Thursday, 19 September 2019

Kids Story : Advay the hero : Pain( part -2)

Advay the hero : Pain( part - 1) के आगे.....

Advay the hero : Pain( part -2)


तभी advay का ध्यान गाय के पैरों की तरफ गया, उसने देखा गाय चिल्लाने के साथ साथ अपना पैर भी बार बार उठा रही थी।

उसे याद आया, ma’am जब animals का chapter पढ़ा रहीं थीं, तब उन्होंने बताया था, कि जब जानवर के कुछ चुभ जाता है, तो वो pain में ऐसे ही बेकाबू होकर अपना दर्द बताते हैं, क्योंकि ये हमारी तरह बोलकर नहीं बता सकते।

Advay ने पापा से कहा, पापा आप गाय को किसी को मारने मत दीजिएगा, मैं अभी आया। बोलकर वो होटल की तरफ दौड़ गया।

उसने होटल वाले से पूछा, आप किसी जानवर के doctor को जानते हैं? होटल वाला बोला, हाँ पर क्यों?

आपने सुना नहीं? वहाँ गाय कितना चिल्ला रही है।

अरे बेटा ये तो यहाँ हर कुछ दिन में होता है, तुम परेशान ना हो, वहाँ के लोग समझ लेंगे।

Advay घबराते हुए बोला, कहीं वो उसे मार ना दें।

आप doctor को बुला दीजिये, please.

डॉक्टर ने आकर देखा, तो बताया इसके पैर में काँच चुभ गया है, उन्होंने उसे निकाल दिया, गाय कुछ देर में शांत हो गयी।

तभी advay को याद आया, वहाँ कुछ बच्चे काँच की बोतल के साथ ही खेल रहे थे, शायद वही टूट के वहाँ पहुँच गया हो, और गाय के चुभ गया हो। उसने वो बात वहाँ खड़े लोगों को बताई। 

Advay की सूझबूझ से गाय ठीक हो गयी थी। और उसके बाद वहाँ फिर कभी बच्चों को काँच की बोतल से खेलने नहीं दिया गया।  

Wednesday, 18 September 2019

Kids Story : Advay the hero : Pain


 Advay the hero: (Pain)



Advay अपने परिवार के साथ घूमने मथुरा, वृन्दावान गया था। उनके होटल के पास ही मंदिर था, जिसमें बहुत बड़ा मैदान भी था। उस मैदान में कुछ गायें बंधी थी, और वहाँ के local बच्चे भी खेलते रहते थे।

एक दिन शाम को advay की family का घूमने जाने का समय हो गया था, advay सबसे पहले ready हो गया था।

Mumma, पापा, दीदी सब तैयार हो रहे थे, तो advay खिड़की से बाहर झांक रहा था। उसने देखा कुछ लड़के मंदिर के मैदान में काँच की बोतल को wicket बनाकर cricket खेल रहे थे।

Advay को उनका खेल देखना बहुत अच्छा लग रहा था। तभी पापा बोले, आज तुम्हें जन्मभूमि ले कर चलता हूँ।

सब घूमने चले गए। अगले दिन, advay एक गाय और बहुत सारे लोगों के शोर से उठ गया।

उसके पापा ने mumma से कहा, मैं जरा देखकर आता हूँ, क्या हो रहा है?

Advay बोला, पापा मैं भी चलूँगा

पापा बोले, अच्छा चलो, पर हम लोग काफी दूर रहेंगे, पास नहीं जाएंगे। advay मान गया।

जब वो लोग उस मंदिर के मैदान में पहुंचे, तो उन्होंने देखा, एक गाय बुरी तरह चिल्ला रही थी, रस्सी तुड़वाना चाह रही थी, और अगर कोई उसके पास जा रहा तो वो बहुत खतरनाक हो जा रही थी, उसे पैर और सींग से मारना चाह रही थी।

वहाँ खड़े कुछ लोग बोल रहे थे, गाय पागल हो गयी है, इसे मार दो, वरना ये हमको भी मार सकती है। कुछ कह रहे थे भूत-प्रेत का साया है जी, तभी तो रातों रात कैसी पागल हो गयी है, झाड-फूंक, मंत्र-सिद्धि करने चाहिए।

तभी advay का ध्यान .......


आगे पढ़िए Advay the hero: (Pain, part -2) में 


Tuesday, 17 September 2019

Article : कौए के दिन


कौए के दिन

श्राद्ध-पक्ष, पितृपक्ष, या कनागत के दिन आ गए हैं। ये वो दिन हैं, जब लोगों को कोयल से ज्यादा कौए भाते हैं। वैसे तो ये काला काग और उसकी काएँ-काएँ किसी को फूटी आँख नहीं सुहाती है। पर जब बात कनागत की हो तो, लोग ढूँढ-ढूँढ कर कौए को भोजन खिलाते हैं।


पर क्या आपके मन में ये सवाल कभी नहीं आया, कि कौए को ही क्यों खिलाते हैं? तो आज आपको इस विषय में बताते हैं।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि पक्षियों में कौआ चंडाल का प्रतीक है, उसे यमराज जी का दूत माना गया है। अतः ये माना जाता है, ये हमारे पितरों के पास से आते हैं। जिसके कारण symbolic रूप में, इन्हें खिलाया गया भोजन हमारे पितरों तक पहुँच जाता है। उन्हें तृप्ति मिल जाती है।

गरुण पुराण में भी व्याख्या की गयी है, कि कौए को भोजन खिलाने से पितरों तक भोजन पहुँच जाता है।

कहा जाता है इंद्र भगवान के पुत्र जयंत ने सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था, तब भगवान श्री राम जी, ने उसे वरदान दिया था, कि तुम्हें(कौए) अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा।

पर ऐसा नहीं है, कि हिन्दू धर्म में केवल श्राद्ध पक्ष में कौए को भोजन कराना चाहिए, बल्कि रोज़ ही हमें भोजन को पाँच लोगों को अर्पण करना चाहिए।

पहले ईश्वर को, दूसरा गाय को, तीसरा कुत्ते को, चौथा कौए को, और पांचवा चींटियों को। ऐसा इसलिए कहा गया है, क्योंकि पूरा ब्रह्मांड पाँच तत्वों का बना है। जिसमें ईश्वर आकाश का, गाय धरती का, कुत्ता जल का, कौआ वायु का और चींटी अग्नि का प्रतीक मानी गयी है।

अगर आप पंडितों की सुनते हैं, तो वे, श्राद्ध में, पंडितों को भोजन व दान आदि करने की बात करते हैं।

माना जाता है, जब हम इस संसार में आते हैं, तो हमारे ऊपर पितृ-ऋण आ जाता है, जिन्हें पितृपक्ष के दिनों में पूजा-पाठ, दान, तर्पण से उतारा जाता है।

ये तो बात हुई शास्त्र, पुराणों और पंडितों की। 

पर जो प्यार, श्रद्धा, और विश्वास हम इन कौओं के प्रति अपने पूर्वजों के जाने के बाद दिखाते हैं, काश वही प्यार, श्रद्धा, और विश्वास माता-पिता के जीवित रहते ही दिखाएँ।

सच जानिए, कौओं को भोजन कराने से ज्यादा पुण्य माता-पिता की सेवा में है।

उनके इस दुनिया से जाने के बाद नहीं, उनके जीते-जी सेवा करके आप इस ऋण से मुक्त हो सकते हैं। और इससे सरल और उचित कोई भी विधि नहीं है।  

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