Tuesday, 14 March 2023

Story of Life : मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2)

 मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-1) के आगे...

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2)



तभी रैना को अपनी हमउम्र एक लड़की ने पीछे से थपथपाया, क्या सोच रही हैं भाभी? भैया को ढूंढ रही हैं निगाहें?

तो रहने दीजिए, कुछ भी मत सोचिए। आपको बता दूं, भैया आपको सारी रस्मो-रिवाज के पूरे होने से पहले नहीं मिलेंगी दूसरा यह आपका कमरा नहीं है।

मेरा कमरा नहीं है?

हां, सारी रस्मो-रिवाज होने तक आप हम सब औरतों के साथ ही रहेंगी और जब तक यहां रहेंगी, मज़े में रह लीजिएगा।

एक बार इस कमरे से बाहर आ गई तो फिर नियम कानून से बंध गई।

नियम कानून...! 

हां भाभी, बुआ जी नियम कानून की चलती फिरती  पाठशाला हैं। पूजा पाठ से जुड़ी कोई जिज्ञासा ऐसी नहीं होगी, जो वो शांत ना कर दें।

हम हिन्दुओं के धर्म कर्म, नियम की समस्त ज्ञाता हैं...

तभी बाहर से आवाज़ आई, रेखा भाभी को सारा ज्ञान आज ही दे देगी या कुछ उसे खुद भी समझने देगी। चल इधर आ कर कल की तैयारी करवा ले...

अभी आई, कहकर रेखा भाग गई.. 

रेखा के बताने से कमरे की बात तो पता चल गई। पर अब रैना को संयम का कोई इंतज़ार नहीं था। क्योंकि वो तो वैसे भी सारी रस्मो-रिवाज के बाद ही मिलने थे।

पर अब उसे इस बात की curiousity ज्यादा थी कि दो दिन बाद, ऐसे भी क्या नियम कानून होंगे जो जिंदगी बदल जाएगी...

रात में सभी औरतें सोने के लिए आ गई। सभी के लिए बहुत अच्छी व्यवस्था थी पर सबसे ज्यादा ध्यान रैना का रखा जा रहा था।

दो दिन बाद ही मुंह दिखाई थी, सुबह से ही घर लोगों से खचाखच भर गया। और सुबह से ही रस्म भी शुरू हो गई, जो कि रात होते होते ही पूरी हुई...

आज रैना को उसका अपना कमरा दिखा दिया गया। कमरा बहुत ही सुन्दर और व्यवस्थित था।

रात में संयम भी आ गया। दोनों के प्रेम की मिलन बेला आ गई थी। 

सोने से पहले संयम ने रैना से कहा, सुनो सुबह चार बजे उठ जाना और हां नहाकर तैयार हो जाना, भोर की आरती के लिए..

चार बजे...चार बजे कौन सी सुबह होती है? उस समय तक तो सूर्य देव भी नहीं निकलते...

हमारे यहां यही नियम है, मां की मंदिर की घंटी के साथ ही सुबह हो जाती है। वही सबका उठने का और पूजा के लिए तैयार हो जाने का Alarm होता है... 

और हां ध्यान रखना इस बात का, मां का बहुत मान है सब लोगों में, तुम्हारे कारण कम ना होए...

यह कहकर संयम तो सो गया, पर रैना को नींद नहीं आ रही थी। वो तो 7 बजे से पहले कभी उठी ही नहीं थी। 

मम्मी कभी कहती भी थीं कि रैना जल्दी उठ जा, तो वो यही कहती, 7 बजे के बाद ही तो सुबह होती है और उसके पहले रात... और रात तो सोने के लिए होती है.. 

पर मां और मायके की तो बात ही अलग होती है... यहां उसकी कौन समझेगा? 

मम्मी-पापा आप ने कैसी जगह मेरी शादी कर दी!.. रैना मन ही मन दुखी होते हुए सोच रही थी।

नया घर, नये नियम... 

फिर मम्मी-पापा ने भी तो कहा था कि अब से वही तुम्हारा घर है, वहां जैसा होता है, वैसी ही तुम भी ढल जाना...

सोचते सोचते, रैना की कब आंख लग गई, उसे भी नहीं पता चला...

सुबह के चार बज गए और बज गई मां के मंदिर की घंटी...

आगे पढ़े मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3) में...

Monday, 13 March 2023

Story of Life : मेरी सास ही मेरी सांस

 मेरी सास ही मेरी सांस 


अल्हड़, शोख, चंचल रैना, ने जवानी की दहलीज पर कदम रख दिया था। 

वो इतनी हसीन थी कि हर जगह से उसके लिए रिश्ते आ रहे थे। पर उसके मां-पापा उसके लिए सुयोग्य घर-वर की तलाश कर रहे थे।

एक दिन उनका इंतज़ार ख़त्म हुआ, जब एक संस्कारी और पूजा-पाठी परिवार से रिश्ता आया। संयम एक सरकारी कम्पनी में उच्च पद पर आसीन था। 

बहुत धूमधाम से विवाह समारोह संपन्न हुआ, मां-पापा ने अपनी लाडली को, ससुराल से जुड़ने उसे अपना परिवार समझना, जैसे सुसंस्कारों के साथ, खुशी खुशी विदा कर दिया।

अपने मायके से अपने ससुराल आने तक रैना ने अपना मन बना लिया कि आज से यही मेरा परिवार है और यही मेरी दुनिया...

बहुत ही भव्य तरीके से उसका स्वागत हुआ, उसके स्वागत में ढोल नगाड़े, शहनाई आदि बजाए गये। द्वार पर आरती और नजर उतारने के लिए ही बहुत सारी औरतें थाल सजाए खड़ी थीं। मंगलाचार के साथ गृहप्रवेश हुआ। 

गृह प्रवेश के साथ ही बहुत सारी रस्मो-रिवाज प्रारंभ हो गये।

रैना के घर में बहुत सी शादियां हुईं थीं, पर इतनी रस्में तो, किसी की शादी में नहीं देखने को मिली थी कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। 

वैसे उसका एक और कारण भी था, हर रस्म को करने वाले लोग भी बहुत थे। ऐसा लग रहा था कि मानो स्वागत के लिए पूरे शहर को बुला लिया है। 

वो लोग सुबह 10 ही घर आ गए थे और अब शाम के आठ बजने वाले थे। 

तभी सासू मां ने कहा, सब भोजन ग्रहण कर लें जितने लोग, आज रस्में पूरी  नहीं कर पाएं हैं, वो दो दिन बाद मुंह दिखाई की रस्म में आकर रस्म पूरी कर लें।

सभी भोजन ग्रहण करने करने चले गए, और रैना के लिए भी थाली सजकर आ गई। 

और उसके बाद रैना को एक कमरे में आराम करने के लिए भेज दिया गया। 

उस कमरे में बहुत सारे गद्दे बिछे हुए थे। रैना को कुछ सूझ नहीं रहा था कि आखिर यह किस कमरे में उसे आराम करने को कहा गया है, जहां एक नहीं बल्कि बहुत से गद्दे बिछे हुए थे।

आगे पढ़े, मेरी सास ही मेरी सांस (भाग - 2) में...

Thursday, 9 March 2023

Memories: त्यौहार सिमट गये

त्यौहार सिमट गये 

आज सुबह जब खिड़की खोली, तो आसमान का रंग कुछ ऐसा था, जो बरबस ही यादों के झरोखे में ले गया।

यूं तो हर त्यौहार की अपनी अलग ही विशेषता होती है, पर हम हिन्दुओं में होली और दीवाली की अधिक महत्ता होती है।

बात बचपन की है। तब हम चारों भाई-बहनों को होली कुछ ज्यादा ही आकर्षित होती थी। आप कहेंगे कि बच्चों में रंग खेलने की इच्छा बलवती ही होती है।

जी, बिल्कुल सही कहा आपने, पर इसके साथ इससे भी बड़ा कारण था, हम लोगों के बड़े चाचा-चाची और छोटी बहन का आना होता है।

उन लोगों के आने से त्यौहार में चार चांद लग जाते थे। और हम सब बच्चे चले जाते थे, अपने dreamland में...

उसका भी एक कारण था, चाचा की बेटी की सारी इच्छा पापा-मम्मी पूरी करते थे। और हम लोग की चाचा-चाची.. तो अगर देखें तो हम पांचों भाई बहन के वो दिन स्वप्निल हो जाते थे। 

मतलब अपने-तुम्हारे की भावना से ऊपर हमारे के भाव में रहा करते थे हम लोग...

होलिका दहन के दो दिन पहले से लेकर, होली खेलने और उसके बाद दूज के और दो दिन बाद तक बस मस्ती मज़ा और धमाल..

मम्मी और चाची का मिलकर होली के पकवान बनाना, चाचा का कलात्मक तरीके से गुजिया गोंठना... कभी भूलेगा ही नहीं..

फिर दूज के दिन, रूचना-टीका के बाद चाचा-चाची का हम लोगों का फिल्म दिखाने ले जाना, वो तो जैसे सोने पर सुहागा ही हो जाता था...

उन लोगों ने हम लोगों को खूब फिल्में दिखाईं, सब बहुत अच्छी थी, लेकिन जो सबसे अच्छी लगी थी, वो थी मैंने प्यार किया

Undoubtedly वो फिल्म बहुत अच्छी थी, पर उसमें भी एक खास कारण था, जो वो विशेष पसंद थी।

हुआ यह था कि जब हम लोग पहुंचे थे तो, फिल्म शुरू हो चुकी थी। जैसे ही हम लोग picture hall  में पहुंचे, उसमें आलोकनाथ कहता है सुमन, और भाग्यश्री पलटती है, सुमन नाम सुनकर, हम सब चाची की तरफ देखने लगे और चाची ने मीठी सी मुस्कान दे दी।

दरअसल हमारी सुंदर सी चाची का नाम भी सुमन है, तो समझे आप क्यों वो फिल्म special थी?

नहीं समझे? अरे भाई heroine के साथ फिल्म देखने वाली feeling आ रही थी।

ऐसी ही बहुत सी मीठी यादों के साथ होती थी, हमारी होलिका दहन के दो दिन पहले से दूज के दो दिन बाद तक की होली

तो यह तो रहा, बचपन का हमारा होली का त्यौहार

फिर शादी हो गई, बंगाल में पहुंच गए, सबसे दूर, किसी का आना-जाना नहीं, सारे त्यौहार सूने से ही जाने लगे, क्योंकि पतिदेव की कभी भी छुट्टी नहीं होती थी ..

बहुत प्रयास के बाद, ईश्वर की कृपा, बड़ों के आशीर्वाद, मामा और बड़े भाई के सहयोग से दिल्ली आ गए।

यहां छोटा भाई भी था। एक बार फिर से त्यौहारों का अस्तित्व में आना शुरू हो गया। फिर से होली का त्यौहार, सिर्फ रंगोत्सव के रूप में सिमट कर नहीं रह गया था, बल्कि फिर से दूज का इंतज़ार रहने लगा था। 

भाई-भाभी और बिटिया रानी के आने से दूज में फिर से रौनक लौट आई थी। जैसे चाचा-चाची के आने से हम भाई-बहन स्वप्निल संसार में होते थे, वैसे ही भाई-भाभी और बिटिया के आने से बच्चे dreamland में होते, वो सबके लिए बहुत कुछ लेकर आते, हम भी खूब सारे पकवानों के साथ तैयार रहते...

बहुत ही सुखद अनुभव रहता था, त्यौहार, त्यौहार लगता था। 

पर अभी कुछ साल पहले ही वो लोग Bombay चले गए।त्यौहार की रौनक धूमिल लगने लगी। अब ना दूज में इंतज़ार रहता, ना उस दिन किसी पकवान को बनाने की इच्छा।

पर रही सही कसर, इस बार की होली में निकल गई, बच्चों के exam का schedule ऐसा था कि होली के कुछ दिन पहले से शुरू होकर होली के कुछ दिन बाद तक exams हैं और हद तो यह है कि होली के एक दिन पहले भी और एक दिन बाद भी..

जब बच्चों को हर समय पढ़ते ही रहना होगा तो क्या होली?

फिर किस तरह से बच्चों में उमंग और उत्साह रहेगा?..

क्या इस तरह से बच्चों के जीवन से उत्साह, उल्लास, उमंग और जोश या यूं कहें कि बचपन ही ख़त्म नहीं हो जाएगा?

अब तो होली की छुट्टी, school हो, college हो या office हो, मात्र एक दिन की ही होती है। इतना बड़ा त्यौहार और छुट्टी बस एक दिन..

Board के exam तो जब हमारा बचपन था और आज जब हमारे बच्चों के board हैं, होली के त्यौहार की रौनक तो हमेशा से ही तहस-नहस कर दी जाती है।

पर अब जब सरकार हिन्दुत्व की ओर बढ़ावा दे रही है तो उनसे अपील है कि अगर हिन्दुत्व को महत्व देना है, तो यह सम्भव तो तभी होगा ना, जब त्यौहार, संस्कृति और संस्कार को बढ़ावा मिलेगा।

ऐसे में बड़े त्यौहार में दो या तीन दिन की छुट्टियां रहे, atleast बच्चों की तो रहे ही, साथ ही उनके final exam की date ऐसे हों कि या तो होली आने के पहले ख़त्म हो जाए या होली के 4 से 6 दिन बाद start ह़ो... 

आप कहेंगे कि आज कल schools and colleges तो, ज्यादातर private ही होते हैं तो उसमें सरकार से appeal से क्या होगा? 

तो उसका जवाब यह है कि अगर government order रहेगा तो private हो या government, rules तो सबको follow करने ही होंगे।

अगर यह बात, सरकार तक पहुंच जाए और त्यौहारों पर ज्यादा दिनों की छुट्टी मिल जाए, तो त्यौहार जो सिमट कर रह गये हैं, वो अपना अस्तित्व वापस पा लेंगे और कुछ हद तक बच्चों को भी अपना बचपन वापस मिल जाएगा...

तो बच्चों और धर्म के लिए इतना तो बनता है।


भाई-दूज पर्व पर सभी भाइयों व बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं 💐 🙏🏻