Wednesday, 16 May 2018

Tips For Shoes

Tips for buying shoes


  1. The size of your feet changes as you grow older so always have your feet measured before buying shoes. The best time to measure your feet is at the end of the day when your feet are largest.
  2. Most of us have one foot that is larger than the other, so fit your shoe to your larger foot.
  3. Don't select shoes by the size marked inside the shoe but by how the shoe fits your foot.
  4. Select a shoe that is shaped like your foot.
  5. During the fitting process, make sure there is enough space (3/8" to 1/2") for your longest toe at the end of each shoe when you are standing up.
  6. Your heel should fit comfortably in the shoe with a minimum amount of slipping - the shoes should not ride up and down on your heel when you walk.
  7. Make sure the ball of your foot fits comfortably into the widest part of the shoe.
  8. Don't buy shoes that feel too tight and expect them to stretch to fit.
  9. Walk in the shoes to make sure they fit and feel right. Then take them home and spend some time walking on carpet to make sure the fit is a good one.
  10. The upper part of the shoes should be made of a soft, flexible material to match the shape of your foot. Shoes made of leather can reduce the possibility of skin irritations. Soles should provide solid footing and not be slippery. Thick soles cushion your feet when walking on hard surfaces. Low-heeled shoes are more comfortable, safer and less damaging than high-heeled shoes.



Tuesday, 15 May 2018

Story Of Life : तिरस्कार(भाग-2)

अब तक आपने पढ़ाकैसे सबका तिरस्कार झेलती राधिका अपनी ज़िंदगी गुज़ार रही थी।
अचानक उसकी मुलाकात अपनी घनिष्ठ सहेली प्रेरणा से हुई ....... अब आगे

तिरस्कार(भाग-2)

उसकी सास तो प्रेरणा की तारीफ करते नहीं थक रहीं थीं, बोलीं कि हमारी कमाऊ बहू ने तो हमारे घर का नक्शा ही बदल दिया। बेचारी दिन भर ऑफिस से थक कर आती है, पर हमारे आराम और खान पान का उसे बहुत ध्यान रहता है, दो नौकर लगा रखे हैं सारा काम काज करने के लिए, खाने पीने की चीजों से घर भर के रखती है, बहुत सुख से जीवन कट रहा है।

तभी प्रेरणा के आने पर सासु माँ अपने कमरे में चली जातीं हैं। राधिका ने प्रेरणा से दिनचर्या पूछी, तो उसने कहा सुबह 7:30 पर उठती हूँ, maid आ कर नाश्ता-खाना बनाने में लग जाती है और एक maid रिया को स्कूल के लिए तैयार करती है।

9 बजे तक मैं, मेरे husband और रिया तीनों निकल जाते हैं। दिन भर ऑफिस कर के शाम को 6 बजे तक वापस आती हूँ, शाम को चाय-नाश्ता करके थोड़ा T.V. देखना, फिर खाना खा कर सो जाना, बस और क्या।

तो घर के सारे काम, रिया को पढ़ाना, सुलाना, खिलाना, वो सब कैसे manage होता है?

रिया को पढ़ाने के लिए tutor आते हैं और बाकी सब के लिए maid हैं। मुझसे तो ये सब होता नहीं। छुट्टी के दिन क्लब या shopping के लिए निकल जाती हूँ।

तभी उसके पति का फोन आता है, बातों में बड़े ही प्यार से उसने बताया कि electricity का बिल और bank का काम हो गया है। उनका वार्तालाप सुन कर राधिका को समझ आ गया प्रेरणा के यहाँ उसका पति ही बाहर के कामकाज संभालते हैं, और साथ ही प्रेरणा को मान-सम्मान और प्यार भी खूब देतें हैं। तभी दो-तीन फोन और बजे तो प्रेरणा ने बड़े रूखेपन से बोल दिया “busy हूँ, I will call you later . पूछने पर पता चला कि वो फोन उसके रिश्तेदारों और मित्रों के थे।

चाय-नाश्ता करके राधिका अपने घर को रवाना हो गई। प्रेरणा से इस मुलाक़ात ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था। कदम तो घर कि ओर पर मन उसे कहीं और ले जा रहा था। वो सोचती हुई चली जा रही थी कि क्या उसके घर को समय समर्पित करने कि सोच सही थी? वो प्रेरणा से अधिक सक्षम थी, पर फिर भी उसे सिवाय तिरस्कार के कुछ नहीं मिल रहा था। कितनी सोच बदल गई है लोगों की, कि जहां पहले घर में रहने वाली और घर का काम खुद संभालने वाली स्त्रियों को सम्मान मिलता था और नौकरों से काम राने वालियों को तिरस्कार, वहीं आज तो धारणा ही बदल गई है। आज के इस उथल-पुथल ने उसे यह सोचने को मजबूर कर दिया कि वो पुनः job join करेगी। थोड़े से प्रयास से ही उसे प्रेरणा से अच्छी  job  मिल गयी।

आज उसके घर का माहौल बदल गया है। उसने भी दो नौकर रख लिए हैं। रोहन को अब tutor पढ़ाने आते हैं। पर नौकर तो नौकर होते हैं, राधिका जितना सबका ध्यान नहीं रखते, पर अब सबका सारा गुस्सा नौकरों पर निकालता। आए दिन नौकर बदले जाते। पर राधिका को अब बहुत प्यार और सम्मान मिलने लगा है। सभी उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते। और तो और जब किसी रिश्तेदार या दोस्त का फोन आता तो बात कि शुरुआत ऐसी होती busy तो नहीं हो, बात कर सकते हैं?

आज राधिका फिर सोच रही थी कि क्या ज़माना है, आज जब मेरे पास time है तो मैं लोगों को busy दिखती हूँ। क्या house wife होना इतने तिरस्कार की बात है? क्या हमारी माँओं का अपने जीवन का हर क्षण परिवार को समर्पित करना इतना तुच्छ था? जो माँ घर में रहकर प्यार बिखेरतीं, बड़ों को सेवा और छोटों को संस्कार देतीं हैं, क्या उसका कोई मोल नहीं है? हाय रे! दुनिया कि इस ‘working women’ की छाप ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है, जो आगे आने वाला समय बताएगा; और हमारा भारत भी आगे बढ़ने की होड़ में इतना दूर चला जाएगा कि सेवा, संस्कार, रिश्तो में प्यार और समर्पण, इन सब के मायने सब पीछे छूट जाएंगे।


Monday, 14 May 2018

Article : माँ

माँ


आज यूं ही बैठे बैठे ख़्याल आया, ये माँ शब्द का क्या अर्थ है। तब म व को अलग अलग किया, नहीं कोई संधि-विच्छेद नहीं, बस दो अक्षर को अलग किया, तो पाया कि, मैं आ गया।  

क्या यही अर्थ नहीं है? जब एक नन्हा शिशु, एक स्त्री की कोख में आ जाता है, तब वह स्त्री नहीं रह जाती है, बल्कि माँ बन जाती है। जैसे वो नन्हा शिशु कह रहा हो मैं आ गया
सच वो पहला एहसास ही जब एक स्त्री को पता चलता है, कि एक शिशु, उसकी कोख में आ गया है, वह क्षण उसके लिए सर्वाधिक अनमोल होता है, उसी क्षण से वह माँ स्वरूप में बदल जाती है, और वो नौ महीने, उसको एक अन्य दुनिया में ले जाते हैं, जिससे वो अपनी अंतिम सांस तक वापिस नहीं लौटती है।
उसकी सारी ज़िंदगी, सारी सोच अपने शिशु के इर्द-गिर्द ही सिमट जाती है। जैसे वो भूल ही जाती है, कि उसका अपना भी एक अस्तित्व है, अपनी भी एक पहचान है।
यही कारण है, बच्चे के कहे गए पहले शब्द सिर्फ माँ ही सबसे अच्छे से समझ पाती है, तब भी वो अपने बच्चे कि सब जरूरत को पूरी करती रहती है, जब वो बोल भी नहीं पाता है। माँ को ही सबसे पहले पता चलता है, कि उसके बच्चे को क्या परेशानी है, चाहे वो उसके पास हो, या दूर।
किसी और रिश्ते में, शायद स्वार्थ निहित हो, पर माँ की अपने बच्चे से कोई अपेक्षा नहीं रहती हैं।
पर क्या हमारा कोई फर्ज नहीं होता है, एक ऐसे रिश्ते के प्रति?
क्या हमें भी, अपनी माँ की हर इच्छा, उनके बताने से पहले नहीं समझ जानी चाहिए? और उन्हे पूरा करने की हर संभव कोशिश भी करनी चाहिए। क्योंकि माँ तो, कभी बताएँगी नहीं कि उन्हे क्या चाहिए।

मैंने देखा है माँ को अपनी ख्वाइशों को परतों में दबाते हुए                         
इल्म तोवो खुद को भी नहीं लगने देतींकि उन्हे चाहिए क्या है।                                     (इल्म : जानकारी)


माँ के तो चरणों में ही स्वर्ग है, कहा जाता है, ईश्वर से भी पहले माँ को पूजा जाता है, तो क्यों हम केवल एक दिन ही माँ दिवस मनाएँ। रोज़ ही कम से कम एक इच्छा को ही समझते जाएँ, और उसे पूरी करने का मन बनाएँ, या कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं, कि उनका सम्मान रें और करवाएँ।