Thursday, 18 April 2024

Article : 6 साल साथ-साथ

6 साल साथ-साथ




आज फिर वही दिन है, हमारी जिंदगी का, जो बहुत ही खूबसूरत है।

6 साल साथ-साथ, एक खूबसूरत सफ़र, जो निरंतर आगे बढ़ता ही जा रहा है। ईश्वर की अनुकम्पा ऐसी ही बनी रहे 🙏🏻

यह दिन ही है, जिसने हमें अपनी जिंदगी से जुड़े दो जन्मदिवस दिए, एक माँ ने दिया था, शरीर रूपी, जिससे इस दुनिया में आए थे। 

दूसरा बेटी ने दिया, कर्म रुपी, यह blog बना कर...

खूबसूरत इसलिए कहा, क्योंकि माँ ने एक बहुत खूबसूरत दुनिया से जोड़ा, जहां विश्व के सबसे अच्छे मम्मी-पापा, भाई-बहन, ददिहाल, ननिहाल, सारे रिश्तेदार, दोस्त मिले। माँ ने बहुत ही अच्छे जीवनसाथी से जोड़ा, उसके बाद बेटी-बेटा, ससुराल में सभी बहुत अच्छे मिले।

फिर बेटी ने blog बनाकर, एक और नई दुनिया, नया परिवार दे दिया। आप सबसे इतना सहयोग, इतना प्यार मिला कि बहुत जल्दी सब अपने लगने लगे।

जिससे जितना लगाव अपनों से था, उतना ही आप से हो गया या यूं कहें कि कब आप सब अपने बन गए पता ही नहीं चला।

और यह परिवार हमारा, इतना विशाल है कि आज यह देश-विदेश सब जगह है। पर एक और जगह है, हमारे दिल में..

ईश्वर की कृपा से यह सब संभव हुआ है, उनका कोटि कोटि धन्यवाद 🙏🏻 हे प्रभू आप अपनी कृपा दृष्टि सदैव बनाए रखियेगा।

और आप सबका भी अनेकानेक आभार, आप सब भी अपना प्यार और सहयोग, ऐसे ही बनाए रखियेगा। 

एक बहुत बड़ा धन्यवाद और प्यार, अपनी बेटी को जिसने blog बनाकर दिया और उसके सुचारू रूप से चलाने के लिए सहयोग दिया और प्रेरित भी किया। 

फिर पढ़ाई-लिखाई की व्यस्तता में वो उतना नहीं जुड़ पा रही थी। 

पर तभी मेरे छोटे से बेटे ने मेरा हाथ थाम लिया और मुझे इसे सुचारू रूप से चलने के लिए निरंतर सहयोग व प्रेरणा दी। उसके बिना, हमारा blog को निरंतर चलाते रहना असंभव है। उसको भी बहुत बड़ा धन्यवाद और प्यार… 

साथ आपका हर पल चाहिए

हमेशा और ज्यादा, 

कभी ना कम चाहिए 

प्यार मिला है इतना

कि आप सब बन गए हैं जिंदगी

अब इस जिंदगी में

यह खुशी हर दम चाहिए

बहुत सारे आभार के साथ इस साल का data डाल रहे हैं, जो साल दर साल निखरता ही जा रहा है।






Tuesday, 16 April 2024

Recipe: Kuttu ki Kachori

आज नवरात्र की अष्टमी है। मां गौरी का पवित्र दिन, आज के दिन बहुत लोग व्रत रखते हैं। वो भी जो नौ दिन तक व्रत रखते हैं और वो भी जो पहला और आखिरी रखते हैं।

तो सोचा, आप सबके लिए व्रत की ही कोई dish share की जाए।

ऐसे में रश्मि जी, जो कि व्रत के एक से बढ़कर एक पकवान बनाती हैं, उनकी ही एक recipe साझा कर रहे हैं।

कुट्टू के आटे की कचौड़ी....

बहुत से लोग कहेंगे कि यह तो हमें भी आती है, तो कोई कहेगा कि अरे उसमें बहुत झंझट है, तो कुछ बोलेंगे कि इतना घी-तेल हम नहीं खाते हैं...

बिल्कुल सही कहा आप सब ने, हमें भी यही लगता था, पर जब उन्होंने सामने ही बना कर taste कराई तो सारी धारणा धरी की धरी रह गई।

आप एक बार पूरी recipe देख लीजिए, बहुत ही आसानी से बन रही थी। और taste की guarantee हमारी... Soft and crisp combination बहुत ही कमाल का आता है।

तो चलिए झट-पट से recipe share कर देते हैं।

कुट्टू की कचौड़ी

Ingredients :

  • Buckwheat flour - 1 cup
  • Boiled potato - 2 medium size
  • Rock salt - ¼ tsp. or as per taste
  • Coriander leaves - 6 to 8 twigs 
  • Green chilli - 2 
  • Clarified butter (ghee) - for frying 


Method :

  1. Boiled potato को अच्छे से mash कर लीजिए।
  2. धनिया पत्ती और हरी मिर्च को finely chop कर लीजिए।
  3. अब आलू में कुट्टू का आटा, नमक, हरी धनिया और मिर्च को अच्छे से मिलाकर dough prepare कर लीजिए।
  4. अब इन की छोटी-छोटी लोई तोड़ लीजिए।
  5. अब हथेली पर थोड़ा-थोड़ा घी लगाते हुए लोई से छोटी-छोटी सी कचौड़ी बना लीजिए।
  6. एक wok लीजिए, उसमें घी डाल लीजिए।
  7. जब घी गर्म हो जाए तो उसमें दो कचौड़ी डाल दीजिए।
  8. अब कचौड़ी पर थोड़ा-थोड़ा घी डालते जाएं, जिससे वो तलकर फूल जाए। 
  9. अब उसको पलट दें और दूसरी तरफ से भी तल लें। 
  10. जब कचौड़ी दोनों तरफ से हल्की-हल्की सी तल जाए, तो तेज आंच करके सुनहरा होने तक तल लें।


गरमागरम खस्ता करारी कुट्टू के आटे की कचौड़ी तैयार है। आप इसे चटनी, दही और पनीर या आलू की सब्जी के साथ serve कर सकते हैं।

वैसे तो गरमागरम कचौड़ी अपने आप में complete है, इसलिए अगर आप उसे ऐसे ही खाना चाहें तो भी बढ़िया लगेगी।


Tips and tricks :

  1. आलूओं को गर्म ही छीलकर mash कर लें। भर्ता जितना smooth होगा, कचौड़ी उतनी easily फूलेगी।
  2. जितना आलू quantity wise भर्ता बनाने के बाद हो जाए, उतना ही कुट्टू का आटा लेना है।
  3. दोनों का ratio equal होने के कारण बिना भरी कचौड़ी होने के बाद भी taste and texture कचौड़ी जैसा आता है। 
  4. आलू ज्यादा होने से घी ज्यादा soak होगा और आटा ज्यादा होने से कचौड़ी कड़ी बनेगी और उसमें आटे का flavour ज्यादा आएगा।
  5. इस तरह से बनाने से कचौड़ी घी भी कम soak करती है। और पूरी कचौड़ी में taste भी एकसार रहता है।
  6. कचौड़ी का dough prepare करते समय ध्यान रखिएगा कि dough ऐसा होना चाहिए कि हाथ पर बहुत चिपके भी नहीं और ना ही ऐसा हो कि bind ही ना हो।
  7. अगर bind ना हो तो, थोड़ा-थोड़ा पानी छींटते हुए आटा गूंथना है।
  8. कुट्टू का आटा बहुत जल्दी गीला होता है, इसलिए पानी अंदाज़ से ही डालें।
  9. धनिया पत्ती और हरी मिर्च भी महीन ही काटें।‌ ज्यादा बड़ी होने से कचौड़ी फूट जाएगी, तो वो बहुत ज्यादा घी soak कर लेगी। 
  10. कचौड़ी बनाने में एक बात का ध्यान रखिएगा कि कचौड़ी एक जैसी होनी चाहिए, कहीं से पतली, कहीं से मोटी नहीं होनी चाहिए। वरना कचौड़ी फूलेगी नहीं।
  11. कचौड़ी को medium flame पर ही तलनी है और सुनहरा high flame पर करना है।
  12. मतलब हर बार कचौड़ी slow flame पर डालनी है, फिर flame medium कर लेनी है और फिर तेज़।
  13. तो flame का right combination, perfect कचौड़ी बनाने का key ingredient है।

Monday, 15 April 2024

Article : पोहेला बोइशाख

पोहेला बोइशाख



आज का article, हमारी‌ एक मीठी सी याद है और उस याद को हमारा कोटि-कोटि नमन भी....

बात उन दिनों की है, जब हम शादी कर के अपने जीवन साथी के साथ उस जगह पहुंचे थे, जो हमारे दाम्पत्य जीवन का प्रथम साक्षी था। जो साक्षी था, एक परिवार के हिस्सा होने से एक परिवार के बनाने की शुरुआत का...

एक शहर छोड़कर आए थे, एक township में...  पश्चिम बंगाल का एक शहर दुर्गापुर...

जो पूरी तरह से अलग था। ना केवल facilities wise बल्कि वहां की संस्कृति, वहां के लोग, उनका खान-पान, आबोहवा और बोली, सब ही कुछ तो अलग था...

आज जब दिल्ली, अपनों के बीच, अपनी सी संस्कृति, बोली और आबोहवा में लौट आए हैं तो ईश्वर से प्रार्थना है कि वो सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।

पर क्योंकि वहां जीवन के नये पड़ाव की शुरुआत में रहे थे, तो वो जीवन की मीठी यादों में शामिल है।

और आज पोहेला बोइशाख है तो सोचा, आपको ले चलें, वहां की खूबसूरत संस्कृति में, पोहेला बोइशाख (बांग्ला: পহেলা বৈশাখ) यानी, बंगाली पंचांग का प्रथम दिन, जो बांग्लादेश का आधिकारिक पंचांग भी है। यह उत्सव 14 अप्रैल को बांग्लादेश में और 15 अप्रैल को भारतीय राज्यों पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, झारखण्ड और असम (बराक घाटी) में बंगालियों द्वारा धार्मिक आस्था के निरपेक्ष मनाया जाता है। 

पोहेला बोइशाख के उत्सव की जड़ें मुगल शासन के दौरान पुराने ढाका के मुस्लिम समुदाय की परंपराओं से जुड़ी हैं, साथ ही अकबर के कर संग्रह सुधारों की घोषणा से भी जुड़ी है।

यह त्यौहार जुलूसों, मेलों और पारिवारिक समय के साथ मनाया जाता है। नए साल में बंगालियों के लिए पारंपरिक अभिवादन শুভ নববর্ষ (बंगाली) "शुभो नोबोबोरशो" है जिसका शाब्दिक अर्थ है "नया साल मुबारक"। 

बांग्लादेश में उत्सव मंगल शोभा यात्रा का आयोजन किया जाता है। 2016 में, UNESCO ने ढाका विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय द्वारा आयोजित इस उत्सव को मानवता की सांस्कृतिक विरासत घोषित किया। 

बाकी states में जहां जिंदगी भाग रही है, किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है, सब अपने-अपने स्वार्थ के निहित हैं, वहां पश्चिम बंगाल में आज भी जिंदगी जीवन्त है। 

वहां अन्य प्रदेशों की तरह कोई भी त्यौहार आने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया भर के नियम-कानून और घर में बहुत सारा काम और दुनिया भर के पकवान...

वहां त्यौहार का मतलब है उत्साह, उमंग और साथ... वहां कोई भी त्यौहार लोग घरों में रहकर सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि वहां पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला, पूरी community, पूरा शहर शामिल होता है।

किसी एक परिवार में नहीं, बल्कि पंडाल में पूजा-पाठ, उत्सव, खाने-पीने और मस्ती-मज़ा का प्रबंध किया जाता है।

आज भी यहां त्यौहार में रौनक है, फिर चाहे शारदीय नवरात्र हो, रथ पूजा या पोहेला बैशाख ...

क्योंकि आज पोहेला बैशाख है, तो क्या बताएं उस दिन के लिए, लोगों में उत्साह देखते ही बनता है।

जगह-जगह मेला होता है, बड़े-बड़े sound boxes लगे होते हैं। उस दिन लोग, अपने कामकाज में व्यस्त नहीं होते हैं। बल्कि अपने पूरे परिवार के साथ, quality time spend करते हैं। 

नया वर्ष आने के 15 दिन पहले से market में festival की चहल-पहल और रौनक दिखाई देने लगती है। 

बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी नव वर्ष का स्वागत, नये वस्त्र, नयी उमंग और उत्साह से करते हैं। 

वहां ऐसा लगता था कि आज भी जिंदगी, जिंदगी है। लोगों को इंतज़ार रहता है, त्यौहार के आने का, वहां कोई कठिन नियम नहीं है, बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी है। बस नियम है तो यह, कि festival वाले दिन festival celebration करना है, काम कहकर व्यर्थ की व्यस्तता नहीं दिखानी है, सब कुछ मिलकर करना है, जिससे festivity भी बढ़े और आपसी प्यार और एकता भी...

और वहां पहुंच कर पंडित जी जो भी नियम कानून बताएं, उसका पूरी आस्था और विश्वास के साथ पालन करना है।

हम सबको सीखना चाहिए उन से, कि कैसे अपनी संस्कृति, अपने त्यौहार को महत्व देना चाहिए और कैसे उसको पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाना चाहिए...

शुभ नववर्ष 💐