं से बारिश के लिए दुआ करने का आग्रह किया. एक आग्रह वाराणसी के धर्म गुरू नारायण भट्टा से भी किया गया. नारायण भट्टा के दुआ करने पर 24 घंटे में ही बारिश हो गई. इससे बादशाह अकबर बहुत खुश हुए.

नारायण भट्टा ने बादशाह से भगवान विशेश्वर का मंदिर बनाने की इजाजत मांगी. बादशाह अकबर ने अपने वित्त मंत्री राजा टोडर मल को मंदिर बनाने का आदेश दिया और इस तरह भगवान विशेश्वर का मंदिर ज्ञानवापी इलाके में बन गया.

ये पूरा ज्ञानवापी इलाका एक बीघा, नौ बिस्वा और छह धूर में फैला है. मान्यता के मुताबिक, खुद भगवान विशेश्वर ने यहां अपने त्रिशूल से गड्ढा खोद कर एक कुआं बनाया था जो आज भी मौजूद है.

लेकिन वर्ष 1632 में शाहजंहा ने इसे तुड़वाने के लिए सेना की एक टुकड़ी भेज दी। हिंदूओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण सेना केंद्रीय मंदिर को तो नहीं तोड़ सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए।

इतना ही नहीं 18 अप्रैल 1669 में औरंगजेब ने इस मंदिर को ध्वस्त कराने के आदेश दिए थे। साथ ही ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश पारित किया था। 

उसके बाद काशी विश्वनाथ मंदिर पर East India Company का राज हो गया, जिस कारण मंदिर का निर्माण रोक दिया गया। फिर साल 1809 में, मंदिर को तोड़कर बनाई गई ज्ञानवापी मस्जिद पर हिन्दुओं ने कब्जा कर लिया।

इस प्रकार इतिहास के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर के निर्माण और विध्वंस की घटनाएं 11वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक चलती रही। हालांकि 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी Mr. Watson ने ‘Vice President in Council’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने के लिए कहा था, लेकिन यह कभी संभव ही नहीं हो पाया। तब से ही यह विवाद चल रहा है।

मंदिर का इतिहास बताता है कि, किस कदर भारतीय संस्कृति को ध्वस्त करने की कोशिश पीढ़ी दर पीढ़ी की गई है।

पर अब समय बदल गया है, सरकार बदल गई है और लोग भी बदल गये हैं; जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, मंदिरों का भव्य निर्माण व हिन्दू सशक्तीकरण!

🙏🏻हर हर महादेव, साथ रहें सदैव🙏🏻