Saturday, 28 December 2024

Article : अलविदा, देश के मनमोहन

अलविदा, देश के मनमोहन 



भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी अपनी चिरनिंद्रा में लीन हो गए। वो भारत के 13वें प्रधानमंत्री थे। 

पर वो ही केवल ऐसे प्रधानमंत्री हुए, जिनके भारतीय मुद्रा पर हस्ताक्षर भी रहे हैं...

मुद्रा पर हस्ताक्षर, पर ऐसे कैसे? 

क्या भारत के प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि उनके हस्ताक्षर भारतीय मुद्रा पर रह सकते हैं? 

और अगर ऐसा है तो, मनमोहन सिंह जी ‌के अलावा किसी और प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर क्यों नहीं है? और अगर ऐसा नहीं है तो उनके कैसे हैं?

क्या इसमें कांग्रेस का कोई हाथ है?

नहीं, बिल्कुल नहीं.. 

बात दरअसल यह है कि श्री मनमोहन सिंह, अपने पूर्ण कार्यकाल में न केवल भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे थे, अपितु और भी बहुत से महत्वपूर्ण स्थान पर भी रहे थे।

आइए जानते हैं, क्यों बेहद मौन रहने वाले श्री मनमोहन सिंह जी, इतने famous थे? 

श्री मनमोहन सिंह जी, अर्थशास्त्र के प्रकांड विद्वान व विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। 

Punjab University से उन्होंने graduation and post graduation की पढ़ाई पूरी की। बाद में वह Cambridge University गए, जहां से उन्होंने PhD की। इसके बाद उन्होंने Oxford University  से D-Phil भी किया। उनकी book India's Export Trends and Prospects for Self-Sustained Growth, भारत की व्यापार नीति की पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है। 

डॉ. सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के तौर पर काफी ख्याति अर्जित की। वह Punjab University और बाद में प्रतिष्ठित Delhi school of economics में professor रहे। 

इसी बीच वह संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन सचिवालय में सलाहकार भी रहे और 1987 और 1990 में जेनेवा में साउथ कमीशन में सचिव भी रहे। 1971 में डॉ. सिंह भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए गए। इसके बाद 1972 में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया।

1985 में राजीव गांधी के शासन काल में मनमोहन सिंह को योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस पद पर उन्होंने लगातार पांच वर्षों तक कार्य किया, जबकि 1990 में वह प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार बनाए गए। जब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 1991 में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया और वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंपा। इस समय वह न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा के सदस्य थे। मगर संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सरकार के मंत्री को संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है। इसलिए उन्हें 1991 में असम से राज्यसभा भेजा गया था। इसके अलावा रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रहे। भारत के आर्थिक इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब, जब वह 1991 से 1996 तक भारत के वित्त मंत्री रहे।

श्री सिंह जी का finance minister बनना, भारत के लिए स्वर्णिम अवसर था, क्योंकि वो बहुत ही सफल अर्थशास्त्री थे। और उन्होंने अपने ज्ञान का सर्वस्व, भारत की अर्थव्यवस्था पर न्यौछावर कर, देश को समृद्धशाली बना दिया था।  

इसके साथ ही उन्होंने लगातार दो बार सफलतापूर्वक प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला है भी संभाला।

अब जवाहरलाल नेहरू जी के बाद, मनमोहन सिंह जी और अब नरेन्द्र मोदी जी हैं, जिन्होंने लगातार प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला है। 

जिस बात से आरंभ किया था कि कैसे श्री मनमोहन सिंह जी के हस्ताक्षर थे रुपए(नोट) के ऊपर... तो उसका जवाब यह है कि भारतीय मुद्रा अर्थात् रुपए पर RBI के governor के sign  होते हैं। अतः जितने समय तक मनमोहन सिंह जी RBI के governor थे, उनके हस्ताक्षर, भारतीय मुद्रा पर अंकित होते थे। लेकिन सिर्फ उतनी ही अवधि तक, ना उसके पहले, न‌ ही बाद में...

श्री मनमोहन सिंह जी जैसे महान विचारक, अर्थशास्त्री और भूतपूर्व प्रधानमंत्री के निधन पर सात दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है।

उनके पार्थिव शरीर को आज अंतिम विदाई दे दी जाएगी...

Wednesday, 25 December 2024

Article: तुलसी पूजन में रखें यह ध्यान

 2014 से भारत में विदधमान बहुत से साधु-संतों ने यह विचार विमर्श किया कि, भारत में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा मिलना चाहिए। अनेकानेक विचार विमर्श के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया कि 25 December को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाया जाए।

उनका यह निर्णय, सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। आपको तुलसी पूजन दिवस  वाले article में यह सब विस्तार से पढ़ने को मिल जाएगा।

तुलसी पूजन में रखें यह ध्यान


आज के article में हम आपको बताने जा रहे हैं, तुलसा जी के पत्ते तोड़ते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए , क्योंकि हम केवल तुलसी पूजन दिवस में ही तुलसी पूजन नहीं करते हैं, अपितु और भी कई अवसर हैं, जिसमें तुलसी पूजन करते हैं। 

फिर चाहे बात तुलसी विवाह की हो, सत्यनारायण कथा की हो, या जन्माष्टमी महोत्सव, जैसे अनेक सभी अवसरों की...

या यूं कहें कि हर बार जब भी, प्रभू श्री हरि का पूजन किया जाता है, तुलसी जी के पत्ते अनिवार्य हैं, क्योंकि बिना तुलसी के पत्ते के पूजन आयोजन पूर्ण नहीं... 

तुलसी के पत्ते तोड़ने से पहले कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। आइए देखते हैं, क्या हैं वो...

तुलसी पत्ते तोड़ने से पहले 

  • हमेशा स्नान के बाद ही तुलसी को स्पर्श करना चाहिए।
  • तुलसी के पत्ते तोड़ने से पहले देवी का ध्यान करें और हाथ जोड़कर उनसे पत्तियों को तोड़ने की अनुमति लें। 
  • इसी के साथ कोमल हाथें से पत्ते तोड़ें। 
  • इन बातों का ध्यान रखने पर ही विष्णु जी तुलसी को भोग के रूप में स्वीकार करते हैं।
  • कभी भी सूर्यास्त के बाद तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, ऐसा करने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं, जिससे कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।  
  • कभी जूठे हाथों से तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। 
  • साथ ही बिना वजह तुलसी के पत्ते न तोड़ें, अन्यथा आपको इसके शुभ परिणाम नहीं मिलते।
  • तुलसी पूजन के दौरान या अन्य दिनों में भी महिलाओं को बाल खोलकर तुलसी की पूजा नहीं करनी चाहिए। बालों को बांधने के बाद ही तुलसी माता की पूजा करें।

जब यह बताया है कि क्या नहीं करना चाहिए, तो यह भी देख लीजिए कि क्या अवश्य करना चाहिए।

तुलसी पूजन में अवश्य करें 

  • तुलसी दिवस के दिन तुलसी पूजा करना काफी शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान तुलसी जी की 11 या फिर 21 परिक्रमा जरूर करें। 
  • मां तुलसी को लाल रंग की चुनरी भी जरूर अर्पित करें। ऐसा करने से साधक के सौभाग्य में वृद्धि होती है।
  • तुलसी पूजन दिवस पर, देवी के इन नामों का जाप जरूर करें, इससे आर्थिक तंगी दूर होगी।

Tuesday, 24 December 2024

Article : सांता नहीं, संतों की भूमि

आजकल सनातन संस्कृति का पुरजोर समर्थन चल रहा है, जिसके तहत बहुत से मंदिर का पुनरोत्थान या नवीनीकरण किया जा है। अगर इसे देश के नजरिए से देखा जाए तो यह बहुत हद तक सही भी है, क्योंकि भारत की भारतीय संस्कृति सनातन धर्म ही है।

कुछ लोग होंगे जो यह कहेंगे कि पहले भी क्या बुरा था, जब सर्व धर्म समभाव था। 

हमारे देश की संस्कृति, वैसे भी अनेकता में एकता है।

पर कभी आपने सोचा, कैसे भारत की सनातन संस्कृति, अनेकता में एकता के रूप में बदल गई? 

अगर आप पूरा article पढ़ेंगे तो आप को इसमें षड्यंत्र की राजनीति दिखेगी।

सांता नहीं, संतों की भूमि


कभी आपने सोचा, कैसे भारत के मूल नागरिक हिन्दूओं को गौण, और मुसलमानों और ईसाईयों को अल्पसंख्यक का नाम देकर प्रमुख बनाकर, सभी सुविधाएं प्रदान कर दी गई। 

क्यों हज के लिए सब्सिडी और हिन्दू तीर्थ यात्राओं के लिए Tax लगता है।

क्यों मंदिर से हर साल लाखों-करोड़ों रुपए सरकारी खजाने में जमा होता है, जबकि मस्जिदों और मजारों के लिए लाखों-करोड़ों की सहायता मिलती है...

क्यों मदरसों में क़ुरान पढ़ाया जाना, एक शिक्षा नीति के अंतर्गत आता है... पर गीता, रामायण, उपनिषद, ग्रन्थ आदि शिक्षा नीति में शामिल होना ban है?

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुस्लिम धर्म को ही flourish किया जाता है, बस उनको highlight ज्यादा किया जाता है। 

पर आपको पता है, ईसाई धर्म का प्रचार और प्रसार तो ऐसे किया जाता है, जो सबकी नस-नस में घोल दिया जाता है, पर उसका किसी को एहसास भी नहीं होता है।

हम यह क्यों कह रहे हैं, वो ही लिख रहे हैं, आप भी गौर कीजिएगा और बताइएगा कि किस हद तक सही है?

December का महीना चल रहा है, और यूरोपीय देशों में festivity का माहौल चल रहा है। चलना भी चाहिए, उनका सबसे बड़ा festival Christmas है। 

पर हमारे देश में क्या festival का माहौल नहीं है? क्या हमारे बच्चे Santa Claus का इंतजार नहीं कर रहे हैं? 

कर रहे हैं? उतनी ज्यादा बेसब्री से जितना कि उन्हें दीपावली का इंतजार भी नहीं रहता है...

पता है क्यों?

क्योंकि schools में बच्चों को हर साल समझाया जाता है कि होली, दीपावली में किस-किस तरह से problem होती है, मानो वो festival न हो, बस problems से भरे दिन हों और उन्हें छोड़ देना ही हितकर है।

और वहीं Christmas का celebration, उसके आने के, one week पहले से ही शुरू कर दिया जाता है। 

Schools में ऐसा माहौल create कर दिया जाता है कि मानो वो school, यूरोपीय देशों में पहुंच गया हो।

Schools में class में christmas tree, Santa Claus बनवाएं जाएंगे। White gift service के नाम पर donation लिए जाएंगे। 

किसी-किसी schools में jesus christ का जन्म भी ऐसे किया जाएगा, जैसे बस वही एक ईश्वर हैं। 

बच्चों के मन-मस्तिष्क में Jesus Christ की ईश्वरीय छवि बसा दी जाती है और उनको Christmas और अधिक tempting लगे, इसके लिए Santa Claus का बच्चों को gift देना भी शामिल होता है।

वरना जन्म तो भगवान श्री कृष्ण और प्रभू श्री राम जी का भी किया जा सकता है, पर किसी school में नहीं celebrate किया जाता है।

होली में रंग और पिचकारी और दीपावली पर पटाखे बच्चों के लिए gift ही तो होते हैं, जो Santa Claus के नाम पर secretly नहीं दिए जाते हैं। माता-पिता बच्चों की पसंद से दिलाते हैं। फिर उस gift को हिकारत भरी हुई नजरों से देखना, कहां तक उचित है?..

European countries में शायद आते होंगे कोई Santa Claus, पर India में तो Santa बच्चों के मां-बाप ही बनते हैं। 

पर क्यों? आवश्यकता क्या है? अगर secretly gift देना ही है तो, जन्माष्टमी, रामनवमी, आदि में भी दिया जा सकता है ना?...

एक सच्चाई और है, India में Santa Claus gift देने के लिए नहीं, बल्कि धर्म परिवर्तन कराने के लिए आते हैं। और एक बात जो बहुत लोगों को नहीं पता होगी। 

Christian religion में चर्च में रहने वाले Father and Nun, tax-free life lead करते हैं। 

तो अगर आप ध्यान दें, तो आप को भी समझ आ जाएगा कि क्यों सनातन संस्कृति को अनेकता में एकता के रूप में बदला गया...

सनातन संस्कृति का महत्व तो विदेशियों को भी समझ आ गया, हम कब समझेंगे?

यह देश संतों का है, सांता का नहीं, अपने बच्चों को सही दिशा निर्देश पर चलाएं और सनातन संस्कृति को बढ़ावा दें। क्योकि सनातन ही सत्य है, चिर है, निरंतर है, मोक्ष है, मुक्ति है।

जय सनातन, जय भारत!