Monday, 12 September 2022

Article : पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करने से, क्या मिलता है मोक्ष?

 पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करने से, क्या मिलता है मोक्ष? 



आज कल पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष चल रहा है, जिसमें हम श्राद्ध कर्म करते हैं, जिससे हमारे पितरों को शांति प्राप्त हो और वह हम से प्रसन्न होकर हमे अनेकों आशीर्वाद प्रदान करें।

अगर पंडितों की मानें तो, पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करने से हमारे पितर तृप्त होते हैं, उससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। और हमें सर्वश्रेष्ठ पुन्य प्राप्त होता है।

ऐसा माना जाता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति, बहुत से सद् कर्मों के पश्चात् होती है।

यह एक ऐसी योनि है, जिसमें हमें मोक्ष मिलना और ईश्वर प्राप्ति करना, सबसे सरल होता है।

अतः यदि इस योनि में हमने पर्याप्त पुन्य अर्जित कर लिए तो हमें सद्गति प्राप्त होगी, हम इस नश्वर संसार के आवागमन से मुक्त हो जाएंगे और हमें मोक्ष मिल जाएगा। 

कहा जाता है कि, सर्वश्रेष्ठ पुन्य प्राप्ति, पितरों को प्रसन्न करने से, उन्हें तृप्त करने से मिलती है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करने से सचमुच पितरों को प्रसन्नता और शांति प्राप्त होती है? 

क्या सचमुच ऐसा करने से मोक्ष मिलता है? 

कर्मकांड से क्या होता है? यह तो हम नहीं कह सकते हैं, पर अगर हम किसी की भी सेवा- सुश्रुषा, पूरे मनोयोग से करते हैं, जिससे वो प्रसन्न हों तो अवश्य ही हमें पुन्य प्राप्त होगा। फिर सेवा अगर अपने पितरों की, पूर्वजों की करेंगे तो सर्वश्रेष्ठ पुन्य प्राप्ति अवश्यंभावी है। 

पर यह सेवा, कर्मकांड नहीं है। वह सेवा है, अपने पितरों की इच्छा पूर्ति करना, उनके सम्मान की रक्षा करना, उनके वंश के नाम को प्रसिद्धि दिलाना, उनको याद करना, उनके बताए मार्ग पर चलना, उनके नाम से दान पुण्य करना होता है। अगर आप यह सब करेंगे तो पुन्य प्राप्ति निश्चित है।

पर आपको पता है, इससे भी ज्यादा आसानी से और निश्चित रूप से मिलने वाले पुन्य का क्या मार्ग है?

वो है, जब आप अपने जीवित, माँ-पापा, सास-ससुर की सेवा सुश्रुषा करते हैं, उनका मान-सम्मान करते हैं, उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करते हैं, उनको बहुत सारा प्यार दें, अपना समय दें और उनकी कही बात को समझें।

सच मानिए, जब माँ-पापा, सास-ससुर प्रसन्न होते हैं तो पितर तृप्त भी होते हैं‌ और प्रसन्न भी होते। और आपको सर्वश्रेष्ठ पुन्य भी अवश्य ही प्राप्त होता है।

और अगर आप, अपने साथ रहने वालों को तृप्त नहीं करते हैं, उनकी परवाह नहीं करते हैं, तब आप कितना ही पितरों के लिए श्राद्ध कर्म कर लीजिए, कितना ही दान, पिंडदान कर लीजिए। गया, बनारस, केदारनाथ आदि कहीं चले जाइए, कुछ नहीं होगा। 

पर अगर आप अपने माता-पिता और सास-ससुर को प्रसन्न रखते हैं। तब ही आप अपने पितरों को प्रसन्न रखने के अधिकारी हैं। 

तो चलिए अब आपको बता देते हैं कि श्राद्ध पूजा में किस पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है तथा इस साल, श्राद्ध पक्ष में कौन सी तिथि, किस तारीख में आएगी...


श्राद्ध पूजा की सामग्री

जिस दिन श्राद्ध किया जाना हो उसके पहले श्राद्ध पूजन के लिए इन चीजों को एकत्रित कर लेना चाहिए।

रोली, सिंदूर, छोटी सुपारी, कपूर, हल्दी, देसी घी, रक्षा सूत्र, चावल, जनेऊ।

तुलसी पत्ता, पान का पत्ता, माचिस, शहद, काला तिल, जौ, हवन सामग्री।

रुई बत्ती, अगरबत्ती, गुड़, मिट्टी का दीया, दही, जौ का आटा।

गाय का दूध, घी, खीर, गंगाजल, खजूर, केला।

सफेद फूल, उड़द, स्वांक के चावल, मूंग, गन्ना।


श्राद्ध तिथि और श्राद्ध करने की तारीख

10 सितंबर    पूर्णिमा का श्राद्ध

11 सितंबर    प्रतिपदा का श्राद्ध

12 सितंबर    द्वितीया का श्राद्ध

12 सितंबर    तृतीया का श्राद्ध

13 सितंबर    चतुर्थी का श्राद्ध

14 सितंबर    पंचमी का श्राद्ध

15 सितंबर    षष्ठी का श्राद्ध

16 सितंबर    सप्तमी का श्राद्ध

18 सितंबर    अष्टमी का श्राद्ध

19 सितंबर    नवमी श्राद्ध

20 सितंबर    दशमी का श्राद्ध

21 सितंबर    एकादशी का श्राद्ध

22 सितंबर    द्वादशी/संन्यासियों का श्राद्ध

23 सितंबर    त्रयोदशी का श्राद्ध

24 सितंबर    चतुर्दशी का श्राद्ध

25 सितंबर    अमावस्या का श्राद्ध

अगर आप अपने परिजनो की मृत्यु तिथि को भूल गए हैं, तो ऐसी दशा में अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। धर्म शास्त्र में अमावस्या तिथि को सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है।

श्राद्ध पक्ष; साल में, केवल 16 दिन के ही होते हैं, अतः इन्हें प्रेम, श्रृद्धा और सम्मान पूर्वक अवश्य करें, कर्मकाण्ड संस्कार आप को करना है तो वो भी कर सकते हैं, नहीं तो अपने पितरों को याद करते हुए, जिसका जो दिन हैं, उनकी उस दिन, पूजा-उपासना, कर के, उनके नाम से दान पुण्य अवश्य करें। 

पर  साथ ही अपने माता-पिता व सास-ससुर को प्रसन्न अवश्य रखें।

हम सभी पर अपने बुजुर्गो, पूर्वजों व पितरों का आशीर्वाद सदैव बना रहे 🙏🏻🙏🏻 

Friday, 9 September 2022

India's Heritage : गणपति विसर्जन, अनंत चतुर्दशी में क्यों?

गणपति विसर्जन, अनंत चतुर्दशी में क्यों?



जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारे गणपति बप्पा, जिन्हें हम सुख,समृद्धि दाता और विघ्नहर्ता भी कहते हैं, ऐेसे, भगवान गणेश को भाद्र पद माह की चतुर्थी तिथि पर विधि-विधान के साथ पूजा करते हुए घर पर स्थापित किया जाता है और अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन के साथ यह उत्सव समाप्त हो जाता है। 

हम सभी सालों से भगवान गणेश जी की चतुर्थी में स्थापना व अनंत चतुर्दशी में विसर्जन करते आ रहे हैं, पर हम में से कितनों को पता है कि-

क्यों चतुर्थी में ही स्थापना की जाती है? 

क्यों अनंत चतुर्दशी में विसर्जन किया जाता है? 

और क्या कारण है कि स्थापना के लिए अधिकतम समय अवधि, दस दिन ही चुनी गई है?

इसके विषय में हम लोगों की दादी माँ, नानी माँ अवश्य जानती होंगी, शायद हमारी माँ और सास भी जानती हों।पर हम में से कितने लोग जानते होंगे? और आने वाली पीढ़ी तो बिल्कुल ही नहीं जानती है।

तो चलिए आज आप को विरासत के इस अंक में, प्रथम पूज्य श्री गणेश जी से जुड़े इसी तथ्य से उजागर करते हैं...

गणपति विसर्जन: 

इस वर्ष, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी तिथि पर गणेश जी का विसर्जन किया जा रहा है।

10 दिनों तक चलने वाला गणेशोत्सव पर्व, अनंत चतुर्दशी तिथि पर घरों और बड़े-बड़े पंडालों में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा को जल में विसर्जित कर के पूर्ण हो जाएगा। 

चतुर्थी में जन्मदिवस : 

सनातन धर्म में भगवान गणेश को बु्द्धि, वाणी, विवेक और समृद्धि के देवता माना जाता है। 

किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की ही पूजा की जाती है। 

ऐसी मान्यता है कि गणेश पूजा से सभी तरह की परेशानियां खत्म हो जाती है। गणेश पूजा से सभी प्रकार के वास्तु संबंधी दोष फौरन दूर हो जाते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन हुआ था इसी कारण से गणेश चतुर्थी पर घर पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं।

शुभ कार्य को करने से पहले अगर भगवान गणेश की पूजा की जाए तो कार्यों में बाधाएं नहीं आती और कार्य अवश्य सफल होता है, और यह पूर्णतः सत्य है।

गणेश विसर्जन का महत्व 

एक अन्य मान्यता के अनुसार गणेश  विसर्जन की तिथि व दस दिनों की स्थापना का तथ्य उजागर होता है।

गणेश विसर्जन के पीछे एक पौराणिक कथा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना के लिए गणेशजी का आह्वान किया था।

गणेश जी की गाथा को आगे बढ़ाने से पहले, चलिए कुछ महत्वपूर्ण तथ्य महाभारत के विषय में भी जान लेते हैं...

महाभारत, एक ऐसा महाकाव्यग्रंथ है, जिसको महर्षि वेदव्यास ने काव्य बद्ध किया था, लेकिन इसे लिपिबद्ध करने तो स्वयं प्रथम पूज्य श्री गणेश जी आ गए थे।

जब इन दोनों की महान उपस्थिति थी, तब इसे महाग्रंथ तो होना ही था।

महाभारत, भारत का एक प्रमुख महाकाव्य ग्रंथ है। 

यह महाकाव्यग्रंथ, भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ हैं।

विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। इस ग्रन्थ को हिन्दू धर्म में पंचम् वेद भी माना जाता है।

यद्यपि इसे साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह ग्रंथ प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय स्रोत है। 

यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। महाभारत में हिन्दू धर्म का पवित्र ग्रंथ, भगवद्गीता, सन्निहित है। गीता में तो, स्वयं भगवान ‌श्री कृष्ण ने अर्जुन को संपूर्ण जीवन सार के विषय से अवगत कराया है। इसमें जन्म से मोक्ष प्राप्ति तक का वर्णन किया गया है।

पूरे महाभारत में लगभग १,१०,००० श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा अधिक हैं।

चलिए हम पुनः महर्षि वेदव्यास जी व गणपति जी के वार्तालाप में आते हैं- 

महाभारत अत्यंत विशाल महाकाव्य था, साथ ही ईश्वरीय वाणी से जुड़ा हुआ महाग्रंथ था; तो इसमें पूर्णतः शुद्धि भी अनिवार्य थी। अतः महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी से महाभारत को लिपिबद्ध करने की प्रार्थना की। 

गणेश जी ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार तो किया परन्तु उन्होंने एक शर्त रखी कि "मैं जब लिखना प्रारंभ करूंगा तो कलम को रोकूंगा नहीं, यदि कलम रुक गई तो लिखना बंद कर दूंगा। फिर आगे का महाकाव्य आपको ही पूर्ण करना होगा।"

तब वेद व्यासजी ने, गणेश जी की अनुनय विनय करते  हुए कहा कि, "भगवन्, आप देवताओं में अग्रणी हैं। विद्या और बुद्धि के दाता हैं, और मैं एक साधारण ऋषि हूं। यदि किसी श्लोक में मुझसे त्रुटि हो जाए तो आप कृपया उस श्लोक को ठीक कर उसे लिपिबद्ध करें।"

गणपति जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ और इस कारण गणेश जी को थकान तो होनी ही थी। साथ ही रुकना ना पड़े, इसलिए वह बार-बार जल भी नहीं ग्रहण कर रहे थे।

ऐसे में गणपति जी के शरीर का तापमान बढ़े नहीं, इसलिए वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया और भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा की। मिट्टी का लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई, इसी कारण गणेश जी का एक नाम पार्थिव गणेश भी पड़ा। 

महाभारत का लेखन कार्य 10 दिनों तक चला और अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य संपन्न हुआ। 

वेदव्यास ने देखा कि गणपति जी का शारीरिक तापमान फिर भी बहुत बढ़ा हुआ है और उनके शरीर पर लेप की गई मिट्टी सूखकर झड़ रही है।

तो वेदव्यास ने उन्हें पानी में डाल दिया। इन दस दिनों में वेदव्यास ने गणेश जी को खाने के लिए विभिन्न पदार्थ दिए। 

इसलिए गणेश चतुर्थी पर गणेशजी को स्थापित किया जाता है और 10 दिन मन, वचन, कर्म और भक्ति भाव से उनकी उपासना करके अनंत चतुर्दशी को विसर्जित कर दिया जाता है।

गणपती बाप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या

गणपति बप्पा, हम सबसे सदैव प्रसन्न रहें व उनकी कृपा दृष्टि हम सब पर सदैव बनी रहे 🙏🏻

Wednesday, 7 September 2022

Article : आधुनिकता कहीं अंत तो नहीं!!

आधुनिकता कहीं अंत 

तो नहीं!!

हम लोग आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते हुए ना जाने किस राह पर चलते जा रहे हैं? शायद अंत की ओर...

आप कहेंगे कि, यह हम कैसे कह रहे हैं? तो हम आपको बहुत सारे प्रमाण देते हैं। फिर आप ही बताइएगा कि क्या सही है...

आज कल हम सभी के पास अपने बचपन से ज़्यादा सुख-समृद्धि है। पहले से दूध, दही, मेवा, मिठाई, अनाज, फल-सब्जियां, आदि सभी सामान तो हमारे पास बचपन से ज़्यादा है।

पंखा, कूलर, एसी, मोटरसाइकिल, कार, फ्रीज, टीवी, आदि, जिसने बचपन में जिसका भी सुख लिया है, उससे ज्यादा ही सबके पास..

फिर भी ना हम स्वस्थ हैं, ना सुखी, ना चिंताओं से मुक्त, ना संतुष्ट... 

क्यों? आखिर ऐसा क्यों? 

जब सब ही पहले से बेहतर, आधुनिक और सुव्यवस्थित है, तो ऐसा क्यों?...

इसका कारण है, कुछ घटक 

  1. आधुनिकता, जो सबसे पहले पायदान पर है...
  2. धनलोलुपता, एक और बहुत बड़ा कारण...
  3. अनावश्यक भूख (आगे बढ़ने की, महत्वकांक्षाओं की)...
  4. बहुत अधिक दवाओं का उपयोग...
  5. अपनों से दूरी...

चलिए सबके बारे में एक, एक करके सोचते हैं..

पहले खाना बनाने के लिए और खाना खाने के लिए, मिट्टी, तांबे, लोहे के बर्तन इस्तेमाल होते थे। चूल्हे पर खाना बनता था, मटके में पानी होता और जमीन में बैठकर खाते थे। लोग खूब घी, मक्खन, दूध, दही, मीठा, तीखा खाते, पर तब लोग, सुखी भी थे, स्वस्थ भी और संतुष्ट भी...

फिर हो गया, 

आधुनिकता का प्रवेश,

चूल्हे की जगह, गैस और माइक्रोवेव ने ले ली, बर्तन भी बदल गये, प्लास्टिक स्टील और एल्यूमीनियम की बहुतायत हो गई, मटके की जगह, RO और refrigerator ने ले ली। ज़मीन की जगह dinning table ने ले ली। घी, मक्खन की जगह, olive oil, refined oil ने ले ली। 

Gym, aerobics सब शुरू हो गया, पर results -

लोग, ना सुखी हैं, ना स्वस्थ और ना संतुष्ट...  

धनलोलुपता 

धनलोलुपता के आगे, सब फीका, ना बचपन, ना मासूमियत, ना बच्चे की किलकारी, ना प्यार, ना ममता। 

बहुत अधिक धन कमाने की चाह में, जो चीजें हमें खुशी देती है, उसे खुद से दूर करते जा रहे हैं। हम अपना पूरा ध्यान और समय, सिर्फ और सिर्फ, इस उधेड़बुन में निकाल देते हैं कि धन कैसे प्राप्त करें। 

अनावश्यक भूख (आगे बढ़ने की, महत्वकांक्षाओं की)

हमें जितने की आवश्यकता है, उससे बहुत ज्यादा पाने की हमारी चाह ने हमें बहुत अधिक महत्वाकांक्षी बना दिया है। जिसके कारण, हम जरुरत से ज्यादा ही busy हो गये हैं और उसमें हम अपने अतुलनीय सुख की तिलांजलि दे रहे हैं।

पहले खेती होती थी, तब बीज से लेकर खाद तक, सब natural होता था। फसल का उत्पादन थोड़ा कम होता था। अनाज, फल-सब्जियों का रखरखाव भी natural होता था, अनाज सालों और दिनों, फल-सब्जियां सही बने रहते थे।

ऐसे ही दूध के साथ भी था, गाय-भैंस, जितना दूध देती थी, उसे ही घर घर पहुंचाया जाता था। ऐसे अनाज और दूध को जब लोग खाते थे, तो स्वस्थ रहते थे। 

लोगों के पास समय था, एक दूसरे को समझने का, सुख-दुख साझा करने का, इसलिए सुखी भी थे और संतुष्ट भी... 

बहुत अधिक दवाओं का उपयोग

अब बहुत अधिक दवाओं का उपयोग होने लगा है; वैसे यह भी आधुनिकता का ही दूसरा रूप है। आज हर चीज के लिए दवाएं मौजूद है।

खेतों में पैदावार बढ़ानी हो - दवा डाल दो - फसल दोगुनी-चौगुनी हो जाएगी; अनाज, सब्ज़ी, फल, सब double size के हो जाएंगे। 

फिर इन सब को लंबे समय तक store करके रखना हो, तो फिर वही, दवा डाल दो। ऐसे ही गाय-भैंस को injections लगाकर, अधिक दूध निकाल लेते हैं...

अब जब हर step पर दवा ही डलेगी, तो आप को क्या लगता है? 

नहीं समझे, ऐसे अनाज और फल-सब्जियों को digest करने के लिए दवा ही खानी पड़ेगी या इन्हें खाने से जब स्वास्थ्य खराब होगा तो उसके लिए दवाएं खाइए।

मतलब बात दवा से शुरू हो कर दवा पर ही खत्म हो रही है।

और लोग हैं कि तबियत ख़राब होने का सारा ठीकरा, घी, सरसों तेल, मक्खन, दूध, मिठाई, नमक पर फोड़कर, उसकी जगह olive oil, margarine, refind oil, rock salt, sugar free, etc. को देकर, नित नए विकल्प खोजते रह रहे हैं। 

जनाब, घी तेल बदलने से नहीं, बल्कि आप को खुद को बदलने की आवश्यकता है...

आवश्यकता है, उस सोच की, जिसमें मंथन किया जाए कि हमें किस हद तक, आधुनिकता चाहिए? हर आधुनिक वस्तुएं बेकार नहीं है, पर यह विचार एक बार अवश्य करें कि उसका प्रभाव, आपके भविष्य में कितना कारगर सिद्ध होगा।

जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए धन आवश्यक है, पर धन ही जीवन नहीं है, एक बार विचार अवश्य करिएगा कि आप कहीं बहुत अधिक धन कमाने की चाह में, उस धन से भी ज्यादा बेशकीमती लम्हे खो तो नहीं रहे हैं? क्योंकि आप कितना भी ज्यादा कमा लीजिए, वो बेशकीमती पल और खुशियां वापस नहीं आने वाले... 

अपनों से दूरी

जो आप को सबसे ज्यादा सुखी, स्वस्थ और संतुष्ट कर सकता है, वो है, आप कितने ज़्यादा naturally रह रहे हैं, कितने संतोषी हैं, कितने positive attitude वाले हैं, आधुनिकता की अंधी दौड़ में कितना शामिल हैं, कितना ज्यादा अपनों को महत्व देते हैं, आप कितना कम स्वार्थी हो, कितना अपनों के साथ रहते हैं...

बस यही है, जो हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता थी, जिसे हम धीरे-धीरे छोड़ते जा रहे हैं, कभी आधुनिकता के नाम पर, कभी व्यस्तता के नाम पर, कभी जरूरत के नाम पर।

जिस दिन हम अपनी संस्कृति को समझ जाएंगे, उस दिन से हम स्वस्थ रहेंगे, सुखी भी होंगे और संतुष्ट भी...

अंत आने से पहले एक बार विचार अवश्य करें - धुनिकता कहीं अंत तो नहीं??