Wednesday, 23 November 2022

Story of Life: ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -3)

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -1) और

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -2) के आगे...

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -3) 




मैं नीचे के bathroom में ready हो जाऊंगा, तुम भी जल्दी आ जाना... 

कहकर नीलेश नीचे चले गए और मैं बाथरूम में...

जल्दी जल्दी नहा तो मैं ली, पर साड़ी! हाय रे... पागल हो गई मैं, पर जितनी जल्दी कर रही थी मैं, उतना ही उसे सही से पहनना असंभव लग रहा था।

मां ने कितना कहा था कि ठीक से ready होना सीख ले, पर मेरी ही मति मारी गई थी, जो उनकी बात नहीं सुनी थी।

पर अब क्या? आज तो गई बारह के भाव...

तभी भाभी आ गई और उन्होंने झटपट मुझे ready कर दिया, और साड़ी तो इतनी अच्छी पहनाई कि मुझे खुद से ही प्यार हो गया, wow! क्या figure है मेरी...

अब खुद को निहारना बंद करें देवरानी जी, नीचे चलो, नहीं तो तुम्हारे साथ मैं भी नहीं बचूंगी।

अरे भाभी, आज तो आप ने बचा लिया, वरना मैं तो गई ही थी। बहुत बहुत धन्यवाद...

धन्यवाद तो नीलू भैया का करना, उन्होंने ही भेजा था, बहुत ध्यान रखते हैं वो हर छोटी बात का। वो जिसके साथ होते हैं, वो कभी जा नहीं सकता है...

भाभी के साथ मैं नीचे पहुंच गई और जल्दी से kitchen में भी...

तभी बुआ जी की फिर से कड़क आवाज़ सुनाई दी, बहुरिया हमारे जाने के पहले आएगी या हम ही ऊपर जाएं?

नीलेश, बुआ जी के पैर दबाते हुए बोले, अरे बुआ जी, लगता है आप ने बातों में ध्यान नहीं दिया, आप की बहुरिया तो रसोईघर में ही है।

ऐं... रसोईघर में? कब? अब इतनी भी हम बात नहीं कर रहे थे, कहकर बुआ जी, रसोईघर की ओर आगे बढ़ गई...

मैं रसोईघर में ही थी, हलवा भी लगभग बनने को  तैयार था, यह सब देखकर बुआ जी प्रसन्न हो गई और शाम को खूब सारा प्यार, आशीर्वाद, और गहना कपड़े देकर चली गई।

बहू, बड़ा खुश होकर गई हैं जीजी, आगे भी ध्यान रखना।

मम्मी जी मुझे और मैं नीलेश को धन्यवाद दे रहे थे कि सब ठीक से हो गया। 

Kitchen में हलवा, इतनी जल्दी कभी ना बनता, अगर मेरे आने से पहले सूजी भूनी हुई ना रखी होती, भाभी ने बताया था कि वो भी नीलू भैया... 

दो दिन ससुराल में बहुत प्यार और सुख से गुज़रे, मम्मी जी सचमुच बहुत सुलझी हुई थीं।

हमारे इतनी जल्दी Bombay जाने की बात से भी उन्होंने कुछ नहीं कहा कि इतनी जल्दी क्यों जा रहे हो?

बल्कि हमारे जाने की खुद वो आगे से आगे बढ़कर तैयारी कर रही थीं।

मैंने कहा भी कि इतनी जल्दी नहीं जाना मुझे... तो वो बोली, अरे कोई बात नहीं, आते जाते रहना, हम तो यहीं हैं...

दो दिन बाद ही हम Bombay आ गए,  और साथ ही बहुत सारी है, जिम्मेदारियां...

ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी, हम दो से चार हो चुके थे...

बहुत कुछ बदल चुका था जिंदगी में, हम दोनों ही बहुत व्यस्त हो चुके थे, मैं बच्चों में और नीलेश अपने काम में.. 

समय के साथ नीलेश... 

पढ़ें ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -4) अंतिम भाग में 

अंतिम भाग अवश्य पढ़िएगा, क्योंकि उसमें ही सार है..

Tuesday, 22 November 2022

Story of Life : ज़िन्दगी का पड़ाव ( भाग - 2)

ज़िन्दगी का पड़ाव ( भाग - 2)


निशा, कैसा लगा तुम्हें? 

उस दमदार आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई...

आह! यह तो नीलेश हैं, cream colour की शेरवानी, उन पर बहुत फब रही थी, और उस पर उनकी लहराती जुल्फों ने तो कमाल ही कर दिया था।

दो मिनट बाद खुद को संभालते हुए, मैंने मन ही मन सोचा अरे निशा, क्या कर रही है, लड़कियों को यूं दीवाना नहीं होना होता है, उन्हें तो बल्कि दीवाना बनाना होता है...

यह ख्याल आते ही मैं सकुचाते, शरमाते हुए अपने में सिमटने लगी। 

नीलेश मुझे अपनी बाहों में थाम कर बिस्तर तक ले गए, और बैठते हुए बोले, शायद तुम्हें बिना फूलों का कमरा पसंद नहीं आया हो, पर मुझे पसन्द नहीं कि अपने सुख के लिए हम किसी और को रौंदे या कुचलें... पर फिर तुम्हारा ख्याल आया, वैसे मैं आपको, तुम तो बोल सकता हूं ना?

मैंने बिना कुछ बोले, हाँ में सिर हिला दिया...

तुम्हारा ख्याल आया तो सोचा कि तुम्हारे भी तो कुछ अरमान होंगे? इस सोच के साथ एक नये अंदाज में तुम्हारे स्वागत की तैयारियां करने लगा।

जैसे फूल ना सही पर कमरे के कोने कोने से तुम्हें गुलाब की सुगंध आए, तो पूरे कमरे में गुलाब का perfume छिड़क दिया। कमरा तुम्हें खूबसूरत लगे, इसके लिए चुन-चुन कर decorative pieces से कमरा सजाया और अगर कहीं तुम्हारी पसंद फिल्मी हों तो यह सोचकर, mild romantic number भी बजा दिया...

नीलेश की बातें सुनकर लगा अच्छा हुआ, हमारी arranged marriage हुई... इन्हें मेरे बारे में कुछ नहीं पता, इसलिए मुझे खुश करने के लिए, कितना कुछ किया है, गर सब पता होता तो इतना रोमांटिक नहीं होता। 

कोई फूलों के लिए भी ऐसे सोच सकता है, इनका हर एक के लिए caring nature ने मेरे दिल को छू लिया, साथ ही मेरी भावनाओं की इतनी परवाह..

मन बार बार मां-पापा को धन्यवाद दे रहा था... मां-पापा से बढ़कर, हमारे लिए कोई अच्छा नहीं सोच सकता है, हम खुद भी नहीं..

नीलेश की बातें,  रोमांटिक माहौल और मेरे दीवानेपन का असर कुछ ऐसा था कि कब हम दोनों एक-दूसरे में समा गये पता ही नहीं चला... 

सुबह जब उठी तो लगा, जैसे इतने सुन्दर ख्वाब की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं जो किसी को अपने को छूने को तो क्या, पास बैठने तक नहीं देती थी, आज किसी के आगोश में समा चुकी थी।

तभी बुआ जी की कड़क आवाज़ गूंजी, भाभी, तुम्हारी बहुरिया आज उठेगी भी या नीलेश के साथ ही रहेगी?

बुआ जी की एक कड़क आवाज़ से पूरा घर हरकत में आ गया। 

नीलेश, जो अभी तक गहरी नींद में थे, भड़भड़ाकर उठे, मुझे जगा देखकर बोले, कमरे से लगा बाथरूम है, जितना जल्दी नहा धोकर ready हो सकती हो जाओ..

नहा धोकर! इतनी सुबह? ..

बिल्कुल, वरना बुआजी को सातवें आसमान पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता...

आप भी नहीं, मैंने घबराते हुए पूछा...

बिल्कुल भी नही, सोचना भी नहीं...

बाकी परेशान ना हो, आज भर adjust कर लो, शाम को बुआ जी की train  है... माँ बहुत cool हैं, फिर हम दो दिन में Bombay के लिए भी निकल जाएंगे।

मैं नीचे के bathroom में ready हो जाऊंगा, तुम भी जल्दी आ जाना...

आगे पढ़े, ज़िन्दगी का पड़ाव ( भाग - 3) में...

Monday, 21 November 2022

Story of Life: ज़िन्दगी का पड़ाव

 ज़िन्दगी का पड़ाव  


कल ही नयी नयी शादी हुई थी। पूरा घर मेहमानों से खचाखच भरा था। 

ससुराल में पहला कदम रखने के साथ ही लंबा घूंघट करा दिया गया था। क्योंकि अभी मेरी ससुराल के साथ ही सासू मां की ससुराल के सब लोग भी मौजूद थे और कुछ उनके ससुराल के भी।

दिन भर रीति रिवाज में गुज़र गया। रात तक कमर का बैंड बाजा बज चुका था। पर ना तो अपना कमरा कौन सा है, वो पता था, ना बिस्तर... और पतिदेव तो किस कोने में हैं, उसकी तो हवा भी नहीं थी।

मेरी शक्ल पर बारह बजे देखकर सासू मां को दया आ गई, वो अपनी ननद से बोलीं जीजी, सारी रस्म अदायगी हो गई हो तो बहुरिया को बा का कमरा दिखाएं दूं।

पर ननद तो ठहरी ननद, उनको कभी अपनी भाभी पर तरस ना आया, तो मुझ पर कैसे आता। 

कहे भाभी, इन्नी जल्दी किस बात की है, अपना समय भूल गई, 4 दिन तक भैया से ना मिल पाई थी। 

4 दिन! मेरी तो सुनकर सांस लगभग रूकने ही वाली थी, पर तब तक मम्मी जी बोलीं..

सब याद है जीजी, कछु ना भूली। पर तब बख्त अलग था। आज कल के बच्चों में उतना सब्र कहाँ।

मम्मी जी ने बात ख़त्म की ही थी कि ना जाने पतिदेव कहां से प्रगट हो गये।

मां दो दिन में ही Bombay निकलना है, जो भी रस्म करनी हो, आधे घंटे में पूरी कर लीजिए। फिर निशा को मेरे कमरे में छोड़ दीजिए, बहुत से paper work करने हैं इसको अपने job transfer से related...

मेरी और मम्मी जी दोनों की बांछे खिल गई कि चलो आधे घंटे में सारी रस्में पूरी हो जाएंगी।

क्योंकि बुआ जी, केवल नीलेश के कहने से शांत होती थीं।

मुझे मेरे कमरे में पहुंचा दिया गया...

मम्मी जी, मुझे मेरे में छोड़कर अपने कमरे की ओर बढ़ चली थीं....

बहुत ही व्यवस्थित कमरा था, जो उस कमरे में रहने वाले की निपुणता को दर्शा रहा था। 

कमरा गुलाब की भीनी खुशबू से महक रहा था, पर कमरे में एक भी फूल नहीं थे। लेकिन बेहद सुन्दर decorative pieces  से कमरा सजा हुआ था, बहुत धीमी आवाज में रोमांटिक गीत बज रहा था, साथ ही मद्धम रोशनी पूरे कमरे को बहुत दिलकश बना रही थी। 

सुहागरात का कमरा, जिसमें एक भी फूल ना हों, फिर भी वो इतना खूबसूरत और दिलकश लग सकता है, ऐसा मेरी सोच से परे था...

अंजान सी मैं कमरा निहार थी कि एक दमदार आवाज ने आवाज दी,..

निशा, कैसा लगा तुम्हें? 

आगे पढें...

जिंदगी का पड़ाव (भाग - 2) में